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वास्तविक प्रार्थना में कोई माँग नहीं होती, बस मौन होता है || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
20 min
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आचार्य प्रशांत: ऋषि कहते हैं – “देवी के द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुंभ के मारे जाने पर इन्द्र आदि देवता अग्नि को आगे करके उन कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे। उस समय अभीष्ट की प्राप्ति होने से उनके मुखकमल दमक उठे थे और उनके प्रकाश से दिशाएँ भी जगमगा उठी थीं।”

देवता बोले – “शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवि! हम पर प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत की माता! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि! विश्व की रक्षा करो। देवि! तुम्हीं चराचर जगत की अधीश्वरी हो। तुम इस जगत का एकमात्र आधार हो, क्योंकि पृथ्वी रूप में तुम्हारी ही स्थिति है। देवि! तुम्हारा पराक्रम अलंघनीय है। तुम्हीं जलरूप में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत को तृप्त करती हो।”

“तुम अनंत बालसंपन्न वैष्णवी शक्ति हो। इस विश्व की करणभूता परा माया हो। देवि! तुमने इस समस्त जगत को मोहित कर रखा है। तुम्हीं प्रसन्न होने पर इस पृथ्वी पर मोक्ष की प्राप्ति कराती हो। देवि! सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं।”

“जगदम्ब! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थों से परे एवं परा वाणी हो। जब तुम सर्वस्वरूपा देवी स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली हो, तब इसी रूप में तुम्हारी स्तुति हो गई। तुम्हारी स्तुति के लिए इससे अच्छी उक्तियाँ और क्या हो सकती हैं?”

“बुद्धि रूप से सब लोगों के हृदय में विराजमान रहने वाली तथा स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली नारायणी देवि! तुम्हें नमस्कार है। कला, काष्ठा आदि के रूप से क्रमशः परिणाम की ओर ले जाने वाली तथा विश्व का उपसंहार करने में समर्थ नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।”

“नारायणि! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। तुम्हें नमस्कार है। तुम सृष्टि, पालन और संहार की शक्तिभूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।”

“शरण में आए हुए दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीड़ा दूर करने वाली नारायणी देवि! तुम्हें नमस्कार है। नारायणि! तुम ब्रह्माणी का रूप धरण करके हंसों से जुते हुए विमान पर बैठती तथा कुशमिश्रित जल छिड़कती रहती हो। तुम्हें नमस्कार है। माहेश्वरी रूप से त्रिशूल, चंद्रमा एवं सर्प को धरण करने वाली तथा महान वृषभ की पीठ पर बैठने वाली नारायणी देवि! तुम्हें नमस्कार है।”

“मोरों और मुर्गों से घिरी रहने वाली तथा महाशक्ति धारण करने वाली कौमारीरूप धारिणी निष्पापे नारायणि! तुम्हें नमस्कार है। शंख, चक्र, गदा और शांर्गधनषरूप उत्तम आयुधों को धारण करने वाली वैष्णवी शक्तिरूपा नारायणि! तुम प्रसन्न होओ। तुम्हें नमस्कार है। हाथ में भयानक महाचक्र लिए और दाढ़ों पर धरती को उठाए वाराहीरूपधारिणी कल्याणमयी नारायणि! तुम्हें नमस्कार है। भयंकर नृसिंहरूप से दैत्यों के वध के लिए उद्योग करने वाली तथा त्रिभुवन की रक्षा में संलग्न रहने वाली नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।”

“मस्तक पर किरीट और हाथ में महावज्र धारण करने वाली, सहस्त्र नेत्रों के कारण उद्दीप्त दिखाई देने वाली और वृत्रासुर के प्राणों का अपहरण करने वाली इन्द्रशक्तिरूपा नारायणी देवि! तुम्हें नमस्कार है। शिवदूती रूप से दैत्यों की महती सेना का संहार करने वाली, भयंकर रूप धारण तथा विकट गर्जना करने वाली नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।”

