
प्रश्नकर्ता: गरुड़ पुराण और ये सारे, जो वाचे जाते हैं, ये भी कल्पना हैं? कहीं न कहीं से तो ये आया है।
आचार्य प्रशांत: कुछ भी जो है, वो कहाँ से आता है? कुछ भी जिसको आप बोलते हो कि “है”, वो कहाँ से आता है? बोलिए?
प्र: रचना तो…


आचार्य प्रशांत: श्रीदुर्गासप्तशती के उत्तर चरित्र में अब हम प्रवेश करते हैं। यह तीसरा और अंतिम चरित्र है ग्रंथ का और इसमें हमें देवी के सतोगुणी रूप के दर्शन होते हैं। देवी यहाँ माँ महासरस्वती के रूप में आविर्भूत होंगी। तो कथा आगे बढ़ती है, आपको स्मरण होगा कि चौथे…

आचार्य प्रशांत: छठा अध्याय — धूम्रलोचन वध (एक के बाद एक वध ही वध हैं।)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने प्रकृति का संबंध बताया जहाँ पर एक संबंध पत्नी का संबंध है और एक संबंध माँ का संबंध है, तो मुझे रामकृष्ण परमहंस याद आ रहे हैं। तो वहाँ पर जो संबंध था, जो वे देवी की तरह, माँ की तरह पूजते थे तो यह वही


आचार्य प्रशांत: ऋषि कहते हैं – “देवी के द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुंभ के मारे जाने पर इन्द्र आदि देवता अग्नि को आगे करके उन कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे। उस समय अभीष्ट की प्राप्ति होने से उनके मुखकमल दमक उठे थे और उनके प्रकाश से दिशाएँ भी जगमगा उठी


आचार्य प्रशांत: तो यह सूत्र स्पष्ट होना बहुत ज़रूरी है। मूल्य आपकी चेतना का है, आपके शरीर का नहीं और मूल्य आपके चुनाव का है, आपकी स्थिति का नहीं। अच्छे से पकड़ लीजिए इसको – मूल्य आपकी चेतना का है, आपके शरीर का नहीं और मूल्य आपके चुनावों का है,

आचार्य प्रशांत: अब देखिए यहाँ पर किन-किन पशुओं के नाम वर्णित हैं – मयूर है, गरुड़ है, वाराह है, सिंह है, गजराज है, गीदड़ियों की आवाज़ की हम बात कर ही चुके हैं। ये इतने भाँति-भाँति के पशुओं का उल्लेख हमें क्या बताता है? ये सब पशु हमारे भीतर की

आचार्य प्रशांत: "इस प्रकार क्रोध में भरे हुए मातृगणों को नाना प्रकार के उपायों से बड़े-बड़े असुरों का मर्दन करते देख दैत्य सैनिक भाग खड़े हुए। मातृगणों से पीड़ित दैत्यों को युद्ध से भागते देख रक्तबीज नामक महादैत्य क्रोध में भरकर युद्ध करने के लिए आया। उसके शरीर से जब

आचार्य प्रशांत: ऋषि कहते हैं – “चंड और मुंड नामक दैत्यों के मारे जाने तथा बहुत सी सेना का संहार हो जाने पर दैत्यों के राजा प्रातापी शुम्भ के मन में बड़ा क्रोध हुआ और उसने दैत्यों की सम्पूर्ण सेना को युद्ध के लिए कूच करने की आज्ञा दी। वह

आचार्य प्रशांत: नवदुर्गा का आरंभ हो चुका है और उचित ही है कि इस काल में हम पूरे ध्यान, पूरे समर्पण के साथ देवी-विषयक चर्चा करें। मैं संदर्भ को थोड़ा व्यापक रखना चाहूँगा ताकि हम बात को बिल्कुल मूल से समझ सकें और जितने भी लोग यहाँ उपस्थित हैं, सब

प्रश्नकर्ता: शिवलिंग क्या है? इसकी पूजा क्यों की जाती है?

