
मित्रता का उद्देश्य एक-दूसरे की सीमाओं को पुष्ट करना नहीं, बल्कि ऊँचाई की ओर बढ़ने में सहयोग देना है। कॉलेज जीवन आत्म-विकास, सीखने और उत्कृष्टता की खोज का दुर्लभ अवसर है। केवल समान सोच वाले समूहों में समय बिताना व्यक्ति को औसत बनाए रख सकता है। सच्चा मित्र स्वयं गुरु बनने का दावा नहीं करता, बल्कि ज्ञान, अनुभव और विकास के बेहतर स्रोतों तक ले जाता है। पढ़ाई, कौशल, खेल, साहित्य और आत्म-विस्तार में लगाया गया समय ही भविष्य को आकार देता है।







प्रश्नकर्ता: जैसे किसी भी व्यक्ति को अपनी कोई भी बात बताने में मतलब कोई सुन ले बिना जजमेंटल (त्वरित निष्कर्ष करे) हुए, उससे एक शान्ति का अनुभव होता है या एक सुकून महसूस होता है। ये किन कारणों से होता है? या कोई भी व्यक्ति कई बार कुछ ख़ास व्यक्ति

आचार्य प्रशांत: समझ में नहीं आ रहा क्या कि जब भगत सिंह कहते थे कि वो नास्तिक हैं तो वो वास्तव में परंपरागत धर्म, सड़े-गले धर्म, संस्थागत धर्म को नकार रहे थे। नहीं तो एक ऊँचे आदर्श के लिए शरीर की आहुति दे देने से बड़ा धार्मिक काम क्या होगा?

आचार्य प्रशांत: जिसमें वो दिखाई दे जाए जो सच हो। जिसमें सच्चाई दिखाई दे जाए उसको आदर्श बनाइए। जो व्यक्ति आपको सत्य दिखा दे उसको आदर्श बनाइए। इंसान अगर सत्य दिखा दे तो आदर्श कहलाने लायक़ है।

प्रश्नकर्ता: नमस्कारम आचार्य जी, पन्द्रह साल की उम्र है, पुरुषों के प्रति काफ़ी आकर्षित रहता हूँ। मुझे पता है कि समलैंगिकता एक विकार है। इस विकार का कैसे विगलन हो? कृपया इस पर मार्गदर्शन करें।


प्रश्नकर्ता आचार्य जी, मैं जाति व्यवस्था से बहुत पीड़ित हूँ। पहले जिस लड़की से शादी करनी चाही, नहीं कर पाया क्योंकि जाति के आधार पर परिवार और समाज ने विरोध किया।



प्रश्नकर्ता: इस संसार में मेरे निकट ज़्यादातर लोभ, दोष इत्यादि माया का प्रभाव रहता है और सारे दोस्त उसी में मग्न रहते हैं। मेरा उठना-बैठना, श्रवण-दर्शन सब उनके साथ ही होता है। फिर उनके साथ सारे पल रहते हुए भी उन विचारों से कैसे बचें? या इन सबसे सम्बन्ध ही

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मित्रों से परेशान हूँ, वो मुझसे वो करवाना चाहते हैं जो मेरा करने का मन नहीं है। ‘बाबर जी!’ (प्रश्नकर्ता को सम्बोधित करते हुए, श्रोतागण हँसते हैं) मेरे अन्दर किसी तरह का बदलाव उन्हें स्वीकार नहीं है तो क्या मैं उन्हें त्याग दूँ या उनके साथ हो

प्रश्नकर्ता: गुरुजी, जब भी हमारे गुरुभाई, गुरुबन्दगी की बात करते हैं तो हमें ऐसा लगता है कि हम भी पूरी बन्दगी कर सकते हैं। अकेले बैठकर भी ऐसा लगता है कि उनकी संगति में ही हूँ, पर जब अकेले नितनेम या गुरुबन्दगी करने बैठने लगते हैं, तो कठिनाई महसूस होती



प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आपको मैं पिछले दो-ढाई वर्ष से सुन रही हूँ। अपने घर परिवार, दोस्त-रिश्तेदारों में और समाज में जब देखती हूँ तो पाती हूँ कि ये

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कहते हैं कि संगति पर किसी की निर्भरता नहीं होनी चाहिए, पर मेरा जीवन तो ऐसा है कि मैं लगातार किसी ना किसी पर आश्रित रहती हूँ, कैसे मैं इस निर्भरता को छोड़ सकती हूँ?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने दुनिया देख ली, अपना अनुभव देख लिया, दूसरों का अनुभव देख लिया, लेकिन फिर भी स्त्रियों की ओर खिंचाव रहता है। क्या करूँ?


