
एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…




प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं गर्ल्स हॉस्टल (लड़कियों का छात्रावास) में रहती हूँ, इंदौर में। तो वहाँ पर बहुत बड़ा हॉस्टल है। सौ-डेढ़ सौ लड़कियाँ रहती हैं तो उसमें से फ़िफ़्टी पर्सेन्ट

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, मेरा क्वेश्चन (प्रश्न) डर को लेकर है। अभी तीन दिन मैंने यहाँ वालंटियरिंग (स्वयं सेवा) की; दिन अच्छे गुजरे; मज़े में निकल गये। लेकिन अभी ‘मीट द मास्टर’ के लिए यहाँ पर मैसेज (संदेश) रिकॉर्ड करना था।मेरा काफ़ी मन था आगे आकर बोलने का

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या सबसे जरूरी यही नहीं है कि हमें अपने पसंद के हिसाब से चलने की आजादी होनी चाहिए?

प्रश्नकर्ता: नमस्ते गुरुजी! मैं एक ऐक्टर हूँ, मुम्बई में पिछले पाँच साल से काम कर रहा हूँ। और अभी पिछले कुछ सालों से अध्यात्म की तरह काफ़ी झुकाव हो रहा है। और मुझे अभी मतलब रीएलाइज़ हुआ कि मुझे दो डर लग रहे हैं, ‘एक तो अननोन की तरफ़ जाने

आचार्य प्रशांत: कौन है तुम्हारा नायक? मुझे बताना कि ये जो तुम्हारे सबसे ज़्यादा प्रचलित हीरो हैं, इन्होंने श्रद्धा दर्शाता कोई पात्र अभिनीत किया है कभी? कर सकते भी हैं? बताओ मुझे? यहाँ बैठे हो तो तुम सब, कहते हो कि श्रद्धा सबसे ऊँची चीज़ है, तुम्हारे इन नायक-नायिकाओं ने

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी हम जो एक मूवी (फ़िल्म) देखकर के आ रहे हैं ‘चार्ली ट्रिपल सेवन’। उसमें एक व्यक्ति है, बन्दा है, करीबन शायद पैंतीस साल के अराउंड (आस-पास) होगा, तीस से पैंतीस साल के

आचार्य प्रशांत: तुम छह-छह, आठ-आठ साल की लड़की को ‘मुन्नी बदनाम हुई’ और ‘मैं तो तेरा बटर चिकन हूँ’ और इस तरीक़ों के गानों पर नचा रही हो। तुम उन बच्चियों में कौन सी भावना का संचार कर रही हो?


आचार्य प्रशांत: इसलिए तुम्हारा दिल टूटा हुआ है, क्योंकि तुम्हें अभी भी पुराने, सामाजिक और आध्यात्मिक प्रचार में बहुत विश्वास है। तुम उस प्रोपगेंडा (झूठ जिसे सच की तरह दिखाने की कोशिश की जाए) के मारे हुए हो जिसने तुमको बता दिया है कि तुम आत्मा हो और ताऊ इंद्र…

आचार्य प्रशांत: हम बहुत हर्षित होते हैं अगर हमारा बच्चा टीवी पर पहुँच जाए। कि देखो इसमें कितनी प्रतिभा है, यह गाना गा रहा है! और गाना क्या गा रहा है? आठ साल का है इनका सोनू और पहुँच गया टीवी पर। कौनसा गाना गा रहा है? वो टीवी पर…


आचार्य प्रशांत: आप जब किसी को देखते हो और आप कहते हो कि, "अरे, मुझे प्यार हो गया", या ख़ास तौर पर ये जो पहली नज़र में प्यार, लव एट फ़र्स्ट साइट, का पूरा सिद्धांत है, खेल है – उसमें आपने कोई उसके गुण देखे? आपने उसको पहली नज़र

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। दो हज़ार चौदह-पंद्रह में एक मूवी निकली थी ‘पीके’। वो मूवी ने पाँच-सौ छह-सौ करोड़ रुपए कमाये और

