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स्तुति करने का क्या अर्थ है? || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: देवता सब पहुँचे हुए हैं, कहाँ पर? हिमालय पर और गंगा जी के तट पर। वहाँ वो देवी की स्तुति कर रहे हैं। तो बहुत कुछ है जो कहते हैं देवता, उसमें जो देवी मंत्र है, देवी सूत्र है, उसको हम पढ़ते हैं और विचारते हैं —

"जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में बुद्धि रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में निद्रा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में क्षुधा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में छाया रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में तृष्णा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में क्षांति माने क्षमा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में जाति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में लज्जा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में शांति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में श्रद्धा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में कान्ति रूप से स्थित हैं , उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में लक्ष्मी रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में वृत्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में स्मृति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में दया रूप से स्थित हैं , उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में तुष्टि रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में माता रूप से स्थित हैं , उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो देवी सब प्राणियों में भ्रान्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। जो जीवों के इंद्रिय वर्ग की अधिष्ठात्री देवी एवं सब प्राणियों में सदा व्याप्त रहने वाली हैं, उन व्याप्ति देवी को बारंबार नमस्कार है। जो देवी चैतन्य रूप से संपूर्ण जगत को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।"

"पूर्व काल में अपने अभीष्ट की प्राप्ति होने से देवताओं ने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इंद्र ने बहुत दिनों तक जिनका सेवन किया, वह कल्याण की साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मंगल करें तथा सारी आपत्तियों का नाश करें। उद्दंड दैत्यों से सताए हुए हम सभी देवता जिन परमेश्वरी को इस समय नमस्कार करते हैं तथा जो भक्ति से विनम्र पुरुषों द्वारा स्मरण की जाने पर तत्काल ही संपूर्ण विपत्तियों का नाश कर देती हैं, वह जगदंबा हमारा संकट दूर करें।"

तो यह जो पूरा देवीस्तुति सूत्र है, इसमें आपके ध्यान में क्या आता है? सबसे पहली बात तो आपको यह पूछना चाहिए कि स्तुति माने क्या? कि देवताओं को यदि सहायता चाहिए तो सहायता पाने की यह क्या विधि हुई, स्तुति, स्तवन गान, ये क्या है? इसके पीछे बड़ा स्पष्ट और गहरा मनोवैज्ञानिक कारण है। स्तुति का अर्थ होता है कि आप नमित होते हैं, अपना सिर झुकाते हैं किसी के सामने। आपको साफ़ दिखाई पड़ता है कि आपसे ऊपर कुछ है।

अब संकट, विपत्ति, आपदा आते क्यों है किसी व्यक्ति पर? तभी आते हैं जब अहंकार से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। जब अहंकार अपने-आपको ही सबसे ऊपर मानने लगता है, जो कि उसकी प्रकृति होती है, तो व्यक्ति पर संकट आते हैं। अहंकार ही अपने लिए सबसे बड़ा संकट होता है, उसका कोई दूसरा, बाहरी शत्रु नहीं होता।

अहंकार स्वयं अपना सबसे बड़ा शत्रु होता है क्योंकि वह स्वयं को ही सत्य मानने लगता है। ‘मैं’ स्वयं को ही प्रमाण मानने लगता है। वह कहता है, “मुझे जो कुछ भी अनुभव हो रहा है, प्रतीत हो रहा है, वही सत्य है, मैं ही प्रमाण हूँ। मुझे लगता है तो सच होगा, मैंने माना है तो सच होगा, मैंने कहा है तो सच होगा।”

तो सारे संकटों का मूल कारण क्या होता है? अहंकार का स्वयं को सत्य मान लेना या आत्मा मान लेना, “मैंने ऐसा कहा न,” “मैंने ऐसा सोचा,” “मुझे ऐसा अनुभव हुआ और अनुभव ही तो सच है।” और अनुभव ही सच बन जाते हैं आपके लिए तो आप अनुभवों के सेवक हो जाते हैं। आप यह नहीं कह पाते कि अनुभव तो अनुभव मात्र है, उसके पीछे क्या दौड़ना। आप कहने लग जाते हैं कि अनुभव सच्चाई हैं, तो अनुभव से जो तृप्ति या सुख मिल रहा है, वह भी सच्चा है। तो और नए-नए तरीके के अनुभव एकत्रित करो, चाहे सूक्ष्म तल के अनुभव हो, चाहे स्थूल तल के। स्थूल तल के जो सुखदाई अनुभव होते हैं, वो हम जानते हैं कि क्या हैं। राग-रंग, वस्तुएँ इकट्ठा करना, पैसे इकट्ठा करना, राज्य, संपदा, वासनाओं की पूर्ति, ये सब स्थूल अनुभव हैं। सूक्ष्म अनुभव क्या होते हैं? सूक्ष्म अनुभव होते हैं अहंकार का भीतर बैठ करके तुष्टि पाना या अपने-आपको यह बताना कि आपके विचार में सत्य की जो कल्पना आ रही है, वही सत्य है।

