
प्रश्नकर्ता: गरुड़ पुराण और ये सारे, जो वाचे जाते हैं, ये भी कल्पना हैं? कहीं न कहीं से तो ये आया है।
आचार्य प्रशांत: कुछ भी जो है, वो कहाँ से आता है? कुछ भी जिसको आप बोलते हो कि “है”, वो कहाँ से आता है? बोलिए?
प्र: रचना तो…






प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, अन्यथा समाज में अगर कोई अंधविश्वास फैलता है तो वो जान तो नहीं लेता, आंतरिक रूप से मार देता है पर किसी का शरीर तो नहीं हरता। अगर कोरोना वायरस से उठ रही इस वैश्विक महामारी के समय में कोई अंधविश्वास फैल रहा है तो वो

We leave a talk moved, and by evening it has faded, so we ask how to stay aware every moment. Yet one glance at a report that says cancer is never forgotten; even in our dreams we remember it, and no one has to remind us. We remember what we truly want to save. The mirror is held up once, and a teacher can do no more than that. Sunlight pours through every window, and we can still crawl under a rock. What are we choosing, each time we forget?
आचार्य प्रशांत: देवता सब पहुँचे हुए हैं, कहाँ पर? हिमालय पर और गंगा जी के तट पर। वहाँ वो देवी की स्तुति कर रहे हैं। तो बहुत कुछ है जो कहते हैं देवता, उसमें जो देवी मंत्र है, देवी सूत्र है, उसको हम पढ़ते हैं और विचारते हैं —
"जो…
तो दूत तो भाई अपमानित सा चेहरा ले करके गया दैत्यराज के पास, तो दैत्यराज ने भी अपेक्षा नहीं करी थी कि एक स्त्री उनका विवाह प्रस्ताव ठुकरा देगी, वह भी तब जब उन्होंने इंद्र…
आचार्य प्रशांत: तो बार-बार देवता कहते हैं: उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
ये क्यों बार-बार कहते हैं? क्योंकि मन के लिए दोहराव बहुत आवश्यक है; कोई बात एक बार बता दो, बात बनती नहीं है। मन तो पत्थर सरीखा है, उसको घिसना…
आचार्य प्रशांत: नौवें अध्याय में प्रवेश करते हैं। तो हमने रक्तबीज का अंत देख लिया या रक्तबीज की मुक्ति देख ली।
राजा ने कहा – “भगवन! आपने रक्तबीज वध से संबंध रखने वाला देवी-चरित्र का यह अद्भुत माहात्म्य मुझे बतलाया। अब रक्तबीज के मारे जाने पर अत्यंत क्रोध में भरे…
आचार्य प्रशांत: तीसरे और उत्तर चरित्र का तेहरवाँ और अंतिम अध्याय।
ऋषि कहते हैं – “राजन! इस प्रकार मैंने तुमसे देवी के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया। जो इस जगत को धारण करती हैं, उन देवी का ऐसा ही प्रभाव है। वे ही विद्या उत्पन्न करती हैं। भगवान विष्णु की…
आचार्य प्रशांत: दसवाँ अध्याय।
ऋषि कहते हैं – “राजन! अपने प्राणों के समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा सारी सेना का संहार होता जान शुम्भ ने कुपित होकर कहा – ‘दुष्ट दुर्गे! तू बल के अभिमान में आकर झूठ-मूठ का घमंड न दिखा। तू बड़ी मानिनी बनी…
आचार्य प्रशांत: लिंग का जो आध्यात्मिक अर्थ है वो प्रतीक और प्रमाण दोनों होता है। लिंग माने प्रतीक और लिंग माने प्रमाण और इन्हीं दोनों अर्थों के कारण शिवलिंग पूजनीय होता है। एक अर्थ में शिवलिंग द्योतक होता है निराकार…
वक्ता: नवदुर्गा का माॅहौल है। शक्ति के बारे में कुछ बातें करना प्रासंगिक रहेगा। शिव केंद्र है, शिव सत्य है। शिव वो हैं जिन तक मन, ‘मन’ रह कर पहुँच नहीं सकता। शिव को तो रहस्य रहना है सदा। शक्ति, मन है, संसार है। शिव में स्थिरता है, अचलता है।…

The Bhagavad Gita is often accused of supporting caste and misogyny through selective quotations that ignore context, grammar, and the text's central teachings. A closer reading shows that its emphasis is on inner qualities, conscious action, and spiritual equality rather than birth-based hierarchy or gender discrimination. Misinterpretations arise when isolated verses are detached from their broader meaning, while the Gita consistently points toward self-knowledge, freedom from ego, and the universal possibility of liberation for every human being.

We have all put down a book that could have helped us, or dozed off halfway through something that mattered. A man who could not keep food down was given medicine, and he threw that away too, since it went in by the same route. Most of us strike a similar deal: we move into a place that stinks and, within a week, call the smell normal. Show our fifteen-year-old self the life we lead now and they would scoff. What would change if we admitted we do not like our condition?

