
व्यक्ति और उसके माता-पिता दोनों अक्सर प्रेम के नाम पर एक-दूसरे पर अधिकार जताते हैं, जबकि संबंधों में निर्णय सम्मान, समझ और स्वतंत्रता पर आधारित होने चाहिए। वयस्क होने के बाद जीवन के महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। सच्ची परवरिश निर्भरता नहीं, आत्मनिर्भरता पैदा करती है। पारिवारिक दबाव का बड़ा हिस्सा प्रेम से नहीं, बल्कि भय, सुविधा, अपेक्षाओं और स्वार्थ से संचालित होता है। स्वस्थ संबंध वहीं संभव हैं जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की चेतना, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करें।








प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कोई भी अपने विचार हमपर थोप देता है, उसी विचार को हम फिर अपना बना लेते हैं और उसी के अनुसार जीने लगते हैं। दूसरों के विचारों को अपने ऊपर आने से कैसे रोकें?
आचार्य प्रशांत: क्या ये सवाल भी दूसरों ने कहा है पूछने को?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। इन दो पंक्तियों ने मुझे अन्दर तक स्पर्श किया है: “वक़्त है कम, लम्बी मंज़िल, तुम्हें तेज़ क़दम चलना होगा।


प्रश्नकर्ता: ज्ञानी कौन है और अज्ञानी कौन है?


आचार्य प्रशांत: विपिन पाल हैं यूट्यूब से, कह रहे हैं, ‘आचार्य जी की बातें वैसे तो ठीक होती हैं, लेकिन बताते बहुत ऐटीच्यूड से हैं। एक दोस्त की तरह नहीं बोलते, ये बात मुझे खटकती है।’
हाँ है ऐटीच्यूड, तो? तुम्हें कैसे पता एक दोस्त होता कैसा है? ये…


आचार्य प्रशांत: तो सवाल है कि एक फ़िल्म आई थी 'द मास्क' के नाम से। उसमें जो मुख्य चरित्र था उसे एक मास्क मिल जाता है, एक मुखौटा मिल जाता है। उस मुखौटे के मिलने से उसे दुनियाभर की तमाम लड़ाइयों में जीत मिलने लग जाती है, शोहरत…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यदि जब सत्य पूर्ण है तो उसी स्रोत से जब चेतना आती है तो वो अपूर्ण क्यों है?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इंसान में इतना आजकल अपने आप को प्रूव (साबित) करने का इतना जोश क्यों होता है, कि दुनिया को प्रूव करके दिखाना है कुछ? मतलब जैसे आजकल टीवी पर भी देखते हैं, तो मैं एक शो में गया था; उसका

सर्वभूतेषु चात्मानं
सर्वभूतानि चात्मनि।
मुनेर्जानत आश्चर्यं

प्रश्नकर्ता: रुमी की कोट्स(उक्तियाँ) पढ़ रहे थे।


प्रश्नकर्ता: एक महिला होकर घर और कार्यस्थल में समुचित तादात्म्य कैसे स्थापित किया जाए?

प्रश्न: आचार्य जी, हमारे अभिभावक, हमारे बड़े, जो भी सुझाव देते हैं क्या वो हमेशा सही होते हैं?



आचार्य प्रशांत: तुम एक बार ये समझ गए के ये डोमिनेशन(वर्चस्व) है, फिर ये काम कर नहीं सकता ! यह काम ही सिर्फ तभी करता है जब तुम नहीं जानते की ये वर्चस्व है ।
तुम वर्चस्व को कई बार प्यार समझ लेते हो, तुम वर्चस्व को कई…

प्रश्न: आपकी प्रोफाइल देखी है, आपने आई. आई. टी. दिल्ली से इंजीनियरिंग की है और उसके बाद आई. आई. एम्. अहमदाबाद । तो उसके हिसाब से आप अब्रॉड में इस समय बहुत मजे से ऐश कर सकते थे ।

प्रश्न: मेरा प्रश्न यह है कि भारत के संविधान में जब यह उल्लेखित है कि समानता का अधिकार सभी को प्राप्त है, तो फिर मुझे मेरी जाति के आधार पर आरक्षण का दंश क्यों झेलना पड़ा

श्रोता:सर, हम कैसे अपने निजता को पाएं? जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, तब हम उसे खो देते हैं।



अक्षयं गतसंतापमात्मानं पश्यतो मुने:।

प्रश्नकर्ता: सर, ताकत पाने के लिए क्या किया जाए?

