प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! जब डेढ़ साल पहले किताबें पढ़नी शुरू की थी तो पढ़ने में बहुत मज़ा आता था, लगता था रोज़ कुछ नया जानने को मिल रहा है। लेकिन अब न पढ़ने का मन करता है, न ही यूट्यूब पर सुनने का। मन को लगता है कि शब्द के पीछे की जो चीज़ है, वो मौन बैठकर ही मिलेगी।
आचार्य प्रशांत: किसने बता दिया तुम्हें कि मौन में बैठने से मिलेगी? मुझे कब देखा तुमने मौन में बैठे हुए?
प्र: लेकिन सामने बैठने से बार-बार सवाल-जवाब करके कुछ फ़ायदा दिखता नहीं है।
आचार्य: सवाल-जवाब करके फ़ायदा इसलिए नहीं होता क्योंकि जो बात सामने आती है उसको कार्यान्वित भी तो करना पड़ता है न। चिकित्सक के सामने बैठे सवाल-जवाब करे, उसने तुमको पर्चा लिख कर के दे दिया और बता दिया कि साथ में ये चार-पाँच तरह के व्यायाम हैं ये रोज़ करने होंगे, ठीक है। अब न तो तुम उसके पर्चे पर अमल करो, न उसने जो व्यायाम बताए हो उनको करो तो फिर सवाल-जवाब करने से क्या लाभ होगा।
जो जाना है उसे जीना भी तो पड़ेगा, जाना और जिया नहीं तो जानना बोझ है। सबकुछ तो जीना है, वही आख़िरी बात है, जी कैसे रहे हो, क्या करते हो।
उठना-बैठना, खाना-पीना, मौन में बैठना इत्यादि कहाँ काम आते हैं।




