किसी के क्रोध पर चोट करो तो क्रोध पाँच गुना हो जाता है। दो गुटों की लड़ाई में एक मारा जाता है तो बीस और खड़े हो जाते हैं। दुर्गा सप्तशती का रक्तबीज यही है: हर बूँद से एक नया असुर। रक्तबीज कोई ख़ास असुर नहीं, हमारे अहंकार की प्रतिक्रियात्मकता है। उस पर चोट करने से वो और बड़ा होता है, क्योंकि किसी को ‘तुम बुरे हो’ कहना भी उसे ‘तुम हो’ कहना है। काली उसे खा लेती हैं, यानी अहंकार प्रकृति से अलग नहीं रह जाता। तो क्या हम देख सकते हैं कि जिसे हम ‘मैंने किया’ कहते हैं, वो कौन कर रहा है?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
[दुर्गा सप्तशती के तृतीय चरित्र पर एक सत्र से। शुंभ-निशुंभ के भेजे असुर एक-एक कर देवी के हाथों हार चुके हैं।]
आचार्य प्रशांत: तो यह सब जब भाग गए तो एक जग पड़ा। उसका नाम था रक्तबीज। बोला, “यह तो सबकी पिटाई हो रही है। मैं बताता हूँ। असली तो मैं हूँ।” रक्तबीज का क्या मतलब है? रक्तबीज का मतलब है कि अज्ञान प्रतिक्रियात्मक होता है। उसको अगर मारो एक चोट तो वह पाँच गुनी प्रतिक्रिया करता है। मूर्ख क्रोध में है और तुम उसके क्रोध पर चोट करो तो उसका क्रोध पाँच गुना हो जाएगा। मूर्ख को ज्ञान देने जाओ तो उसका अज्ञान पाँच गुना बढ़ जाएगा। अहंकार तिलमिलाता है, प्रतिक्रिया करता है। यह रक्तबीज का सिद्धांत है। “मुझे मारोगे तो मैं पाँच गुना हो जाऊँगा या 15 गुना हो जाऊँगा, 50 गुना हो जाऊँगा। जितना मुझ पर आघात करोगे, मैं उतना ताक़तवर हो जाऊँगा।” यह अहंकार की निशानी है। अहंकार पर चोट करो, अहंकार और बड़ा हो जाता है।
अहंकार पर चोट करो, अहंकार और बड़ा हो जाता है।