वक्ता: सिर्फ निजता है, जो हक के साथ कह सकती है कि “मैं हूँ, बाकि कुछ है नहीं।’’ ‘है’ शब्द का प्रयोग करने का हक़ सिर्फ़ निजता को है; बाकि सब तो बस लगता है कि है। ‘वो’ वास्तव में है, सब कुछ उसी से उठता है। दो शब्द हैं



श्रोता (वेदप्रकाश): रामकृष्ण ने कहा कि “मैं किसी भी स्त्री को देखता हूँ तो मुझे उसमें ‘दुर्गा’ या ‘काली’ दिखती हैं”, कृपया समझाएं।
वक्ता: रामकृष्ण ने कहा कि “मैं किसी भी स्त्री को देखता हूँ तो मुझे उसमें ‘दुर्गा’ या ‘काली’ दिखती हैं”, तो यह कोई विधि नहीं थी, यह

वक्ता: वो जो छोटा आदमी है, जो उसको अपना आत्म-सम्मान बोल रहा है। तो वो आत्म-सम्मान कहाँ से आ रहा है? वो समाज के वातावरण से आ रहा है जिसमें बड़े लोगों को प्राथमिकता दी जाती है, ठीक? तो क्या ये वास्तव में उसका आत्म-सम्मान है या ये उसके

प्रश्नकर्ता: सर, मेरा सवाल यह है कि क्या हमें अपनी ज़िन्दगी हमेशा दूसरों के बताए हुए रास्ते पर ही चलानी चाहिए या हमारी ख़ुशी जिसमें है वो काम करना चाहिए? जैसे कि मैं डिप्लोमा का कोर्स कर रहा हूँ। बहुत से लोग, यहाँ तक कि मेरे घर में – मेरे…

वक्ता: सरफ़राज़ का सवाल है कि अभी हमसे कहा जाए कि अपने बारे में कुछ लिखो, अपने बारे में कुछ बताओ, अपना विवरण दो –

वक्ता: ये बात बिल्कुल ठीक है कि आदमी से आदमी का संबंध होता है और उसी का नाम समाज है| पर असल में ऐसा होता कहाँ है? मैं और आप मिलते हैं, तो हम व्यक्तियों की तरह कहाँ मिलते हैं? मैं होता हूँ, आप होते हैं और समाज होता है|


प्रश्नकर्ता: मैं अपने डर को कैसे तोड़ सकता हूँ? जब तक मुझे बाहरी सहायता न मिले, मैं कैसे अपने ही द्वारा बनाए गए खेलों से, अपनी सीमाओं से बाहर आऊँ?

प्रश्नकर्ता: सर, बचपन से सुनते आए हैं ‘स्वयं से पहले सेवा’। पर यहाँ आकर सुना कि ‘सेवा से पहले स्वयं’। तो सर ये…

प्रश्न: सर, हम ‘चरित्र’ शब्द का अर्थ जानना चाहते हैं|

वक्ता: यह जो हमारा मस्तिष्क है, यह करीब-करीब एक यंत्र है। सच तो यह है कि हम निन्यानवे प्रतिशत यंत्र ही हैं और जैसे एक यंत्र की पूरी-पूरी प्रोग्रामिंग रहती कि वो क्या करेगा और क्या नहीं करेगा, ठीक उसी तरीके से हमारी भी पूरी-पूरी प्रोग्रामिंग रहती है, जिसे हम…


