
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम विकास है। सर मैं रांची, झारखंड से हूँ और पिछले 11 महीने से मैं आपको सुन रहा हूँ। मेरा प्रश्न, सर, आज के सत्र से रिलेटेड है। जो आपने ये बोला है कि जब केंद्र बेचैन है, तो उसकी कल्पना भी और अधिक बेचैन होगी, और इसमें कि बेचैनी को परख-परख के ही चैन मिलेगा, तो क्या हम लोग हैं ऐसे ही, क्या चैन ही बेचैन है? फिर इस तरह से कह सकते हैं।
और इसी तरह, मतलब बेचैनी में ही हम लोगों का ये जीवनकाल जो है, वो समाप्त हो जाएगा। क्योंकि, जैसे ये हम इस सेंस में पूछ रहे हैं कि जैसे पहले जब हम आपको आज से पहले सुना करते थे तब भी हम बेचैन ही थे, लेकिन आज बस वो है ना तल बदल गया है। बेचैन आज भी हैं हम लोग, वो चैन नहीं मिल रहा है।
तो क्या जो हमारी आज की डेट में बेचैनी है जिस तल पर, वही चैन है?
आचार्य प्रशांत: वही अगर चैन है तो फिर तो सब समाप्त हो गया ना, सब रुक गया। सब आपके चुनाव की बात है, आपको क्या मिलेगा, क्या नहीं मिलेगा ये मैं नहीं तय कर सकता, कोई नहीं तय कर सकता। ये आपको ही तय करना है।
बेचैनी जितनी गहरी होती है, वो अपने लिए उतने ही ऊँचे चैन की कल्पना कर लेती है। बेचैनी जितनी कुरूप होती है, वो अपने लिए उतनी ही सुंदर चैन की कल्पना कर लेती है। उसमें आकर्षण होता है, उस आकर्षण के सामने घुटने टेकने हैं कि नहीं, वो आपका चुनाव है।
प्रश्नकर्ता: हाँ सर, वो तो चुनाव है लेकिन सर वही बीच में दो रास्ते होते हैं ना — कि आकर्षण तो रहता है, बट, एक बहुत बड़ा आकर्षण होता है, एक उससे कम का आकर्षण होता है। जैसे ही अगर कोई भी एक चीज़ हम लोग पकड़ेंगे मतलब वहाँ पर भी वो बेचैन ही रहता है। वो एक तल के लिए चैन भी हो सकता है, बट बेचैन भी होता है।
आचार्य प्रशांत: क्या बोलना चाहते हैं, साफ़ बोलिए।
प्रश्नकर्ता: जैसे सर, मान लीजिए जैसे कि अभी एक उदाहरण के तौर पर लेते हैं, जैसे आज से 11 महीने पहले हम आपको यूट्यूब के माध्यम से सुना करते थे, आज हम आपके सत्र को जॉइन किए। बहुत सारे चीज़ों में एक क्लैरिटी आया है। क्लैरिटी आने के बाद, धीरे से एक तल तो बदला ही है लेकिन उस तल के बदलने के बाद ऐसा आज की डेट में फील होता है कि हाँ, ये तल तो बदला है और उसमें जो भी चीज़ें आ रही हैं, उसके साथ भी वो बेचैनी है कुछ ना कुछ।
आचार्य प्रशांत: आपको क्यों लग रहा है कि आपके पास अब जो चीज़ आएगी उसमें पूरा चैन होगा, ये क्यों लग रहा है? जो चीज़ें आ रही हैं उनमें कुछ ना कुछ बेचैनी है, तो उनसे आगे की चीज़ों पर जाइए।
प्रश्नकर्ता: हाँ सर वही, तो क्या ये बेचैनी ही एक तरीक़े से एक चैन का रूप है?
