युवा अभिनेत्री की जिज्ञासा: मैं दर्शकों को रिझाऊँ कि समझाऊँ? || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2022)

प्रश्नकर्ता: एक यंग एक्ट्रेस (युवा अभिनेत्री) होने के नाते मेरे लिए एक बहुत ही कांसर्निंग टॉपिक (सम्बन्धित विषय) हैं— फेमिनिज़्म (नारीवाद) और हमारी इंडस्ट्री और जो पोर्ट्रेयल (निरूपण) होता है एक्ट्रेसेस (अभिनेत्रियों) का या कैरेक्टर्स (पात्रों) का। मैं तो अपने रोल्स (भूमिकाओं) के ज़रिए हमेशा यही कोशिश करती हूँ आचार्य जी कि मैं एक बहुत ही स्ट्रॉंग, (मज़बूत) एक बोल्ड (बहादुर) लड़की का, एक ऐसे कैरेक्टर को हमेशा लेकर आऊँ।
जैसे मैंने अपने बचपन में शुरुआत की, तो मेरा पहला सीरियल था 'सात फेरे' जो रंगत के ऊपर था, जो लड़कियों को लगता था कि ब्यूटी स्टैंडर्ड (सौन्दर्य मानक) में साँवला रंग होना, काला रंग होना कुछ ग़लत है। तो अपने सीरियल के ज़रिए, उस रोल के ज़रिए, भले ही मैं नौ-दस साल की थी, पर मैंने हमेशा रोल्स (भूमिकाएँ) ऐसे ही सेलेक्ट (चयन) किये। फिर उसके बाद में बनी ‘झाँसी की रानी’ ज़ीटीवी के एक शो पर, उसके ज़रिए भी मैं एक स्ट्रॉंग लड़की का मैसेज (सन्देश) देना चाहती थी। ‘झाँसी की रानी’ जिन्होंने हमें इतिहास में दिया था, तो मुझे अच्छा लगा कि वह मौक़ा मिला। और कम-से-कम मैं एक स्ट्रॉंग लड़की का सोर्ड फाइटिंग (तलवारबाज़ी) प्रदर्शित कर पायी। सोचो अगर एक लड़की...
झाँसी की रानी एक ऐसी लड़की थी जिसे बताया ही नहीं था कि तुम लड़कों से कमज़ोर हो, कोई लिमिटेशन (सीमा) ही नहीं थी। तो उन्होंने कभी अपनेआप को कमज़ोर ही नहीं समझा और वो लड़कों की तरह बराबरी से लड़ती थीं। और उन्होंने एक राज्य भी सम्भाला, एक मुहिम मंगल पाण्डे के साथ उस वक़्त जो अपराइज़िंग (विद्रोह) थी, सबको एक मुक़ाम तक लाया। और अपनेआप में एक बहुत बड़ी हीरोइन थी हमारे देश की, तो मुझे अच्छा लगा कि मुझे उस किरदार को निभाने का मौक़ा मिला। उसके बाद एक सीरियल था ‘शक्तिपीठ के भैरव’, जहाँ पर मैं पार्वती देवी बनी थी, और उनके सभी एक-सौ-आठ शक्तिपीठों के जो



