
एक-से-एक पिक्चरें रिलीज़ होती हैं; दो-सौ, चार-सौ, छः-सौ करोड़ जा रही हैं, वो तुम्हारी जेब से ही तो जा रहा है। वो छः-सौ करोड़ का बिज़नेस कैसे किया पिक्चर ने? पिक्चरें जो इतना पैसा बनाती हैं उनको देखने फोर्ब्स पाँच-सौ वाले तो आते नहीं, या आते हैं? रेस चार, गोलमाल…







प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं गर्ल्स हॉस्टल (लड़कियों का छात्रावास) में रहती हूँ, इंदौर में। तो वहाँ पर बहुत बड़ा हॉस्टल है। सौ-डेढ़ सौ लड़कियाँ रहती हैं तो उसमें से

Acharya Prashant: Our normal life is our nemesis. And it is our nemesis precisely because it appears normal. It is not normal. It is normal only by comparison. It is normal only relative to your neighbour. It is the life that your neighbour is leading. It is the life that



Do not try to brand or categorize actions. Look at the actor.
Saying yes might be the holiest deed ever performed; saying no might be the holiest deed ever done. Saying A can be the holiest of actions; saying A can be the vilest of deeds. Going towards the left…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आचार्य जी, मेरा क्वेश्चन (प्रश्न) डर को लेकर है। अभी तीन दिन मैंने यहाँ वालंटियरिंग (स्वयं सेवा) की; दिन अच्छे गुजरे; मज़े में निकल गये। लेकिन अभी ‘मीट द मास्टर’ के लिए यहाँ पर मैसेज (संदेश) रिकॉर्ड करना था।मेरा काफ़ी मन था आगे आकर बोलने का

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या सबसे जरूरी यही नहीं है कि हमें अपने पसंद के हिसाब से चलने की आजादी होनी चाहिए?

प्रश्नकर्ता: नमस्ते गुरुजी! मैं एक ऐक्टर हूँ, मुम्बई में पिछले पाँच साल से काम कर रहा हूँ। और अभी पिछले कुछ सालों से अध्यात्म की तरह काफ़ी झुकाव हो रहा है। और मुझे अभी मतलब रीएलाइज़ हुआ कि मुझे दो डर लग रहे हैं, ‘एक तो अननोन की तरफ़ जाने

आचार्य प्रशांत: कौन है तुम्हारा नायक? मुझे बताना कि ये जो तुम्हारे सबसे ज़्यादा प्रचलित हीरो हैं, इन्होंने श्रद्धा दर्शाता कोई पात्र अभिनीत किया है कभी? कर सकते भी हैं? बताओ मुझे? यहाँ बैठे हो तो तुम सब, कहते हो कि श्रद्धा सबसे ऊँची चीज़ है, तुम्हारे इन नायक-नायिकाओं ने

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी हम जो एक मूवी (फ़िल्म) देखकर के आ रहे हैं ‘चार्ली ट्रिपल सेवन’। उसमें एक व्यक्ति है, बन्दा है, करीबन शायद पैंतीस साल के

आचार्य प्रशांत: तुम छह-छह, आठ-आठ साल की लड़की को ‘मुन्नी बदनाम हुई’ और ‘मैं तो तेरा बटर चिकन हूँ’ और इस तरीक़ों के गानों पर नचा रही हो। तुम उन बच्चियों में कौन सी भावना का संचार कर रही हो?


आचार्य प्रशांत: इसलिए तुम्हारा दिल टूटा हुआ है, क्योंकि तुम्हें अभी भी पुराने, सामाजिक और आध्यात्मिक प्रचार में बहुत विश्वास है। तुम उस प्रोपगेंडा (झूठ जिसे सच की तरह दिखाने की कोशिश की जाए) के मारे हुए हो जिसने तुमको बता दिया है कि तुम आत्मा हो और ताऊ इंद्र…

आचार्य प्रशांत: हम बहुत हर्षित होते हैं अगर हमारा बच्चा टीवी पर पहुँच जाए। कि देखो इसमें कितनी प्रतिभा है, यह गाना गा रहा है! और गाना क्या गा रहा है? आठ साल का है इनका सोनू और पहुँच गया टीवी पर। कौनसा गाना गा रहा है? वो टीवी पर…


आचार्य प्रशांत: आप जब किसी को देखते हो और आप कहते हो कि, "अरे, मुझे प्यार हो गया", या ख़ास तौर पर ये जो पहली नज़र में प्यार, लव एट फ़र्स्ट साइट