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, अन्यथा समाज में अगर कोई अंधविश्वास फैलता है तो वो जान तो नहीं लेता, आंतरिक रूप से मार देता है पर किसी का शरीर तो नहीं हरता। अगर कोरोना वायरस से उठ रही इस वैश्विक महामारी के समय में कोई अंधविश्वास फैल रहा है तो वो


आचार्य प्रशांत: देवता सब पहुँचे हुए हैं, कहाँ पर? हिमालय पर और गंगा जी के तट पर। वहाँ वो देवी की स्तुति कर रहे हैं। तो बहुत कुछ है जो कहते हैं देवता, उसमें जो देवी मंत्र है, देवी सूत्र है, उसको हम पढ़ते हैं और विचारते हैं —
"जो…
तो दूत तो भाई अपमानित सा चेहरा ले करके गया दैत्यराज के पास, तो दैत्यराज ने भी अपेक्षा नहीं करी थी कि एक स्त्री उनका विवाह प्रस्ताव ठुकरा देगी, वह भी तब जब उन्होंने इंद्र…
आचार्य प्रशांत: तो बार-बार देवता कहते हैं: उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
ये क्यों बार-बार कहते हैं? क्योंकि मन के लिए दोहराव बहुत आवश्यक है; कोई बात एक बार बता दो, बात बनती नहीं है। मन तो पत्थर सरीखा है, उसको घिसना…
आचार्य प्रशांत: नौवें अध्याय में प्रवेश करते हैं। तो हमने रक्तबीज का अंत देख लिया या रक्तबीज की मुक्ति देख ली।
राजा ने कहा – “भगवन! आपने रक्तबीज वध से संबंध रखने वाला देवी-चरित्र का यह अद्भुत माहात्म्य मुझे बतलाया। अब रक्तबीज के मारे जाने पर अत्यंत क्रोध में भरे…
आचार्य प्रशांत: तीसरे और उत्तर चरित्र का तेहरवाँ और अंतिम अध्याय।
ऋषि कहते हैं – “राजन! इस प्रकार मैंने तुमसे देवी के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया। जो इस जगत को धारण करती हैं, उन देवी का ऐसा ही प्रभाव है। वे ही विद्या उत्पन्न करती हैं। भगवान विष्णु की…
ऋषि कहते हैं – “राजन! अपने प्राणों के समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा सारी सेना का संहार होता जान शुम्भ ने कुपित होकर कहा – ‘दुष्ट दुर्गे! तू बल के अभिमान में आकर झूठ-मूठ का घमंड न दिखा। तू बड़ी मानिनी बनी…
वक्ता: नवदुर्गा का माॅहौल है। शक्ति के बारे में कुछ बातें करना प्रासंगिक रहेगा। शिव केंद्र है, शिव सत्य है। शिव वो हैं जिन तक मन, ‘मन’ रह कर पहुँच नहीं सकता। शिव को तो रहस्य रहना है सदा। शक्ति, मन है, संसार है। शिव में स्थिरता है, अचलता है।…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

एक पुजारी जो रोज़ भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और वशीकरण के नाम पर आए लोगों से मिलता है, आचार्य प्रशांत से पूछता है: जब वो ख़ुद जानता है कि कुछ भूत-चुड़ैल नहीं होता, तो लोग बार-बार इसी झूठ की शरण में क्यों जाते हैं? जवाब अंधविश्वास से कहीं गहरा निकलता है — यह हमारे भीतर के उस झूठ की कहानी है, जिसे हम हर कीमत पर बचाना चाहते हैं।