बहुत सारे लोग आध्यात्मिक अनुभवों की तलाश में रहते हैं, और जब उनको लगता है कि उन्हें कोई विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभव हो गया है तो कहने लग जाते हैं कि वे तो अब सत्य के निकट आ रहे हैं, यह बहुत बड़ा अहंकार हुआ न। अहंकार कह रहा है, “मुझे अनुभव हुआ है तो सत्य होगा।” मुझे एक अनुभव हुआ है तो सत्य होगा, क्यों? क्योंकि मुझे हुआ है न, भाई! मैं सत्य हूँ। देख रहे हो कितना बड़ा अहंकार है।

कुछ लोग होते हैं जो रुपए-पैसे और चीज़ों से सुख लूटते हैं, ये स्थूल तल के अनुभवयाची लोग हैं। दूसरे होते हैं जो सूक्ष्म तल के अनुभवों की खोज में रहते हैं। दोनों बराबर के अहंकारी हैं।

अहंकार जब स्वयं को ही सबसे ऊँचा स्थान देने लग जाए तो समझ लीजिए कि अब आप पर विपत्ति आने ही वाली है। और अहंकार माने घमंड या गर्व नहीं होता, अहंकार माने होता है ‘मैं’।

जब ‘मैं’ भाव ही आपके लिए सबसे प्रधान हो जाए तो संकट दूर नहीं। ‘मैं’, ‘मेरा’, ‘मुझे’, ‘मेरे विचार’, ‘मेरे दोस्त-यार’, ‘मेरे परिजन’, ‘मेरी भावनाएँ’, ‘मेरे अनुभव’, ‘मेरी पसंद’, ‘मेरी नापसंद’, ‘मेरी स्वेच्छा’, जो व्यक्ति इन चीज़ों को बहुत महत्व देने लग जाए, उस पर संकट सन्निकट है।

अब आप समझिए कि स्तुति का क्या मतलब हुआ। स्तुति का मतलब हुआ यह स्पष्ट घोषणा करना और बारंबार घोषणा करना कि कोई मुझसे ऊपर है। तो देवी की स्तुति करके वास्तव में देवता उस मूल कारण को ही हटाए दे रहे हैं जिस कारण से उन पर विपत्ति आई थी। वो कारण क्या था? अहंकार, जो कह रहा था कि मुझसे ऊपर कोई नहीं और जैसे ही स्तुति शुरू हुई वैसे ही वह कारण हट गया, क्योंकि अब आप मान रहे हैं कि आपसे ऊपर कोई है।

तो वास्तव में शुंभ-निशुंभ की पराजय उसी क्षण हो गई थी, जिस क्षण देवताओं ने स्तुति आरंभ की। वो सूक्ष्म घटना तो तभी घट गई थी। क्योंकि हार भी पहले आंतरिक होती है, सूक्ष्म, और फिर बाद में चल करके, कुछ समय ले करके वह स्थूल रूप में बाहर दिखाई पड़ती है। हार पहले ही हो गई होती है, आंतरिक और सूक्ष्म हार तो आपके भीतर घट चुकी है, जिस क्षण आपका अहंकार निरंकुश हुआ, बेलगाम, लेकिन इंद्रियों को वह हार ज़रा देर में प्रकट होती है जब वह कालचक्र में, भविष्य में स्थूल रूप से आपकी आँखों के सामने घटती है, तब आप मानते हैं कि मैं हारा। आप हार बहुत पहले गए थे।

मैं कहता हूँ न बार-बार कि कर्म का कर्मफल वास्तव में तत्काल होता है; कर्म और कर्मफल एक साथ होते हैं। हाँ, चूँकि हम इतने संवेदनशील नहीं होते हैं कि भीतर घटने वाली हार को या भीतर मिलने वाले कर्मफल को तत्काल ही पहचान सके, तो हमें लगता है कि कर्म हो गया है, कर्मफल आने में अभी देर है। फिर जब वह कर्मफल अपने स्थूल रूप में भी हमें दिखाई पड़ता है, तब हम मानते हैं कि अरे! अब परिणाम मिला, फल मिला। फल लेकिन वास्तव में सूक्ष्म रूप से, हम कह रहे हैं कि, कर्म के साथ ही मिल जाता है।

