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युवा अभिनेत्री की जिज्ञासा: मैं दर्शकों को रिझाऊँ कि समझाऊँ? || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
25 min
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प्रश्नकर्ता: एक यंग एक्ट्रेस (युवा अभिनेत्री) होने के नाते मेरे लिए एक बहुत ही कांसर्निंग टॉपिक (सम्बन्धित विषय) हैं— फेमिनिज़्म (नारीवाद) और हमारी इंडस्ट्री और जो पोर्ट्रेयल (निरूपण) होता है एक्ट्रेसेस (अभिनेत्रियों) का या कैरेक्टर्स (पात्रों) का। मैं तो अपने रोल्स (भूमिकाओं) के ज़रिए हमेशा यही कोशिश करती हूँ आचार्य जी कि मैं एक बहुत ही स्ट्रॉंग, (मज़बूत) एक बोल्ड (बहादुर) लड़की का, एक ऐसे कैरेक्टर को हमेशा लेकर आऊँ।

जैसे मैंने अपने बचपन में शुरुआत की, तो मेरा पहला सीरियल था 'सात फेरे' जो रंगत के ऊपर था, जो लड़कियों को लगता था कि ब्यूटी स्टैंडर्ड (सौन्दर्य मानक) में साँवला रंग होना, काला रंग होना कुछ ग़लत है। तो अपने सीरियल के ज़रिए, उस रोल के ज़रिए, भले ही मैं नौ-दस साल की थी, पर मैंने हमेशा रोल्स (भूमिकाएँ) ऐसे ही सेलेक्ट (चयन) किये। फिर उसके बाद में बनी ‘झाँसी की रानी’ ज़ीटीवी के एक शो पर, उसके ज़रिए भी मैं एक स्ट्रॉंग लड़की का मैसेज (सन्देश) देना चाहती थी। ‘झाँसी की रानी’ जिन्होंने हमें इतिहास में दिया था, तो मुझे अच्छा लगा कि वह मौक़ा मिला। और कम-से-कम मैं एक स्ट्रॉंग लड़की का सोर्ड फाइटिंग (तलवारबाज़ी) प्रदर्शित कर पायी। सोचो अगर एक लड़की...

झाँसी की रानी एक ऐसी लड़की थी जिसे बताया ही नहीं था कि तुम लड़कों से कमज़ोर हो, कोई लिमिटेशन (सीमा) ही नहीं थी। तो उन्होंने कभी अपनेआप को कमज़ोर ही नहीं समझा और वो लड़कों की तरह बराबरी से लड़ती थीं। और उन्होंने एक राज्य भी सम्भाला, एक मुहिम मंगल पाण्डे के साथ उस वक़्त जो अपराइज़िंग (विद्रोह) थी, सबको एक मुक़ाम तक लाया। और अपनेआप में एक बहुत बड़ी हीरोइन थी हमारे देश की, तो मुझे अच्छा लगा कि मुझे उस किरदार को निभाने का मौक़ा मिला। उसके बाद एक सीरियल था ‘शक्तिपीठ के भैरव’, जहाँ पर मैं पार्वती देवी बनी थी, और उनके सभी एक-सौ-आठ शक्तिपीठों के जो मेनिफ़ेस्टेशन्स (अभिव्यक्तियाँ) हैं। तो आज मैं एक किरदार कर रही हूँ ‘बन्नी चाऊ होम डिलीवरी’, एक ऐसी लड़की है जो...

तो अपनी कहानियों की तरफ़ मैं मानती हूँ कि मैं बहुत रेस्पोंसिबल (ज़िम्मेदार) हूँ, एक तो अपनी तृप्ति के लिए भी, एक एक्ट्रेस होने के नाते कि मुझे अच्छा लग रहा हैं कि नहीं, एंजॉय (आनन्द लेना) कर पा रही हूँ कि नहीं। और साथ ही साथ जो लड़कियाँ मुझसे रिलेट (सम्बन्धित) करती हैं, जो मुझे देखती हैं, क्या उन्हें मैं एक अच्छा मैसेज दे पा रही हूँ या नहीं। अब रही बात कल्पना दे रही हूँ उन्हें या (यथार्थ), वो तो भगवान जाने, आप समझते होंगे बेहतर, पर अपनी तरफ़ से यही कोशिश है कि एक स्ट्रॉंग मैसेज हमेशा दूँ, एक अच्छे आचरण, जो अच्छे-अच्छे कैरेक्टर्स लिखे जाते हैं, कुछ अच्छी सीखें दूँ और सशक्तिकरण की तरफ़ ही बढ़ाऊँ और यह डर मुझे हमेशा लगा।