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। दो हज़ार चौदह-पंद्रह में एक मूवी निकली थी ‘पीके’। वो मूवी ने पाँच-सौ छह-सौ करोड़ रुपए कमाये और


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरी छः वर्ष की बेटी है। जो विद्यमान औपचारिक शिक्षा व्यवस्था है, उससे तो उसको भाषा की, विज्ञान की, गणित की, संसार की शिक्षा मिल ही जाएगी। ये भी समझ में आता है कि उस औपचारिक, सांसारिक शिक्षा के समानांतर, साथ-साथ,


किसी का दिमाग भ्रष्ट करने का एक बहुत अच्छा तरीका होता है उसको सेक्सुअल एक्टिविटी (यौन गतिविधि) की लत लगवा देना। अब वह कुछ भी करेगा।

तुम्हें बर्बाद करने में एक चीज़ का सबसे बड़ा योगदान रहा है तो वो है – फिल्में और *टीवी*।


प्रश्नकर्ता: हमारे जीवन और समाज में अभिनेताओं और खिलाड़ियों का कितना महत्व है? अखबारों में, पत्रिकाओं में, मीडिया में और इंटरनेट पर यही छाए रहते हैं।


प्रश्नकर्ता: मैं बहुत, बचपन से ही बहुत डरा हुआ और दुखी था। फिर मैंने उसका उपाय के लिए, जब समझा तब, उपाय के लिए मैंने गीता पढ़ी, रामायण पढ़ा, अष्टावक्र-गीता पढ़ी, कबीर के भजन सुने, ओशो को भी बहुत सुना, आपके भी