तो इसी तरीके से जिस क्षण देवताओं ने स्तुति आरंभ की, उसी क्षण बाजी पलट गई थी। उनकी जीत सुनिश्चित हो गई थी क्योंकि उन्होंने अपनी हार के कारण को ही हटा दिया। ठीक है? तो यह बात हुई स्तुति की कि हम क्यों पूजन करते हैं, हम क्यों भजन करते हैं, हम क्यों नमन करते हैं, मतलब क्या है।

और जितने भी तरीके की धार्मिक धाराएँ हैं विश्व में, नमन सब में आवश्यक है, पूजा सब में होती है, भक्ति सब जगह है, स्तुति सब जगह है। आप वजह समझ पा रहे हैं न? पूजा हो, अर्चना हो, भक्ति हो, स्तुति हो, सब में एक चीज़ साझी है—मैं सर झुकाता हूँ, मैं मानता हूँ कि मुझसे आगे कुछ है, मुझसे ऊपर कुछ है, मुझसे श्रेष्ठ कुछ है, मुझसे बेहतर कुछ है।

और अगर आप नहीं मानोगे कि आप से आगे, ऊपर, श्रेष्ठ, बेहतर, सुंदर कुछ है तो आपकी कोई भी आंतरिक प्रगति होगी कैसे? अगर आपसे अच्छा और आपसे ऊपर कुछ हो ही नहीं सकता तो फिर तो आप जैसे हो, वही उच्चतम हुआ। अगर वही उच्चतम और श्रेष्ठतम हुआ तो आगे आप कोई भी प्रगति कैसे करोगे?

तो आंतरिक प्रगति का सूत्र ही यही है कि सबसे पहले मानो कि मैं भीतर से अधूरा और दूषित हूँ। मुझे साफ़ होना है, मुझे पूरा होना है, मुझे श्रेष्ठतर और सुंदरतर होना है और फिर जिस किसी को भी आपने श्रेष्ठता का, सुंदरता का, उच्चता का और उत्कृष्टता का प्रतीक माना हो, उसकी स्तुति करो। समझ में आ रही बात? यह कहना कि मैं अभी आधा हूँ, अधूरा हूँ, छोटा हूँ, काफ़ी नहीं होगा। उस बात की पूरी-पूरी घोषणा करनी पड़ेगी कि किसी और को आपसे बेहतर बताना पड़ेगा, किसी ऐसे को जो आपसे दूर का हो, आपसे बाहर का हो।

भक्ति में यही सिद्धांत है: मैं दूषित हूँ, मैं कलुषित हूँ, मैं मलिन हूँ, मैं हीन हूँ लेकिन मैं जैसा हूँ, वैसा रहना न तो मुझे स्वीकार्य है, न मेरा स्वभाव है, न मेरी नियति है। बेहतर, उच्चतर मुझे निश्चित रूप से होना है और मुझे बहुत बेहतर होना है। जो मेरा लक्ष्य है, वह बहुत आगे का और ऊपर का है मुझसे। इतना आगे का और ऊपर का है मुझसे कि मैं उसको भगवान बोलता हूँ अपना। जो मुझे हो जाना है, उसी का नाम मैंने भगवान दिया है। जो मेरी श्रेष्ठतम, उच्चतम संभावना है, उसी का नाम तो मैंने भगवान दिया है। पर चूँकि वो श्रेष्ठतम और उच्चतम है इसीलिए मैं कह ही नहीं सकता, मैं ऐसी धृष्टता कर ही नहीं सकता कि कह दूँ कि मुझमें और भगवान में कुछ भी साझा है। क्योंकि कुछ भी साझा है तो अंतर बहुत ज़्यादा नहीं हुआ न? और अगर अंतर बहुत ज़्यादा नहीं हुआ तो प्रगति भी बहुत ज़्यादा नहीं होगी।

अगर आपमें और आपके लक्ष्य में, अगर आपमें और आपकी उच्चतम संभावना में कुछ या बहुत कुछ साझा है तो फिर आपकी वर्तमान स्थिति और आपकी उच्चतम संभावना में बहुत दूरी नहीं हो सकती न, ये बात समझ में आ रही है? और अगर आपकी वर्तमान स्थिति और आपकी उच्चतम संभावना में बहुत दूरी नहीं हो सकती तो फिर आपकी बहुत ज़्यादा प्रगति भी नहीं हो सकती क्योंकि आपने तो अपना लक्ष्य ही छोटा चुना।