प्रश्नकर्ता: आप ये जो बातें बताते हैं वो एक व्यक्ति के लिए तो सही हैं, वो इनको व्यवहार में ला सकता है, या सीख सकता है, अंदर से खुद ऐसा बना सकता है, लेकिन एक समूह में आने के बाद वो सारी बातें निरर्थक-सी हो जाती हैं। तो ये अलग
प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…
लोग भी न बंदा देख कर और शक्ल देख कर बोलते हैं। तुम शेर की तरह रहो, शेर की तरह जियो, किसी की हिम्मत नहीं होनी चाहिए तुम पर आक्षेप या आपत्ति करने की।
सिर्फ़ इसलिए कि आपकी काया में कोई हिस्सा कम है या त्रटिपूर्ण है, दुख आवश्यक नहीं है। उसकी अपनी तरह की चेतना होगी, उसे जीने दो न, उसका अपना एक संसार होगा, समस्त जीवों की चेतना वैसे भी एक जैसी नहीं होती। तुम्हें स्वीकार ही नहीं हो रहा कि तुम्हारे सामने जो है, वो भी परमात्मा की ही एक अभिव्यक्ति है।
प्रश्नकर्ता: जिस समाज में मैं प्रतिदिन जी रहा हूँ, उसमें ताकत और प्रतिष्ठा ही सबकुछ है। जिसकी हैसियत और उपाधि न हो, उसे कोई सुनता भी नहीं, और जो समाज में ऊँचे स्थान पर बैठा है, वो कुछ अनर्गल ही क्यों न बके, वो परम सत्य मान लिया जाता है।…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम गवाक्ष जोशी है। मैं आइआइटी कानपुर में पीएचडी का छात्र हूँ। और विद्युत अभियान्त्रिकी विभाग से। मेरा प्रश्न धर्म को लेकर है। मैं हितोपदेश मित्रलाभ पढ़ रहा था! तो एक श्लोक आया था मेरे सामने, जिसका अर्थ ये था — भोजन, निद्रा, भय और…
प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। आपने पढ़ने के लिए एक किताब सुझाई था जिसका नाम था ‘लस्ट फ़ॉर लाइफ़’ बाय इरविन स्टोन, जो कि विन्सेंट वैन गॉग जी की बायोग्राफ़ी थी। सर, उन्होंने जो संघर्ष किया अपनी पूरी ज़िन्दगी में और वो बहुत कम आयु पर ही चले गये थे। क्या उनका…
आचार्य प्रशांत: सेल्फ़ एस्टीम (आत्म सम्मान)। एस्टीमेशन (अनुमान लगाना) शब्द का क्या अर्थ होता है? एस्टीमेशन का क्या अर्थ होता है?
श्रोता: अनुमान।
आचार्य: अनुमान लगाना। है ना? अनुमान। बढ़िया है, अनुमान शब्द को ही पकड़ लो। तुम्हारा नाम क्या है?
श्रोता: आशा।
आचार्य: आशा। बैठो। ये नाम जानती हो…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शानदार व्यक्तिव का मालिक बनना चाहता हूँ।
आचार्य प्रशांत: मालिक बनो नहीं, मालिक के हो जाओ। जो शानदार मालिक का हो जाता है, उसको फिर बहुत सारी शानदार चीज़ें मिल जाती हैं। जल्दी से बस माँग रख देते हो, हाथ फैला देते हो — ‘ये चाहिए।‘ जो…
आचार्य प्रशांत: हम एक भूत, माने एक पदार्थ की उत्पत्ति का कारण सदा दूसरे पदार्थ को मानते हैं और बात निपटा देते हैं। भूत माने मैटेरियल, भौतिक पदार्थ। जब आप एक भूत की उत्पत्ति का कारण दूसरे भूत को मानते हो और दूसरे की उत्पत्ति की वजह तीसरे को…
प्र: किस चीज़ का ज्ञान?
आचार्य: चीज़ का ज्ञान। चीज़ कुछ भी हो सकती है, हर ज्ञान चीज़…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप हमें जो ज्ञान देते हैं, वह कहाँ से आता है?
आचार्य प्रशांत: कल कहा था न मैंने कि आप मुझसे सीख रहे हो और मैं आपसे सीख रहा हूँ। ज़िन्दगी देखता हूँ, और ज़िन्दगी में वो सारे गुरुजन शामिल हैं जो इस संसार में रहे और…
आचार्य प्रशांत: चेतना अपूर्ण होती नहीं है। चेतना के पास चुनाव होता है पूर्ण या अपूर्ण होने का। वास्तव में सत्य और चेतना अलग-अलग नहीं है। सत्य ही जब…
~ अष्टावक्र गीता
आचार्य प्रशांत: जब उस योगी ने जान ही लिया है कि वही समस्त भूतों में निवास करता है और समस्त भूत उसमें हैं, तब ये बड़े आश्चर्य की बात है कि अभी भी उसमें ममत्व बचा रहे। जिस मुनि…
प्रश्नकर्ता: “इफ यू डिजायर हीलिंग लेट् योरसेल्फ फॉल इल्ल” (यदि आप उपचार की इच्छा रखते हैं तो अपने आपको बीमार होने दें)
आचार्य: बहुत सुंन्दर, मतलब क्या है इसका?