“दाढ़ों के कारण विकराल मुख वाली, मुंडमाला से विभूषित मुंड्मर्दिनी चामुंडारूपा नारायणि! तुम्हें नमस्कार है। लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि तथा महा-अविद्यारूपा नारायणि! तुम्हें नमस्कार है। मेधा, सरस्वती, वरा, भूति, बाभ्रवी, तामसी, नियता तथा ईशारूपिणी नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।”

“सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि! सब भयों से हमारी रक्षा करो; तुम्हें नमस्कार है। कात्यायनि! यह तीन लोचनों से विभूषित तुम्हारा सौम्य मुख सब प्रकार के भयों से हमारी रक्षा करे। तुम्हें नमस्कार है। भद्रकाली! ज्वालाओं के कारण विकराल प्रतीत होने वाला, अत्यंत भयंकर और समस्त असुरों का संहार करने वाला तुम्हारा त्रिशूल भय से हमें बचाए। तुम्हें नमस्कार है।”

“देवि! जो अपनी ध्वनि से सम्पूर्ण जगत को व्याप्त करके दैत्यों के तेज़ नष्ट किए देता है, वह तुम्हारा घण्टा हम लोगी की पापों से उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की बुरे कर्मों से रक्षा करती है। चंडिके! तुम्हारे हाथों से सुशोभित खड्ग, जो असुरों के रक्त और चर्बी से चर्चित है, हमारा मंगल करे। हम तुम्हें नमस्कार करते हैं।”

“देवि! तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गए हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं। देवि! अंबिके! तुमने अपने स्वरूप को अनेक भागों में विभक्त करके नाना प्रकार के रूपों से जो इस समय इन धर्मद्रोही महादैत्यों का संहार किया है, वह सब दूसरी कौन कर सकती थी?”

"विद्याओं में, ज्ञान को प्रकाशित करने वाले शास्त्रों में तथा आदि वाक्यों में तुम्हारे सिवा और किसका वर्णन है? तथा तुमको छोड़कर दूसरी कौन ऐसी शक्ति है, जो इस विश्व को अज्ञानमय घोर अंधकार से परिपूर्ण ममतारूपी गड्ढे में निरंतर भटका रही हो।”

“जहाँ राक्षस, जहाँ भयंकर विष वाले सर्प, जहाँ शत्रु, जहाँ लुटेरों की सेना और जहाँ दावानल हो, वहाँ तथा समुद्र के बीच में भी साथ रहकर तुम विश्व की रक्षा करती हो। विश्वेश्वरि! तुम विश्व का पालन करती हो। विशरूपा हो, इसलिए सम्पूर्ण विश्व को धारण करती हो। तुम भगवान विश्वनाथ की भी वंदनीया हो। जो लोग भक्तिपूर्वक तुम्हारे सामने मस्तक झुकाते हैं, वे सम्पूर्ण विश्व को आश्रय देने वाले होते हैं।”

“देवि! प्रसन्न होओ। जैसे इस समय असुरों का वध करके तुमने शीघ्र ही हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार सदा हमें शत्रुओं के भय से बचाओ। सम्पूर्ण जगत का पाप नष्ट कर दो और उत्पात एवं पापों के फलस्वरूप प्रपट होने वाले महामारी आदि बड़े-बड़े उपद्रवों को शीघ्र दूर करो।”

“विश्व की पीड़ा को दूर करने वाली देवि! हम तुम्हारे चरणों पर पड़े हुए हैं, हम पर प्रसन्न होओ। त्रिलोक निवासियों की पूजनीया परमेश्वरि! सब लोगों को वरदान दो।”

देवी बोलीं – “देवताओं! मैं वर देने को तैयार हूँ। तुम्हारे मन में जिसकी इच्छा हो, वह वर माँग लो। संसार के लिए उस उपकारक वर को मैं अवश्य दूँगी।”

देवता बोले – “सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।”

देवी बोलीं – “देवताओं! वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाईसवें युग में शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो अन्य महादैत्य उत्पन्न होंगे। तब मैं नंदगोप के घर में उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ से अवतीर्ण हो विंध्याचल में जाकर रहूँगी और उक्त दोनों असुरों का नाश करूँगी।”