मेरे करिअर में मुझे कई ऐसे रोल्स आये हैं कि एक ग्लेमरस (आकर्षक) लड़की है या ऐसा एक डांस नम्बर है, कर लीजिये। पर मैं अल्टीमेटली (आख़िरकार) सोचती हूँ कि इससे मैं क्या मैसेज दे रही हूँ। तो हर प्रोजेक्ट, हर एक किरदार जो मेरे दरवाज़े पर आते हैं, मैं सोचती हूँ इससे मैं अल्टीमेटली क्या मैसेज दूँगी, उसका जो है वो मेरी रेस्पोन्सिबिलिटी (ज़िम्मेदारी) मुझ पर हैं और जो कॉन्सेक्वेन्स (परिणाम) जो हैं कर्मा (कर्म) से वो मेरे ऊपर ही है।

तो अब इसलिए मैं फूँक-फूँककर चलती हूँ और अब तक बहुत खुश हूँ। इस पर मैं और क्या कर सकती हूँ आचार्य जी आगे जाकर अपनी अगर मैं एक इमेज (छवि) बना भी रही हूँ तो मैं चाहूँगी कि अल्टीमेटली अपने कैरेक्टर्स के अलावा ‘उल्का’ होने के नाते भी समाज को सही दिशा में ले जा सकूँ अपनी इन्हीं कोशिशों के ज़रिए।

आचार्य प्रशांत: वही जो पुरानी कहानी है, आप चूँकि कहानियों के क्षेत्र मे हैं, जो सबसे पुरानी कहानी है उसको याद रखिएगा। सबसे पुरानी कहानी ये है कि हम जंगल में थे और जंगल में भी काम चल रहा था। हम जंगल से बाहर क्यों निकले। हमने पहले गाँव बसाये, हमने खेती करी, फिर हमने शहर बसाए, औद्योगिकीकरण हुआ, स्कूल, अस्पताल, सड़कें — हमने ये सब खड़े करे। हमने ये क्यों करा? हमने ये सब करा चैन के लिए।

जंगल में भी हम कोई भूखे नहीं मर रहे थे। जंगल का कोई जानवर भूखा मरता है क्या! हम भी भूखे नहीं मर रहे थे जंगल में। कुछ और था जो हमें चाहिए था जिसके लिए हमने इतनी मेहनत करी है। जंगल से हम बाहर निकले हैं, हमारे पास एक वजह थी, वो वजह नहीं भूलनी है, वो पुरानी कहानी नहीं भूलनी है। हम आज जो भी कुछ कर रहे हैं, वो एक तरह से उस पुरानी कहानी का दोहराव ही है, बस याद रखना है कि हमने यात्रा शुरू किसलिए करी थी।

हमने यात्रा इसलिए नहीं शुरू करी थी कि जंगल में हमें खाने को नहीं मिल रहा था। खाने को जंगल में आज भी पर्याप्त है, हर जानवर के लिए है, हमें भी वहाँ पर पर्याप्त ही था। हम बाहर निकले थे क्योंकि हमें कोई ऊँची चीज़ चाहिए थी। हमें कुछ करके दिखाना था, अपने भीतर की सृजनात्मकता को अभिव्यक्ति देनी थी कि कुछ चैन मिले, हम इसलिए निकले थे। आप भी याद रखिए कि आप भी अपने घर से इसीलिए निकली हैं। खाने को तो सबके घर में होता है।

प्र१: उसके कई माध्यम हो सकते हैं।

आचार्य: कई माध्यम भी हो सकते हैं। तो इस पूरी कहानी के अन्त में वो चैन मिला कि नहीं मिला, वो जानना ज़रूरी है। बाक़ी सब चीज़ें मिल गयी हैं और चैन नहीं मिला है, तो भूलना नहीं है कि बाक़ी सब चीज़ों का भी महत्व तभी है जब वो शांति दे दें। ठीक है!