दुर्गा सप्तशती कहती है कि शुंभ के मरते ही आकाश स्वच्छ हो गया, नदियाँ ठीक मार्ग से बहने लगीं और पवित्र वायु बहने लगी। यानी असुर वो है जो आकाश को गंदा करे। आज वही काम वो करते हैं जो दिखाते हैं कि वो कितना भोगते हैं, और हम उन्हें अपना आदर्श बना लेते हैं। समस्या वो नहीं, हम हैं: हमें नहीं पता कि सम्मान किसे देना है। जब तक हम सत्य को सम्मान नहीं देंगे, तरह-तरह के झूठों को देते रहेंगे। तो हम किसे अपना आदर्श बनाए हुए हैं?
Questioner: All the forms of multimedia, the film industry and advertisements, have presented images of both sexes that are very often unrealistic and debatable. The very quality of femininity has been portrayed in the film industry, ironically, as victimizing them, merely pretty faces, and sidekicks. Why do you think women…
दुनिया की सबसे ज़्यादा रोमांटिक पिक्चरें भारत में बनती हैं। आप घोर नाक़ाबिल हो, सारी नाक़ाबिलियत आपकी छुप जाती है जब कोई आकर बोलता है, "तुम मेरे सब कुछ हो।" मौत जैसी होती है आशिक़ी, हॉल में बैठकर आँसू बहाने से नहीं होती, मैदान में ख़ून बहाने से होती है। आशिक़ी बहुत प्यारी चीज़ होती है, पर आशिक़ी दमदार लोगों के लिए है।
राज कपूर ने फ़िल्म बनाई — 'मेरा नाम जोकर', दिल से बनाई हुई फ़िल्म थी वो और दो दिन नहीं चली क्योंकि हमें दिल से नफ़रत है जबकि एक घटिया फ़िल्म 800-1000 करोड़ कर जाती है। हम जैसे हैं, वैसी हमारी फ़िल्में होती हैं। आज लोगों को न समझदारी चाहिए, न दिल से उठे हुए गीत चाहिए। बदलाव हम में आएगा, तो ही हमारी फ़िल्में बदलेंगी। कोई फ़िल्म अच्छी लगी है, तो ख़ुद उसके प्रचारक बनो। अगर सब तक नहीं पहुँचाओगे, तो अगली बार वैसी कोई फ़िल्म बनेगी भी नहीं।
उत्तर भारत, विशेषकर बिहार वो जगह है जहाँ न पैसा है, न शिक्षा है, पर कामना में कोई कमी नहीं है। हमने ये धारणा बना ली है कि जो कुछ भी पाना है, वो या तो शरीर से, या मानसिक कल्पना, अंधविश्वास और मन्नत माँगने से मिल जाएगा। आप गरीब और अशिक्षित हो — घर आते हो, बच्चों को मारते-पीटते हो और पत्नी का बलात्कार करते हो, वही चीज़ फिर फिल्मों में आ जाती है। शिक्षा और वास्तविक धर्म की ज़रूरत है। जिस दिन सचमुच ही साक्षर होने लग गए हमारे यूपी, बिहार, उस दिन भारत का और पूरी दुनिया का नक्शा बदल जाएगा।
All of us within have a point, a corner that loves excellence. Mediocrity might be useful, but mediocrity cannot be loved. The Superman really is the highest potentiality resting within each of us. So, instead of that real Superman, we create, draw, and imagine caricatures of Superman in the form of superhero movies. Being the Superman is not entertainment, it is sacrifice, it is penance, it is austerity, it is Tapasya in the real sense.
Creativity is the action of a fresh and free mind. With a fresh mind, whatever you do is creative. We have equated creativity with brilliance and dynamism, whereas it can be very ordinary. It’s like love—where something totally new comes from nowhere, where one is not overly concerned about results, and where one is not caught in mundane distractions. It's an expression of freedom and fearlessness.
The movies tell us that unless there is a special person in your life, you are really missing out on something big, and then you are seized by FOMO. What is FOMO? Fear of missing out.
“Oh my God, everybody has that! I am the only one left behind! I…
Just watched this movie, Chichore. It is based on IIT Bombay. In the campus, there is one girl in a batch of forty boys. But the girl’s only contribution in the whole story is that she is extremely beautiful, and all the guys are after her. So, in the…
ये कला है? आग लगे ऐसी कला को।
तुम एक…
आचार्य प्रशांत: जिन्होंने शरीर के ही दम पर प्रसिद्धि पाई, जिनको शरीर के ही नाते जानते हो उन फ़िल्मी सितारों की जवानी की और बुढ़ापे की तस्वीरें देख लिया करो। देह क्या है स्पष्ट हो जाएगा। देहभाव से मुक्त होने का अच्छा तरीक़ा है। कोई रहे हों अपने ज़माने के…
आचार्य प्रशांत: मैं आपसे एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ — जो फ़िल्में, जो पिक्चरें, मूवीज़ जनसामान्य के लिए रिलीज़ करी जाती हैं, उन पर सेंसर बोर्ड ‘ए’, ‘यूए’, ‘यू’ ये सब ठप्पा लगाता है न? लगाता है न? तो बहुत सारी बातें होती हैं जिनको समाज और सरकार और बाहर…
एक बार आप कहीं के लोगों की आदत डलवा दें, कि तुम्हें माँस-ही-माँस खाना है, बिलकुल सब और तला-भुना भी खाना है। अब क्षेत्र में अगर कोई आकर के सेहतमंद खाना बेचना भी चाहे तो उसका रेस्तराँ बंद हो जाएगा कि नहीं हो जाएगा?
तो यह लोग जो गंदगी फैला…
देश का जो सबसे बड़ा लफंगा हो, अगर वह देश का सबसे बड़ा टीनएज सेलिब्रिटी भी बन गया हो, तो माँ-बाप को समझ जाना चाहिए कि अब बहुत ज़बरदस्त ख़तरा है।
टीनएज (किशोर) लड़कियों को भगत सिंह का पता हो न हो, खुदीराम बोस का पता हो न हो, विनय…
आचार्य प्रशांत: अभिनेताओं और खिलाड़ियों का समाज में उतना ही महत्व होना चाहिए जितना मन में मनोरंजन का महत्व होना चाहिए। आप किसी व्यक्ति…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी एक तरफ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुखद और चौंका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए।
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा की फ़िल्में मात्र हमें मनोरंजन…
प्रश्नकर्ता: आज के समय में व्यक्ति के पतन में फ़िल्मों और टेलीविज़न की बहुत बड़ी भूमिका नज़र आती है। कृपया इस विषय पर कुछ कहें।
आचार्य प्रशांत: बस एक चीज़ है जो अध्यात्म की सबसे बड़ी दुश्मन है, वो है - प्रचलित संस्कृति। और प्रचलित संस्कृति का वर्तमान में सबसे…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, केसरी फ़िल्म के बारे में कुछ कहें। क्या ये फ़िल्म और बेहतर हो सकती थी? कैसे?
आचार्य प्रशांत: वीरता भी यकायक नहीं आती। वीरता भी अभ्यास माँगती है।
आपने अभी केसरी फ़िल्म की बात की।
इक्कीस नौजवान सिपाही यूँही नहीं भीड़ गए होंगे दस हज़ार अफ़गानों से।…

किसी के क्रोध पर चोट करो तो क्रोध पाँच गुना हो जाता है। दो गुटों की लड़ाई में एक मारा जाता है तो बीस और खड़े हो जाते हैं। दुर्गा सप्तशती का रक्तबीज यही है: हर बूँद से एक नया असुर। रक्तबीज कोई ख़ास असुर नहीं, हमारे अहंकार की प्रतिक्रियात्मकता है। उस पर चोट करने से वो और बड़ा होता है, क्योंकि किसी को ‘तुम बुरे हो’ कहना भी उसे ‘तुम हो’ कहना है। काली उसे खा लेती हैं, यानी अहंकार प्रकृति से अलग नहीं रह जाता। तो क्या हम देख सकते हैं कि जिसे हम ‘मैंने किया’ कहते हैं, वो कौन कर रहा है?