प्रश्नकर्ता: एक यंग एक्ट्रेस (युवा अभिनेत्री) होने के नाते मेरे लिए एक बहुत ही

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरी छः वर्ष की बेटी है। जो विद्यमान औपचारिक शिक्षा व्यवस्था है, उससे तो उसको भाषा की, विज्ञान की, गणित की, संसार की शिक्षा मिल ही जाएगी। ये भी समझ में आता है कि उस औपचारिक, सांसारिक शिक्षा के समानांतर, साथ-साथ,


किसी का दिमाग भ्रष्ट करने का एक बहुत अच्छा तरीका होता है उसको सेक्सुअल एक्टिविटी (यौन गतिविधि) की लत लगवा देना। अब वह कुछ भी करेगा।

तुम्हें बर्बाद करने में एक चीज़ का सबसे बड़ा योगदान रहा है तो वो है – फिल्में और *टीवी*।


प्रश्नकर्ता: हमारे जीवन और समाज में अभिनेताओं और खिलाड़ियों का कितना महत्व है? अखबारों में, पत्रिकाओं में, मीडिया में और इंटरनेट पर यही छाए रहते हैं।


प्रश्नकर्ता: मैं बहुत, बचपन से ही बहुत डरा हुआ और दुखी था। फिर मैंने उसका उपाय के लिए, जब समझा तब, उपाय के लिए मैंने गीता पढ़ी, रामायण पढ़ा, अष्टावक्र-गीता पढ़ी, कबीर के भजन सुने, ओशो को भी बहुत सुना, आपके भी



अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥


आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।


आत्मसम्मान उपलब्धियों से नहीं, अपनी पहचान से जन्म लेता है। जब तक हम स्वयं को केवल शरीर मानते हैं, तब तक प्रकृति और समाज की अपेक्षाएँ हमें अधूरा महसूस कराती रहती हैं। सच्ची मुक्ति तब है जब हम जैविक और सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर चेतना के अनुसार जीवन जिएँ। शरीर साधन है, साध्य नहीं। जीवन का उद्देश्य प्रकृति के आदेशों का पालन नहीं, बल्कि अपने बंधनों को पहचानकर उन्हें तोड़ते हुए स्वतंत्रता और आत्मबोध की ओर बढ़ना है।

भारत की असली चुनौती तकनीक या प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक ढाँचा है जहाँ उत्कृष्टता कुछ द्वीपों तक सीमित रह जाती है। जब समाज सत्य, स्वतंत्र सोच और मानवीय विकास के बजाय लोकधर्म, भय और सामाजिक स्वीकृति से संचालित होता है, तब स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होता। एक बेहतर समाज केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि साहसी, ईमानदार और जागरूक समुदायों के निर्माण से जन्म लेता है।