“फिर अत्यंत भयंकर रूप से पृथ्वी पर अवतार ले मैं वैप्रचित्त नाम वाले दानवों का वध करूँगी। उन भयंकर महादैत्यों को भक्षण करते समय मेरे दाँत अनार के फूल की भाँति लाल हो जाएँगे। तब स्वर्ग में देवता और मर्त्यलोक में मनुष्य सदा मेरी स्तुति करते हुए मुझे ‘रक्तदंतिका' कहेंगे।”

“फिर जब पृथ्वी पर सौ वर्षों के लिए वर्षा रुक जाएगी और पानी का अभाव हो जाएगा, उस समय मुनियों के स्तवन करने पर मैं पृथ्वी पर अयोनिजारूप में प्रकट होऊँगी। और सौ नेत्रों से मुनियों को देखूँगी। अतः मनुष्य ‘शताक्षी' इस नाम से मेरा कीर्तन करेंगे। देवताओं! उस समय मैं अपने शरीर से उत्पन्न हुए शाकों द्वारा समस्त संसार का भरण-पोषण करूँगी। जब तक वर्षा नहीं होगी, तब तक वे शाक ही सभी प्राणियों की रक्षा करेंगे।”

“ऐसा करने के कारण पृथ्वी पर ‘शाकंभरी' के नाम से मेरी ख्याति होगी। उसी अवतार में मैं दुर्गम नामक महादैत्य का वध भी करूँगी। इससे मेरा नाम ‘दुर्गादेवी’ के रूप से प्रसिद्ध होगा। फिर मैं जब भीमरूप धारण करके मुनियों की रक्षा के लिए हिमालय पर रहने वाले राक्षसों का भक्षण करूँगी, उस समय सब मुनि भक्ति से नतमस्तक होकर मेरी स्तुति करेंगे। तब मेरा नाम ‘भीमादेवी’ के रूप में विख्यात होगा।”

“जब अरुण नामक दैत्य तीनों लोकों में भरी उपद्रव मचाएगा, तब मैं तीनों लोकों का हित करने के लिए छः पैरों वाले असंख्य भ्रामरों का रूप धारण करके उस महादैत्य का वध करूँगी। उस समय सब लोग ‘भ्रामरी’ के नाम से चारों ओर मेरी स्तुति करेंगे।”

“इस प्रकार जब-जब संसार में दानवी बाधा उपस्थित होगी, तब-तब अवतार लेकर मैं शत्रुओं का संहार करूँगी।"

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यह सुनते समय तो श्रीकृष्ण का वो श्लोक याद आ रहा था, ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत...’, कि जब भी जिस भी रूप में समस्या आएगी, मैं आकार उसका निवारण करूँगा। बिल्कुल वैसा ही लग रहा था।

आचार्य: वैसा ही है।

प्र२: हमने, आचार्य जी, एक शास्त्र पढ़ा था ‘शिवसूत्र', और उसमें था ‘गुरुपाय'। तो इसमें जो दुर्गा के नाम हैं, उसमें उन्होने जो उपाय किए, उन्हीं के हिसाब से उनका नाम भी रखा गया है।

और दूसरी बात जो बड़ी रोचक सी लगी कि उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा आएगा कि पानी खत्म हो जाएगा। तो यह हम देख भी रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है और पानी की समस्या की बातें हो रही हैं। तो बिल्कुल ऐसा लग रहा है कि जो बताया गया है, वह हो रहा है अभी हमारे साथ।

आचार्य: फिर शकम्बरी देवी के रूप में वे उपस्थित होंगी, माने समस्याओं का आना तो तय है। जैसा है इंसान, मनुष्य का अहंकार समस्याओं को तो बुलाता ही रहेगा, और फिर वो समस्याएँ ही अहंकार को थोड़ा नमित करती हैं, थोड़ी सद्बुद्धि देती हैं। और फिर वो देवी को आमंत्रण देता है, स्तुति करता है, आचमन करता है और फिर देवी उपस्थित होती हैं।