धर्मग्रंथों को जाति-व्यवस्था के चश्मे से देखने के बजाय उनके मूल संदेश को समझना आवश्यक है। श्रुति का केंद्र जाति, लिंग या सामाजिक पहचान नहीं, बल्कि अहंकार और उससे मुक्ति है। पारंपरिक व्याख्या से अलग समझ को पुनर्व्याख्या मानकर खारिज करना उचित नहीं। वास्तविक अध्यात्म बाहरी पहचान नहीं, अपनी नीयत, भ्रम और कपट को ईमानदारी से देखने तथा आत्मबोध की ओर बढ़ने का आग्रह करता है।

शादी और रिश्तों के सामाजिक दबाव में अपने शरीर और गरिमा का सौदा करना बंद करना ज़रूरी है। जीवन का उद्देश्य केवल जोड़ी बनाना या यौन सुख पाना नहीं है। प्रेम वह है जो व्यक्ति को भीतर से ऊँचा और मुक्त करे, न कि उसे वस्तु बना दे। इसलिए पहले स्वयं को गढ़ें, ज्ञान और कौशल बढ़ाएँ, जीवन को सार्थक बनाएँ और अपने भीतर पूर्णता विकसित करें; सही व्यक्ति मिले तो स्वागत है, न मिले तो भी जीवन अधूरा नहीं है।

भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।

सच्चा वैराग्य महत्वहीन या हानिकारक चीज़ों को छोड़ना है, और सच्ची महत्वाकांक्षा उस चीज़ के लिए पूरी तरह समर्पित होना है जो वास्तव में मूल्यवान है। दोनों विरोधी नहीं, बल्कि गहरी समझ के दो पहलू हैं। जब विवेक से सत्य और असत्य स्पष्ट दिखने लगते हैं, तो त्याग प्रयास नहीं रहता, स्वाभाविक हो जाता है। आध्यात्मिक यात्रा में यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।

नाम जप तभी उपयोगी साधना बनता है जब जपे जाने वाला नाम किसी छवि, व्यक्ति, कहानी या सांसारिक विषय की ओर संकेत न करे। सामान्य नाम मन में इच्छाओं और अहंकार से जुड़े विषयों को मजबूत करते हैं, जबकि निर्गुण नाम मन को उन विषयों के बोझ से हल्का कर सकता है। इसलिए नाम जप का उद्देश्य किसी कल्पित रूप की पूजा करना नहीं, बल्कि अपनी सीमित पहचान से आगे जाने की आकांक्षा, यानी मुमुक्षा, को जगाना है।

सही काम आनंद पाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए किया जाता है क्योंकि वही सही है। सही काम करते समय सुख मिले या बोरियत, दोनों को समान रूप से स्वीकार करना ही आनंद है। पढ़ाई, विशेषकर गणित, केवल परीक्षा का विषय नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन की भाषा है, जो दुनिया को समझने की क्षमता देती है. गलतियाँ स्वाभाविक हैं और उनसे सीखना चाहिए, लेकिन बेईमानी कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती। सच्ची सफलता पूर्णता में नहीं, बल्कि ईमानदारी में है।

मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उनकी अनिवार्यता से जुड़ी मान्यताएँ हैं। हम जिन चीज़ों को अपरिहार्य मानकर पकड़े रहते हैं, वही हमारे दुख का कारण बनती हैं। समाधान समस्याओं से लड़ने में नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं को निष्पक्ष होकर देखने में है। जैसे ही मन कुछ क्षणों के लिए अपने पूर्वाग्रहों को स्थगित करता है, सत्य की झलक मिलती है। वही झलक भीतर प्रेम जगाती है, और वही प्रेम व्यक्ति को अपने बंधनों को छोड़कर स्वतंत्रता, सत्य और वास्तविक जीवन की ओर बढ़ने का साहस देता है।

डर वास्तविकता से नहीं, बल्कि अस्पष्टता और कल्पना से ताक़त पाता है। वह कभी स्पष्ट नहीं बताता कि किस बात का भय है, बल्कि धुंधले संकेतों से मन को विचलित करता रहता है। डर से भागने के बजाय उसे सामने बुलाकर उसके हर दावे से स्पष्टता माँगनी चाहिए। जैसे ही भय को सटीक होने के लिए मजबूर किया जाता है, उसकी शक्ति समाप्त होने लगती है, क्योंकि उसका पूरा अस्तित्व भ्रम और धुंध पर टिका होता है।