प्रश्नकर्ता: जो वासनाओं का दमन करने की पहले जो कोशिश होती थी, तो उसमें केवल यह होता था कि नियमों का अनुसरण करने के लिए हुआ करता था। उस पर आवरण गिराएँ ताकि दिखाई न दे लोगों को। जब यह बोध हुआ, जब बुद्धि को यह समझ आया कि वासनाओं



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सत्य के लिए उपलब्ध रहो, इसका अर्थ क्या है?


प्रश्नकर्ता: कहानी है कि एक बार बकरियों के झुंड पर एक बाघिन झपट पड़ी, बाघिन गाभिन थी और कूदते समय उसे बच्चा पैदा हो गया और वो मर गयी। वो बच्चा बकरियों के साथ पलने लगा, बकरियाँ घास-पत्ते खातीं तो वो भी घास-पत्ते खाता, वो ‘मैं, मैं’ करतीं तो वो

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आज आपको पहली बार प्रत्यक्ष रूप से सुन रहा हूँ और आपका बहुत आभार है। पूरा जीवन कोई कमी नहीं थी, लेकिन फिर भी बहुत बेचैनी में निकला है। और अभी एक-दो साल से आपको सुनने लगा हूँ तो काफ़ी कुछ समझ आता है, ऐसा नहीं…

प्रश्न: प्रणाम आचार्य जी। कई दिनों से मैंने व्यर्थ की जगहों पर समय बिताना छोड़ दिया है। फ़िज़ूल की बातों से दूर रहने लगा हूँ। पुराने दोस्तों से भी बेकार की बातें भी करना छोड़ दिया है। जो भी समय मिलता है पूरी कोशिश करता हूँ कि काम में लगे।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमन। गुरु कबीर जी हर पल साधु के संग रहने को कह रहे हैं। साधुसंग से शरीर के पाप मिट जाते हैं, ऐसा उन्होंने भजन में कहा है। शरीर, अहंकार, संसार — ये सब परेशानियाँ तो बनी ही रहती हैं मेरे जीवन में और बार-बार लगातार हावी

बहुत लोग मिलेंगे कहेंगे, "अरे, अरे! बहुत बड़ी बातें मत करो, हमें समझ में नहीं आती हैं। यह तुम क्या गीता उपनिषद् लेकर बैठ जाते हो, भइया! हम बड़े सीधे, सरल आदमी हैं, हमें यह सब बातें समझ में नहीं आती; आलू, टिंडा बताओ न?"



प्रश्न: आचार्य जी, आपका वीडियो देखकर साथी के चयन के प्रति कुछ स्पष्टता आई है, लेकिन इसे जीवन में व्यावहारिक तौर पर कैसे उतारूँ? कृपया मार्ग दिखाएँ।
आचार्य प्रशांत: अपने आसपास आप वही तो देखोगे ना जो आपने अपने आसपास इकट्ठा कर लिया है। आप किसी बाग़ में चले जाइए,…



प्रश्न: सर, एक छोटा बच्चा जो अपने माँ-बाप को ठीक से नहीं पहचानता उसे स्कूल भेज दिया जाता है। वो बच्चा फिर अलग-अलग चीज़ें सीखता है, मिसाइल बनाना सीखता है। तो ये शिक्षा प्रणाली सही है या गलत?
वक्ता: तुम्हें पता है। बिलकुल ठीक बात है। जिस मन को अभी…


श्रोता १: सर, दोस्त और दोस्ती क्या है?

वक्ता: राहुल का सवाल है कि क्या संबंधो में कोई आशा रखनी चाहिए? मित्रता के सम्बन्ध की खासतौर पर बात की है। नहीं, कभी भी नहीं।