![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)
आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग है।
आचार्य प्रशांत के यूं तो सोशल मीडिया इत्यादि पर तीन करोड़ से अधिक फॉलोवर और तीस करोड़ से अधिक श्रोता हैं, परंतु गीता कम्यूनिटी कुछ अलग ही बात है। इसमें मात्र वे गंभीर साधक सम्मिलित हैं जो…

15 नवंबर को गीता सत्र से कुछ घंटे पहले, देश की बड़ी पशु कार्यकर्ता, गौरी मौलेखी जी का एक संदेश आया। उन्होंने आचार्य जी से नेपाल में होने वाले ‘गढ़ीमाई महोत्सव’ के विषय पर बिहार के, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और प्रेस से बातचीत के लिए पटना आने का अनुरोध किया। यह एक गंभीर मुद्दा था—हजारों जानवरों की जान बचाने का और एक सदियों पुरानी कुप्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठाने का।

On the evening of November 15, just hours before a scheduled Gita session, a message arrived from Gauri Maulekhi, a prominent animal rights activist. She requested Acharya Prashant to join her in Patna the following morning to meet the Chief Secretary of Bihar and address the press about the Gadhimai festival in Nepal. This was no ordinary request. It was a plea to save thousands of animals and to raise a voice against a centuries-old practice of cruelty disguised as tradition.

"मुझे आश्चर्य होता है ये देखकर कि कैसे भगवान ने चार करोड़ बंगालियों को बनाते हुए, एक आदमी को भी जन्म दिया।"
जिस 'आदमी' की बात यहाँ गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर कर रहे हैं, उनके लिए एक बार गांधी जी ने कहा था,
"विद्यासागर की उपाधि उन्हें उनके ज्ञान के लिए…

Love is great. Love is necessary. Love is beautiful.
But what is love?
For most of us, love is the greatest excitement and comfort—and also the greatest suffering. Whether love has become a problem or something you cherish the most in your life, please go deeper into the matter. Know…

Spirituality is about belonging to existence. Not belonging to a narrow household, or caste or ideology. All these are boundaries. So, wherever there are boundaries, there is violence. Wherever there are boundaries, there is also the fear of being small, powerless, limited. The really non-violent one is at home, everywhere and in every situation. Non-violence is not about following duties. Non-violence is an action in clarity and love. That alone is non-violence.

नवरात्रि में हम देवी की पूजा करते हैं और महिषासुर को बाहर का कोई दैत्य मान लेते हैं। पर दुर्गा सप्तशती का दूसरा चरित्र हमारी अपनी वृत्ति की कथा है। जो मन प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मानता है, जंगल काटता है, नदियाँ दूषित करता है, पशुओं को खाता है और कहता रहता है कि मुझे और चाहिए, वही महिषासुर है। त्यौहार उसी के वध के लिए है, उसे भोग लगाने के लिए नहीं। क्या इस नवरात्रि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानेंगे?

किसी के क्रोध पर चोट करो तो क्रोध पाँच गुना हो जाता है। दो गुटों की लड़ाई में एक मारा जाता है तो बीस और खड़े हो जाते हैं। दुर्गा सप्तशती का रक्तबीज यही है: हर बूँद से एक नया असुर। रक्तबीज कोई ख़ास असुर नहीं, हमारे अहंकार की प्रतिक्रियात्मकता है। उस पर चोट करने से वो और बड़ा होता है, क्योंकि किसी को ‘तुम बुरे हो’ कहना भी उसे ‘तुम हो’ कहना है। काली उसे खा लेती हैं, यानी अहंकार प्रकृति से अलग नहीं रह जाता। तो क्या हम देख सकते हैं कि जिसे हम ‘मैंने किया’ कहते हैं, वो कौन कर रहा है?

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

जब तक दोस्ती का अर्थ नहीं समझोगे, तब तक जितनी भी दोस्तियाँ करोगे, सब गड़बड़ होंगी। जो तुम्हारी मक्कारी या नालायकी में साथ देगा, तुम उसे ही अपना असली दोस्त समझोगे। दोस्ती का मतलब है, गहराई से एक-दूसरे को समझना, और इसका असली अर्थ वही समझ सकता है, जो वयस्क और परिपक्व होने को तैयार हो। प्यार और दोस्ती केवल एक परिपक्व मन को ही मिलती हैं।

Spirituality is neither a tradition nor a culture. Spirituality is not at all about following something or somebody. When it is said that you must follow the Guru, the Guru is the Truth, not a person not a man. Spirituality would never say, “Follow the words of a man.” Spirituality says, “Let the mind follow the Center, the Truth or you may call it the Heart or God.”

