सिगरेट, शराब, ड्रग्स - क्यों चाहिए जवानी को नशा?

Acharya Prashant

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सिगरेट, शराब, ड्रग्स - क्यों चाहिए जवानी को नशा?
ये जो पैसे की अंधाधुंध दौड़ है, प्लेसमेंट, प्लेसमेंट — ये नशा कैसे नहीं है? बताओ न! यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, पर्सनल क्वेश्चन है मेरे बेटे को लेकर। मेरा बेटा 21 साल का है सर, उसे सिगरेट और नशे का एडिक्शन है और मैंने काउंसलिंग से, प्यार से, परिवार से, रिहैबिलिटेशन से — सब कोशिश की, पर असफल रही हूँ। और इसके कारण वो हर बार मैनिपुलेट कर जाता है, मैं उसमें आ जाती हूँ। बस यही गाइडेंस चाहिए — मैं इसकी लत कैसे छुड़ाऊँ? उसे सही रास्ते पर कैसे लेकर के आऊँ?

आचार्य प्रशांत: देखिए, आप कह रही हैं — बेटे को नशे की लत लगी हुई है — सिगरेट, शराब।

प्रश्नकर्ता: नहीं शराब नहीं सर।

आचार्य प्रशांत: तो बेटे को नशे की लत लगी हुई है। लत छुड़वानी है, नशा छुड़वाना है, ठीक है। आपके सवाल में एक मान्यता है, एक असम्प्शन है — कि दो स्थितियाँ होती हैं, और दो ही स्थितियाँ होती हैं, जिनमें से एक स्थिति दूसरी से बेहतर है। और एक स्थिति तो वो है जिसमें बेटा अक्सर चला जाता है — नशे की स्थिति। और दूसरी स्थिति वो है जिसे हम आमतौर पर होश की स्थिति कहते हैं। होश माने क्या? जो आम आदमी की चेतना की साधारण स्थिति होती है, उसको हम "होश" बोल देते हैं, यही न?

जैसे हम लोग यहाँ सब बैठे हुए हैं, तो हम कहेंगे — हम होश में बैठे हुए हैं। हम कहेंगे — हम यहाँ पर सब बैठे हुए हैं, तो हमने थोड़ी कोई नशा कर रखा है, तो हम सब होश में हैं। सड़क पर बाहर आप जाएँ, लोग चल रहे हैं, आप कहेंगे — ये होश की स्थिति है, है न? लोग रेस्टॉरेंट में बैठे हैं, खाना खा रहे हैं, कोई अपने दफ़्तर में काम कर रहा है, कोई अपनी दुकान पर माल बेच रहा है। इसको हम कहते हैं कि ये सब "होश की स्थिति" में हो रहा है — होश की स्थिति में। ठीक है? साथ चल रहे हैं?

हम चाहते हैं कि नशे की स्थिति में न रहे — हम "होश की स्थिति" में आ जाएँ, और होश की स्थिति की हमारी परिभाषा है: जिस स्थिति में आम आदमी की चेतना आमतौर पर रहती है, वो होश है। उसे हम "होश" कहते हैं। और उस चेतना से हटकर के जब कोई इंटॉक्सिकेंट — मादक द्रव्य — ले लेता है, तो हम कहते हैं कि ये जो है — ये नशा है, ये बेहोशी है। दुनिया भर में इतनी बड़ी समस्या है ये, नशा। हर तरीक़े से समस्या है, अर्थशात्री बोलते हैं — इससे जीडीपी का नुकसान होता है। समाजशास्त्री बोलते हैं — इससे समाज में दरार पड़ती है, परिवार खराब होते हैं, सड़कों पर दुर्घटनाएँ होती हैं। जितने तरीक़ों के नुकसान गिनाए जा सकते हैं — गिना दीजिए। लेकिन फिर भी बहुत-बहुत सारे लोग हैं जो साधारण होश की अपेक्षा नशे को बेहतर मानते हैं।

और हम चाह रहे हैं कि बेटा — ये जो नशे की हालत है, इसको छोड़ के साधारण होश की हालत में आ जाए। यही चाह रहे हैं न? हमारा बेटा भी वैसा ही हो जाए जैसे सब लोग हैं — दुनिया के नॉर्मल–नॉर्मल काइंड ऑफ़ कॉन्शसनेस। उसको हम कहते हैं "होश"। पर ये जो साधारण होश है — ये इतनी ही प्यारी और आनंदप्रद स्थिति होती, तो इतने सारे लोग नशा कर क्यों रहे होते? क्योंकि कोई भी अपने आप को जानते-बूझते दुख नहीं देना चाहता। मनुष्य आनंदधर्मा है, सब जीव भी सुख ही चाहते हैं। यहाँ तक कि पेड़-पौधे भी। अब हम जानते हैं बहुत अच्छे से कि आप उनकी ओर बढ़ें उनको काटने-तोड़ने के लिए, तो वो भी घबराते हैं — पेड-पौधे भी। दुख किसी को नहीं चाहिए, सुख सबको ही चाहिए।

जब सुख सबको ही चाहिए — और अगर साधारण होश की स्थिति बहुत अच्छी ही स्थिति है, तो इतने लोग फिर नशा करते क्यों? इसलिए करते हैं, क्योंकि जिसको हम साधारण होश बोलते हैं न, उसमें ही खोट है। जिसको हम "साधारण होश" बोलते हैं — और वो जो होश है, कॉन्शसनेस की साधारण स्थिति, वो निर्माण है — शरीर का और समाज की ताक़तों का। समाज की ताक़तों में सब आ जाता है — इतिहास आ जाता है, राजनीति आ जाती है, धर्म आ जाता है, अर्थव्यवस्था आ जाती है, संस्कार आ जाते हैं — सब आ जाता है। वो सब जब मिलते-जुलते हैं, तो उससे परिभाषित हो जाता है कि "साधारण होश" माने क्या।

पर जो साधारण होश की हालत है न — ये बहुत अच्छी होती नहीं है। और इसीलिए जब आप नशे से किसी को वापस लाना चाहते हो साधारण होश में, तो आप उसका रिहैबिलिटेशन वग़ैरह कितना भी करवा लो — आप उसको वापस लाते हो, आप पाते हो — वापस नशे में चला जाता है। फिर हम कहते हैं — उसको लत लग गई है। लेकिन मैं तो एक बहुत साधारण, मासूम-सा सवाल पूछ रहा हूँ — अगर हमारे होश की स्थिति वाक़ई बहुत अच्छी है, लाभदायक है — तो कोई नशे में वापस जाएगा क्यों? क्यों जाएगा? कोई भी अच्छी चीज़ को छोड़ के गड़बड़ हालत में जाना चाहता है क्या? कोई नहीं जाना चाहता।

तो हम जिसको सामान्यतः "होश" कहते हैं, क्यों न पहले उसकी जाँच–पड़ताल करें? क्योंकि ये होश कोई आसमान से नहीं उतरा है। जिसको हम कहते हैं नॉर्मल कॉन्शसनेस, वो एक बनाई हुई चीज़ है। वो एक कंस्ट्रक्ट है — जिसको अर्थव्यवस्था ने बनाया है, जिसको तमाम तरह की विचारधाराओं ने बनाया है, जिसको लोकधर्म ने बनाया है — और आपसे कहा जाता है कि ये सब चीज़ें हैं, और तुम इनको मानोगे तो तुम "होशमंद" कहलाओगे। और कोई अगर उसमें चैन न पाए तो, वो क्या करे?

साधारण होश की जो हालत है, अगर वो बिल्कुल बुझी राख जैसी हो — जिसके नीचे थोड़ी बहुत जो आग है, वो भी दब जाती है समाप्त हो जाती है — तो? क्योंकि आमतौर पर नशे की शुरुआत जवानी में ही होती है और जवानी दहकना चाहती है। और आपने जिसको कहा है "होशमंद" होना, उसमें दहकने के लिए कोई जगह है नहीं। आप चाहते हो — वो आग होने से पहले राख हो। और वो राख न होना चाहे तो? अब उसे कोई बहुत ऊँचा, अच्छा तरीक़ा तो मिल नहीं रहा है।

जीवन-दर्शन उसने जाना नहीं है, विश्व का उत्कृष्ट बौद्ध साहित्य उसने पढ़ा नहीं है। पर उसको ये दिखाई दे रहा है कि — दुनिया, परिवार, समाज मुझसे जो कराना चाहते हैं, मैं वैसा नहीं रहना चाहता। ये एक तरीक़े से चाहते हैं कि मैं सोचूँ, मैं वैसे नहीं सोचना चाहता। तो ले-दे के वो एक रास्ता चुन लेता है, ऐसा रास्ता जो बहुत गलत, बहुत ख़तरनाक भी हो सकता है, पर मरता क्या न करता। वो यही रास्ता चुन लेता है, वो रास्ता है — नशे का।

जो हमारी साधारण स्थिति है — होश की, चेतना की, कॉन्शसनेस की, अगर वो वाक़ई बहुत आकर्षक होती, तो कोई नशे की ओर नहीं जाता।