आचार्य प्रशांत: तल है। आप ऊपर बढ़ रहे हैं, बेचैनी में जो बेहोशी है वो कम होती जा रही है।
प्रश्नकर्ता: जी, हाँ वो बेहोशी कम हो रही है।
आचार्य प्रशांत: बेहतर देख पाएँगे कि “हाँ, बेवकूफी हो रही है, हो रही है, हो रही है, हो रही है, हो रही है।”
मुक्ति एक सतत प्रक्रिया है, जो आखिरी साँस तक चलती है।
कभी ऐसा नहीं होगा कि अब जो मेरे पास है, वही सर्वश्रेष्ठ है और अंतिम है। जो होगा, उससे लगातार आगे बढ़ते रहना होगा। 11 महीने नहीं, 11 साल नहीं, आप अगर 110 साल जी गए तो 110 साल।
प्रश्नकर्ता: इसका मतलब यही है कि जो बेचैनी और चैन के बीच में एक बेहोशी है, उसका लिमिट हम लोगों का कम होता जाएगा।
आचार्य प्रशांत: जैसे भी आप कहना चाहें। नींद होती है ना, तो बहुत गहरी नींद होती है, कम गहरी नींद होती है, अधजगे होते हैं, फिर जग जाते हैं कई बार तो भी थोड़ा-सा हल्की खुमारी होती है, और फिर एक होता है — संपूर्ण जागरण। डिग्रीज़ होती हैं ना।
प्रश्नकर्ता: जी।
आचार्य प्रशांत: दर्द भी वैसा ही होता है, एक दर्द इतना गहरा होता है कि बेहोश हो जाएँ। एक दर्द होता है कि बस चीख रहे हैं। एक दर्द होता है कि चल नहीं सकते, पड़े हैं। एक दर्द होता है कि है दर्द, पर काम कर रहे हैं। एक दर्द होता है कि पता ही सिर्फ़ तब चलता है जब थोड़ा ध्यान दो, नहीं तो है दर्द, डिग्रीज़ होती हैं।
प्रश्नकर्ता: तो उस डिग्री को कम करने का मतलब क्या सिर्फ़ तर्क और कुतर्क करते रहना होता है? या मतलब, वो अपने आप एक ऐसा पड़ाव आता है कि वो कम हो जाता है?
आचार्य प्रशांत: आगे क्या आता है क्या नहीं आता है, ना पता, ना उसका कोई भरोसा दिलाया जा सकता है। अभी आप जहाँ पर हैं, वहाँ आप अपने लिए जो-जो गड़बड़ियाँ कर रहे हैं, जो-जो बंधन तैयार कर रहे हैं उनको ख़ुद ही देखिए ध्यान से।
आपके सब सवालों में भविष्य का आश्वासन माँग रहे हैं आप। आपकी अभी की जो स्थिति है उस पर पूरा ध्यान दीजिए और उससे बेहतरी क्रमशः ही होगी। अचानक से कोई चमत्कार नहीं हो जाना, किसी दिन कोई चमत्कार नहीं हो जाना। चमत्कार या अकस्मात पूर्ण मुक्ति, इसकी उम्मीद भी वही करते हैं जिन्हें अपने बंधनों के ज़ोर का पता नहीं होता।
आप मेरे पास आएँ, मैं आपको बोलूँ कि आपको बोन मैरो का कैंसर है। मैं कहूँ कि कल ये कुछ और टेस्ट्स हैं, ये करा के लाइए और अभी के लिए ये गोलियाँ ले लीजिए। और आप कहें “अच्छा, गोली दे दी है तो कल सुबह तक ठीक हो जाएगा ना?”
इसका मतलब क्या है?