देवी को यह सब मालूम है, क्यों कहना पड़ रहा है? क्योंकि देवताओं ने सुख माँगा है। देवताओं ने कहा है कि हम बने रहें और हम पर जब भी कभी विपदा आए, आप आ जाइएगा। तो देवी बता रही हैं कि विपदा तो आएगी-ही-आएगी। विपदा क्यों आएगी? क्योंकि देवताओं तुम चीज़ ही ऐसी माँग रहे हो, इससे विपदा आनी तय है।

तुम माँग रहे हो कि सदा तुम्हारा शासन बना रहे। सतत तो कुछ भी बना नहीं रहना, पर तुम चीज़ बहुत छोटी माँग रहे हो। तुम मुक्ति नहीं माँग रहे, तुम भोग माँग रहे हो। तुम कह रहे हो कि हम सदा बने रहे और राज्य का भोग करते रहें।

तुम्हारी माँग ही ऐसी है कि तमाम तरह के दैत्य पैदा होंगे क्योंकि दैत्य तुम्हारे ही भीतर हैं, देवताओं। जो तुमने वरदान माँगा, उस वरदान में तुमने दैत्यों को भी माँग लिया। वर में तुम सत्य नहीं माँग रहे, तुम मुक्ति नहीं माँग रहे, तुम तो माँग रहे हो सत्ता, और भोग और सुख। तो इसलिए तूम पर विपदा आएगी। हाँ, ठीक है, तूमपर विपदा आएगी, तुम मुझे बुलाओगे, मैं आकर विपदा हर भी लूँगी, लेकिन विपदा पुनः आएगी। विपदा तब तक आती रहेगी, जब तक तुम देवी के पास भोग माँगने जाते रहोगे मुक्ति की जगह।

प्रार्थना में कभी भोग मत माँग लेना। प्रार्थना में सदा मुक्ति माँगो।

देवता होना कोई अपने-आपमें बड़े मंगल की बात नहीं। कुछ साल भोगते हैं और फिर पीटे जाते हैं। इधर-उधर छुपते हैं, लुकते हैं, फिर तपस्या करते हैं, स्तुति करते हैं, सहायता माँगते हैं, सब सुख बराबर हो जाता है। बल्कि ऐसे विपदा के काल और बुरे लगते हैं जब मन में पुराने सुख की स्मृति रहती है, कि हाय! हम तो कभी राजा हुआ करते थे। देखो, क्या हो गए! सारे अधिकार, वैभव, राज्य, सम्पदा सब छिन गया।

तो देवताओं जैसे मत हो जाना कि परा-शक्ति से माँग क्या रहे हो? कि हमारा राज्य लौटा दो, हमारे हाथी-घोड़े लौटा दो, हीरे-जवाहरात लौटा दो। मोती-माणिक्य नहीं माँगने हैं, मुक्ति माँगनी है। यही गलती करते हैं बार-बार देवता। पहले हमने एक जगह कहा था न कि दैत्य कहाँ से आते हैं? देवताओं के भीतर से आते हैं।

प्र२: अगर हम माँगेगे भी, हो सकता है हमे लगे कि हम कुछ अच्छी चीज़ माँग रहे हैं, लेकिन हम उसमें भी दानव ही माँग लेंगे, जैसे आपने बताया तो इस हिसाब से माँगना ही अपने-आपमें...

आचार्य: इस हिसाब से वास्तविक प्रार्थना मौन होती है। यही प्रार्थना है कि हमारी कामनाएँ हम पर हावी न हो जाएँ। अगर हमने कुछ भी माँगा तो हमने कामना ही तो माँग ली न अपनी? मौन रहकर तुम यह माँग लेते हो कि कामना से मुक्ति मिल जाए।

वास्तविक प्रार्थना में कोई माँग नहीं होती, बस मौन होता है।

देवता मौन नहीं रह पाए, वर माँगने में लग गए। और वर जितने भी वो माँगते हैं, साथ में अपना अमंगल भी माँग लेते हैं। अगर ढंग से उन्होंने वर माँग लिया होता तो देवी को बार-बार क्यों आना पड़ता?