पहले हमें ये देखना होगा न — कि हमने अपनी दुनिया रची कैसी है एक नए बच्चे के लिए, जो कुछ सालों में युवा हो जाता है। क्योंकि कोई बच्चा नशा करता है, वो तो नहीं पैदा होता कि, पैदा हुआ है और फूँ (सिगरेट पीने की ओर इशारा)। ज़रूर उसके जीवन के अनुभव ही होते हैं, जो उससे कहते हैं — वैसे तो नहीं रहना है जैसे सब लोग रहते हैं।

वो कहता है — "अगर ये सब होशमंद हैं, मेरे आसपास वाले, तो बेहोशी बेहतर है। मैं बेहोश होना पसंद करूँगा।" आपने अफ़ीम की बात करी। आपको मालूम है पहले उसका इस्तेमाल किस लिए होता था? वो एक पेन किलर के तौर पर इस्तेमाल की जाती थी। कुछ समझ में आ रही है बात? जब सर्जरी करनी होती थी, और एनेस्थीसिया वग़ैरह बहुत विकसित नहीं हुए थे, तो इसी का इस्तेमाल होता था — पेन किलर के तौर पर, समझो बात को।

ये हमने समाज बना कैसा रखा है? इसमें एक जवान आदमी करे क्या? — वो चमकना चाहता है, वो उठना चाहता है, वो बढ़ना चाहता है, और हम उसको देते हैं दमन। वो करे क्या? तो फिर अलग–अलग तरीक़े के नशे स्वीकार किए जाते हैं। और जो लोग मादक द्रव्यों का नशा कर लेते हैं, उनको तो हम कह देते हैं नशेड़ी। पर जो दूसरे तरीक़े के नशे कर लेते हैं — वो अपने आप को इज़्ज़तदार बोलते रहते हैं, नशेड़ी सब हैं। उनको ये लगता रहता है — "हम थोड़ी नशा करते हैं।"

ये जो पैसे की अंधाधुंध दौड़ है, प्लेसमेंट, प्लेसमेंट — ये नशा कैसे नहीं है? बताओ न!

माँ बच्चों के पीछे लगी हुई है — "सेटल कब होगा? सेटल कब होगा? तेरी तो जॉब भी लग गई!" ये नशा कैसे नहीं है? माँ को नशेड़ी क्यों न बोलें? और एक बार उसने शादी कर ली, तो उसके पीछे लगी हुई है — "अब बच्चा! बच्चा! बच्चा!" भाई, कोई बहकी–बहकी बात करे, तो यही तो कहते हो — "नशे में है!" ये सब बहकी–बहकी बातें नहीं हैं क्या? आपने जो समाज बनाया है, उसमें आपके सब आदर्श नेता, ये आपको क्या होशमंद लग रहे हैं? पर इन्हें ही हम होश वाला मानते हैं, और कहते हैं — "ऐसा ही बनो, क्योंकि ये होश वाले लोग हैं।" और उनसे ज़्यादा बेहोश कोई होता नहीं।

आप इलेक्शन मैनीफेस्टो पढ़िए। चुनाव आता है, इलेक्शन मैनीफेस्टो रहते हैं। किसी इलेक्शन मैनीफेस्टो में क्लाइमेट चेंज का नाम नहीं है! और हम कहते हैं — "ये बड़े–बड़े नेता हैं!" उन्हीं में से सब आपके विधायक बनेंगे, सांसद बनेंगे, फिर मंत्री बनेंगे, मुख्यमंत्री बनेंगे, प्रधानमंत्री बनेंगे — और ये क्लाइमेट चेंज का नाम नहीं ले रहे! इससे बड़ी कोई बेहोशी हो सकती है? तो जो साधारण होश की अवस्था है न, वो है ही इतनी गड़बड़ कि उससे बचने के लिए हर आदमी कोई न कोई नशा करता है। उस नशे से अगर बचना है, तो एक ही तरीक़ा है — ये जो साधारण होश है इसको ही बदल डालो। नहीं तो ज़िन्दगी जीने के लिए आपको कोई न कोई खुराफ़ात पालनी पड़ेगी। सबने पाल रखी होती है।

कोई कहता है — “पैसा बहुत आ गया है, अब मैं जा रहा हूँ — मैं विश्व-भ्रमण करूँगा।” विश्व-भ्रमण करके क्या कर रहे हो? कुछ सीख रहे हो? किसी का कल्याण कर रहे हो? जहाँ जा रहे हो, वहाँ प्रेम बरसा रहे हो? ना कुछ सीख रहे हो, ना जहाँ जा रहे हो वहाँ के लोगों को ही लाभ दे रहे हो— तो तुम ये कर क्या रहे हो? ये भी एक तरह का नशा है। कोई कहता है — “एक के बाद एक फ़ैक्ट्रियाँ डालूँगा।” कोई सीरियल आन्त्रप्रेन्योर बन जाता है। क्यों कर रहे हो ये सब कुछ? वो ये सब कुछ इसलिए कर रहा है, ताकि जिसको हम “आम ज़िन्दगी” कहते हैं, उससे बच सके।

तो ये आम ज़िन्दगी हमने इतनी घटिया चीज़ बनाई ही क्यों है कि इससे बचना पड़े बार–बार? बोलो तो — ये जो फ़िल्में देखने भागते हो, ये जो एंडलेस स्क्रॉलिंग करते हो, ये नशा नहीं है क्या? और ये नशा क्यों करते हो? क्योंकि आप बोलते हो — "रील लाइफ़ इज़ बेटर देन रियल लाइफ़।" तो रियल लाइफ़ हमारी इतनी बेकार है ही क्यों कि हमें रियल लाइफ़ से भागकर रील लाइफ़ में घुसना पड़ता है?

अगर हम दुनिया ऐसी कर पाएँ — जहाँ एक जवान आदमी को अपनी ऊर्जा को सही जगह लगाने का भरपूर मौका मिले, उसे जीवन के साथ प्रयोग करने की छूट मिले, तो उसके पास समय ही नहीं होगा, ऊर्जा ही नहीं होगी कि वो फालतू जाकर के शराब और बाक़ी तरह के नशे करे। उसे ज़रूरत ही नहीं लगेगी। पर जब आप उसको बाँध दोगे, रोक दोगे, तो बिल्कुल हो सकता है कि वो परिवार का दिल रखने के लिए शराब का नशा ना करे — पर फिर वो कोई और नशा कर लेगा। और जब वो कोई दूसरा नशा करता है, तो आप बोलते हो — "मेरा बेटा बड़ा इज़्ज़तदार है। हम भी इज़्ज़तदार हैं, हमारे घराने का है न? हमारे घराने का है!"

किसी-किसी को तो इज़्ज़त का ही नशा होता है। उसको बड़ा अच्छा लगता है कि जहाँ जा रहे हैं, वहाँ सब जगह से इज़्ज़त मिल रही है। किसी–किसी को अपने ख़्यालों का, अपने विचारों, अपनी मान्यताओं का नशा होता है। उसको लगता है कि उसके पास असंप्शन्स नहीं हैं — ट्रुथ है। और उनके ट्रुथ पर ज़रा सी चोट पड़े, तो तिलमिला उठते हैं। ये नशेड़ी की निशानी है — ज़रा सी चोट पड़ी नहीं कि तिलमिला गए। बात समझ रहे हो?

ज़िन्दगी साफ-सुथरी अगर जी जाए, तो फिर उसमें किसी प्रकार की अतिरिक्त उत्तेजना की ज़रूरत नहीं पड़ती है। नशा क्या होता है? — कि ज़िन्दगी पर्याप्त नहीं है, मुझे कुछ और चाहिए। ज़िन्दगी पर्याप्त नहीं है, तो ऐसी ज़िन्दगी तुमने जीने का फैसला क्यों किया? अब जब हम कहते हैं — "हमें उत्तेजना चाहिए" तो उत्तेजना के लिए शब्द क्या होता है अंग्रेज़ी में? थ्रिल एंड एडवेंचर, राइट? रोमांच! उत्तेजना हमें चाहिए।

और कितने लोग हैं जो थ्रिल और एडवेंचर के लिए जाते हैं! कोई पहाड़ों पर चढ़ रहा है, कोई कह रहा है — "मैंने फलाना रिस्क उठाया, मैं ये कर रहा हूँ, मैंने ख़तरनाक ट्रैक करी, मैंने ऐसी हैकिंग करी।" तुम्हें अतिरिक्त ख़तरे क्यों उठाने पड़ रहे हैं? तुम्हारी ज़िन्दगी ही ऐसी क्यों नहीं है कि उसमें कदम-कदम पर ख़तरा हो — क्योंकि तुम झूठ को चुनौती दे रहे हो? और जो झूठ को और बंधनों को चुनौती देता है, उसे अतिरिक्त ख़तरे नहीं उठाने पड़ते — उसकी ज़िन्दगी अपने आप में ख़तरा बन जाती है। बहुत थ्रिलिंग, बहुत एडवेंचरस हो जाती है। पर ज़िन्दगी तो हम सिखाते हैं अपने बच्चों को कि रुई के फाहों में सुरक्षित होकर जीना। और जब एक जवान आदमी को तुम कॉटन वूल में लपेट करके जीना सिखाते हो, तो फिर कहाँ से उसके पास रोमांच होगा? और जवानी तो रोमांच माँगती है, ख़तरा माँगती है।