मतलब है कि आप अपने मर्ज़ की गहराई से परिचित ही नहीं हैं, आप समझ ही नहीं रहे हैं कि बोन मैरो कैंसर क्या होता है। जो समझेगा, वो कहेगा, “मेरे लिए इतना ही काफी है कि दर्द थोड़ा-सा कम हो जाए, ज़िंदगी थोड़ी-सी बढ़ जाए।”
जो अध्यात्म में आए और कहे कि, “ढाई-तीन घंटे में हो जाएगी मुक्ति।” कोई क्रैश कोर्स है? कोई कॉन्सीक्रेटेड वाटर वग़ैरह है, ऐसे छींटा मार दीजिए तो जल्दी से हमारा काम हो जाए। इसका मतलब है वो समझ ही नहीं रहा कि माया किस कैंसर का नाम है, तभी तो वो इस तरह की उम्मीदें रख सकता है।
कैंसर तो फिर भी हो सकता है कि पूरे तरीक़े से क्योर हो जाए, माया पूरे तरीक़े से कभी नहीं होती, वो बस रेमिशन में जाती है और थोड़ा-सा गड़बड़ कर दो, वापस आ जाती है। वहाँ ये सब सवाल पूछना, और दिन गिनना या कैलेंडर के पन्ने पलटना कि 4 महीने बीत गए, 11 महीने बीत गए — मतलब माया को बहुत हल्के में ले रहे हो।
कोई चूर्ण वाला खेल है?
ये खेल ऐसे ही चलता रहा तो बहुत जल्दी कहीं बाबा जी की चूर्ण ही चाट रहे होगे, क्योंकि वहाँ पर त्वरित समाधि लगती है (दो श्रोताओं पर मंत्र फेंकने का नाट्य करते हुए), अभी दोनों लोटना शुरू कर देंगे।
मुझे ये बड़ा मज़ेदार लगता है, तुम 30 साल के हो, 40 साल के हो, 50 साल के हो, जिन्होंने 50 साल तक बेवकूफ़ बनाया उनसे कभी जाकर नहीं पूछते, “कि 30-50 साल बेवकूफ़ बनाया और जो चीज़ देने का वादा किया था, वो कब दोगे? इतनी सारी बेड़ियाँ पहना दी इतने दशकों में और कहा था कि बेड़ी पहन लोगे तो अमृत बरसेगा। वो अमृत कब बरसेगा?”
उनसे कभी नहीं पूछते।
और यहाँ आते ही बिल्कुल ऐसे हिसाब-किताब, “देखिए जी, 5 महीने हो चुके हैं, वो एनलाइटनमेंट अभी तक नहीं आया। 5 महीने, पूरे 5 महीने बीत गए हैं। नहीं 11, 11 महीने। 11 महीने हो गए एनलाइटनमेंट नहीं आया।”
आओ और सूद समेत वापस माँगो, ब्याज वग़ैरह सब कुछ कि 11 महीने हो गए, इनलाइटनमेंट नहीं दिया। पिछवाड़े में मूली लगी हुई है कि उखाड़ लेंगे, एनलाइटनमेंट है। वहाँ 30 साल, 50 साल में भी नहीं पूछने जाते, यहाँ 11 ही महीने में हो गया, “टीटू की जान लेंगे क्या? 11 महीने बीता दिए।” बेकदरी है बस, बेकदरी है।
वहाँ हिम्मत ही नहीं पड़ेगी जाकर पूछने की, वहाँ जाकर पूछने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी, “पंडित जी, आपने इतनी बार कथा में बैठाया है, और हर बार बोला है कि अब तुम्हारे ऊपर ये-ये इनकी-इनकी कृपा हो गई और मैं तो तब भी झुन्नूँ हूँ, इतनी कृपा के बाद भी।” जाकर पूछा कभी?