अहंकार भावनाओं से नहीं, बल्कि उनके उपयोग से पहचाना जाता है। आँसू, मुस्कान या कोई भी भावना अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी। समस्या तब शुरू होती है जब अहंकार उन्हें लाभ, छवि या स्वार्थ के साधन में बदल देता है। यदि रोना किसी परिणाम, सहानुभूति या लाभ से जुड़ा है, तो वह प्रोग्राम्ड इमोशन है। शुद्ध भावना सहज होती है; अहंकार हर भावना को अपने हित के अनुसार मोड़ देता है।

आत्मसम्मान उपलब्धियों से नहीं, अपनी पहचान से जन्म लेता है। जब तक हम स्वयं को केवल शरीर मानते हैं, तब तक प्रकृति और समाज की अपेक्षाएँ हमें अधूरा महसूस कराती रहती हैं। सच्ची मुक्ति तब है जब हम जैविक और सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर चेतना के अनुसार जीवन जिएँ। शरीर साधन है, साध्य नहीं। जीवन का उद्देश्य प्रकृति के आदेशों का पालन नहीं, बल्कि अपने बंधनों को पहचानकर उन्हें तोड़ते हुए स्वतंत्रता और आत्मबोध की ओर बढ़ना है।

भारत की असली चुनौती तकनीक या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक ढाँचा है जहाँ उत्कृष्टता कुछ द्वीपों तक सीमित रह जाती है। जब समाज सत्य, स्वतंत्र सोच और मानवीय विकास के बजाय लोकधर्म, भय और सामाजिक स्वीकृति से संचालित होता है, तब स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होता। एक बेहतर समाज केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि साहसी, ईमानदार और जागरूक समुदायों के निर्माण से जन्म लेता है।

डर बोलने से नहीं, बल्कि दूसरों की राय और अपनी छवि खोने के भय से पैदा होता है। जब हम अपनी पहचान को लोगों की स्वीकृति पर टिका देते हैं, तब साधारण काम भी कठिन लगने लगता है। गलती करना गलत होना नहीं है; गलती सीखने का अवसर है, पहचान नहीं। आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और दूसरों की राय से मुक्त होकर ही व्यक्ति निडर होकर बोल सकता है और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।

श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य अवतारों को केवल उनके मानवीय जीवन से समझना भ्रम पैदा करता है। साकार रूप सीमित होता है, जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को निराकार सत्य की ओर ले जाना है। देह, परिवार या घटनाओं में कमियाँ खोजने के बजाय उनके संदेश का सार समझना आवश्यक है। विवेक, कृतज्ञता और सही दृष्टि ही आध्यात्मिक समझ का आधार हैं, जबकि हर बात में दोष ढूँढ़ना केवल अहंकार को पोषित करता है।

काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए।

जीवन के बड़े निर्णय, जैसे करियर और विवाह, तभी सार्थक होते हैं जब वे समझ और जागरूकता से लिए जाएँ, न कि सामाजिक दबाव या आदत के कारण। अधिकांश लोग बिना स्वयं को समझे जीवन के महत्वपूर्ण चुनाव कर लेते हैं और फिर उनके परिणामों से जूझते हैं। वास्तविक परिपक्वता अपने जीवन की जिम्मेदारी लेने, स्वयं को जानने और बाहरी अपेक्षाओं के बजाय स्पष्टता और विवेक के आधार पर निर्णय लेने में है।

