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अपने अहंकार को सत्य का भोजन बना दो || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: "इस प्रकार क्रोध में भरे हुए मातृगणों को नाना प्रकार के उपायों से बड़े-बड़े असुरों का मर्दन करते देख दैत्य सैनिक भाग खड़े हुए। मातृगणों से पीड़ित दैत्यों को युद्ध से भागते देख रक्तबीज नामक महादैत्य क्रोध में भरकर युद्ध करने के लिए आया। उसके शरीर से जब रक्त की बूँद पृथ्वी पर गिरती, तब उसी के समान शक्तिशाली एक दूसरा महादैत्य पैदा हो जाता।”

“महासुर रक्तबीज हाथ में गदा लेकर इन्द्र शक्ति के साथ युद्ध करने लगा। तब ऐंद्री ने अपने वज्र से रक्तबीज को मारा। वज्र से घायल होने पर उसके शरीर से बहुत-सा रक्त चूने लगा और उससे उसी के समान रूप तथा पराक्रम वाले योद्धा उत्पन्न होने लगे। उसके शरीर से रक्त की जितनी बूँदें गिरीं, उतने ही पुरुष उत्पन्न होने गए। वे सब रक्तबीज के समान ही वीर्यवान, बलवान तथा पराक्रमी थे। वे रक्त से उत्पन्न होने वाले पुरुष भी अत्यंत भयंकर अस्त्र-शस्त्रों का प्रहार करते हुए वहाँ मातृगणों के साथ घोर युद्ध करने लगे।”

“पुनः वज्र के प्रहार से जब उसका मस्तक घायल हुआ, तब रक्त बहने लगा और उससे हजारों पुरुष उत्पन्न हो गए। वैष्णवी ने युद्ध में रक्तबीज पर चक्र का प्रहार किया तथा ऐंद्री ने उस दैत्य सेनापति को गदा से चोट पहुँचाई।”

“वैष्णवी के चक्र से घायल होने पर उसके शरीर से जो रक्त बहा और उससे जो उसी के बराबर आकार वाले सहस्त्रों महादैत्य प्रकट हुए, उनके द्वारा सम्पूर्ण जगत व्याप्त हो गया। कौमारी ने शक्ति से, वराही ने खड्ग से और माहेश्वरी ने त्रिशूल से महादैत्य रक्तबीज को घायल किया। क्रोध में भरे हुए उस महादैत्य रक्तबीज ने भी गदा से सभी मातृ-शक्तियों पर पृथक-पृथक प्रहार किया।”

“शक्ति और शूल आदि से अनेक बार घायल होने पर जो उसके शरीर से रक्त की धारा पृथ्वी पर गिरी, उससे भी निश्चय ही सैंकड़ों असुर उत्पन्न हुए। इस प्रकार उस महादैत्य के रक्त से प्रकट हुए असुरों द्वारा सम्पूर्ण जगत व्याप्त हो गया। इससे उन देवताओं को बड़ा भय हुआ।”

“देवताओं को उदास देख चंडिका ने काली से शीघ्रतापूर्वक कहा – ‘चामुंडे! तुम अपना मुख और भी फैलाओ। तथा मेरे शस्त्रपात से गिरने वाले रक्तबिन्दुओं और उनसे उत्पन्न होने वाले महादैत्यों को तुम अपने इस उतावले मुख से खा जाओ। इस प्रकार रक्त से उत्पन्न होने वाले महादैत्यों का भक्षण करती हुई तुम रण में विचरती रहो। ऐसा करने से उस दैत्य का सारा रक्त क्षीण हो जाने पर वह स्वयं भी नष्ट हो जाएगा। उन भयंकर दैत्यों को जब तुम खा जाओगी, तब दूसरे नए दैत्य उत्पन्न नहीं हो सकेंगें’।”

“काली से यों कहकर चंडिका देवी ने शूल से रक्तबीज को मारा। और काली ने अपने मुख में उसका रक्त ले लिया। तब उसने वहाँ चंडिका पर गदा से प्रहार किया, किन्तु उस गदापात ने देवी को तनिक भी वेदना नहीं पहुँचाई। रक्तबीज के घायल शरीर से बहुत-सा रक्त गिरा। किन्तु ज्यों ही वह गिरा, त्यों ही चामुंडा ने उसे अपने मुख में ले लिया। रक्त गिरने से काली के मुख में जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हें भी वह चट कर गई और उसने रक्तबीज का रक्त भी पी लिया।”