परिवार से, माँ-बाप से, जहाँ से शिक्षा मिली है, जहाँ से दुनिया भर के प्रभाव और संस्कार पड़े हैं, उनसे कभी जाकर पूछा कि “जो-जो बातें बोली थीं कि ऐसा करो, ऐसा करो, हमने सब करा, हमें मिला क्या?” वहाँ कभी पूछते हो? पर यहाँ के लिए अलग मानदंड होते हैं, यहाँ के लिए अलग स्टैंडर्ड्स होते हैं, “11 महीने बीत गए हैं, देखिए।”
इससे ज़्यादा एंकलेस जॉब नहीं होता है, इसमें सिर्फ़ एक तरीक़े से रहा जा सकता है कि हँस लो, अपने ही ऊपर हँस लो। कोई आपको आपकी पूरी ज़िंदगी बेवक़ूफ़ बनाए रहा, आप उससे जाकर के कभी सवाल नहीं करते। आपको उससे कोई समस्या भी नहीं है, सही बात तो ये है।
पर मैं आपको ये बता दूँ, कि उसने आपको बेवक़ूफ़ बनाया है, तो आपको मुझसे समस्या है। मैंने बेवक़ूफ़ नहीं बनाया है, मैंने सिर्फ़ बताया है कि उसने बेवक़ूफ़ बनाया है इसलिए आपको मुझसे समस्या है। क्योंकि मेरे बाद ही आपको पता चल गया कि आप बेवक़ूफ़ हो। बेवक़ूफ़ आप हमेशा से थे, पर आपको ये कोई बताने वाला नहीं था कि आपको लगातार बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा है, तो आपकी गाड़ी मज़े में चल रही थी।
मैं विलेन इसलिए हूँ क्योंकि मैंने आकर के बता दिया है कि देखो भाई, तुम्हारा रोज़-रोज़ बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा है। तो अब बड़ा क्रोध है, जैसे मैंने बेवक़ूफ़ बनाया हो।
फिर इतना ही नहीं, “अब तुम ही ने बताया था ना कि बेवक़ूफ़ बन रहे हैं, तो बताए हुए 11 महीने बीत चुके हैं, बताओ हम अभी भी बेवक़ूफ़ क्यों हैं?” मैं क्या करूँ? ये ऐसी-सी बात है कि कोई चला जा रहा हो स्कूटर पर, बाइक पर झुन्नूँ, उसको बोलो कि भाई, तेरा स्टैंड ऊपर कर ले। वो ऊपर भी ना करे और आगे जाकर के गिर जाए, और फिर तुमसे बोले “रुको-रुको, तुम ही को मारेंगे।” बोले, “काहे को मार रहे हो?” बोले, “जब तूने बताया, तो फिर तूने स्टैंड उठा भी क्यों नहीं दिया।”
बोले, “क्योंकि हमें तो नहीं पता था कि स्टैंड अटका हुआ है।” पता किसको था?
श्रोता: हमको।
आचार्य प्रशांत: तो ज़िम्मेदारी भी किसकी है?
श्रोता: हमारी।
आचार्य प्रशांत: तेरी है, तू ही आकर के स्टैंड ठीक भी कर। मैं बताना ही छोड़ दूँगा। लोगों के कम्युनिटी पर आते हैं, "आचार्य जी, आपको 7 महीने से सुन रही हूँ, आपकी सारी बातें सब समझ में आती हैं और एक ही बात तो आप बोल रहे हो ना कि प्रकृतिस्थ होकर जियो। सारी बात हमें समझ में आती है, लेकिन फिर भी हमारी ज़िंदगी नहीं बदली।"
अब मैं उनका खोलता हूँ परसेंटेज देखता हूँ, कभी -24 है, कभी -2 है, कभी 18 है, कभी 1.45 है। और दावा क्या है, "आपकी सारी बातें...।"
दीदी, अपनी प्रजाति की लाज रखो, तुम होमो सेपियन्स कहलाती हो। सेपियन्स से आशय होता है — बुद्धिमान। वहाँ लिख रही हैं, "7 महीने से सारी बात समझ में आती है।" सारी बात समझ में आ रही है, तो ये 2.5 और 4 और 18, ये परसेंटेज कहाँ से आ गया? वो हम ही को बता रही हैं, "आपने कुल इतना ही तो बताया है ना प्रकृतिस्थ होकर जियो। अब मैं पूरी तरह प्रकृतिस्थ हो गई हूँ।"
माने क्या हो गई हो? क्या कर डाला? डर लगता है पढ़ के, मेरे नाम पर पता नहीं क्या चल रहा है कल अख़बार में छपेगा।
और कुछ?
प्रश्नकर्ता: नहीं सर, प्रणाम।