जानवर अपनी जैविक प्रवृत्तियों के अनुसार जीते हैं, जबकि मनुष्य के पास विवेक और चुनाव की क्षमता है। इसलिए अपने व्यवहार को सही ठहराने के लिए पशुओं का उदाहरण देना उचित नहीं है। जीवन में महत्वपूर्ण यह है कि हम सचेत होकर निर्णय लें। इसी तरह खेल में सफलता तब मिलती है जब ध्यान खेल पर हो, न कि जीत, प्रशंसा या दूसरों को प्रभावित करने पर। परिणाम की चिंता बढ़ते ही एकाग्रता टूटती है और प्रदर्शन प्रभावित होता है।

हम जिन भावनाओं, इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और रिश्तों को अपना मानते हैं, उनमें से अधिकांश समाज, परिवार, शिक्षा, मीडिया और वातावरण द्वारा आरोपित होते हैं। व्यक्ति अपनी ही नहीं, उधार ली हुई मान्यताओं के अनुसार जीता है और फिर उसी को अपनी पहचान समझ लेता है। वास्तविक स्वतंत्रता तब शुरू होती है जब हम अपने विचारों, भावनाओं और लक्ष्यों की जाँच करते हैं, झूठे प्रभावों को पहचानते हैं और अपने जीवन को सचेत रूप से जीना शुरू करते हैं।

प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।

मित्रता का उद्देश्य एक-दूसरे की सीमाओं को पुष्ट करना नहीं, बल्कि ऊँचाई की ओर बढ़ने में सहयोग देना है। कॉलेज जीवन आत्म-विकास, सीखने और उत्कृष्टता की खोज का दुर्लभ अवसर है। केवल समान सोच वाले समूहों में समय बिताना व्यक्ति को औसत बनाए रख सकता है। सच्चा मित्र स्वयं गुरु बनने का दावा नहीं करता, बल्कि ज्ञान, अनुभव और विकास के बेहतर स्रोतों तक ले जाता है। पढ़ाई, कौशल, खेल, साहित्य और आत्म-विस्तार में लगाया गया समय ही भविष्य को आकार देता है।

आध्यात्मिकता दुनिया से भागना नहीं, बल्कि उसे गहराई से समझना है। परिवार, बच्चों और समाज से संवाद के लिए उनके रुचि-क्षेत्रों को जानना आवश्यक है। किसी विचार को थोपने के बजाय समझ और निष्पक्षता से बात करनी चाहिए। आत्मज्ञान जीवन के हर क्षेत्र को दिशा देता है। सीखने की प्रक्रिया में जिज्ञासा, अध्ययन और खुला संवाद व्यक्ति को अधिक परिपक्व, प्रभावी और सार्थक बनाते हैं।

गरीबी केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि गलत सोच, अंधविश्वास, भाग्यवाद और अविवेकपूर्ण आदतों से भी बढ़ती है। शिक्षा, जिम्मेदारी और सही मूल्यों की कमी इंसान को पीढ़ियों तक गरीब बनाए रखती है। कर्मकांड, दिखावा और बिना समझ के खर्च आर्थिक संकट को गहरा करते हैं। बदलाव तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी बुद्धि, विवेक और जिम्मेदारी के साथ सही निर्णय लेना शुरू करे।

मुक्त कर्म वही है जिसमें आनंद किसी भविष्य के परिणाम में नहीं, बल्कि कर्म करने में ही होता है। बच्चा खेलते समय किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता; खेल ही उसका सुख है। इसके विपरीत, बंधन और लालच से किए गए कर्म हमेशा हिसाब, मुआवज़े और भविष्य की आशा से भरे होते हैं। निष्काम कर्म वही है जहाँ कर्म स्वयं ही अपना पुरस्कार बन जाता है, और जीवन गणना नहीं बल्कि सहज उल्लास में बदल जाता है।

