वास्तविक प्रार्थना में कोई माँग नहीं होती, बस मौन होता है || श्रीदुर्गासप्तशती पर (2021)

आचार्य प्रशांत: ऋषि कहते हैं – “देवी के द्वारा वहाँ महादैत्यपति शुंभ के मारे जाने पर इन्द्र आदि देवता अग्नि को आगे करके उन कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे। उस समय अभीष्ट की प्राप्ति होने से उनके मुखकमल दमक उठे थे और उनके प्रकाश से दिशाएँ भी जगमगा उठी थीं।”
देवता बोले – “शरणागत की पीड़ा दूर करने वाली देवि! हम पर प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत की माता! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि! विश्व की रक्षा करो। देवि! तुम्हीं चराचर जगत की अधीश्वरी हो। तुम इस जगत का एकमात्र आधार हो, क्योंकि पृथ्वी रूप में तुम्हारी ही स्थिति है। देवि! तुम्हारा पराक्रम अलंघनीय है। तुम्हीं जलरूप में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत को तृप्त करती हो।”
“तुम अनंत बालसंपन्न वैष्णवी शक्ति हो। इस विश्व की करणभूता परा माया हो। देवि! तुमने इस समस्त जगत को मोहित कर रखा है। तुम्हीं प्रसन्न होने पर इस पृथ्वी पर मोक्ष की प्राप्ति कराती हो। देवि! सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं।”
“जगदम्ब! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थों से परे एवं परा वाणी हो। जब तुम सर्वस्वरूपा देवी स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली हो, तब इसी रूप में तुम्हारी स्तुति हो गई। तुम्हारी स्तुति के लिए इससे अच्छी उक्तियाँ और क्या हो सकती हैं?”
“बुद्धि रूप से सब लोगों के हृदय में विराजमान रहने वाली तथा स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली नारायणी देवि! तुम्हें नमस्कार है। कला, काष्ठा आदि के रूप से क्रमशः परिणाम की ओर ले जाने वाली तथा विश्व का उपसंहार करने में समर्थ नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।”