“तदनंतर देवी ने रक्तबीज को, जिसका रक्त चामुंडा ने पी लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्टि आदि से मार डाला। राजन! इस प्रकार शस्त्रों के समुदाय से आहत एवं रक्तहीन हुआ महादैत्य रक्तबीज पृथ्वी पर गिर पड़ा। नरेश्वर! इससे देवताओं को अनुपम हर्ष की प्राप्ति हुई। और मातृगण उन असुरों के रक्तपान के मद से उद्धत-सा होकर नृत्य करने लगा।"

क्या समझ में आ रहा है, क्या हुआ यह?

श्रोता१: जब पूरी कहानी सुनी, आचार्य जी, तो कबीर साहब का एक भजन याद आया। उसमें एक पंक्ति आती है कि "आग बुझी मत जान, छुपी है राख़ में।" वो वही है जैसे रक्तबीज के साथ हुआ, जैसे जब उसका खून चूता तो वापस और पैदा हो जाते। मुझे लग रहा है कि शायद वही बात कही गई है कि जब तक वृत्ति पूरी तरह से ख़त्म नहीं होगी, वह नहीं जाएगी। जैसे आप कहते हैं कि हमें सतत अवेयर (सावधान) रहना पड़ेगा।

श्रोता२: इसमें, आचार्य जी, यही देखने को मिला कि एक्स्पोनेंशियली (तेजी से) बढ़ रहा है, एक से हज़ार, हज़ार से और। तो यह कैंसर की तरह है कि पूरा ख़त्म नहीं हुआ तो और बढ़ेगा यह, तो इसको जड़ से ख़त्म करना है।

आचार्य: मूल सूत्र समझिए। अहंकार चोट खाने पर बढ़ता है। अहंकार को चोट पसंद होती है। उसको चोट दोगे, वह बढ़ेगा। उसको जितना खंडित करोगे खंड-खंड, दूनी शक्ति के साथ खड़ा हो जाएगा। इसीलिए तो अहंकार सदा चोटिल रहता है, वह चोट खाना भी चाहता है, चोट देना भी चाहता है। वह रक्तबीज है, अहंकार ही रक्तबीज है।

यह कितनी विचित्र बात है। जीवन, स्थितियाँ, तथ्य, अहंकार को जितनी चोट पहुँचाते हैं, उसके समक्ष जितना सिद्ध करते हैं उसका झूठ, वह उतना और बढ़ता है। उसकी प्रक्रिया देखिए, चूँकि वह झूठा है, मायावी है, अधूरा है, इसीलिए उसे चोट लगेगी-ही-लगेगी। जीवन ही चोट देता रहेगा बार-बार क्योंकि वह जीता ही झूठे आधारों पर है। एक कहानी है, एक कल्पना है अहंकार और जीवन उसे चोट देता है। जब जीवन उसे चोट देता है तो वह और सघन हो जाता है। जब वह और सघन हो जाता है तो जीवन उसे और चोट देता है। जब और चोट मिलती है तो वह और बढ़ जाता है।

रक्तबीज है अहंकार। दैत्य है इसलिए चोट खाएगा, जब चोट खाएगा तो और बढ़ जाएगा। जब और बढ़ जाएगा तो और चोट खाएगा, तो और बढ़ जाएगा, बढ़ता ही जाएगा, इसलिए अहंकार नहीं मिटता। रक्तबीज यहाँ पर प्रतीक है, किसका? अहंकार का। अहंकार रक्तबीज जैसा है, इसीलिए उसको मिटाने के तरीके विफल हो जाते हैं। जितने तरीकों से देवियों ने उस पर प्रहार किया, वे विधियाँ हैं जो अहंकार को मिटाने के लिए व्यक्ति उपयुक्त करता है।