तो फिर कहेगा — "चलो, यही रोमांच कर लेते हैं। एक नई ड्रग बाज़ार में आई है, उसको ट्राई करते हैं।" जिसको जीने के लिए सही मक़सद मिल गया, वो क्यों कोई नशा करेगा? जिसको जीने के लिए उच्चतम मिल गया, वो क्यों किसी और दिशा में जाकर अपना एक पल भी ख़राब करेगा? पर —

हमारे पास — न मक़सद, न उच्चतम। ना हमारा परिवार, ना हमारी शिक्षा किसी तरह के मक़सद की, किसी तरह की ऊँचाई की बात करते हैं, और जवानी ऊँचाई माँगती है।

क्योंकि अब आप बच्चे नहीं हो। आप अपने आप से सवाल करते हो — "मैं पैदा किस लिए हुआ हूँ? मुझे करना क्या है?" और उसका जब कोई जवाब नहीं मिलता, तो आप इन सवालों से, अनुत्तरित अपने प्रश्नों से घबरा करके कहते हो — "नहीं-नहीं, मन से इन बातों को हटाओ। मन से इन बातों को हटाओ।"

उसके लिए फिर किसी ने आकर के आपको एक पुड़िया थमा दी, आप उस रास्ते पर निकल पड़े — बहक गए। नशे की समस्या का सस्ता समाधान ये है कि मादक द्रव्यों की आपूर्ति बंद कर दीजिए — जो कि होनी चाहिए। बॉर्डर सील कर दीजिए — जो कि होना चाहिए। विजिलेंस, लॉ एंड ऑर्डर एन्फोर्समेंट — ये सब तगड़े हों — जो कि बिल्कुल होने चाहिए। जो पकड़े जाएँ, उनका कन्विक्शन रेट हाई होना चाहिए — बिल्कुल होना चाहिए, ये सब होना चाहिए। लेकिन ये सब सतही समाधान हैं।

असली समाधान तो तभी मिलेगा जब किसी जवान आदमी को समाज से भाग करके अपने लिए एक काल्पनिक कॉन्शसनेस रचने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी। जब आप नशे में होते हो न, तो आप एक अपना अलग काल्पनिक जगत रच लेते हो। काल्पनिक जगत आपको रचना इसलिए पड़ता है, क्योंकि ये जो तथ्यों का जगत है — द वर्ल्ड अराउंड यू — इसमें आप कुछ ढंग का कर नहीं पा रहे होते हो। तो आप कहते हो — "चलो, घंटे-दो घंटे के लिए ही सही, पर हमें दूसरी दुनिया तो मिल गई।" दूसरी दुनिया की ज़रूरत पड़े ही क्यों? ये जो हमारी दुनिया है, हम इसी को ऐसा क्यों नहीं बना सकते कि किसी को दूसरी दुनिया में — नशे की दुनिया में — भागना ही न पड़े?

हम उच्चतम की बात कर रहे थे। संतों, ऋषियों ने मालूम है क्या कहा नशे को लेकर? उनको किसी नशे की ज़रूरत नहीं है। कहते हैं — "हमें राम-खुमारी चढ़ी हुई है।" कहते हैं — राम का नशा, माने उच्चतम की बात। किसी छोटी चीज़ से ख़ुद को बाँधोगे, तो कितना भी ख़ुद को समझा लो — ऊपर-ऊपर मान जाओगे, भीतर कुछ बैठा है जो छुटपन से, क्षुद्रता से कभी राज़ी होता नहीं है। और जब वो राज़ी नहीं होगा, तो किसी न किसी तरह की खुराफ़ात करेगा। कोई न कोई वो अपने लिए नशा ढूँढ ही लेगा।

पर हम सब बहुत होशियार लोग हैं। जैसा हमने कहा कि दौलत का नशा हो, शोहरत का नशा हो — 50 और तरीक़े के नशे हों, उनको हम नशा मानते ही नहीं। उनको अगर हम नशा मान लें, तो ये पोल खुल जाएगी कि हमारा जीवन, हमारा समाज — बड़ा गड़बड़ चल रहा है। क्योंकि अगर ये खुल गया कि भाई — किसी जगह में, किसी शहर में, किसी देश में, किसी प्रांत में — 95% लोग नशेड़ी हैं, तो फिर तो विध्वंस हो जाएगा न।

तो हम ये मानना ही नहीं चाहते कि वास्तव में नशा तो 95% लोग कर रहे हैं। हम अपने आप को सांत्वना दे लेते हैं ये बोल के कि — "सिर्फ़ 5% नशेड़ी हैं, बाक़ी सब ठीक हैं, बाक़ी कोई नशा नहीं करते। सिर्फ़ 5% नशेड़ी हैं!" संत कबीर कहते हैं — "जो सर से ना उतरे, माया कहिये सोय।" जिसके दिमाग में अगर कोई चीज़ चढ़ के बैठ रही है, उसको भी माया ही मानो — माने नशा ही मानो। और यहाँ कोई नहीं बैठा ऐसा जिसका दिमाग खाली हो, सबके दिमाग में कुछ न कुछ कीड़ा लगा ही हुआ है। किसी को ये खुराफ़ात चल रही है — "भाई को नीचा कैसे दिखाऊँ?" किसी को ये चल रहा है — "फलाँनी शादी आ रही है, वहाँ देवरानी से ज़्यादा आकर्षक कैसे दिखूँ?" ये सब नशे नहीं हैं क्या?

नशे की क्या निशानी होती है? दिमाग बिल्कुल — क्या बोलते हो? — आउट हो गया! और जिसके दिमाग में ऊटपटांग चल ही रही है, चल ही रही है — उसका दिमाग आउट नहीं हुआ है क्या? भले ही उसने कोई और नशा न किया हो, बोलिए। ऑफ़िस पॉलिटिक्स में किस तरीक़े से — "मैं गुप्ता हूँ, खन्ना का पत्ता कैसे काटना है?" और वो दिन-रात इसी खुरपेच में लगा हुआ है, कि खन्ना का पत्ता कैसे काट दूँ। और ज्ञानियों ने हमसे कहा है —

"माया माया सब कहे, माया लखे न कोय। जो मन से ना उतरे, माया कहिये सोय।।"

दिमाग में कोई बहुत छोटी, पेटी, शूद्र चीज़ लगातार चल रही है — वो नशा कैसे नहीं है? हाँ, वो नशा ऐसा नहीं है जो रोड एक्सिडेंट करा दे। वो नशा ऐसा भी नहीं है जो आपकी किडनी ख़राब कर देगा या आपका दिमाग ख़राब कर देगा। वो नशा ऐसा नहीं, पर नशा तो है। भले ही वो आपको शारीरिक रूप से बहुत क्षति न दे, पर नशा तो है। और ये कहना भी पूरी तरह ठीक नहीं कि शारीरिक रूप से क्षति नहीं देता। दिमाग में उल्टी-सीधी धारणाएँ, कल्पनाएँ, अंधविश्वास बना के जो हम चलते रहते हैं — उससे उल्टी-पुल्टी चिंताएँ भी तो होती हैं। और जो चिंताएँ होती हैं — वही फिर क्या रक्तचाप और मधुमेह का कारण नहीं बनतीं? तो शरीर हर तरह के नशे से ख़राब होता है। ये जो होती हैं कार्डियक डिज़ीज़ेस — ये तो अब हम जानते हैं, सर्वविदित है कि लाइफ़स्टाइल डिज़ीज़ेस होती हैं।

आप बैठे हुए हैं और बैठे-बैठे आप सोच रहे हैं — "लड़की की शादी करनी है, दहेज कहाँ से जुगाड़ना है? सरकारी नौकरी किसकी लग गई? कब निकलने वाला है यूपीएससी का रिज़ल्ट? वहाँ के लड़कों को जाकर मैं कैसे फँसाऊँगा? ये क्या करना है, वो क्या करना है…?" और ये सब आप कर रहे हैं। आपका बीपी बढ़ता जा रहा है, बढ़ता जा रहा है।

हम क्यों न मानें कि अभी आप बैठकर नशा ही कर रहे हो? बस बोतल दिखाई नहीं दे रही है। आ रही है बात समझ में? बिल्कुल हम उसको रिहैबिलिटेशन के द्वारा अपनी ये साधारण होश की दुनिया में वापस ला सकते हैं। पर बहुत संभावना होगी कि वो दोबारा जाकर किसी मादक पदार्थ का सेवन शुरू कर देगा। आप अगर देखेंगे आँकड़े, तो ज़्यादातर यही होता है।

तो फिर इसीलिए रिहैबिलिटेशन सेंटर्स का भी खूब चलता है। वो एक बार किसी को ठीक करके छोड़ते हैं और 6 महीने में फिर आ जाता है। फिर छोड़ो, फिर आ जाएगा। और जितनी बार वो लौट-लौट के आता है न, उतनी बार वहाँ उसके रुकने-रहने की अवधि बढ़ती जाती है। लोग ऐसे भी होते हैं — 6 महीने, 8 महीने, साल भर रिहैबिलिटेशन चल रहा होता है उनका, और उसमें फिर पैसा भी खूब देते हैं।

ज़िन्दगी को ही एक ज़बरदस्त रोमांच बना लो। ये सब छोटे-मोटे नशे भूल जाओगे, याद ही नहीं रहेगा।

एक सज्जन आए थे मेरे पास। उनकी सिगरेट नहीं छूट रही थी। तो बोले, “आपको सुनने से छूट गई।” मैंने कहा, “पर मैंने तो इस किस्म का कभी कोई लेक्चर, उपदेश दिया ही नहीं। आमतौर पर ये सब बातें न मुझसे किसी ने पूछी हैं, न मैंने करी हैं — कि सिगरेट कैसे छोड़नी है। तो आपकी सिगरेट छूटी कैसे गई?” बोले, “नहीं, आपके कहने से नहीं छूटी है। आपने कहा, उससे नहीं छूटी है। आपको सुनने से छूटी है।”

मैंने कहा, “मतलब?”