मैं एक पाँच करोड़ की बन्दूक ले आऊँ, कितनी महँगी चीज़ है न! पाँच करोड़ की बन्दूक ले आऊँ, उससे ख़ुद को ही गोली मारूँ। कितनी महँगी चीज़ मैं ले आया! (श्रोतागण हँसते हैं)। बात इसकी नहीं है कि चीज़ कितनी महँगी है जो आपने ख़रीद ली, बात ये है कि जो चीज़ आपने ख़रीदी उससे आपको मिला क्या। पाँच करोड़ की बन्दूक से भी अगर मुझे मौत ही मिली है, तो मैं पागल हूँ न! पहले तो पाँच करोड़ कमाने के लिए इतनी मेहनत करी होगी, और फिर वो सब काम कर उससे मौत पायी; कितना बड़ा पागल निकला मैं!

तो भूलना नहीं है कि अन्ततः हमने ये सब करके पाया क्या, पाया क्या। हमारे जो बहुत, बहुत, बहुत पुराने पुरखे थे, यही सवाल उनके सामने भी था जो आज आपके सामने है, हमारे सामने, सबके। कि कुछ पाना शेष है इसीलिए जंगल से बाहर निकलो। जो पाना तब शेष था वही पाना आज भी शेष है — ये हमारी त्रासदी है।

जंगल से बाहर निकल आये, भीतर के जंगल से बाहर नहीं निकल पाये, गन्दे जंगल खड़े कर दिये हैं। मैं पूछ रहा था किसी से, मैंने कहा, ‘जंगल में जानवर होते हैं सब, पर कोई जंगल गन्दा देखा है। जंगल में जानवर-ही-जानवर, जानवर-ही-जानवर हैं। उनको कोई शिक्षा नहीं मिली, कोई सभ्यता-संस्कृति उनको नहीं पढ़ायी, कोई गन्दा जंगल देखा है आज तक।

यहाँ बीच (समुद्र तट) इतनी गन्दी क्यों है। वहाँ से होटल से निकलकर बीच तक जा रहा हूँ, रास्ते में टट्टी-पेशाब की भभक उठ रही है बिलकुल। और ये बिलकुल सुबह की बोल रहा हूँ मैं, साढ़े पाँच, छः साढ़े छः बजे की बात।

जंगल में जानवर है, जंगल गन्दा नहीं है। हम अपनेआप को सभ्य-सुसंस्कृत बोलते हैं, हमारे शहर, हमारे समुद्र, हमारे तालाब, हमारी नदियाँ, हमारी हवा, हमारा आकाश, हमारा सबकुछ क्यों गन्दा है। हम तो जानवर से भी बदतर हैं न, हम जिस वजह से जंगल से निकले थे वो उल्टा ही पड़ गया सबकुछ।

प्र१: और आज अगर कोई कूड़ा फैला दे, तो हम उसे जानवर बुलाते हैं। जबकि...

आचार्य: जानवर नहीं गन्दा होता।

प्र१: हाँ! जबकि जानवर नहीं गन्दा होता। कचरा करने वाले, गन्दगी फैलाने वाले हम ही हैं।

आचार्य: आप तो जब जानवरों के क्षेत्र में जाते हो, तो सेल्फ़ी ले-लेकर इंस्टाग्राम में डालते हो, कितना सुंदर है! कितना मनोरम है! और जानवर जब आपके क्षेत्र में आते हैं, तो कहते हैं, ‘कहाँ फँस गए! जान जा रही है बिलकुल।’ आदमी जब जानवरों के घर में जाता है तो पुलकित अनुभव करता है बिलकुल— वाह! मज़ा आ गया। है न! पहाड़ों पर चले गए, जंगलों में, नदियों में चले गए, कितना आनन्द आ गया! और वही जब हम जानवरों को अपने यहाँ पर घसीट लाते हैं तो उनकी क्या दुर्दशा होती है।

प्र१: हम उन्हें यहाँ ले आए हैं जंगलों से। हम शहर में ज़बरदस्ती उन्हें अपने साथ बाँधकर रख रहे हैं और उन्हें भी अशांत कर रहे हैं।

आचार्य: हम सबके लिए हिंसक हैं। देखिए, आज की बात की शुरुआत ही हमने बड़े अच्छे नोट पर करी थी। हमें अगर अपना पता नहीं, तो हम जिस भी चीज़ पर हाथ रखेंगे उसका इस्तेमाल करने के लिए ही रखेंगे। यही शोषण है। तो जानवर तो जानवर है, जिन सम्बन्धों को हम प्रेम का कहते हैं वहाँ भी हिंसा बराबर की है। जानवर को तो आप कह देते हो कि मुर्गा लाया हूँ काटकर खाने के लिए। आप घर में पत्नी लेकर के आते हो, उसको भी तो करना क्या है।

प्र२: तो फिर विचारधारा में ही फ़ॉल्ट (त्रुटि) है?