दुनिया की सबसे ज़्यादा रोमांटिक पिक्चरें भारत में बनती हैं। आप घोर नाक़ाबिल हो, सारी नाक़ाबिलियत आपकी छुप जाती है जब कोई आकर बोलता है, "तुम मेरे सब कुछ हो।" मौत जैसी होती है आशिक़ी, हॉल में बैठकर आँसू बहाने से नहीं होती, मैदान में ख़ून बहाने से होती है। आशिक़ी बहुत प्यारी चीज़ होती है, पर आशिक़ी दमदार लोगों के लिए है।
राज कपूर ने फ़िल्म बनाई — 'मेरा नाम जोकर', दिल से बनाई हुई फ़िल्म थी वो और दो दिन नहीं चली क्योंकि हमें दिल से नफ़रत है जबकि एक घटिया फ़िल्म 800-1000 करोड़ कर जाती है। हम जैसे हैं, वैसी हमारी फ़िल्में होती हैं। आज लोगों को न समझदारी चाहिए, न दिल से उठे हुए गीत चाहिए। बदलाव हम में आएगा, तो ही हमारी फ़िल्में बदलेंगी। कोई फ़िल्म अच्छी लगी है, तो ख़ुद उसके प्रचारक बनो। अगर सब तक नहीं पहुँचाओगे, तो अगली बार वैसी कोई फ़िल्म बनेगी भी नहीं।
उत्तर भारत, विशेषकर बिहार वो जगह है जहाँ न पैसा है, न शिक्षा है, पर कामना में कोई कमी नहीं है। हमने ये धारणा बना ली है कि जो कुछ भी पाना है, वो या तो शरीर से, या मानसिक कल्पना, अंधविश्वास और मन्नत माँगने से मिल जाएगा। आप गरीब और अशिक्षित हो — घर आते हो, बच्चों को मारते-पीटते हो और पत्नी का बलात्कार करते हो, वही चीज़ फिर फिल्मों में आ जाती है। शिक्षा और वास्तविक धर्म की ज़रूरत है। जिस दिन सचमुच ही साक्षर होने लग गए हमारे यूपी, बिहार, उस दिन भारत का और पूरी दुनिया का नक्शा बदल जाएगा।
ये कला है? आग लगे ऐसी कला को।
तुम एक…
आचार्य प्रशांत: जिन्होंने शरीर के ही दम पर प्रसिद्धि पाई, जिनको शरीर के ही नाते जानते हो उन फ़िल्मी सितारों की जवानी की और बुढ़ापे की तस्वीरें देख लिया करो। देह क्या है स्पष्ट हो जाएगा। देहभाव से मुक्त होने का अच्छा तरीक़ा है। कोई रहे हों अपने ज़माने के…
आचार्य प्रशांत: मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ — जो फ़िल्में, जो पिक्चरें, मूवीज़ जनसामान्य के लिए रिलीज़ करी जाती हैं, उन पर सेंसर बोर्ड ‘ए’, ‘यूए’, ‘यू’ ये सब ठप्पा लगाता है न? लगाता है न? तो बहुत सारी बातें होती हैं जिनको समाज और सरकार और बाहर…
एक बार आप कहीं के लोगों की आदत डलवा दें, कि तुम्हें माँस-ही-माँस खाना है, बिलकुल सब और तला-भुना भी खाना है। अब क्षेत्र में अगर कोई आकर के सेहतमंद खाना बेचना भी चाहे तो उसका रेस्तराँ बंद हो जाएगा कि नहीं हो जाएगा?
तो यह लोग जो गंदगी फैला…
देश का जो सबसे बड़ा लफंगा हो, अगर वह देश का सबसे बड़ा टीनएज सेलिब्रिटी भी बन गया हो, तो माँ-बाप को समझ जाना चाहिए कि अब बहुत ज़बरदस्त ख़तरा है।
टीनएज (किशोर) लड़कियों को भगत सिंह का पता हो न हो, खुदीराम बोस का पता हो न हो, विनय…
आचार्य प्रशांत: अभिनेताओं और खिलाड़ियों का समाज में उतना ही महत्व होना चाहिए जितना मन में मनोरंजन का महत्व होना चाहिए। आप किसी व्यक्ति…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी एक तरफ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुखद और चौंका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए।
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा की फ़िल्में मात्र हमें मनोरंजन…
प्रश्नकर्ता: आज के समय में व्यक्ति के पतन में फ़िल्मों और टेलीविज़न की बहुत बड़ी भूमिका नज़र आती है। कृपया इस विषय पर कुछ कहें।
आचार्य प्रशांत: बस एक चीज़ है जो अध्यात्म की सबसे बड़ी दुश्मन है, वो है - प्रचलित संस्कृति। और प्रचलित संस्कृति का वर्तमान में सबसे…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, केसरी फ़िल्म के बारे में कुछ कहें। क्या ये फ़िल्म और बेहतर हो सकती थी? कैसे?
आचार्य प्रशांत: वीरता भी यकायक नहीं आती। वीरता भी अभ्यास माँगती है।
आपने अभी केसरी फ़िल्म की बात की।
इक्कीस नौजवान सिपाही यूँही नहीं भीड़ गए होंगे दस हज़ार अफ़गानों से।…
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।
क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
डर और जड़ता से बाहर निकलने का रास्ता किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि एक छोटे-से सही कदम से शुरू होता है। अपनी समस्याओं का बार-बार विश्लेषण और वर्णन करने के बजाय उनसे दूर जाने का निर्णय आवश्यक है। सत्य के प्रति प्रेम जागने पर भय अपने-आप पीछे छूट जाता है और साहस जुटाना नहीं पड़ता। सही संगति, अनुकूल वातावरण और आत्मिक विकास के अवसरों को अपनाने से परिवर्तन सहज होने लगता है। अपनी कमजोरियों से मोह रखने के बजाय उनके प्रति वैराग्य विकसित करना ज़रूरी है। शिकायत, बहाने और आत्म-दया में उलझे रहने से कुछ नहीं बदलता; निर्णायक कर्म, सत्य के प्रति प्रेम और वर्तमान स्थिति के विरुद्ध विद्रोह ही ऊँचे जीवन की वास्तविक शुरुआत हैं.