बोले, “मैं दिन का डब्बा खाली कर देता था।” मैंने कहा, “हाँ, उपाय क्या निकाला?” बोले, “अभी मैं दिन में कई-कई घंटे बैठकर आपको सुन रहा होता हूँ, और जब सुन रहा होता हूँ, तो सिगरेट फूँकने का ख़्याल ही नहीं आता। बोले, ये जितने घंटे आपको सुन रहा होता हूँ, उसमें कहीं भी आप सिगरेट वग़ैरह छोड़ने की बात नहीं कर रहे। आपने शब्दों में बिल्कुल नहीं कहा — सिगरेट छोड़ दो। पर जब आपको सुन रहा होता हूँ, तो सिगरेट छूट जाती है। उस वक़्त ख़्याल ही नहीं आता। और जो आपने कहा, अगर मैंने उसको ध्यान से सुना है, तो मन कुछ ऐसा हो जाता है कि उसके बाद ये सब लगता ही नहीं — कि डब्बा खोलो, फूँको। ये सब लगता ही नहीं।”

मैंने कहा, “अच्छा, ठीक है। आप सुनते रहिएगा।” समझ में आ रही है बात? ये सब खुराफ़ातें हैं, और ये जीवन में तभी प्रवेश करती हैं जब जीवन में खाली स्थान होता है। ज़िन्दगी में खाली जगह छोड़ ही क्यों रहे हो? छोटी-सी तो ज़िन्दगी है — उसको पूरे तरीक़े से सही काम में आहुत कर दो, जैसे यज्ञ में आहुति दी जाती है। मैं कहता हूँ, ऐसे जलो जैसे कोई मोमबत्ती हो — और दोनों सिरों से जल रही हो। अब उसके पास बैठकर कोई फालतू काम करने की कहाँ जगह है? वो दोनों सिरों से जल रही है। उसे प्रकाश से इतना प्यार है। वो कह रही है — “मेरी ज़िन्दगी जल्दी ख़त्म हो जाएगी, कोई बात नहीं पर रोशनी होनी चाहिए।”

अब तुम थोड़ी कहोगे — "काम-धंधा बंद करो, अब दो घंटे यारों के साथ बोतल खोलने का समय आ गया है।" तुम्हारा काम ही तुम्हारा यार है, बोतल वग़ैरह सब छूट जाती है। क्या करना है? और आपने कोशिश करके नहीं छोड़ा — वो छूट गई। कुछ इतना अच्छा, इतना सुंदर, इतना आवश्यक मिल गया कि भले ही सोचा भी — "अच्छा, आज तो पीना है, आज बोतल खोलनी है।" भले ही सोच के भी रखा था — भूल गए। क्या पीना छूट गया? नहीं — भूल गए। कुछ दूसरी चीज़ है जो बहुत ज़रूरी मिल गई।

ये गाँजा, अफ़ीम, चरस, एलएसडी और शराब — ये सब क्या हुआ? भूल गए। पुराना स्टॉक बहुत पड़ा हुआ है — हॉस्टल में, घर में, जहाँ कहीं भी रहते हैं। पर उसको उठाना भूल गए, ये हो जाता है। और जब ऐसे छूटता है न — कि कोशिश कर-करके नहीं छोड़ा, वो छूट गया। इट ड्रॉप्ड, इट जस्ट ड्रॉप्ड। मुझे पता भी नहीं चला और छूट गया। तब समझो कि सचमुच छूटा है। पर सचमुच तभी छूटेगा, जब पहले जीवन को एक सार्थक अर्थ दोगे। और जीवन को सार्थक अर्थ आप मान्यताओं पर और रूढ़ियों पर चलकर कभी भी नहीं दे पाओगे।

एक आदमी जो गलत नौकरी करके बैठा हुआ है — बहुत संभावना है, ये नशा करेगा। एक आदमी जो गलत शादी करके बैठा हुआ है — बहुत संभावना है, ये नशा करेगा। समझ में आ रही है बात? एक जवान आदमी जो ऐसे घर में है जहाँ लगातार उस पर दबाव बनाया जा रहा है — "नहीं-नहीं, तू ये पढ़ाई मत कर। तू वो वाला कोर्स कर — उसमें प्लेसमेंट, पैकेज वग़ैरह बेहतर लगता है।" बहुत संभावना है — ये नशा करेगा। और जिसके पास साफ़-सुथरी सही ज़िन्दगी है, वो सही ज़िन्दगी ही अपने आप में इतना बड़ा संघर्ष होती है कि आप और कुछ नहीं माँगते।

बहुतों के मन में ख़्याल आ रहा होगा — "पर मेरी तो नौकरी भी गलत है, शादी भी गलत है पर मैं तो नशा नहीं करता।" तो हमने कहा था न — कि नशा सिर्फ़ वही थोड़ी होता है जो मुँह से किया जाए। 100 तरह के नशे होते हैं, आप दूसरी तरह का नशा करते होंगे, आप इज़्ज़तदार नशा करते होंगे। पर जो सुबह से शाम तक ऐसी ज़िन्दगी जी रहा है जिसमें सच्चाई का गला घोंटा जा रहा है — वो उस ज़िन्दगी को बर्दाश्त कैसे करेगा? उसे उस ज़िन्दगी से थोड़ी देर के लिए, टेम्पोरैरिली हटने के लिए — कोई न कोई नशा चाहिए होता है, तो फिर वो करता है।

और एक दूसरा आदमी भी सोच लो — उसकी साधारण होश की ज़िन्दगी इतनी प्यारी है कि उससे बर्दाश्त नहीं होता कि होश एक पल को भी खोए। एक दूसरा आदमी ऐसा भी हो सकता है। एक लेखक है — वो लिख रहा है, और पूरे होश में लिख रहा है। और आपने जाकर के उसको शराब पिला दी। और वो कह रहा है — "अब मेरे अक्षर काँप रहे हैं, अब सही शब्द पकड़ में नहीं आ रहा है, अब मेरे मुहावरे ढीले पड़ रहे हैं।" वो आदमी कहेगा — "दोबारा मत पिला देना। मुझे मेरे काम से प्यार है, और ये जो तुमने अभी मुझे पिला दी ना —इसकी वजह से मेरे प्यार में बाधा पड़ती है। दोबारा पिला मत देना मुझे।"

हमारे पास क्या कुछ ऐसा है जिससे हमें इतना प्यार हो कि उससे हम दो मिनट भी हटने को तैयार न हों? हमारे पास आमतौर पर ऐसा कुछ होता नहीं। हो सकता है, पर व्यवस्था, रूढ़ियाँ, परंपरा, दूसरों की अपेक्षाएँ, और अपनी अंधता — इनके चलते हम उसको दबा देते हैं। पैदा तो सब प्रेमी होते हैं, पर प्रेम को दबा देते हैं। और उसको दबाओगे तो तमाम तरह के रोग पैदा होंगे — जिनमें से नशा एक रोग है। समझ में आ रही है बात?

मैं बहुत ज़ोर देकर के आप लोगों से बोलना चाहता हूँ, क्योंकि बहुत जल्दी आपकी ज़िन्दगी में ये दोनों चीज़ें आने वाली हैं — नौकरी और परिवार, दोनों। और ये दोनों नशे के सबसे बड़े कारण हैं। बहुत सारी तो नौकरियाँ ऐसी होती हैं जो चल ही नहीं सकतीं बिना नशे के। जानते हैं आप? वहाँ पियो-पिलाओ, नहीं तो डील्स नहीं होतीं।

लेविश कॉरपोरेट पार्टीज़ होती हैं, इन्वेस्टमेंट बैंकिंग वग़ैरह में, और वहाँ आप बोल दो — "आई एम अ टीटोटलर, मैं कर ही नहीं सकता चीयर्स" — तो आपसे बात ही नहीं करेगा कोई। बहुत लोग सिर्फ़ पैसे के लिए ऐसे अपने बॉस वग़ैरह को बर्दाश्त करते हैं, कि भीतर से घायल हो जाते हैं और फिर वो कहते हैं — "गम गलत करने के लिए थोड़ी पी लेते हैं।" और परिवार का तो कहना ही क्या! गलत लड़की मिल गई, गलत लड़का मिल गया। नौकरी से तो फिर भी जल्दी आप इस्तीफ़ा दे सकते हो, शादी से थोड़ी इस्तीफ़ा दे दोगे जल्दी?