किसी ने चक्र से मारा, गदा से मारा, शूल से मारा, बाण से मारा, ऋष्टि से मारा। ये सब क्या हैं? ये अलग-अलग विधियाँ हैं जो अहंकार को मिटाने के लिए इस्तेमाल में लाई जाती हैं, और इनको तुम जितना लगाते हो, वो उतना बढ़ जाता है। इसीलिए अध्यात्म में चतुराई भरी विधियों का बहुत महत्व होता नहीं। विधियाँ तो अहंकार को बढ़ाने के ही काम आती हैं, रक्तबीज हैं।

तो मिटता कैसे है? कुछ ऐसा चाहिए, कोई ऐसा चाहिए जो इतना विशाल हो कि अहंकार को अपने में समा ले, सिर्फ़ वही विधि है। उसे चोट पहुँचाकर नहीं, उसे ग्रहण करके ही मिटाया जा सकता है।

महागरल को महादेव अपने कंठ में स्थापित कर लेते हैं क्योंकि और कहीं आप उसे रख ही नहीं सकते। वो वह सबकुछ जला रहा था, राख़ कर रहा था। और रक्तबीज को काली अपने शरीर में स्थापित कर लेती हैं। और कहीं उसके लिए कोई जगह नहीं थी। महादेव को सत्य मानो और विष को अहंकार। महाकाली को सत्य मानो, रक्तबीज को अहंकार।

अहंकार को मिटाने का सिर्फ़ एक तरीका है – वह सत्य में समाहित हो जाए। उसे चोट दोगे, वह बढ़ेगा। उसे समर्पित कर दो, उसे सत्य के विशाल मुख में सेवित कर दो।

अहंकार कितना भी बड़ा हो, सच से तो छोटा होता है न? उसे सच के मुँह में डाल दो, उसे सच का भोजन बना दो, फिर वह सच की काया में समाविष्ट हो जाएगा, जैसे रक्तबीज काली की काया में समाविष्ट हो गया, जैसे नदियाँ सागर में समाविष्ट हो जाती हैं।

रक्तबीज का क्या हुआ? वह काली की देह बन गया। नदियों का क्या होता है? वो सागर की देह बन जाती हैं। अहंकार का क्या होगा, उसे सत्य की देह बन जाने दो। उसे सत्य का ग्रास बन जाने दो, सत्य का भोजन। क्या किया आपने अहंकार का? उसे सत्य को खिला दिया। वह सच का भोजन बन गया।

इसी को फिर यज्ञ कहते हैं, इसी को बलि कहते हैं। यही दान है – अपने अहंकार को भोजन बना दो। अहंकार का क्या किया? भोग लगा दिया। अहंकार को क्या बोला? जैसे यज्ञ में बोलते हैं – ‘स्वाहा’। तुम जाओ, तुम देवताओं का भोजन बनो। मिटो नहीं, भोजन बन जाओ किसी का; मिटो नहीं, काम आ जाओ किसी के। किसके काम आ जाओ? किसी के। किसके काम आ जाओ? देवताओं के, महादेव के, महाकाली के, इनके कम आ जाओ। सिर्फ़ यही तरीका है। उनके मुँह में चले जाओ।

तुम्हें मिट्टी में भेजेंगे तो तुम नहीं मिटोगे, मुँह में जाओ तुम, सिर्फ़ तभी मिटोगे। तुम्हें नष्ट नहीं किया जा सकता; तुम्हारा सिर्फ़ सही उपयोग किया जा सकता है। नष्ट नहीं होओगे तुम। कौन रक्तबीज को नष्ट कर सकता है? नष्ट करने की चेष्टा की तो सम्पूर्ण धरा ही रक्तबीज से व्याप्त हो गई। नष्ट नहीं हो सकते, उपयुक्त हो सकते हो, उसे काम में लगा दो।

अहंकार को मिटाने का क्या तरीका है? उसे काम में लगाओ, काम में। जो कुछ भी है, उसे काम में लगा दो। गरुड़ था, काम में लगाया, उल्लू था, काम में लगाया। गरुड़ हो कि उल्लूक हो, वाचाल हो कि मूक हो, लगाओ सबको काम में। जो जिस तरीके से लग सकता है, उसको लगा दो काम में।

