प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मैं अपनी फ्रेंड्स को आपके वीडियोज भेजती हूँ जिसमें जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा नहीं देना है। तो वो मुझसे रिवर्ट में तर्क करती हैं कि उनका चाहे वो पहला बच्चा हो चाहे वो दूसरा बच्चा हो कि यह गुड न्यूज़ है। और आचार्य जी, अभी जितनी इस पृथ्वी पर जनसंख्या है उसमें एक बच्चा भी अकोमडेट (वहन) कर पाना असंभव है। तो वो मुझसे कहते हैं कि यह गुड न्यूज़ है और आचार्य जी यह आप कहते हैं कि यह अभिशाप है। तो मुझे इस पर थोड़ा सा स्पष्टता चाहिए।
आचार्य प्रशांत: नहीं इस पर जो स्पष्टता है उसके लिए तो विशेष आध्यात्मिक शिक्षा की भी ज़रुरत नहीं है, तो बहुत भौतिक विषय है, आँकड़ें ही समझा देंगे कि बात क्या है ।
प्रति व्यक्ति हम संसाधनों का जितना उपभोग करते हैं उतने के लिए ही पृथ्वी पर पर्याप्त संसाधन मौजूद नहीं है। तुम और लोग कहाँ से ले आ दोगे ? एक घर हो जिसमें दस ही लोगों के खाने की गुंजाइश हो और उसमें चालीस लोग पहले से हैं और तुम चाह रहे हो चालीस को सत्तर बना दें, तो इसमें अब क्या तुमको अध्यात्म समझाया जाये। यह बात तो सीधे-सीधे गणित की और आँकड़ों की है। एक साधारण घर हो उसमें तो फिर भी उधार से ला सकते हो, बाहर से कहीं ला सकते हो। अगर उस घर का नाम ही ‘ग्रह’ हो तो ? पृथ्वी पर अनाज बाहर से कहाँ से लेकर आओगे ? पृथ्वी पर जगह और संसाधन बाहर से कहाँ से लेकर के आओगे ? कोई दूसरी पृथ्वी तो है नहीं न। एक ही पृथ्वी है और वो जितना दे सकती है वो पर्याप्त नहीं है इन आठ- सौ -करोड़ लोगों के लिए ही। और ज़्यादा लोग कहाँ से लाओगे? समझ में आ रही है बात।
और यह भी नहीं है कि यह जो आठ- सौ- करोड़ लोग हैं अगर यह न बढ़े तो भी पर्याप्त हो जाएगा, तो भी नहीं होगा। क्योंकि हर व्यक्ति प्रगति चाहता है, विकास और तरक्की का अर्थ क्या है ? कंसम्प्शन (उपभोग) बढ़ाना। यही तो! और जो हम कंसम्प्शन भोग बढ़ाते हैं, दो तरीके से बढ़ाते हैं। एक यह कि जितने हैं वो और ज़्यादा भोगे और दूसरा, भोगने के लिए और नए-नए लोग भी वो पैदा करें जो भोग रहे हैं। जो हमारा भोग है उसकी दो पहलू हैं— ख़ुद भी ज़्यादा भोगो और भोगने के लिए अपने घर में और लोग पैदा कर दो, जो और भोगे।