क्या सचमुच FOMO और YOLO सिर्फ़ Gen Z की समस्या हैं, या ये मनुष्य के पुराने डर के नए नाम हैं? जब भीतर खालीपन हो, तो बाहर की हर चीज़ छूटती हुई लगती है। फिर जीवन एक दौड़ बन जाता है, जहाँ “और चाहिए” कभी ख़त्म नहीं होता। समस्या वस्तुओं की कमी नहीं, उस अहंकार की है जो हमेशा अधूरा महसूस करता है। जब तक स्वयं को नहीं जानोगे, तब तक हर चाह एक नई बेचैनी बनती रहेगी।

TCS जैसे मामलों पर पूरा देश कुछ दिनों तक हैरान होता है, लेकिन क्या सच में ये घटनाएँ नई हैं! कार्यस्थलों पर शोषण, करियर के नाम पर चुप्पी, धर्म को पहचान और सत्ता का हथियार बना देना, और भीतर से डरा हुआ इंसान... ये सब उसी समाज से निकलता है जिसे हमने सामान्य मान लिया है। सवाल सिर्फ़ कानून या सिस्टम का नहीं, इंसान की चेतना और परवरिश का है।

आप सपनों से परेशान होकर जागते हैं, फिर भी उन्हें पूरे दिन ढोते रहते हैं। अगर गड़बड़ी सपने में थी, तो उसे जागृत जीवन में क्यों लाना? वर्तमान जीवन अपने आप में पूर्ण है, पर आप उससे बचने के लिए बीते भ्रमों को पकड़े रहते हैं। सपने कामनाओं से जन्म लेते हैं; जितना उन्हें पकड़ोगे, उतना वे आपको पकड़ेंगे। छोड़ दो, तभी स्पष्टता आएगी।

आज के समय में बच्चों में मोबाइल और गेम का एडिक्शन बढ़ता जा रहा है, जिसका मुख्य कारण खुद माता-पिता की लापरवाही और सुविधा-प्रियता है। समस्या को समझाने से नहीं, बल्कि सीधे नियंत्रित करने से हल किया जा सकता है। इसी तरह सोशल मीडिया तुलना और हीन भावना को बढ़ा रहा है। हर मानसिक समस्या का मूल समाधान आत्म-जागरूकता और सही दिशा में प्रयास है, जिसके लिए व्यक्तिगत पहल जरूरी है।

तुम्हारे घर में कोई चीज़ अँधेरे में रखी थी, कोई आकर उस पर थोड़ी रोशनी डाल सकता है। उस पर थोड़ा प्रयोग करके बता सकता है कि ये चीज़ सड़ी हुई है। उसके आगे का काम तो तुम्हारी नीयत का है। उसको उठा के बाहर तुम्हें ही फेंकना पड़ेगा। नीयत, फ़ैसला, ईमानदारी, इनका कोई विकल्प नहीं होता। डूबे रहो इधर-उधर की चीज़ों में, वासना हो, डर हो। जिस दिन तुम जलोगे, उस दिन डर और वासना भी जल जाएँगे। कहानी कभी न कभी तो ख़त्म होनी है। या तो ख़ुद अभी ख़त्म कर लो, नहीं तो चिता पर ख़त्म हो जाएगी। मर्ज़ी है।

ये जितने आकाशीय खगोलीय पिंड हैं, ग्रह–नक्षत्र, चाँद–तारे, इनका मनुष्य के जीवन पर कोई प्रभाव पड़ता हो, न इसकी कोई पुष्टि है, न कोई प्रमाण है। इस पूरी चीज़ का मनोवैज्ञानिक कारण बस इतना ही है: अपने ऊपर दायित्व न लेना, बल्कि दायित्व भाग्य पर डाल देना। जब भी कोई देश पूजने लग जाता है अपनी मान्यताओं को, और तर्क की आवाज़ों को सुनने से मना कर देता है, तो फिर कोई बाहरी ताक़त आकर उसको ग़ुलाम बनाती है। भारत ने प्रमाण को ठुकरा दिया, मान्यता पर चलना शुरू कर दिया, वो भारत की ग़ुलामी बन गया।

अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।