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥






जब तक दोस्ती का अर्थ नहीं समझोगे, तब तक जितनी भी दोस्तियाँ करोगे, सब गड़बड़ होंगी। जो तुम्हारी मक्कारी या नालायकी में साथ देगा, तुम उसे ही अपना असली दोस्त समझोगे। दोस्ती का मतलब है, गहराई से एक-दूसरे को समझना, और इसका असली अर्थ वही समझ सकता है, जो वयस्क और परिपक्व होने को तैयार हो। प्यार और दोस्ती केवल एक परिपक्व मन को ही मिलती हैं।
तुम कहते हो, ‘जो ज़रूरत में काम आए, वो मित्र’ — यह नकली परिभाषा है। असली दोस्त ख़ुद के क़रीब लाता है; उसकी संगति में गहरी शांति मिलती है, जबकि नकली दोस्त भटकाता है, उत्तेजनाओं में उलझाता है। सच्चा मित्र वह नहीं, जो तुम्हें और नशों में डाल दे, बल्कि वह है, जो तुम्हारे सारे नशों को उतार दे। पर इसकी पहचान कर सको — ज़रूरी है कि तुम्हारा अपना मन साफ़ हो। पहले ख़ुद जग जाओ, फिर दुनिया साफ़-साफ़ दिखाई देगी।
हमारी फ़िल्में, किस्से, संस्कृति यही सिखाते हैं कि दोस्त वो है जो गुनाहों में शरीक हो जाए, सही-गलत का बिना सवाल किए साथ दे। लेकिन सच्चा दोस्त वो है जो ज्ञान दे, प्रकाश दे; न कि अँधकार में सहायक हो। जो तुम्हारे अँधेरे को चुनौती दे, तुम्हें बाहर निकाले।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब मैं अपने मित्रों को अध्यात्म के बारे में बताती हूँ तो उनमें से कुछ इसमें रुचि नहीं लेते। वे कहते हैं, ‘उनके जीवन में दूसरी चीज़ें महत्वपूर्ण हैं।‘ हालाँकि इससे मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, चूँकि मैं समझती हूँ कि सत्संग मुझे मुक्ति की ओर…
तुम चाहते हो कि उनको ये जताए भी रहो कि मैं तुम्हारा हूँ और बीच-बीच में हर छः महीने में चार दिन के लिए किसी शिविर इत्यादि में जाकर शांति भी भोग लो। ये धोखा करने की बहुत लोग कोशिश करते हैं। वो सोचते हैं कि वो शैतान को धोखा दे रहे हैं। उन्हें पता नहीं होता है कि वो खुद को धोखा दे रहे हैं, आत्मा को धोखा दे रहे हैं।
प्रश्नकर्ता: अपूर्वा हैं, अगर कोई हमारी किसी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाए, हमें बार-बार परेशान करे तो हम उस समय पर न्यूट्रल (तटस्थ) कैसे बने रहें?
आचार्य प्रशांत: देखो, दो-तीन तरह की परेशानियाँ होती हैं जो लोगों को लगती हैं। मान लो, तुम ट्रेन में जा रही हो, भारतीय रेल। अब…
प्रश्नकर्ता: लेकिन अभी हम अगर देखें तो जो भी आदर्श माने जाते हैं…
आचार्य प्रशांत: समलैंगिकता विकार है, ऐसा तुम्हीं कह रहे हो। इस विकार का समाधान, मैं…
आचार्य प्रशांत: ऐसों से बचना जो मिलते ही ये कहते हैं कि चल यार, वीकेंड (सप्ताहान्त) पर पीते हैं। ऐसों से बचना जो जब तुमसे मिलने आते हैं तो तुम्हारे लिए साथ में गलौटी कबाब लेकर आते हैं, बचना। ये तो आया ही है देह का सुख साथ लेकर के।…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। महाभारत में हम देखते हैं कि युद्ध से पूर्व अर्जुन को आत्यन्तिक पीड़ा होती है अपने सगे-सम्बन्धियों के विरुद्ध युद्ध करने में। उनका मन शोक से भर जाता है, वो नहीं चाहते हैं युद्ध करना। वहीं उनके दूसरे भाई — युधिष्ठिर, भीम, नकुल, सहदेव — तैयार…
आचार्य प्रशांत: लड़की-लड़का साथ रहेंगे, तो उसमें एक सेक्सुअल डायमैन्शन (यौन आयाम) हमेशा रहेगा। इस बात को न नकारने से कोई फ़ायदा है, न इस बात का विरोध करने की कोई ज़रूरत है। ठीक है?
हाँ, अब आपको क्या करना है, आपको याद रखना है कि आप कौन हो, आप…
प्रश्नकर्ता: त्रिपुरा रहस्य में संगति के बारे में बहुत बोला गया है। मतलब सत्संगति आपको मोक्ष की ओर ले जाती है। क्या अपनी संगति हम चुन सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: बिलकुल! वहीं एक चुनाव है जो आपको जी-जान से करना चाहिए, जिस पर अड़ जाना चाहिए।
प्र: मेरे जीवन में…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, ऐसा कहते हैं कि एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते। मैंने भी यह देखा है कि कहीं-ना-कहीं कुछ छुपी हुई मंशा रहती है या इरादे रहते हैं।