भारत में तो पता भी चल जाए कि शादी बिल्कुल गलत हो गई है, तो संबंध विच्छेद को मानते हैं महापाप। माने एक गलती कर दी है अगर, तो तुम उसको ज़िन्दगी भर ढोओ भी, और लड़कियों के लिए तो और मुश्किल है। सिर्फ़ यही नहीं होता कि शादी हो गई है — अगर गर्भ हो गया, और फिर बच्चा हो गया, तो मामला पूरा ही अपरिवर्तनीय हो गया। और ये सब आपकी ज़िन्दगी में अब आएगा अगले कुछ सालों में। तो इसलिए मैं आपसे बहुत ज़ोर देकर बोलना चाहता हूँ — गलत चुनाव मत कर लेना। छोटी-मोटी गलतियाँ सुधारी जा सकती हैं, पल्टी जा सकती हैं। वो गलतियाँ मत कर लेना जो फिर सुधारने में बहुत महँगी हो।

इधर-उधर जाकर के व्यर्थ में कोई दहेज के लिए शादी कर रहा है, कोई माँ-बाप के दबाव में शादी कर रहा है, कोई जाति देख के शादी कर रहा है, कोई कह रहा है — "बाक़ी सब ठीक है, पर अभी धर्म फँस रहा है मेरा जाकर के।" कोई सिर्फ़ सेक्सी फिगर देखकर शादी कर रहा है। और उसके बाद फिर तुम नशेखानों में पाए जाओ, तो तुम ही ज़िम्मेदार हो।

मैं आपसे बोल तो रहा हूँ, पर मुझे पता है — मेरे बोलने के बाद भी… पर अपनी ओर से जितनी कोशिश कर सकता हूँ, बचाने की — कर रहा हूँ। कोशिश तो 20 साल से कर रहा हूँ, 22–24 साल से कर रहा हूँ। और ये भी देखा है कि जिनको बचाने की कोशिश की थी — वो मेरी आँखों के सामने ही कैसे बर्बाद हुए। तो इसीलिए हर बीतते साल के साथ और ज़्यादा ज़ोर लगाकर, दृढ़ता से, इंटेंसिटी से कोशिश करता हूँ। हालाँकि नतीजा ज़्यादातर यही निकलता है… पर शायद कुछ लोग बच जाते होंगे। मैं अपने आप को क्यों इतना हतोत्साहित करूँ? क्या पता दो-चार बच जाएँ, क्या पता?

बेटे को कुछ ऐसा दीजिए जिसके लिए वो जी भी सके और मर भी सके, सारे नशे छूट जाएँगे। और आप ना दे पा रहे हो — तो कम से कम उसे मौका दीजिए कि वो ख़ुद खोजे। ना दबाव डालिए, ना हड़बड़ी करिए, ठीक है।

प्रश्नकर्ता: गुड ईवनिंग सर। आई एम सात्विक उपाध्याय। आई एम करंटली पर्स्यूइंग बी.टेक इन इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग फ्रॉम एम.एन.आई.टी. भोपाल।" सर, हम अपने माँ-बाप से दूर इधर रह रहे हैं। ऐसे कई लोग होते हैं जो हमारे जीवन में अशांति पैदा करते हैं — मतलब हमारी शांति भंग कर देते हैं। लेकिन तब भी हम उनका साथ नहीं छोड़ पाते। हम उन्हें तब भी अपना मान के रखते हैं, तब भी उनके साथ जुड़े रहते हैं — जबकि वो कन्टिन्यूअसली हमारे जीवन में अशांति पैदा कर रहे हैं। तो ऐसा क्यों होता है, सर?

आचार्य प्रशांत: सवाल है कि, बहुत लोग होते हैं जो जीवन को अशांत कर देते हैं — लेकिन फिर भी हम उनका साथ तो छोड़ नहीं पाते। तो ऐसा क्यों होता है?

तो ज़िन्दगी में लोग होते हैं, जिनके साथ पता है कि ये आएँगे तो शांति ही ख़राब करेंगे — विचलन, विक्षेप, डिस्टर्बेंस पैदा करेंगे — पता है, लेकिन उसके बाद भी उन्हें छोड़ नहीं पाते। और उन्हें हम बार-बार मौका देते रहते हैं कि फिर से आओ।

प्रश्नकर्ता ने "डिस्टर्बेंस" की तो बात करी, पर "डी" से ही एक और शब्द है जिसको बिल्कुल छुपा गए — "डिज़ायर।" आपको शांति से थोड़ा-बहुत प्रेम है, पर आपको कामना से बहुत ज़्यादा लगाव है। आपने मूल्य शांति की अपेक्षा कामना को दे रखा है। और ये जो आदमी है न, जो आकर आपकी शांति भंग करता है — ये कहीं न कहीं आपकी कामना पूरी कर रहा है। वरना कोई ऐसे आदमी को ज़िन्दगी में आने नहीं देगा।

भाई, मुझे पता है — कोई मेरा नुकसान करता है। फिर भी मैं उसे बार-बार आने देता हूँ। तो ज़रूर कहीं चोरी-छुपे, लुक-छुप के, मैं उससे कुछ फ़ायदा भी पा रहा हूँ। नुकसान क्या कर रहा है, ये तो मैं प्रकट कर देता हूँ, फ़ायदा क्या है — ये मैं साफ़ छुपा गया। फ़ायदा ये है कि वो इंसान आपकी कामना-पूर्ति का विषय है। और कामना-पूर्ति के लिए अगर आपको अपनी शांति बेचनी पड़े — तो आप स्वीकार कर लेते हो। आप कहते हो — "कामना पूरी होनी चाहिए भैया। सुख मिलना चाहिए, मौज आनी चाहिए, भले ही पल-दो पल की। उसके बाद अगर घंटों तक हफ़्तों तक भी तिलमिलाते रहो, बेचैन रहो — तो कोई बात नहीं। “दो पल तो मज्जा आया ना।"

हाँ पर जब तिलमिलाने के हफ़्ते आते हैं तो कहते हो, "अरे! बड़ा गलत हो गया। हम तो नहीं चाहते थे कि बेचैनी मिले, हम तो दुख नहीं चाहते थे। और ये आदमी है, इसका पता है कि दुख देता है, फिर भी हमने इसको आने दिया।" ये घटना आकस्मिक नहीं थी, संयोग नहीं है। इसके पीछे एक नियम है, एक सिद्धांत है। और सिद्धांत ये है कि —

तुम्हारी ज़िन्दगी में वही होगा जिसको तुम मूल्य देते हो। संयोगवश कुछ नहीं होता, संयोगवश बाहरी घटनाएँ हो सकती हैं। लेकिन तुम्हारे भीतर जो कुछ भी हो रहा है, वो तुम्हारे चाहने से ही हो रहा है।

तो अगर तुम कहते हो कि "मैं डिस्टर्ब हो गया," तो ये बाहरी घटना नहीं है। बाहर कोई तूफ़ान नहीं आया था, तूफ़ान भीतर आया था। और भीतर के तूफ़ान तुम्हारी सहमति के बिना नहीं आ सकते — ये नियम है। बाहर कुछ भी होता रहे, लेकिन भीतर जो हो रहा है उसमें तुम्हारी अनुमति, सहमति शामिल है। जब तुमने मूल्य ही इस बात को दे रखा है कि थोड़ी देर का सुख मिल जाए, जब यही बात अपने आप को समझा रखी है कि थोड़ी देर का सुख बहुत बड़ी बात है, तो फिर शांति को कौन सम्मान देगा, कौन कीमत देगा?

और ये मुझे कैसे पता कि थोड़ी देर का सुख बड़ी बात होती है? कैसे पता कि कामना-पूर्ति का बढ़ा महत्त्व है? वो मुझे व्यवस्था ने, फिल्मों ने, शिक्षा ने, दोस्तों ने, परिवार ने, संस्कार ने और समाज ने सिखाया। क्योंकि यहाँ तो सब कुछ ही शांति के लिए नहीं है, किसके लिए है? सुख के लिए है। और जो आदमी सुख को शांति से ज़्यादा महत्त्व देता है, उसे सुख तो कभी मिलता ही नहीं वो शांति से भी हाथ धो बैठता है। आप जाते हो आपके बड़े-बूढ़े आशीर्वाद भी क्या देते हैं? "सदा शांत रहो?" क्या बोलते हैं?