रामसेतु बनना है, गिलहरी भी काम में लगी हुई हैं, रीछ भी काम में लगा हुआ है, वानर भी काम में लगे हुए हैं। सम्पूर्ण प्रकृति काम में लगी हुई है। काम में लगाओ सबको। बड़े बंदर, छोटे बंदर, बड़े भालू, छोटे भालू, वो गिलहरी लगी है। और भी लगे होंगे, चूहे भी लगे होंगे, पक्षी भी लगे होंगे, न जाने छोटे-मोटे और कीड़े-मकोड़े हों उनका तो कोई उल्लेख भी नहीं आता, सब लगे हैं।

आशय समझ रहे हो, क्या आशय है? जो जैसा है, उसको उसके आगे ले जाने का एक ही तरीका है कि उसको आगे के काम में लगा दो। सिर्फ़ उस पर चोट मारते रहोगे, बोलते रहोगे कि तू गलत है, तू गलत है, जैसे रक्तबीज को पहले चोट मारी, तू गलत है, तू गलत है। बस इतना बताते रहोगे तो वह और बढ़ेगा। वह जैसा है, वैसा ही वह और दृढ़ हो जाएगा, कई गुना बढ़ जाएगा। वह जैसा भी है, उसे काम में लगाओ। उसे देवताओं का भोजन बना दो, उसे काली का ग्रास बना दो।

निंदा नहीं करनी है प्रकृति की, न्याय करना है। न्याय माने क्या होता है? जस्टिस नहीं, इंसाफ नहीं। न्याय का वास्तविक अर्थ है – सही जगह पर रखना। किसी भी इकाई, किसी भी वस्तु या किसी भी व्यक्ति के साथ जब तुम न्याय की बात करो तो उसका अर्थ है – सही जगह पर रखना। उसके साथ जो सही हो सकता है, वह कर देना। तो अहंकार के साथ क्या न्याय है? उसे सत्य के मुख में रख दो। कहो कि यह सत्य का भोजन हुआ, हमने इसे सत्य को समर्पित किया, यह सत्य का निवाला बन गया।

सत्य बड़ा भूखा है, पूर्ण है पर भूखा है। किसके लिए भूखा है? अहंकार के लिए। काली की लपलपाती जिह्वा देखी है? भूखी है, किसके लिए? रक्तबीज के लिए। सत्य ऐसा ही है, सारी विसंगतियाँ, सारे विपरीत उसमें समाए हुए हैं। पूर्ण है लेकिन भूखा है, “आओ, आओ, आओ।” उसे प्रेम भी कह सकते हो, उसे भूख भी कह सकते हो। प्रेम से कहता है, “आओ।” और यह सत्य का प्रेम है, तुम उसके पास जाओगे तो वह तुम्हें खा जाएगा। इसीलिए लोग जाते ही नहीं उसके पास। महाप्रेम है यह, काली-सा प्रेम है। निंदा नहीं, न्याय। क्या निंदा?

भारत ने इसीलिए इतने रूप रखे देवी के और हर रूप का फिर उत्सव है। नवरात्रि समझ में आ रही है? सब रूप पूजनीय हैं। किसी की निंदा नहीं। कोई हेय नहीं, किसी की भर्त्सना नहीं; सबकी पूजा।

जीवन के सब रंग पूजनीय हैं, बशर्ते जीवन सच्चाई के पीछे-पीछे चल रहा हो। सब ठीक है। यह सही-गलत, अच्छे-बुरे की नैतिकता से बहुत आगे की बात है।

इसीलिए भारत में इतनी विविधताएँ पाई जाती है क्योंकि कुछ भी ठीक हो सकता है। जब कुछ भी ठीक हो सकता है तो फिर तुम्हें जीवन के विविध रंग देखने को मिलते हैं। हर रंग के विविध फूल देखने को मिलते हैं क्योंकि कुछ भी ठीक हो सकता है। कुछ भी ठीक हो सकता है, अगर उसे सही दृष्टि से किया गया है, सही उद्देशय से किया गया है, सही केंद्र से किया गया है। तुम करो तो।