नवरात्रि में देवी और असुरों की कथा पढ़कर सवाल उठता है: जब दोनों ही प्रकृति हैं, तो लड़ाई किससे है? लड़ाई प्रकृति से नहीं, उस अधूरेपन से है जो मानता है कि दुनिया को भोगकर वो पूरा हो जाएगा। देवता और असुर दोनों यही चाहते हैं। अंतर बस इतना है कि चोट खाकर देवता देखते हैं और लौट आते हैं, असुर फिर वही दोहराते हैं। हम भी रोज़ भोजन, लोगों और चीज़ों से पूरा होने की उम्मीद करते हैं। और ‘सब ब्रह्म है’ कहकर विवेक छोड़ देना भी उसी अहंकार की चाल है। चोट हमें भी लगती है; क्या हम उससे सीखते हैं?

नवरात्रि में हम देवी की पूजा करते हैं और महिषासुर को बाहर का कोई दैत्य मान लेते हैं। पर दुर्गा सप्तशती का दूसरा चरित्र हमारी अपनी वृत्ति की कथा है। जो मन प्रकृति को केवल भोगने की वस्तु मानता है, जंगल काटता है, नदियाँ दूषित करता है, पशुओं को खाता है और कहता रहता है कि मुझे और चाहिए, वही महिषासुर है। त्यौहार उसी के वध के लिए है, उसे भोग लगाने के लिए नहीं। क्या इस नवरात्रि हम अपने भीतर के महिषासुर को पहचानेंगे?

Many Indian parents keep their children, and especially their daughters, away from sport, even where coaches and facilities exist. The barrier is often not outside but in the parent’s own ideas: poor returns, uncertainty, and fixed notions of what a girl’s life must be. Blaming our own parents does not help either; our life is now our responsibility. Parenting is a decision of the greatest responsibility, and it begins with self-love. Can we love a child if we cannot love ourselves?

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

We often defend a bad choice by pointing to a worse one: stay dishonest or starve, keep the wrong grip or stop playing. But the real trouble is not the option we picked. It is the option we never let ourselves see. Action does not need greed or attachment to find its energy. The third way begins by rejecting both false choices, without knowing what comes next. Which of our everyday choices are really false dilemmas?

Seen a bubble in the sea? That is our story.
You came with the hands empty, empty, and nothing will you carry.
So why be caught in misery? Make merry, make merry!
Who is your family? Who is a lover really?
You are deep in illusion, happily, happily fooling yourself…

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥
~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

A modern woman calls herself liberated, yet lives anxious — anxious about age, desirability, marriage, motherhood. Acharya Prashant exposes this anxiety as proof that feminism never touched the real wound: centuries of conditioning that reduced women to bodies for pleasure and reproduction. External equality isn't enough. True freedom demands she reject the entire inheritance of tradition and simply become human — not woman, not wife, not mother by decree, but free.

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।

Success never quiets the anxiety underneath it. Hustle culture runs on karma — a restless cycle of chasing the next job, package, or achievement in hopes of filling an inner void. Young professionals in Bangalore who've "succeeded" on paper remain fearful, ashamed, and unsettled within, proof that success is a liar: it promises liberation but delivers only debt. Anxiety itself traces not to the future but to a present that's been neglected, and real freedom from restlessness begins only by turning inward.

We often call something “help” or “love” while secretly expecting something in return. When that return does not come, we feel hurt, revealing that the relationship was a trade, not genuine help. The ego, being unfulfilled, cannot truly love or share. Likewise, desperation to be loved makes us controllable. Real love emerges when we stop seeking validation, work on ourselves, and become so inwardly fulfilled that we no longer need to be loved.

Migration can arise from genuine needs such as safety, education, livelihood, or environmental conditions, as well as from the ego's pursuit of greater consumption and fulfilment. The challenge is to distinguish between these motives with wisdom rather than ideology. Fair, impartial screening, mutual respect between migrants and host societies, and practical integration create a balanced approach that is both humane and responsible.