श्रोता: सदा प्रसन्न रहो।

आचार्य प्रशांत: "सदा खुश रहो, प्रसन्न रहो, सुखी रहो, फूलो-फलो।" और फूलो-फलो ही नहीं होता भाई — "दूधो नहाओ, पूतो फलो।" क्या ये हमें शांति का संस्कार दे रहे हैं? नहीं। क्योंकि जो लोकधर्म है, लोकसंस्कृति है, पॉप-कल्चर है, पॉप-रिलिजन है — जिसका आम आदमी व्यवहार करता है, जिसको हम मानते हैं कि यही तो धर्म है — वो पूरे तरीक़े से कामना पर आश्रित है। जिसको हम अपना कल्चर और रिलिजन बोलते हैं, उसके केंद्र में डिज़ायर बैठी है। इसीलिए आप उन जगहों पर बहुत जाते हो, आपने देखा होगा, किसी जगह की बात हो जाए — वहाँ मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। खट से भीड़ लग जाती है न? — मनोकामना।

किसी भी जगह का हमें अगर महात्म्य बताना होता है, कि ये बढ़िया जगह है, आध्यात्मिक दृष्टि से तो कहते हैं — “अरे! वहाँ जो-जो गए, उन्होंने जो-जो माँगा मिल गया। सारी इच्छाएँ पूरी होती हैं फलानी जगह जाकर के।"

तो हमें जो संस्कार ही मिले हैं न, वो इच्छा-पूर्ति के संस्कार मिले हैं। किसी तरह जो चीज़ हम चाहते हैं, वो मिल जाए बस। तो तुम जो चाहते हो वो मिल जाता है उसको सुख बोलते हैं। शांति सबसे ऊँची बात है, और शांति के लिए जो क़ीमत अदा करनी पड़े, कर देनी चाहिए — ये हमें सिखाया कब गया?

तो पहली बात तो हमने ये देखा, अगर हमें चैन की जगह बेचैनी पसंद होती है, तो उसका कारण ये है कि हम स्वयं बेचैनी को मूल्य देते हैं — कोई बाहरी बात नहीं है। दूसरी बात ये देख रहे हैं कि, ये जो मूल्य हम दे रहे हैं, ये मूल्य भी हमारा नहीं हैं — ये मूल्य हमें सिखा दिया गया है। आप किसी को बधाई कब देते हो, जब उसे बहुत शांत पाते हो? कभी हुआ है ऐसा कि कोई सामने से चला आ रहा हो, आप उसको देखो और कहो, "बधाई हो! आप कितने शांत हैं!"

हाँ, किसी के यहाँ नई गाड़ी आ जाए तो आप बधाई देने पहुँच जाओगे। क्या कंसम्प्शन की चीज़ है, भोग की चीज़? भाई, हम ज़िन्दगी को बिल्कुल धरातल पर आकर परखना चाहते हैं। किसी के अगर बच्चा हो जाए — बच्चा भी नहीं, पुत्र रत्न — तो उसको बधाई देने पहुँच जाओगे। भाई, किसी का नहीं बच्चा, उसकी ज़िन्दगी बहुत शांत चल रही है, तो बधाई देने जाते हो, "बधाई हो! आप बख्श दिए गए।" जाते हो क्या बधाई देने? पूरी की पूरी संस्कृति ही कामना-पूर्ति और सुख प्राप्ति पर चल रही है। चल रही है कि नहीं चल रही है?

पूरी की पूरी संस्कृति—"अरे! फलाने के घर तो अब सोना बरस रहा है।" बेटी पैदा हुई है। कौन बोलता है — “सरस्वती आई है?” अगर खुद को सांत्वना देनी भी हो, तो क्या बोल देते हो? "लक्ष्मी आई है।" अब क्या करें? हो ही गई, पैदा। चाहते तो नहीं थे, मरता क्या न करता, "लक्ष्मी आई है! लक्ष्मी आई है!" अरे, "सरस्वती" बोल देते, पर सरस्वती सुख नहीं देती, वो शांति देती हैं। शांति देती हैं ना? ज्ञान तो शांत करता है। बात आ रही है समझ में? हम में कूट-कूट कर हर दिशा से ये बात भर दी गई है कि मज़ा बड़ी बात है। और मज़ा भी कैसा? सस्ता, चीप, मोमेंट्री प्लेज़र्स, चीप टिटेलेशंस — ये सब हमें चाहिए। और ये जब मिलता है तो फिर हम उससे इंकार करने की हालत में रह ही नहीं जाते। क्योंकि हमने इस मूल्य को स्वीकार कर लिया, आत्मसात कर लिया है कि मज़ा तो बड़ी बात होती है।

लोग अपनी इंस्टाग्राम, डीपी वग़ैरह लगाते हैं, फेसबुक। प्रोफाइल लगाते हैं। वो अपने शांति के क्षणों की लगाते हैं क्या? वो कब लगाएँगे? देखो, मैं डिस्को में हूँ और मस्त झूम रहा हूँ। और किसी को स्ट्रेटेजिकली खड़ा कर रखा है कि बस जब झूम रहा हूँ तभी फोटो लेना। या पूरा वीडियो बनवा दिया। उसमें फ्रेम दर फ्रेम देख-देख के जिस क्षण में दिखाई दे रहा है कि मदहोशी छा गई है, बिल्कुल सुख की, वो आप लगाओगे। और वो लगाते ही, ना जाने कितनों के दिल बिल्कुल जल उठेंगे कि सारा सुख तो यही लूट ले गया, हम ही रह गए।

ये सब क्यों हो रहा है? क्योंकि सुख की प्रकृति से हम अनभिज्ञ हैं। क्यों? क्योंकि जीवन शिक्षा, आत्म-शिक्षा, अंदरूनी शिक्षा, जिसको आप अध्यात्म भी बोल सकते हो — पर अध्यात्म बोलो तो डर जाते हो — तो जीवन शिक्षा बोल लो, वो जीवन शिक्षा हमें कभी दी ही नहीं गई। उस जीवन शिक्षा की जगह हमको बहुत सतही किस्म के संस्कार दिए गए हैं, जिसमें ये है कि ऐसी चीज़ हो जाए तो सुख मनाओ, ऐसी चीज़ हो जाए तो बधाई गाओ। सुख की हमारी चाह ऐसी है कि, कोई डायबिटिक भी आ जाए तो बधाई देने के लिए हम उसको मिठाई ही खिला दें।

आपके घर कोई आता है और आप कहते हो कि ये खुशी का मौका है। क्या आप उसको कोई पोषक, स्वास्थ्यवर्धक चीज़ खिलाते हो क्या? अगर खिलाते हो, तो वो सड़ेले हलवाई का वही कार्बोहाइड्रेट्स और शुगर से भरा पुलिंदा ही हो, और मरेगा वो जल्दी — सुख।

और जिन चीज़ों में सुख मनाना है, वो भी आपने नहीं सोची। सुख शांति से बड़ी बात है। ये भी आपको परवरिश ने, समाज ने, संस्कारों ने, संयोग ने बता दिया। और किन बातों में सुख मनाना है, ये भी उन्होंने ही बताया है। तो हमारा अपना क्या है? हमारी अपनी फिर निराशा है, बेचैनी है, हमारा अपना बस पछतावा है। ये दुनिया के चलन में रहकर अपनी ज़िन्दगी गंवा बैठे, यही पछतावा है हमारा। और इसी पछतावे के साथ एक दिन आग हो जाना है हमको।

आपको ये भी कैसे पता कि कौन सी बात को सुख मानना है? अच्छा बताओ, कौन सी बात को सुख की घटना मानना है? यह भी दूसरों ने बता दिया है। हमें नहीं पता। इसीलिए तो एक समाज में एक बात को माना जाता है कि ये खुशी की बात है, दूसरे समाज में बिल्कुल उससे विपरीत चीज़ को माना जा सकता है, ये खुशी की बात है। और एक ही समाज में एक शताब्दी में एक चीज़ को मानेंगे ये खुशी की है, तो किसी दूसरी शताब्दी में किसी दूसरी चीज़ को मानते थे कि ये खुशी की है, विपरीत बातें।

तो सुख किस बात में मनाना है? ये भी कोई और तय कर रहा है। हम बस क्या भोगने के लिए हैं? सुख के जाने के बाद जो भग्नावशेष बचते हैं, जो रूइंग्स हैं, जो ‘आफ्टर पार्टी’ होते है, है ना? सुख वाली पार्टी और उसके बाद वहाँ क्या बचता है? कभी शादी-ब्याह के पंडाल देखा है? रात में नहीं, अगले दिन सुबह। वहाँ सब क्या दिखाई देता है? रात की मदहोशियों के बाद असली ज़िन्दगी, वो हमारी ज़िन्दगी है। रात आई, चली गई और अब ये बचा है। दो पल के सुख ने यही छोड़ा है। किस-किस ने देखा है कि क्या हालत रहती है जब सब चले जाते हैं? उसके बाद पंडाल की और जो जगह होती है, लॉन वग़ैरह मैदान, उसकी क्या हालत रहती है? देखा है ना? वो हालत ही हमारी ज़िन्दगी है।

मैं कहता हूँ लोगों से कि शादीयों में जाओ या न जाओ, लेकिन शादीयों के बाद ज़रूर जाओ। आप जवान लोग हो, आपको पूरी ज़िन्दगी जीनी है। अपने आप से पूछिए — *"व्हाट टू वैल्यू? व्हाट इज़ रियली इंपॉर्टेंट?" इनके सस्ते जवाब स्वीकार मत करो। किसी और की बात की उधारी स्वीकार मत करो, उधार की ही वरना ज़िन्दगी रह जाएगी। ख़ुद पूछो अपने आप से — "मैं इस काम में क्यों उतरूं? मैं फलानी बात को क्यों महत्त्व दूँ? कुछ चल रही है — रस्म, रिवायत, प्रथा, परंपरा। मैं जानना चाहता हूँ कि मैं उसका पालन क्यों करूँ?" ये सवाल जरूरी है।