रोगी एक बार में ठीक हो जाए तो चिकित्सक क्यों बोलेगा कि मैं फिर इस बीमारी का उपाय करने आऊँगी, मैं फिर इस बीमारी का उपाय करने आऊँगी। और आती ही रहूँगी, इतने कल्पों तक मैं आती रहूँगी, इतने मन्वंतरों तक मैं आती रहूँगी। इसका मतलब क्या है? यह जो रोगी है, यह ठीक होना ही नहीं चाहता। यह बार-बार वरदान माँगता है बस। वरदान भी बस इसका एक ही है – हम अपने राज्य का सुख भोगते रहें।

सत्य की तरफ़ इसलिए नहीं जाना कि मनोकामना पूर्ण होती रहे। यह बात बहुत छोटी हो जाएगी और आत्मघातक भी।

पूजा, प्रार्थना, धर्म, अध्यात्म तुम्हारी इच्छाएँ पूरी करने के लिए नहीं होते, तुम्हारी केंद्रीय वृत्ति ‘अहम्’ को उठा देने के लिए होते हैं, मिटा देने के लिए होते हैं।

पर प्रचलित तो यही है न सब कि फलां मंदिर में जाओ, सारी मनोकामनाएँ पूरी होंगी। हमने ऐसा हाल कर दिया है धर्म का कि लोग अपनी-अपनी इच्छाएँ लेकर खड़े हो जाते हैं भगवान के द्वार, देवी के द्वार, “यह दे दो, यह दे दो, यह दे दो।” तुम जो कुछ माँग रहे हो, उसी में तुम्हारा अमंगल है। माँग क्यों रहे हो? चुप हो जाओ न!

जो तुम चाह रहे हो, वही तुम्हें बर्बाद करेगा। मत चाहो। अगर देवी वास्तव में बड़ी हैं, तो उन पर ही छोड़ दो न, वो देख लेंगी। सत्य के सामने शर्तें क्या रखनी कि यह दे दो, वह दे दो। समर्पित हो जाओ, इतना काफ़ी है। वो पूछें, “कहो, वत्स! क्या चाहिए?” आप देख लीजिए। वो भी कब से आतुर हैं यही उत्तर सुनने के लिए, मिलता ही नहीं है।

इतनी पौराणिक कथाएँ हैं, कभी असुर प्रार्थना करते हैं, कभी दैत्य प्रार्थना करते हैं, कभी मानव तपस्या करते हैं, कभी अन्य कोई गन्धर्व, कोई और। लेकिन जब वर माँगने का समय आता है तो चुप कोई नहीं रह पाता है। और फिर वही वर भरी पड़ता है।

वास्तविक तपस्या वह है जो तुम्हें वर माँगने के लायक ही न छोड़े। तुमने वर माँगने वाले को तपा-तपाकर मिटा दिया। यही तो वर है तपस्या का। अगर तुम बचे हुए हो तपस्या के बाद भी कामना माँगने के लिए, वर माँगने के लिए, तो तुम्हारी तपस्या अभी बहुत अधूरी है।

देखो न क्या हुआ है? अभी-अभी देवी ने शुम्भ-निशुम्भ को समाप्त किया है, और फिर देवी ने बता दिया है कि अभी वह आने वाला है दानव, अभी वह आने वाला है दानव। सबके नाम भी बता दिए, कोई दुर्गम नाम का आएगा, वह अरुण नाम का आएगा और वह ऐसे-ऐसे उत्पात करेंगे और फिर मैं उनको मारूँगी। यह क्या बात है? अभी-अभी तो मारा है। वो फिर आ जाएँगे, क्यों आ जाएँगे?