प्रेम कोई सामाजिक स्वीकृति, विवाह या रोमांटिक आकर्षण नहीं, बल्कि अहंकार के मिटने की प्रक्रिया है। सच्चा प्रेम अनुमति नहीं मांगता और न ही हार्मोन या परंपरा से पैदा होता है; वह सत्य और मुक्ति की ओर भीतर की यात्रा है। इसी तरह अहंकार सफलता पाने के लिए खुद को नहीं मिटा सकता — क्योंकि जब तक "मैं" बना हुआ है, तब तक हर त्याग, चाहे परिवार का हो, मित्रों का हो या स्वास्थ्य का, अहंकार का ही एक रूप रहता है। सही कर्म योजना बनाकर नहीं, बल्कि झूठे प्रभावों और बंधनों से मुक्त होकर स्वतः प्रकट होता है।


डेटिंग ऐप, कुंडली मिलान और “मेरी पसंद” जैसी धारणाएँ अक्सर प्रेम नहीं, बल्कि डर, सामाजिक कंडीशनिंग और अहंकार से संचालित होती हैं। परंपरा के दबाव में किया गया चुनाव और केवल व्यक्तिगत पसंद पर आधारित चुनाव, दोनों ही भ्रमित हो सकते हैं। सच्चा प्रेम तब संभव होता है जब व्यक्ति स्वयं को जाने और ऐसा संबंध चुने जो उसके बंधनों, भय और अहंकार को चुनौती देकर उसे भीतर से मुक्त करे।

रिश्तों में प्रेम को अक्सर जन्म, परिवार या सामाजिक भूमिकाओं से जोड़ दिया जाता है, जबकि अधिकांश संबंध अपेक्षाओं, स्वामित्व और तयशुदा व्यवहारों पर टिके होते हैं। केवल माता-पिता या संतान का रिश्ता होने से प्रेम नहीं जन्मता। प्रेम कोई जैविक घटना नहीं, बल्कि सीखने और समझने की प्रक्रिया है। जहाँ “मेरा” और “मेरे लिए” का आग्रह घटता है, वहीं प्रेम सीमाओं को लाँघकर स्वतंत्रता, करुणा और वास्तविक संबंध का रूप लेता है।

रिश्तों में प्रेम अक्सर मान लिया जाता है, पर अधिकांश संबंध तय भूमिकाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक ढाँचों पर चलते हैं। माता-पिता, पति-पत्नी या परिवार के रिश्ते भी कई बार समझ, स्वतंत्रता और संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि आदत, अधिकार और “मेरापन” से संचालित होते हैं। सच्चा प्रेम सीमित नहीं होता; वह स्वामित्व नहीं, बल्कि समझ, स्वतंत्रता और विस्तार देता है। प्रेम जन्म से नहीं, जागरूकता से सीखा जाता है।

गरीबी केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि गलत सोच, अंधविश्वास, भाग्यवाद और अविवेकपूर्ण आदतों से भी बढ़ती है। शिक्षा, जिम्मेदारी और सही मूल्यों की कमी इंसान को पीढ़ियों तक गरीब बनाए रखती है। कर्मकांड, दिखावा और बिना समझ के खर्च आर्थिक संकट को गहरा करते हैं। बदलाव तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी बुद्धि, विवेक और जिम्मेदारी के साथ सही निर्णय लेना शुरू करे।

क्या सचमुच FOMO और YOLO सिर्फ़ Gen Z की समस्या हैं, या ये मनुष्य के पुराने डर के नए नाम हैं? जब भीतर खालीपन हो, तो बाहर की हर चीज़ छूटती हुई लगती है। फिर जीवन एक दौड़ बन जाता है, जहाँ “और चाहिए” कभी ख़त्म नहीं होता। समस्या वस्तुओं की कमी नहीं, उस अहंकार की है जो हमेशा अधूरा महसूस करता है। जब तक स्वयं को नहीं जानोगे, तब तक हर चाह एक नई बेचैनी बनती रहेगी।