First of all, we have to realize what our life is like. You know, I can’t change something without firstly understanding its processes and its actuality. I must know what this thing called my life is. We keep living without knowing a thing about life. And we’re blinded by names and identities.

Questioner: When I do something my parents don’t approve of, they scold me. But sometimes the matter goes too far and I get offended, and then I refrain from talking back to them; I fear that if I say something, I will end up hurting them. But then, if I…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर आज काफ़ी अच्छे सीख थे सत्र में। और मेरा प्रश्न भी इस सत्र से ही सम्बन्धित है। सर, आपने बताया था कि मान्यताओं का सम्बन्ध अनुभव से है। प्रारम्भ में हमने चर्चा की था। यानी कि जो विकार हैं, वो भी एक तरह से मान्यताओं…

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

प्रश्नकर्ता: अपूर्वा हैं, अगर कोई हमारी किसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाए, हमें बार-बार परेशान करे तो हम उस समय पर न्यूट्रल (तटस्थ) कैसे बने रहें?
आचार्य प्रशांत: देखो, दो-तीन तरह की परेशानियाँ होती हैं जो लोगों को लगती हैं। मान लो, तुम ट्रेन में जा रही हो, भारतीय रेल। अब…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! मेरे दो प्रश्न हैं। पहला प्रश्न है कि टिपिकली (आमतौर पर) ऐसा माना जाता है कि जो महिलाएँ होती हैं, वो थोड़ा प्राकृतिक रूप से केयर गिवर्स (देखभाल कर्ता),इमोशनल (भावुक), ह्वेरैज़ मेन (जबकि पुरुष) वो थोड़ा,लॉजिकल (तार्किक), गो-गेटर्स (उद्योगी), ऐम्बिशस (महत्वाकांक्षी) होते हैं।
जब…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा प्रश्न यह है कि हम अपने बच्चों को सत्य से कैसे अवगत कराएँ।
आचार्य प्रशांत: सत्य कुछ होता ही नहीं है, उससे कैसे अवगत कराएँगे? झूठ से अवगत कराया जाता है। सच रोशनी है। सच क्या है? रोशनी है, है न? उस रोशनी में वो सब…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं पिछले दो-तीन महीने से अध्यात्म में हूँ। थोड़े समय से बिलकुल सही चल रहा था, जब तक मन और बुद्धि पर काम हो रहा था तो ज़्यादा डर नहीं था, पिछले हफ़्ते कुछ ऐसा हुआ कि बहुत ज़्यादा डर लगने लगा। मैं जिनसे सीख रही…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मेरा सवाल मेरे बच्चों के बारे में था, आचार्य जी। मेरे नौ साल के और ग्यारह साल के दो बच्चे हैं लेकिन उनका लगाव आध्यात्मिक साहित्य में नहीं हो पा रहा है। वो लोग पंजाबी रैपिंग सॉन्ग सुनते हैं; बॉलीवुड के आइटम सॉन्ग सुनते हैंl उसमें…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! डू वी नीड टू क्रिएट गॉड्स ऑर वी हैव ऑलरेडी (क्या हमें भगवान बनाने होंगे या वो पहले से हमारे पास हैं)? जैसे हम कुछ अच्छी क्वालिटीज़ हम जो पढ़ते हैं शास्त्रों में, कई बार हमारे पास नहीं होती है, या वो हमारे पास है, हम अनदेखा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, जो सोसाइटी (समाज) के द्वारा हमारे ऊपर कंडीशनिंग (अनुकूलन) करी गयी है, गलत मूल्यों को हमारे अंदर बैठा दिया गया है। लेकिन मुझे एक चीज़ समझ में नहीं आती है कि यह सोशल (सामाजिक) कंडीशनिंग इतनी बुरी तरह कैसे हम पर हावी होती चली गयी? अगर…

The building is raised on a weak foundation, and now you want to penalize everybody who comes and shakes it up even a little? You don't do this. Why did you allow this building to stand on such a weak foundation, and now you are trying to protect it through legislation? What kind of stupidity is this?

प्रश्नकर्ता: अगले प्रश्नकर्ता आपके साथ गोवा शिविर में भी थे और वहीं से ही वे उद्धृत करते हैं। आपने कहा था, ‘आदमी वास्तव में जान जाए उनके ऊपर कौन है। तो आगे लिखते हैं कि आचार्य जी, इस बात को मैं कैसे समझूँ और जान पाऊँ कि ज़िन्दगी निजी भोग…

प्रश्नकर्ता: मेरे विचार से एक व्यक्तिगत संसार होता है और एक सामाजिक संसार होता है। और मेरी आयु वर्ग में — 21 से 30 वर्ष की आयु के बीच जहाँ पर आदमी के के सामाजिक संसार को दो हिस्सों में बाँट दिया जाता है — रिश्ता (पर्सनल लाइफ़) और कैरियर…