अगर पीने से तुमको समाधि मिलती होती तो मैं बिल्कुल नहीं मना करता पीने से। तो समस्या पीने में नहीं है। बात ये है कि जब पी रहे हो तो समाधि से और दूर होते जा रहे हो। जब पी रहे हो तो जो तुम्हें वास्तव में चाहिए उससे और दूर होते जा रहे हो। पीने में ये बुराई है। कोई आकर के अगर सिद्ध कर दे कि पीने से उसे परमात्मा मिलता है तो मैं कहूँगा, ‘तू अब पानी भी मत पी, सिर्फ़ शराब पी।’ कसौटी शराब नहीं है, कसौटी परमात्मा हैं। पर उसका तो तुम नाम ही नहीं ले रहे।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शराब पीने में क्या गलत है?
आचार्य प्रशांत: पीना तो गलत है भी नहीं, तो उसमें क्या तुम कारण निकाल लोगे कि गलत क्यों है। जो गलत है वो तुम्हें पता नहीं, इसलिए तुम गलती को इधर-उधर ढूँढ रहे हो। ट्रेन खड़ी है प्लेटफ़ॉर्म पर और तुम जाकर बैठ गए हो कैंटीन में। और तुम पी रहे हो। और तुम पीने में मगन हो, और ट्रेन छूट गई, तो अब क्या फ़र्क पड़ता है कि शराब पी रहे थे कि चाय पी रहे थे? गलती पीने में थोड़े ही थी, गलती तो ये भूल जाने में थी कि क्या करना था और क्या करने में लिप्त हो गए।
जिस समय तुमको दौड़कर ट्रेन पर चढ़ जाना चाहिए था, उस समय तुम मसरूफ़ थे पीने में। अब कुछ पियो। पानी पियो, ट्रेन तो तब भी छूट गई न! अभी भी तुम बात ये कर रहे हो कि गलती ये कर दी कि शराब पी ली। ट्रेन का अभी भी तुम्हें होश नहीं है। पिए हुए हो। ट्रेन छूटी उसका कुछ होश है? उसका तो पता ही नहीं, ‘ट्रेन थी क्या? मैं कौन हूँ? कहा है प्लेटफ़ॉर्म? कैसी ट्रेन?’
और नशे का एक पक्का लक्षण ये है कि बोतल ही नज़र आती है बस। तो अभी भी बात किसकी कर रहे हो? बोतल की ही कर रहे हो। और जिसको बोतल-ही-बोतल नज़र आती हो, जो बोतल की ही बात कर रहा हो, उसको तो अभी भी चढ़ी ही हुई है। मुझे कोई दिक्कत नहीं है उस शराब से जो तुम जिस्म में उड़ेलते हो। कहीं ज़्यादा बड़ी समस्या है वो शराब जो लगातार होश पर चढ़ी रहती है।