आचार्य: भीतर, विचारधारा जहाँ से जन्म ले रही है उस स्रोत में ही फ़ाल्ट है, हमें वो स्रोत ही बदलना पड़ेगा। विचारधाराएँ तो वरना बदलते रहते हैं हम। आज आपकी एक विचारधारा है, आप कल समाजवादी हो जाइए, पूँजीवादी हो जाइए। विचारधाराएँ नहीं, जिस स्रोत से समस्त विचार उठ रहे हैं हमारे, वही सब गड़बड़ रहता है। आपकी इंडस्ट्री में तो गाने भी बनते हैं— ‘मैं गरम मुर्गी हूँ, मुझे पकाकर खा जा, चिकन हूँ मैं।’ तो ऐसा थोड़ी है कि...

प्र१: मुझे पता है एक्जेक्टली (ठीक-ठीक) यह कौनसा गाना है।

आचार्य: कुछ ऐसा ही है वो ‘बटर चिकन’ बना लो मेरा’। तो अब ये एक महिला ही तो गा रही है और किसी लिरिसिस्ट (गीतकार) ने ये लिखा है। वो अपनेआप को इंसान बोलता है, जिसने ये लिखा है। तो ऐसा थोड़े ही है कि हमें मुर्गी ही खानी है, सामने जो महिला है हमें उसको भी तो बटर चिकन बनाकर खाना ही है, और क्या करना है। वो ख़ुद बोल रही है, ‘खाओ मुझे’।

ये झूठों में सबसे बड़ा झूठ है कि फ़िल्में समाज का दर्पण हैं। कि लोग जैसे हैं वैसा ही हम फ़िल्मों में दिखा देते हैं, कि समाज में जो चल रहा है वही तो फ़िल्मों में दिखाते हैं। समाज में अच्छाई नहीं चल रही? (आचार्य जी स्वामी विवेकानन्द की तस्वीर की तरफ़ हाथ से इशारा करते हुए) समाज में ये (स्वामी विवेकानन्द) नहीं हुए थे? ये आसमानों में थे कहीं? इन पर कितनी फ़िल्में बनायी हैं आपने। कबीर साहब समाज में नहीं थे? उन पर कितनी फ़िल्में बनायीं? या समाज में जो सबसे सड़ा-गला बदबू मारता क्षेत्र है, उसी से आपको फ़िल्म बनानी है। क्यों झूठ बोलते हो कि हम क्या करें, साहित्य समाज का दर्पण है और कला समाज से उठती है, लोग जैसे हैं वैसी ही फ़िल्में बना दी। ऐसा कुछ नहीं है।

बहुत कुछ हो रहा है दुनिया में। कलाकार को, फ़िल्म के निर्माता को चुनाव करना होता है कि वो किस क्षेत्र को चुनकर के प्रदर्शित करेगा। और जिस क्षेत्र को चुनकर के प्रदर्शित किया जाता है उस क्षेत्र का प्रभाव बढ़ जाता है। आप बार-बार यही दिखाओगे, अब बॉम्बे को लेकर के आप बार-बार यही दिखाओगे कि माया नगरी है और गैंगस्टर्स (बदमाशों) की, अंडरवर्ल्ड (अपराधी वर्ग) की नगरी है, तो पूरे देश में छवि क्या जाएगी बम्बई की। यही तो जाएगी न, कि यहाँ दो ही काम होते हैं— या तो पिक्चरें बनती हैं या गोलियाँ चलती हैं। बम्बई ऐसी है क्या? यहाँ जहाँ जाओ वहीं शूटिंग ही हो रही होती है और जहाँ जाओ वहीं पर वो भाई-लोग घूम रहे होते हैं। ऐङे! (हाथ से बन्दूक का इशारा करते हुए)। यही हो रहा होता है? हमें तो नहीं मिले अभी तक। कि सड़कों पर जिसको जाओ वही कट्टा लेकर घूम रहा है। ऐसा तो नहीं है, पर आपकी फ़िल्मों ने तो बम्बई ऐसा ही दिखा रखा है।