समुद्र के लिए ही यहाँ आया समुद्र से ही मेरा आखिरी नाता
पर आज सुबह से व्यस्त रहा रेतीले मसले ये गिनती वो घाटा
साँझ अब जब तट पर आया समुद्र लहराता बोला मुस्कुराता
रेत के कणों में मन फँस जाता रेत गिनते सूरज ढ़ल जाता
रेत का कण विशाल…

TCS जैसे मामलों पर पूरा देश कुछ दिनों तक हैरान होता है, लेकिन क्या सच में ये घटनाएँ नई हैं! कार्यस्थलों पर शोषण, करियर के नाम पर चुप्पी, धर्म को पहचान और सत्ता का हथियार बना देना, और भीतर से डरा हुआ इंसान... ये सब उसी समाज से निकलता है जिसे हमने सामान्य मान लिया है। सवाल सिर्फ़ कानून या सिस्टम का नहीं, इंसान की चेतना और परवरिश का है।

अहंकार साधना भी करेगा तो इसलिए नहीं करेगा कि वो विसर्जित हो जाए, विगलित हो जाए, मिट जाए। वो साधना भी करेगा, श्रम भी करेगा तो इसीलिए करेगा कि वो बचा रहे बल्कि अमर हो जाए।

थोड़ी जीवन में ठसक होनी चाहिए, एक्सक्लूसिविटी। एक शान, ऐरी-गहरी चीज़ों को भाव नहीं देना, ऐरे-गैरों को मुँह नहीं लगाना। “तू क्यों है ऐरा-गैरा?” मैं तेरा अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं तुझे प्रेरणा दे रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है तू भी वही संभावना रखता है, जो किसी ऊँचे-से-ऊँचे व्यक्ति में है। तू अपनी संभावना क्यों नहीं साकार कर रहा? और जिस दिन तक तू अपनी संभावना साकार नहीं करता, उस दिन तक मैं तुझे स्वीकार नहीं करता।

जिसको तुम कहते हो रोमांटिक लव, इसका बाज़ारवाद से बहुत सीधा ताल्लुक है। अच्छे कपड़े पहन लिए, तोहफ़े दे लिए और मज़े कर लिए, लेकिन कुछ पूरा नहीं पड़ रहा; एक अधूरापन, एक कसक रह जाती है। आपकी बेचैनी वैसी की वैसी है। प्रेम का मतलब है कि जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोल दो; वो ख़ुद को जानने लगे, मन को समझने लगे, यही प्रेम है। लेकिन ये करना आसान नहीं होता। ये करने की क़ीमत चुकानी पड़ती है। ये करने के लिए तुम्हें अपना सर्वस्व भी निछावर करना पड़े, तो कर दो। यही है वैलेंटाइन डे।

सामंजस्य, एडजस्टमेंट नहीं कर लेना चाहिए। जहाँ किसी तरीके से झुकना भी पड़े, दबना भी पड़े, डरना भी पड़े, वहाँ कम से कम अपने लिए नापसंद तो उठे। इतना तो हो कम से कम। मेरे भी थे ऑफिस में लोग, जिनको न चाहते हुए भी ‘सर’ बोलना पड़ता था। बहुत लंबे समय तक नहीं बोला, पर जितने समय तक बोला, उतने समय तक बोलना भी ऐसा था कि सिर भनना जाए।

किसी महिला को पढ़ाई, नौकरी, खेल से वंचित कर दिया गया, यह अत्याचार नहीं है क्या? पर इन अत्याचारों को तो हम अत्याचार मानते ही नहीं। चूँकि हमने महिला की पूरी आइडेंटिटी को उसकी सेक्सुअलिटी से ही बाँध दिया है। उसी का नतीजा यह होता है कि कहीं पर भी दंगा-फसाद हो, उसमें महिलाओं का बलात्कार अक्सर देखने को मिलता है। लेकिन महिला सिर्फ अपने जेंडर या सेक्स से तो आइडेंटिफाइड नहीं होती न! हमें उसके व्यक्तित्व के बाकी आयामों को भी सम्मान देना सीखना होगा।