कुछ भी अपने-आपमे न सही है, न गलत। ऊँचे-से-ऊँचा काम भी बहुत गलत हो जाएगा अगर किसी निचले केंद्र से आया है। दान, क्षमा, पुण्य, अक्रोध, अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह, ये सब बहुत-बहुत बुरे हो सकते हैं अगर गलत केंद्र से आ रहे हैं। और इनके विपरीत बहुत-बहुत भले हो सकते हैं अगर सही केंद्र से आ रहे हैं। केंद्र बताओ केंद्र, कर्म मत बताओ, आचरण मत बताओ।

पश्चिम आचरण की बात से आगे नहीं बढ़ पाया, वहाँ सारा खेल कर्म-केन्द्रित चलता है। भारत ने कर्ता को देखा। इसीलिए जो ज्यूडिशियल सिस्टम है, न्याय व्यवस्था है, वह लचर है, चरमराई हुई है। वह न्याय व्यवस्था से ज़्यादा अन्याय व्यवस्था हो जाती है क्योंकि वह सिर्फ़ आचरण, व्यवहार, कर्म देखती है, कर्ता को नहीं देखती। सिर्फ़ कर्म, और कर्म में भी सिर्फ़ स्थूल कर्म, विचार नहीं। तुम किसी की हत्या का विचार कर रहे हो तो तुम्हें कोई सज़ा नहीं मिल सकती, जबकि विचार भी कर्म है, पर उसकी कोई सज़ा तुम्हें नहीं देगा, कोई कानून नहीं।

कितनी आज़ादी की बात है न ये। इसीलिए भारत में थोड़ी-थोड़ी दूर पर रीतियाँ बदलती हैं, रिवाज़ बदलते हैं, संस्कार बदलते हैं, क्योंकि कुछ भी ठीक हो सकता है। देश के एक हिस्से में जो चीज़ ठीक मानी जाती है, देश के दूसरे हिस्से में वह वर्जित होती है क्योंकि कुछ भी गलत भी हो सकता है।

तो कहीं किसी ने कुछ सही मान लिया, कहीं किसी ने कुछ गलत मान लिया। खेल है, कुछ भी हो सकता है। असली बात कुछ और है, असली बात यह है कि जो भी कुछ तुम ले रहे हो, जो भी कुछ तुम छोड़ रहे हो, तुम्हारी दृष्टि किस पर है? चाह क्या रहे हो? कामना क्या है?

एक समुदाय है जो कहता है कि शाम के बाद भोजन नहीं करना है, और ऐसे भी पंथ हैं जो आधी रात को भोजन करते हैं, भोग लगाते हैं। कहीं सफ़ेद कपड़ा बड़ा शुभ माना जाता है और कई ऐसे हैं जो काला-ही-काला पहनते हैं। काला भी सही हो सकता है, सफ़ेद भी सही हो सकता है, हर रंग अच्छा है, हर रंग बुरा है, तुम पर निर्भर करता है। जीवन रंगारंग है।

यह ध्यान की बात है, चेतना की बात है। मन आलसी होता है, वह ध्यान देना नहीं चाहता तो वह क्या करता है फिर? वह नियम पकड़ लेता है और कहता है कि काला अच्छा है, सफ़ेद बुरा है या सफ़ेद अच्छा है, काला बुरा है। फिर आसानी हो जाती है। काला दिखा नहीं कि आँख बंद करके बेहोशी में ही बोल दो कि अच्छा है या बुरा है, कुछ भी।

ध्यान ज़रा मेहनत का काम है। वहाँ तुम्हें यह नहीं देखना है कि काला है कि सफ़ेद है, वहाँ तुम्हें यह देखना है कि काले के पीछे क्या है, सफ़ेद के पीछे क्या है। आम आदमी इतनी मेहनत नहीं करना चाहता तो वह साधारण नैतिक नियम बना लेता है, किसी ने ऐसा कर दिया तो वह बुरा कहलाएगा, किसी ने ऐसा कर दिया तो वह अच्छा कहलाएगा।

नियम आलसियों के लिए है। नियम अज्ञानियों के लिए है। समझदार चेतना पर चलते हैं, उन्हें नियमों की आवश्यकता नहीं रहती। पर चूँकि अधिकाँश लोग कभी भी समझदार हो नहीं पाते, तो इसीलिए नियमों की आवश्यकता बची रह जाती है।

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