तो भक्त बहुत महत्वाकांक्षी होता है, वह अपने लिए ऊँचे-से-ऊँचे लक्ष्य चुनना चाहता है। वह कहता है, “छोटे में संतुष्टि कहाँ है?” उपनिषद कहते हैं न कि ‘अल्प में सुख नहीं है’। भक्त भी यही कह रहा कि अल्प में सुख नहीं है। तो उसे जो भगवत-प्राप्ति करनी है, वह बहुत ऊँची चीज़ होनी चाहिए।

भगवान को बहुत ऊपर होना चाहिए, भगवान को इतना ऊपर होना चाहिए कि भक्त की दृष्टि से भी आगे रहे वो। भक्त बस उनकी ओर हाथ बढ़ा सकता है, छू नहीं सकता। छूने लग गया अगर भक्त उनको तो फिर तो वह भक्त जैसे ही हो गए, फिर भक्त को बहुत लाभ नहीं होगा भगवान को पा लेने में भी। समझ रहे हैं बात को?

तो ये है पूजा या नमन या स्तुति के पीछे का सिद्धांत। ऐसा नहीं है कि देवी कोई व्यक्ति आदि हैं जो प्रसन्न हो जाती हैं अगर किसी ने प्रशंसा कर दी। इसको ऐसे मत सोच लीजिएगा। ये सारे काम मानवीय त्रुटियों और वृत्तियों के होते हैं कि किसी ने आ करके आपकी खुशामद कर दी और आप तत्काल फूल गए। यहाँ वो काम नहीं चल रहा है कि कोई जा करके देवी का महिमामंडन कर दे, देवी के गुणों का बखान कर दे और देवी इस बात से एकदम प्रसन्न हो जाएँ और प्रकट हो जाएँ कि “हाँ, मैं आ गई। तुमने कितनी बढ़िया मेरी खुशामद करी, बोलो, क्या चाहते हो?” नहीं, वैसी कोई बात नहीं है।

स्तुति के बाद देवी यदि प्रकट होती हैं तो इसलिए नहीं कि देवी को प्रशंसा की कोई चाह थी। देवी का प्रकट होना भी मानस लोक की एक घटना है, एक आंतरिक घटना है। देवी का प्रकट होना माने मन के भीतर शक्ति का प्रकट होना, तो देवताओं ने स्तुति करी और स्तुति का अर्थ होता है कि मन के भीतर ही अहंकार घटा और जैसे ही भीतर अहंकार घटता है, वैसे ही भीतर शक्ति बढ़ती है, यह हुआ देवी का मन के भीतर अवतरण। अहंकार घटा, शक्ति उठी। अहंकार कैसे घटा? स्तुति करके, क्योंकि स्तुति अहंकार ने की न और स्तुति वह कर ही सकता है घटकर ही। अगर अहंकार घटा नहीं होता तो स्तुति कर नहीं पाता, फिर तो वो अपनी ही स्तुति करता वरना।

तो अहंकार घटा, स्तुति हुई और जहाँ अहंकार घटा, वहाँ देवी प्रकट हो गईं। इसको ऐसे नहीं लेना है कि देवताओं के सामने कोई देवी का रूप आ गया, उस तरह की बातें आप अक्सर कहानियों में पढ़ते हैं या टेलीविजन पर देखते हैं तो ऐसा लगने लगता है कि जैसे देवी कोई व्यक्तित्वधारी इकाई हों। और वो देवताओं के सामने प्रकट होती हैं और देवता उनका इंद्रियों से ही दर्शन और अनुभव करते हैं, और फिर देवी उनसे बात करती हैं और ऐसा लगता है जैसे कि दो व्यक्तियों के बीच में, दो इकाइयों के बीच में बातचीत, संवाद चल रहा हो। नहीं, वैसी कोई बात नहीं है। ये सारी घटनाएँ आंतरिक हैं, मानसिक हैं तभी तो हमारे लिए उपयोगी है न, क्योंकि वही मानस हमें भी है।

जो कमियाँ, वृत्तियाँ, त्रुटियाँ सब देवताओं में थीं, वही हममें भी हैं। जैसे देवता हारते थे, कष्ट पाते थे, हम भी हारते हैं, कष्ट पातें हैं। जैसे देवता सुख में सत्य को भूल जाते थे, वैसे हम भी भूल जाते हैं। तो इसका मतलब है कि देवता अगर अहंकार को नमित करके भीतर की शक्ति जागृत कर सकते थे तो हम भी कर सकते हैं, यह सीखना होता है।

तो देवताओं ने इस तरह से स्तुति गान किया और देवी प्रकट होती हैं। अभी एक-दो बातें और हैं इस पूरे स्तुति सूत्र में जो समझनी आवश्यक हैं।

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