हम कितनी नकली ज़िन्दगी जी रहे हैं? ये सबसे ज़्यादा पता चलता है हमारे सेलिब्रेशंस में, हमारे उत्सवों में। ऊपर-ऊपर सब ऐसे दिखा रहे होते हैं जैसे खुश हैं, सुखी हैं। और सेलिब्रेशन से ज़्यादा कहीं नहीं पता चलता है कि हम कितने ज़्यादा बेचैन हैं, खोखले हैं, दुखी हैं। कहीं पर पार्टी जैसा कुछ हो रहा हो, वहाँ चले जाना और समझ जाओगे कि ये सुख चीज़ क्या होती है।

हुआ था मेरे साथ एक बार — आपकी उम्र उससे भी ज़रा सी पहले की ही बात है। तो भाई सच्चिदानन्दघन, हम कहते हैं भीतरी बात, असली बात, आनंद को हम कहते हैं स्वभाव है, आनंद सबको चाहिए। मैं भी पार्टीज़ में जाता था, दो-चार बार गया, और फिर जाना बंद कर दिया। साथ वालों ने कहा, “क्या बात है? तुझे नहीं आना? डोंट यू लव फन?” बिल्कुल यही शब्द थे, चार। एग्ज़ैक्टली, आज भी याद है — “डोंट यू लव टू हैव फन? डोंट यू वांट टू हैव फन?” तो मैंने जवाब दिया था, “आई डिडन्ट फाइंड एनीबडी हैविंग फन, एंड हेंस आई विल नॉट कम।”

हाँ, मुझे भी तब ‘जॉय’ वाला शब्द नहीं था। तब ‘फन’ की बात हुई थी। बिल्कुल साफ़ याद है ‘फन।’ तब उन्होंने कहा था आओ, “वी विल हैव फन, गुड फन।” मैंने कहा, “आई ऑल्सो वांट टू हैव गुड फन, बट वेयर इज़ द फन?” मैं अपने आप से झूठ नहीं बोल सकता। वहाँ बहुत सारे लोग थे, बहुत कुछ हो रहा था, बहुत शोर था, म्यूज़िक था, डांस था, ये- वो खाना-पीना हर तरह की चीज़ें चल रही थी। पर सच बताऊँ तो, “आई डिडन्ट फाइंड एनीबडी रियली हैविंग फन।” मुझे वो सब मिज़रेबल लगे — उदास और भीतर से हताश। और उन्होंने ऊपर-ऊपर खुशी पोत रखी थी। ऐसे। “हाँ जी-हाँ जी, आइए जी-आइए जी, गुड मॉर्निंग जी, आज तो बहुत अच्छा दिन है जी” कम ऑन। बोलो, क्या ऐसा ही नहीं है?

तो ज़िन्दगी इसलिए थोड़ी है कि ये जो खोखला सुख है, इसके पीछे जाते रहो। सुख बुरा नहीं है, पर फिर असली सुख चाहिए। और वो असली सुख असली चीज़ों में ही मिलता है। असली ज़िन्दगी जी के ही मिलता है। ये छोटी-छोटी बातों से असली सुख नहीं मिल जाता। उपनिषद् कहते हैं “नाल्पे सुखं।” अल्प माने छोटा। छोटी ज़िन्दगी जी के, छोटे विषयों को अपना उद्देश्य बना के, छोटे-छोटे लक्ष्य रख के तुम्हें कभी सुख नहीं मिलेगा।

“भूमा तत्सुखं।” भूमि का मतलब बड़ा, विशाल, अनंत। अपने आप को अनंत को समर्पित करो, लक्ष्य अपना आसमान जैसा बनाओ, तब आनंद में जीते होगे। आसमान ज़िन्दगी के आखिरी पल तक नहीं मिलना, पर ज़िन्दगी मौज में बीतेगी। ज़िन्दगी मौज में बीतेगी क्योंकि लक्ष्य ऐसा बनाया कि उसके लिए आराम से जिए, फिर मरे। और छोटी सी चीज़ उसको लक्ष्य बनाया, उसको पा भी लिया तो भी वैसे ही मिज़रेबल रहोगे, जैसे हमेशा से थे। मिज़रेबल समझते हो ना? दुखी, संतप्त — पा लिया।

लोग आ रहे हैं, बधाइयाँ दे रहे हैं। “अरे! वाह, बंटू का तो बड़ा पैकेज लग गया है।” और बंटू कह रहा, “क्या बताएँ?” बंटू कह रहा है, “ये पैकेज वग़ैरह से ज़्यादा मज़ा तो मुझे इंस्टाग्राम में आता है।” वो पैकेज वाली जॉब में जाकर भी वहाँ बाथरूम में छुप-छुप के रील्स ही देख रहा होगा। आपको पता है ना? ये बहुत बड़ी-बड़ी कंपनियाँ हैं, जिन्होंने अब ऐसा करा है कि लैवटरीज में, माने शौचालयों में, वो ब्लॉकर्स लगाते हैं। कौन से ब्लॉकर्स? कि वहाँ पर नेट नहीं चल सकता। और ये मैं बिल्कुल कई फॉर्च्यून 500 कंपनियों की बात कर रहा हूँ। वहाँ बोर में भी ऐसा खूब हो रहा है। अब वो इतना पैसा दे रहे हैं, और वो कहते हैं — “इतनी बड़ी-बड़ी बातें, ये-वो, ऐसा-वैसा, टॉप की जॉब, बढ़िया लड़की मिलेगी, दहेज़ अच्छा मिलेगा।” इधर-उधर प्रेस्टिज़, पचास बातें — पर वो जो लड़का ही नहीं, 35-35 साल के मैनेजर हैं — वो भाग के जा रहे हैं वहाँ पर, बंद कर रहे हैं अंदर, कमोड के ऊपर बैठ जाते हैं। और वहाँ क्या कर रहे हैं? स्क्रॉलिंग कर रहे हैं और करते ही जा रहे हैं, करते ही जा रहे हैं।

हारकर ये करना पड़ा कि, "यहाँ पर जो है, आपका वाई-फाई चलेगा ही नहीं, नेट ब्लॉक करो।" ये होता है जब आप छोटी चीज को लक्ष्य बनाते हो। वो मिल भी जाती है, तो भीतर छटपटाहट बनी रहती है और आप फिर तुच्चे कामों पर अपनी भड़ास निकालते हो। ये सारा जो होता है वर्कप्लेस में, क्या बोलते हैं? एब्सेंटिज़्म, एम्प्लॉई डिससैटिस्फैक्शन, डीमोटिवेशन — ये सब क्यों होता है? इसीलिए होता है क्योंकि तुम जिस नौकरी में हो, सबसे पहले तुम्हें करनी ही नहीं चाहिए थी। तुम गलत काम में हो।

तो सही काम क्या है? वो तुमने कभी अपने आप से ना पूछा, ना तलाशा। तुम तो पत्ते की तरह थे — समाज की और संयोग की हवा तुमको जहाँ ले आई, तुम वहाँ आकर पड़ गए। संयोग से इस नौकरी में हो। अब ये अर्थ नहीं रखता, कुछ काम तुम्हारे लिए। तो जियोगे कैसे इसके लिए? तो घड़ी ताकते रहते हो — कब समय हो जाए, घर भागें; और कब 30 तारीख आए तो सैलरी मिले। किसी ने कहा है, दुनिया में सबसे अगर बेकार कोई खोज है — द मोस्ट फ्यूटाइल ऑफ़ ऑल पर्स्यूट्स, वो है द पर्स्यूट ऑफ़ हैप्पीनेस।

जब कोई सीधे-सीधे कहता है कि मुझे ख़ुशी चाहिए, तो उसे सिर्फ़ दुख मिलेगा। जो कहता है, "मुझे ख़ुशी नहीं चाहिए, मुझे सार्थकता चाहिए," उसे चुपचाप आनंद मिल जाता है। जो ख़ुशी के लिए इधर-उधर हाथ-पाँव फेंकता है, उसे ख़ुशी तो क्या ही मिलती है, दुख मिलता है। और जो कहता है, "ख़ुशी हटाओ, ख़ुशी वग़ैरह की हम परवाह नहीं करते। मुझे सार्थकता चाहिए, पर्पस चाहिए, सही ज़िन्दगी चाहिए।" — उसने माँगी थी सार्थकता, उसे सार्थकता के साथ में आनंद मुफ़्त मिल जाता है। सार्थकता माँगीए है, आनंद अपने आप मिल जाएगा।

प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। मेरा क्वेश्चन इसी से रिलेटेड था। जैसे आपने अभी बोला कि गोल्स अपने आसमान को इतना (ऊँचाई की तरह ईशारा करते हुए) अपन को करना चाहिए। तो जब गोल्स अपने बड़े होते हैं, तो उतनी अपनी एक्सपेक्टेशन होती हैं।

तो एक्सपेक्टेशन जैसी है — अगर उस हिसाब से अपन अब वो चीज़ अचीव नहीं कर पा रहे, या फिर उसके लिए अपन डेली उतनी मेहनत नहीं कर पा रहे उस फुल एफ़िशिएंसी से — तो उससे अपन फ्रस्ट्रेटेड या फिर डिसहार्टेंड कैसे नहीं हो? और अगर हमें इतना एक्सपेक्ट नहीं करना चाहिए, तो उस लिमिट में कैसे एक्सपेक्ट करें?

