और हम चीन से आगे निकल गए || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। सर, मेरी एक कज़न हैं जो पहले से ही एक बच्चे की माँ हैं। और अभी हाल में ही उनसे बात हुई थी तो वो दूसरा बच्चा भी प्लान कर रही हैं। इस बारे में जब बात की कि इंडिया की जनसंख्या चाइना से ज़्यादा हो रही है, तो आप क्यों कर रहे हो? तो उनका बस यह कहना था कि 'मैं अभी तीस की होनेवाली हूँ, तो दो बच्चें तो चाहिए; उसके बाद मैं कर नहीं पाऊँगी।' फिर यह बोला कि गोद ले लो। उसका उत्तर यही मिला कि अपना बच्चा तो अपना ही होता है। सर, हम किस दिशा में जा रहे है?
आचार्य प्रशांत: मैटर्निटी वार्ड (प्रसूति कक्ष) की दिशा में। (सब हँसते हुए) मैं क्या बोलूँ इसमें? कुछ नहीं है करने को ज़िंदगी में तो यही करो। और क्या है? देखिए, यह मुझ पर बहुत बार इल्ज़ाम लग जाता है, कहते हैं, 'आप महिला हो क्या? जब महिला नहीं हो, तो हमारे मुद्दों पर क्यों बोलते हो? और वो भी हमें अनाब-शनाब क्यों बोलते हो?' महिलाओं को बड़ी दिक़्क़त होती है।
देखिए, महिला नहीं हूँ लेकिन इंसान हूँ। महिलाएँ भी इंसान ही होती है। एकदम से मैं महिला के चित्त में प्रवेश नहीं कर सकता। लेकिन एक इंसान होने के नाते दूसरे इंसान की क्या संवेदनाएँ होती हैं, ज़िंदगी कैसी होती है इसको थोड़ा-बहुत तो मैं अनुभव कर सकता हूँ न? अनुभव करने के नाते कहा करता हूँ। यह आपको बड़े भ्रम में डाल दिया गया है, बड़े जाल में बाँध दिया गया है, आपको बार-बार बोल करके कि बच्चा बड़ी महत्वपूर्ण चीज़ होती है।
देश की आबादी चीन से ज़्यादा हो गई है, ठीक है, चलो वो तो एक एग्रीगेटेड फ़िगर (कुल आँकड़ा) है, है न? एक बड़ा आँकड़ा है। कहते हो एक सौ बयालीस करोड़, वो एक सौ बयालीस करोड़ में से सत्तर करोड़ महिलाएँ होंगी। और हर महिला एक चेहरा होती है। हर महिला अपनेआप में एक समूची सत्ता होती है, एक अलग व्यक्ति होती है। मैं उस व्यक्ति से बात करता हूँ।