इसी सिलसिले में एक पॉडकास्ट मैंने सुना, हालाँकि वह यूएस बेस्ड (आधारित) है,…
आचार्य प्रशांत: देखो, एक होता है आखिरी सच, उसको कभी आत्यंतिक…
आचार्य प्रशांत: तुम्हारे सामने कोई स्त्री हो जो एकदम ही बेहूदी हो, उल्टी-पुल्टी बातें करती हो, गिरा हुआ उसका आचरण हो, झूठी हो,…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। कुछ चीज़ें हमें साफ़-साफ़ पता चलती हैं कि हम ग़लत कर रहे हैं, किसी को धोखा दे रहे हैं, इत्यादि। लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं जो व्यर्थ होती हैं लेकिन करते समय लगता है कि चलो, कर दिया तो कर दिया, कोई ऐसी बात नहीं…
आचार्य जी और संस्था के कुछ सदस्य ऋषिकेश में मध्यरात्रि में घूमने निकले, और किसी विषय पर बातचीत कर रहे थे, तभी पास में एक मन्दिर में राम-धुन चल रही थी। राम-धुन में इतनी लयबद्धता और मधुरता थी कि संस्था के कुछ सदस्यों ने साधुओं से प्रार्थना की कि उन्हें…
प्रश्नकर्ता: सर, एक अच्छी पढ़ाई करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: जो अभी कर रहे हो, बेटा। अभी क्या कर रहे हो? तुमने सवाल पूछा, 'अच्छी पढ़ाई करने के लिए क्या करना चाहिए?' अभी क्या कर रहे हो?
प्र: पढ़ रहे हैं।
आचार्य: हम जान ही तो…
प्रश्नकर्ता : कभी मैं बहुत ज़्यादा फ़्रैन्ड्ली (मित्रवत) हो जाता हूँ किसी से एकदम। क्या यह मेरे लिए सही है?
आचार्य प्रशांत : अगर कह दिया जाए कि नहीं सही है, तो क्या करोगे? कह रहे हो बहुत जल्दी किसी से फ़्रैन्ड्ली हो जाते हो। तो अगर कह दिया जाए…
जो कोई तुमसे यह बोले…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य ज़ी! आध्यात्मिक व्यक्ति की सामाजिक लाइफ़ (ज़िंदगी) कैसी होनी चाहिए? जीवन में मित्र और रिश्ते भी आवश्यक हैं लेकिन आध्यात्मिक लोगों की संख्या कम है, माया में लिप्त लोगों की ज़्यादा। सामाजिक पक्ष जीवन का कैसे मजबूत करें? मेरा जीवन कटा-कटा सा महसूस होता है, कहीं भी…
प्रश्नकर्ता: मैंने ये अक्सर पाया है कि मेरी सोच जो है, न घर में पत्नी और माँ के साथ मेल खाती है, और न ही काम पर बॉस और सहकर्मियों के साथ मेल खाती है। उस चक्कर में वाद-विवाद हो जाता है, या फ़िर मैं एक सुनिश्चित सी दूरी बना…
प्रश्न: आचार्य जी, मेरे डर मेरे माहौल को बदलने नहीं दे रहे हैं? इसमें मैं क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: ऐसा ही है लेकिन ये भी तय है कि अगर भीतर का माहौल बदलता है तो आदमी खुद ही बाहर का माहौल बदल देता है। आदमी खुद ही ऐसे…
आचार्य प्रशांत: हम सब ये चाहते हैं कि निर्दोष रहें। तो ऐसे में वो स्थिति हम सबको सुहाती है जिसमें हमें ये एहसास हो कि हम में कोई खोट नहीं, हम में कोई दोष नहीं, क्योंकि निर्दोषिता स्वभाव है न। ऐसा माहौल जो तुम्हें ये एहसास करा दे, थोड़ी ही…
राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय |
जो सुख साधु संग में, सो वैकुंठ न होय ||
~ संत कबीर
वक्ता: एक आदमी की कहानी से शुरू करूँ| उसको बड़ा शौक था यह देखने का, कि स्वर्ग कैसा होता है, वैकुंठ कैसा होता है| तो कहते है कि उसने ईश्वर…
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।
सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।
प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।
क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
डर और जड़ता से बाहर निकलने का रास्ता किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि एक छोटे-से सही कदम से शुरू होता है। अपनी समस्याओं का बार-बार विश्लेषण और वर्णन करने के बजाय उनसे दूर जाने का निर्णय आवश्यक है। सत्य के प्रति प्रेम जागने पर भय अपने-आप पीछे छूट जाता है और साहस जुटाना नहीं पड़ता। सही संगति, अनुकूल वातावरण और आत्मिक विकास के अवसरों को अपनाने से परिवर्तन सहज होने लगता है। अपनी कमजोरियों से मोह रखने के बजाय उनके प्रति वैराग्य विकसित करना ज़रूरी है। शिकायत, बहाने और आत्म-दया में उलझे रहने से कुछ नहीं बदलता; निर्णायक कर्म, सत्य के प्रति प्रेम और वर्तमान स्थिति के विरुद्ध विद्रोह ही ऊँचे जीवन की वास्तविक शुरुआत हैं.