प्रश्नकर्ता: सर, वैसे तो हमारे…
आचार्य प्रशांत: संदीप (श्रोता की ओर इशारा करते हुए) पूछ रहा है, "अपने ही लिए जीना चाहिए या दूसरों के लिए भी? हमारी कुछ ज़िम्मेदारियाँ हैं जिन्हें हमें निभाना पड़ेगा जैसे बेटा हूँ, भाई हूँ।" चलो, संदीप खुद ही बोलो।
प्रश्नकर्ता: सर, अब तक तो हम सोच रहे थे कि…
आचार्य प्रशांत: देखिए, जब आप कहती हैं कि - "एक महिला होकर घर और कार्यस्थल में समुचित तादात्म्य कैसे बैठाया जाए,” तो आप शायद अपनी पहचान के भीतर से ये सवाल कर रही हैं। आपने सवाल…
आचार्य प्रशांत जी: मैं बड़ा हूँ तुमसे, हूँ न? मैं जो जवाब दूँगा, तुम्हें कैसे पता वो सही होगा?
यही प्रयोग कर लेते हैं। मैं भी तो बड़ा हूँ, जैसे दूसरे बड़े…
प्र: अधूरा।
आचार्य: तो क्या स्वभाव हुआ तुम्हारा?
प्र: पूरा।
आचार्य: और जानना। तो, बोध स्वभाव है, और पूर्णता स्वभाव है।
कुछ बोला मैंने और समझ गए, तब कैसा…
प्रश्न: आचार्य जी, बाहरी प्रभावों से कैसे बचा जाए?
आचार्य प्रशांत: (सत्संग शुरू होने के कुछ समय पहले आचार्य जी ने कुछ श्रोताओं को शांत होकर बैठने के लिए कहा। उसी बात का उल्लेख आचार्य जी ने उदाहरण के रूप में लिया।)
अभी मैं डाँट रहा था। उस…
आचार्य प्रशांत: जब तुम अपने छोटे भाई से लड़ते हो तो वो बुरा माना जाता है, जब तुम अपने पड़ोसी…
(अट्टहास)
आपको किसी ने क्या प्रेरित किया, जो आज आप…
आचार्य प्रशांत: नाम क्या है तुम्हारा?
श्रोता: लोकेन्द्र
वक्ता: लोकेन्द्र,…
वक्ता:तुम्हारा नाम क्या है?
श्रोता:अभिषेक।
वक्ता:अभिषेक, ये कितने लोग ने देखा है कि जो भी कुछ आपको पता है, इसको आप ज़िन्दगी का मूल कह सकते…
आचार्य: प्रतियोगिता हाँ।
प्र: सर, तो अगर प्रतिस्पर्धा नहीं होगी तो श्रेष्ठ नहीं पता चलेगा। प्रतिस्पर्धा हमें श्रेष्ठ देने में मदद करती है।
आचार्य: मैं तुम्हें जो जवाब दे रहा हूँ वो मेरी तरफ़ से श्रेष्ठ जवाब…
प्रश्नकर्ता: मैं अपनी ऊर्जा और समय को कैसे दिशा दूँ, ताकि मैं सबसे अलग और अनूठा बन पाऊँ?
आचार्य प्रशांत: जो तुमने सवाल पूछा है, उत्तर बिलकुल इसी में बैठा हुआ है, सामने ही है। तीन बिन्दुओं का उत्तर है और तीनों तुम्हारे सवाल से ही निकल कर आ रहे…
क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोअहम ममेति वा।।
(जो मुनि आत्मा को अक्षय व गतसंताप देखता है, उसके लिए कहाँ विद्या है और कहाँ विश्व है? उसके लिए कहाँ ‘मैं देह हूँ’, और कहाँ ‘देह मेरी है’ की भावना है?)
(अष्टावक्र गीता, १८.७४)
आचार्य…
प्रश्न: सर, आपका एक विडियो था उसमें बोला था कि *बीइंग ह्यूमन इज़ इंटेलिजेंस, बिकॉज़ अदरवाइस इट इज़ कंडीशनिंग*और सर, मानुष जन्म का मतलब भी यही हुआ कि अभी में स्थापित हो गए,बीइंग इन नाउ। तो वो भी और यह भी एक हैं?
वक्ता: उसमें कहीं कोई अंतर दिख…
वक्ता: तुम्हें किसने कह दिया कि बाहर से जो आ रहा है, इसके दो प्रकार होते हैं, अच्छा और बुरा?
श्रोता: ये ही सिखाया गया है, सर।
वक्ता: किसने, बाहर से?
श्रोता: बाहर से ही तो सीखेंगे।
वक्ता: तो वही तो कह रहा हूँ,
मूल अंतर बस दो हैं- ‘…
आचार्य प्रशांत: जीवन किसी बाहरी सहायता की प्रतीक्षा करने का नाम नहीं है। जीवन किसी ख़ास मसीहा के स्वागत के…
आचार्य प्रशांत: तो फँस गए!
प्र: हाँ, सर।
आचार्य: बैठो। बात ठीक है। भ्रम पैदा होना लाज़मी है। सेवा करेगा कौन? अब छह लोग तुम्हारे आसपास सोए…
(सभी श्रोतागण हँसते हैं)
वक्ता: अभी सप्ताह भर पहले किसी ने रात के दस बजे एस.एम.एस. पर पूछा, ‘सर कैरेक्टर, चरित्र क्या होता है?’ मैंने जवाब दिया एस.एम.एस. है,…
वक्ता: विवेक का सवाल है कि हम अपनी कमजोरियों को कैसे जान सकते हैं| कैसे पता कि कुछ कमज़ोरी है? कैसे पता कि कुछ कमी है ही तुममें?
तुम एक ऐसे देश में पैदा हुए जिसके मन से अभी भी अंग्रेजों कि ग़ुलामी गयी नहीं है| तो यहाँ पर अभी…