ये जो पैसे की अंधाधुंध दौड़ है, प्लेसमेंट, प्लेसमेंट — ये नशा कैसे नहीं है? बताओ न!
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, पर्सनल क्वेश्चन है मेरे बेटे को लेकर। मेरा बेटा 21 साल का है सर, उसे सिगरेट और नशे का एडिक्शन है और मैंने काउंसलिंग से, प्यार से, परिवार से, रिहैबिलिटेशन से — सब कोशिश की, पर असफल रही हूँ। और इसके कारण वो हर बार मैनिपुलेट कर जाता है, मैं उसमें आ जाती हूँ। बस यही गाइडेंस चाहिए — मैं इसकी लत कैसे छुड़ाऊँ? उसे सही रास्ते पर कैसे लेकर के आऊँ?
आचार्य प्रशांत: देखिए, आप कह रही हैं — बेटे को नशे की लत लगी हुई है — सिगरेट, शराब।
प्रश्नकर्ता: नहीं शराब नहीं सर।
आचार्य प्रशांत: तो बेटे को नशे की लत लगी हुई है। लत छुड़वानी है, नशा छुड़वाना है, ठीक है। आपके सवाल में एक मान्यता है, एक असम्प्शन है — कि दो स्थितियाँ होती हैं, और दो ही स्थितियाँ होती हैं, जिनमें से एक स्थिति दूसरी से बेहतर है। और एक स्थिति तो वो है जिसमें बेटा अक्सर चला जाता है — नशे की स्थिति। और दूसरी स्थिति वो है जिसे हम आमतौर पर होश की स्थिति कहते हैं। होश माने क्या? जो आम आदमी की चेतना की साधारण स्थिति होती है, उसको हम "होश" बोल देते हैं, यही न?




