जो सबसे अच्छे काम होते हैं उस पर दुनिया कभी इज़्ज़त नहीं देती। दुनिया इज़्ज़त बस उन कामों को देती है जो दुनियादारी के होते हैं। दुनिया जैसे ही काम करो, दुनिया द्वारा स्वीकृत काम करो, दुनियादारी में ही तुम भी लोटने लग जाओ, तो दुनिया इज़्ज़त देगी। सचमुच जो ऊँचे काम होते हैं, उसकी तो कभी इज़्ज़त मिलेगी ही नहीं। तो जो इज़्ज़त के बहुत प्यासे हैं वो फिर कभी सचमुच ऊँचे और अच्छे काम कर भी नहीं पाएँगे। ज़िंदगी में सचमुच अगर कोई काबिल-ए-तारीफ़ काम करना है, कोई मौलिक काम करना है, तो इज़्ज़त की चाह के साथ नहीं करा जा सकता।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मैं दो साल पहले फ्रांस आया था पढ़ाई करने के लिए। मेरी क्लास में कुछ पच्चीस लोग हैं जिसमें मैं अकेला इंडियन हूँ। तो कंपेयर टू (तुलनात्मक रूप से), जो मेरे क्लासमेट्स (सहपाठी) हैं; उनसे मुझे थोड़ा ज़्यादा एक्सपीरियंस (अनुभव) है। तो मुझे पहले से बहुत चीज़ें आती थीं, तो उसके कारण कंपैरिज़न (तुलना) हुआ और बहुत कॉन्फ्लिक्ट्स (टकराव) होने लग गए मेरे क्लासमेट्स और मेरे बीच में। क्योंकि मुझे थोड़ा ज़्यादा एक्सपीरियंस था उनसे और वो बिगिनर्स (शुरुआती छात्र) थे।
इसी चक्कर में किसी ने मेरा फ़ोन हैक कर लिया। उसने मेरे प्राइवेट इंफॉर्मेशन (निजी जानकारी) का मिसयूज़ (दुरुपयोग) करके काइंड ऑफ़ कैरेक्टर असैसिनेशन (एक प्रकार का चारित्र हनन), मेरी रेपुटेशन (छवि) गिराने की कोशिश की, क्योंकि फर्स्ट ईयर में मैं टॉप कर रहा था और सबके मार्क्स सबके सामने रख दिए जाते थे। लेकिन फिर उन्होंने, क्लास के लोगों ने बोलकर वो भी रुकवा दिया कि सबके मार्क्स एक साथ न दिखें।
फिर सेकंड ईयर में मुझे टीचर से भी प्रोब्लम होने लग गई। टीचर्स भी मुझे थोड़ा