आचार्य प्रशांत: बेटा, एक्सपेक्टेशन तो अपने हाथ का खिलौना होती है। तुम तय कर सकते हो — मुझे इतना करना है, मुझे इतना नहीं करना है। ये बात एक्सपेक्टेशन की नहीं होती है।

और बात यूँही कोई ऊँचा गोल बना लेने की नहीं होती है। वो जो गोल है ना, वो दो तरह की समझदारी से निकलना चाहिए — टू काइंड्स ऑफ़ अवेयरनेस। पहला — मैं कौन हूँ? मैं फंसा कहाँ पर हुआ हूँ? और दूसरा ये — काम तो मैं जो भी करूँगा, दुनिया में ही करूँगा ना? तो दुनिया की आज की हालत क्या है? और दुनिया की ज़रूरत क्या है? और जब इन दोनों बातों को एक साथ देखते हुए आप एक काम में उतरते हो, तो उसके बाद बात एक्सपेक्टेशन की नहीं, इमर्शन की हो जाती है।

क्योंकि मैं काम में यूँही नहीं उतरा हूँ। मैं जानता हूँ कि कुछ ज़रूरी है, इसलिए कर रहा हूँ। मैं जानता हूँ, मैं जो काम कर रहा हूँ वो आज दुनिया के लिए बहुत ज़रूरी है। और मैं जानता हूँ, मैं जो काम कर रहा हूँ, वो मैं ना करूँ तो मैं भी नहीं जी पाऊँगा। मैं इसलिए उसमें उतरा हूँ। अब इसमें उम्मीद की या डेडलाइन की या रोज़ कितना काम करना है, इसकी कोई बात नहीं होती है।

आपका कोई बहुत प्यारा दोस्त है, वो अस्पताल में भर्ती है। डॉक्टर ने कहा — "फलानी चीज़ है, जल्दी से ले आओ, जल्दी से जल्दी ऑपरेशन करना है।" तो उसमें आप एक्सपेक्टेशन थोड़ी रखेंगे कि — "मैं जाऊँगा-आऊँगा तो कम से कम जो एवरेज स्पीड है, वो 80 की निकलनी चाहिए।" 80 केएमपीएच (किमी प्रति घंटा) — ये एक्सपेक्टेशन थोड़ी रखोगे! आप तो वास्तव में डैशबोर्ड को, स्पीडोमीटर को देखोगे भी नहीं। जितना आपके बस में होगा, आप उतनी तेजी से गाड़ी भगाओगे और उतनी तेजी से वापस लाओगे। बल्कि कोई पूछेगा कि एवरेज स्पीड कितनी रखी — तो आपको पता भी नहीं होगा। जब सही फैसले लिए जाते हैं, तो उसमें काम एक्सपेक्टेशन का मुँह देख के नहीं किया जाता। ना अपनी एक्सपेक्टेशन, ना दूसरों की। फिर काम उतना हो जाता है, जितने कि तुम कभी एक्सपेक्टेशन कर भी नहीं सकते थे।

असली काम की पहचान ही यही है कि वो तुम्हारे भीतर वो ताकत खड़ी कर देता है, जितनी तुम्हें पता ही नहीं थी।

छोटा काम करोगे ना, तो उसके लिए ताकत भी छोटी ही चाहिए। और छोटे काम करते-करते स्वयं से भी हमारी अपेक्षा, उम्मीद, एक्सपेक्टेशन क्या हो जाती है — कि मैं तो इतना ही कर सकता हूँ। तो एक्सपेक्टेशन रख के बड़ा काम नहीं किया जाता। बड़ा काम बस किया जाता है। और फिर तुम क्या देखते हो — कि “बाप रे बाप! मैं इतना कर गया। इतना तो मैं कभी कर भी नहीं सकता था! ये मैंने इतना किया है।” तुम ख़ुद हैरान रह जाओगे — कि मुझसे इतना कैसे हो गया?

अगर मैं अपने लिए कोई लक्ष्य, टारगेट, गोल, डेडलाइन बनाता — मैं तो भी इतना ना कर पाता, जितना मैं सोचता हूँ कि करने के काबिल हूँ, मैंने उससे कई ज़्यादा कर दिया। वो हो गया, क्योंकि ज़रूरी था। काम वो करो जो तुम्हारी समझ से निकला हो। काम वो करो जो दुनिया के लिए ज़रूरी हो, उसके बाद घंटे गिन के काम नहीं करोगे। उसके बाद अपनी थकान देखकर काम नहीं करोगे।

उसके बाद काम ज़िन्दगी बन जाता है। और ऊँची चीज़ तुम्हें मिले, उसके लिए ज़रूरी है पहले कि तुम ये स्वीकार तो करो कि ऊँचे संघर्षों में उतरना है। अर्जुन इतने दिनों से थे श्री कृष्ण के पास। श्री कृष्ण उनके दोस्त की तरह रहते थे, संबंधी भी हैं और सखा भी हैं। श्री कृष्ण मिले हुए थे अर्जुन को, गीता नहीं मिली अर्जुन को — गीता तभी मिली जब अर्जुन ने सबसे भयानक युद्ध में उतरना स्वीकार किया। तब मिलती है गीता।

जो बात अर्जुन को पता चली, वो कभी नहीं पता चलती अगर अर्जुन युद्ध से भाग गए होते। अर्जुन ने अपना ही जो प्रचंड रूप देखा, अर्जुन की अपनी उम्मीदों, एक्सपेक्टेशन से आगे का — अर्जुन ने जो अपना योद्धा रूप देखा, वो अर्जुन ख़ुद भी कभी नहीं देख पाते। गीता को अर्जुन कभी नहीं पाते अगर अर्जुन ने महाभारत का युद्ध स्वीकार नहीं किया होता और अर्जुन भागने को तैयार हो रहे थे।

तो पहले जीवन में बड़े संघर्षों को आने तो दो। छोटी-मोटी सुरक्षित ज़िन्दगी जिओगे तो तुम्हें लगेगा कि तुम्हारी काबिलियत भी छोटी-मोटी ही है। तुम्हारी बहुत-बहुत बड़ी काबिलियत है, पर वो काबिलियत सक्रिय नहीं होगी, एक्टिवेट नहीं होगी, अगर तुम ज़िन्दगी में बड़ी चुनौती आने ही नहीं दोगे। अब तय कर रखा है ज़िन्दगी में कि मच्छर ही मारने हैं, और बहुत लोग ज़िन्दगी में सिर्फ़ मच्छर ही मारते हैं। और भीतर तुम्हारे एक टैंक बैठा हुआ है। तो उस टैंक का तुम्हें कभी पता लगेगा भी? क्योंकि मच्छर मारने के लिए टैंक की तो ज़रूरत होती नहीं ना। तो टैंक तुम्हारे भीतर पड़ा रह जाएगा जंग खाता हुआ, और तुम कभी जान नहीं पाओगे कि कितनी ताकत तुम्हारे भीतर थी क्योंकि तुमने चुना ये है कि ज़िन्दगी में मच्छर मारने हैं।

बड़ा संघर्ष चुनो, तो तुम्हें भी अचंभा हो जाएगा — मेरे पास टैंक भी है? हाँ, टैंक है तुम्हारे पास। पर वो तुमको उपलब्ध तभी होगा जब तुम पहले उतना बड़ा दुश्मन अपने सामने पाओगे। और हमारा ये है कि बड़ा दुश्मन हो तो हम लोट जाते हैं, चाटुकारिता करने लग जाते हैं, चरण वंदना करते हैं, कहते हैं इतना इनके पास बल है, इनसे पंगे थोड़ी लेंगे। किसी के पास कितना भी बल हो, तुम्हारे पास उससे ज़्यादा बल है। पर वो बल तुम्हें दिखाई नहीं देगा जब तक तुम उसका आह्वान नहीं करोगे — इनवोकेशन। और वो इनवोकेशन सिर्फ़ एक तरीक़े से होता है: ये मत देखो कि मेरी काबिलियत क्या है, ये मत देखो कि मैं ख़ुद से कितनी उम्मीद रख सकता हूँ, कितनी एक्सपेक्टेशन। कहो, सही है तो करना पड़ेगा।

सही है तो करना पड़ेगा। अब सर फूटे, माथा फूटे, तकलीफ़ें आएँ, जूझना पड़े, दुनिया रूठे — सही है तो करना पड़ेगा। और जब करना शुरू करते हो तो पता चलता है — अरे! ये तो होने भी लग गया! मैं ये कर सकता था? मुझे तो पता भी नहीं था। वो करके ही पता चला कि कर सकता हूँ।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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