ये जो देवता खड़े हैं न, ये ही हैं असली गड़बड़ी। देवी कितनी ही बार मारें असुरों को, ये सुर ही असुर का कारण बन जाते हैं। नहीं तो होना तो यह चाहिए था कि हाँ, शुम्भ-निशुम्भ का संहार हो गया, अब जगत सदा के लिए आपदा मुक्त हो गया। नहीं हो पाएगा जगत आपदामुक्त, ये देवता खड़े हैं न, “मेरी कामना पूरी करो, मैं राज्य भोगूँ, कामधेनु गाय चाहिए, कल्पवृक्ष चाहिए, इतनी रानियाँ चाहिए, इतने तरह के भोग चाहिए, रत्न-आभूषण चाहिए।” यही सब तो वरदान इनको चाहिए होता है कि “देवी, अब हम बहुत हर्षित हुए। आपने हमको हमारा राज्य वापिस दिलवा दिया, अधिकार वापिस दिलवा दिए।” जो भी कोई ऐसी कामना रखेगा, वह शीघ्र ही अपने लिए नए उत्पात तैयार कर लेगा।

प्र३: यहाँ पर, आचार्य जी, जो देवताओं की कामनाएँ हैं, वे ही असुर हैं या दैत्य हैं। और जो पूरा वर्णन है, उसमें जो हमारे मन में भी छवि आती है, वह यह आती है कि असुर माने कुछ भद्दा या कुछ उस तरीके का। लेकिन जब कामनाओं की पूर्ति होती है, तो वह हमें बहुत सुख देती है या बहुत सुंदर-सुंदर होती है।

आचार्य: इसीलिए तो फिर दैवीय दृष्टि चाहिए न कि तुम देख सको कि ये सुंदर, सुगंधित, सुखदायिनी लगने वाली कामनाएँ वास्तव में दैत्याकार हैं, दैत्यवादिनी हैं, दैत्यस्वरूपा है। वह आँख चाहिए जो सुंदर कामना में राक्षसी को देख पाए, वह नाक चाहिए जो सुगंधित इच्छा में दुर्वास का अनुभव कर पाए, वह कान चाहिए जो मनोवांछित शब्द में अमंगल की चेतावनी सुन पाए। वह नहीं है अगर तुम्हारे पास, तो यही हाल रहेगा, बार-बार दैत्यों द्वारा सताए जाओगे।

कामना लगती सुखदायनी है, होती वह रक्तपिपासु है।

ये जितने भी तुम्हें असुर मिले हैं पाठ में, इनको सबको तुम कामनाएँ ही जानना, कौन सी कामना? व्यक्तिगत भोग की कामना। व्यक्तिगत भोग की कामना ही असुर है।

प्र२: अभी आपने, आचार्य जी, बोला कि अगर तुम ऐसे नहीं होते तो दुर्गा वापस क्यों आएगी बार-बार। मैंने आपका एक लेख पढ़ा था, उसमें आपने कहा था कि एक तरह से इविल (बुराई) अच्छा है क्योंकि इविल बार-बार आपको शुभ का साथ देता है। इस तरह से बताया था आपने, ’इफ यू रिएलि लव ए सैंट, यू विल नोट लाइक एविल’ (अगर आप वाकई किसी संत को चाहते हैं, तो फिर आपको बुराई अच्छी नहीं लग सकती)।

आचार्य: जब प्रेम पूरा होगा तो तुम दूर क्यों जाना चाहोगे? यह तो कोई बहुत मज़ेदार बात हुई नहीं कि बार-बार दूर जाकर फिर निकट आ रहे हो। और निकट आना इतना ही प्यारा है तो पूरे ही निकट आ जाओ न, बिना दूरी के, निरंतर। बीच में दूरी का अंतराल क्यों रखना?

देवताओं को भी महादेव प्यारे हैं, पर उनको बीच-बीच में प्यारे हैं। तो ठीक है, बीच-बीच में भी तुम्हें अगर महादेव प्यारे हैं तो देव कहलाओगे, पर मुक्ति नहीं पाओगे। तो प्रश्न यही है कि तुम्हें देव कहलाने में रुचि है या मुक्ति में?

