मुक्ति एक सतत प्रक्रिया है, जो आखिरी साँस तक चलती है। कभी ऐसा नहीं होगा कि अब जो मेरे पास है, वही सर्वश्रेष्ठ है और अंतिम है। जो होगा, उससे लगातार आगे बढ़ते रहना होगा। 11 महीने नहीं, 11 साल नहीं, आप अगर 110 साल जी गए तो 110 साल।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा नाम विकास है। सर मैं रांची, झारखंड से हूँ और पिछले 11 महीने से मैं आपको सुन रहा हूँ। मेरा प्रश्न, सर, आज के सत्र से रिलेटेड है। जो आपने ये बोला है कि जब केंद्र बेचैन है, तो उसकी कल्पना भी और अधिक बेचैन होगी, और इसमें कि बेचैनी को परख-परख के ही चैन मिलेगा, तो क्या हम लोग हैं ऐसे ही, क्या चैन ही बेचैन है? फिर इस तरह से कह सकते हैं।
और इसी तरह, मतलब बेचैनी में ही हम लोगों का ये जीवनकाल जो है, वो समाप्त हो जाएगा। क्योंकि, जैसे ये हम इस सेंस में पूछ रहे हैं कि जैसे पहले जब हम आपको आज से पहले सुना करते थे तब भी हम बेचैन ही थे, लेकिन आज बस वो है ना तल बदल गया है। बेचैन आज भी हैं हम लोग, वो चैन नहीं मिल रहा है।
तो क्या जो हमारी आज की डेट में बेचैनी है जिस तल पर, वही चैन है?
आचार्य प्रशांत: वही अगर चैन है तो फिर तो सब समाप्त हो गया ना, सब रुक गया। सब आपके चुनाव की बात है, आपको क्या मिलेगा, क्या नहीं मिलेगा ये मैं नहीं तय कर सकता, कोई नहीं तय कर सकता। ये आपको ही तय करना है।




