साल भर हम वही करते हैं जो लालच कहता है, और कहते हैं, “क्या करें, दुनिया हावी हो जाती है।” फिर एक रात दीये जलाकर उसकी जीत का उत्सव मनाते हैं जिसने राज्य छोड़ दिया, और लंका जीतकर भी वहाँ से कुछ नहीं लूटा। राम जीते हुए थे क्योंकि उनमें लोभ नहीं था। हम हारे हुए इसलिए नहीं हैं कि कमज़ोर हैं, बल्कि इसलिए कि लालची हैं। तो दिवाली का यह उल्लास किसका है? क्या यह दिन जश्न का होना चाहिए, या प्रायश्चित और तपस्या का?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
[दिवाली के अवसर पर एक संवाद से, 2019]
आचार्य प्रशांत: मैं समझना चाहता हूँ। एक दिन आता है जिसको आप कहते हैं आज पर्व है, आज त्योहार है। वजह क्या है आपके पास उस दिन को अलग या महत्वपूर्ण जानने की? मैं बिल्कुल आरंभ से शुरुआत करना चाहता हूँ। बिल्कुल अज्ञानी होकर के जैसे कि मुझे कुछ पता ना हो। ठीक है! तो मान लो मैं किसी और ग्रह से आया हूँ। मैं नहीं जानता कुछ। मैं समझना चाहता हूँ कि एक दिन आया है। वह दिन कुछ भी हो सकता है। दिवाली, दशहरा, क्रिसमस, ईद, रक्षाबंधन। ठीक है! या चाहे जो राष्ट्रीय पर्व होते हैं, या चाहे जो अंतरराष्ट्रीय पर्व होते हैं। वो कुछ भी हो सकता है। साल में ऐसे 15–20 दिन आते हैं ना जब हम कोई ना कोई त्योहार तो मनाते ही हैं।
वो कोई बहुत पुराना त्योहार भी हो सकता है जैसे दिवाली हो गई या वो आजकल का कोई प्रचलन हो सकता है कि जैसे फ़ादर्स डे हो गया, वैलेंटाइन्स डे हो गया, रोज़ डे हो गया। ये सब। मैं जानना चाहता हूँ कोई एक दिन ख़ास क्यों घोषित कर रहे हैं आप? मैं कहीं और से आया हूँ। मैं नहीं जानता। मुझे बताइए। और उस दिन आप क्या कर रहे हैं? आपने कह दिया कि वो दिन ख़ास है। अब उस दिन आप क्या कर रहे हैं? आप कह रहे हैं कि एक दिन है। मान लीजिए कोई भी दिन है। 2 अक्टूबर है, गांधी जयंती है। ठीक है! 25 दिसंबर