प्र२: आपने कहा था कि आपको संत इतने प्यारे हैं कि आप चाहते हो कि वो बार-बार आएँ। आपने इस संदर्भ में कहा था।

आचार्य: देखो, प्रेम जब पूरा होता है तो उसमें यह नहीं होता कि मुझे दूसरा प्यारा है। यह भी अहंकार होता है कि मुझे दूसरा प्यारा है। प्रेम जब पूरा होता है तो तुम दूसरे से अभिन्न हो जाते हो, फिर यह कहने के लिए शेष नहीं रह जाते हो कि मुझे दूसरा प्यारा है।

यह बड़ी माया होती है कि मुझे दूसरा प्यारा है, दूसरे के प्रति मैं प्रेम का अनुभव करता रहूँ, इसलिए मैं बचा रहूँगा, इसलिए बीच-बीच में दूरी बनाता रहूँगा। और क्योंकि दूरी नहीं बनाऊँगा तो मैं बचा नहीं रहूँगा, बचा नहीं रहूँगा तो प्रेम का अनुभव कौन करेगा? यह जो प्रेम है, यह निम्न स्तर का प्रेम है, जिसमें आप दूरी बचा कर रखते हो।

इस स्तर का प्रेम करने वाले बहुत मिल जाएँगे कि थोड़ी दूरी तो होनी चाहिए न, नहीं तो प्रेम पता कैसे चलेगा? अगर एक ही हो गए, अभिन्न हो गए, अनन्य हो गए तो अनुभव ही नहीं होंगे। अनुभव होने के लिए दो चाहिए, और प्रेम के अनुभव का हमें भोग करना है। बड़ा सुख होता है न प्रेम के अनुभव में, हमें उस सुख का भोग करना है, इसलिए थोड़ी दूरी बनाकर रखेंगे।

सुख में और आनंद में यही अंतर है – सुख में दूरी चाहिए क्योंकि सुख में भोग है, आनंद में अंत है, मुक्ति है, अद्वैत है, वहाँ एक होना पड़ेगा। तो सुख चाहिए तो बीच-बीच में दूरी बना लो, आनंद चाहिए तो अभिन्न हो जाओ। वह तुम पर है।

प्र४: आचार्य जी, अभी जैसे इसमें बताया गया था कि जब देवी ने शुम्भ-निशुम्भ को मार दिया तो सारी नदियाँ साफ़ हो गई, सारा वातावरण साफ़ हो गया। अभी इसका उदाहरण हाल ही में देखने को मिला जब कोरोना काल आया था तो दिल्ली में जो यमुना नदी है, वह एकदम साफ़ हो गई थी। यह एक देवीय प्रकोप की तरह ही था, फिर भी लोग अर्थव्यवस्था की बात कर रहे थे कि अर्थव्यवस्था बढ़ नहीं रही है। तो इतनी भयंकर आपदा आने के बाद भी हमें समझ नहीं आया तो फिर तो हमारा विनाश तय है।

आचार्य: अब और बड़ी आएगी, उसमें कुछ संदेह नहीं है।

आपका अज्ञान ही आपदा का रूप लेता है। अज्ञान जब तक है, आपदा आती रहेगी। छोटी आपदा से आप समझ जाओ, छोटी आपदा से ही आपका अज्ञान दूर हो जाए तो बड़ी की नौबत नहीं आती। पर छोटी आपदा आपको अगर ज्ञान की तरफ़ नहीं भेज पायी, तो फिर आपमें ज्ञान का संचार करने के लिए बड़ी आपदा आएगी।

प्र१: आचार्य जी, अब तक के पूरे पाठ में लगातार यही हो रहा है कि देवताओं पर आपदा आई थी, मगर असुरों का नाश हो गया था और देवों को एक और सुधार का मौका मिल गया था। तो आप जैसे बता रहे हैं कि इससे और बड़ी आपदा आएगी तो फिर शायद देव भी नहीं बचेंगे?

आचार्य: हाँ, फिर वह काल-रात्रि, सृष्टि-रात्रि से संबोधित की जाती है, जिसमें फिर पूरी सृष्टि का ही नाश हो जाता है। फिर पूरी सृष्टि की पुनः रचना होती है। एक होती है आपकी रात्रि और फिर एक होती है ब्रह्मा की रात्रि, पौराणिक बातें हैं, जिसमें पूरी रचना ही अरचित हो जाती है, मिट जाती है। फिर कुछ नया होता है, शून्य से।

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