तो ये तो चुनाव की बात होती है न कि आप पूरे समाज से, पूरे परिदृश्य से क्या उठाकर के प्रदर्शित करना चाहते हो। मैं बताता हूँ आप क्या उठाते हो— जो सबसे घटिया चीज़ है दुनिया की, आप वही उठाते हो। क्यों? क्योंकि उससे आपकी जेब भरती है। तो ये मत बोलिए कि मैं क्या करूँ, दुनिया ऐसी ही है। आप गन्दे आदमी हो इसीलिए आप गन्दगी देख रहे हो और दिखा रहे हो।

घरों में साफ़ जगहें भी बहुत होती हैं और कोई घर ऐसा नहीं है जिसमें शौचालय नहीं होता। तो आपसे कोई कहता है, अपने घर की तस्वीर दिखाओ, तो अपना कमोड (शौचासन) दिखा देते हो क्या। तो ये कौनसी बात है कि जो था वही दिखा दिया। घर में तो सीवर भी होता है, उसमें बजबजाता हुआ माल भी होता है। कोई पूछे, ‘घर दिखाओ।’ तो वही सब बजबजाता माल काहें नहीं दिखा देते। कहो, ‘मैं तो वही दिखा रहा हूँ जो घर में था।’ घर में पूजा घर भी होता है, ठीक है न! देवालय भी होता है, शौचालय भी होता है। घर को प्रदर्शित करना है, तो शौचालय दिखाओगे क्या?

प्र१: तो इसी से रिलेटेड (सम्बन्धित) जैसे क्या है न, आजकल एक, जैसे आप कह रहे हैं, निर्माताओं को ख़ुद चुनाव करना चाहिए। कई बार ऑडियंस (दर्शक) सपोर्ट (समर्थन) नहीं करती, तो इंडस्ट्री ओवरऑल या वो जो कुछ निर्माता, प्रोड्यूसर्स, एक्टर्स हैं, वो डिमोटिवेट (प्रेरणाहीन) हो जाते हैं। फिर उन्हें लगता है कि दिस इज़ व्हाट आइ एम गुड एट (मैं इसी में अच्छा हूँ)। मैं अगर नहीं कर पाऊँगा, तो मैं अपना घर कैसे चलाऊँगा ।

आचार्य: ऐसा नहीं है कि ऑडियंस सपोर्ट नहीं करती। हर आदमी उस एक आख़िरी चीज़ का प्यासा है, वो अगर आपको सपोर्ट नहीं कर रहा है, तो इसका मतलब ये है कि आप उसको वो चीज़ नहीं दे पा रहे हो। आपने फ़िल्म बनाई, आपने अपनी ओर से कहा, ‘मैंने एक ऊँचे विषय पर एक उत्कृष्ट फ़िल्म बनायी, पर वो चली नहीं, फ्लॉप (असफल) हो गयी। तो अब अगला मैं क्या बनाऊँगा— एक फ़िल्म जिसमें छः आइटम नम्बर हैं।’ ठीक है न।

बात ये नहीं है कि आपने बहुत अच्छी फ़िल्म बनायी थी, पर वो चली नहीं। बात ये है कि आपने जो फ़िल्म बनायी थी, उसमें कमी थी इसलिए नहीं चली। और उसमें कमी ये नहीं थी कि उसमें आपने हिंसा या नंगा नाच नहीं रखा था, उसमें कमी ये थी कि जो दिल है, उसकी जो प्यास है, उसकी प्यास को, मूल प्यास को वो फ़िल्म नहीं बुझा पा रही थी। एक प्रयास और करो भाई। वो भी नहीं ठीक बैठता, इंसान हैं, ग़लतियाँ होती हैं, एक प्रयास फिर और करो। लेकिन सही दिशा में प्रयास करो न।

सही दिशा में आपने एक प्रयास करा, आप असफल हो गए, तो आपको ये थोड़े ही करना है कि आप ग़लत दिशा में ही चल पड़ो।

सही दिशा में एक प्रयास करा, असफल हो गए आप, तो क्या आप ग़लत दिशा में चल पड़ोगे? ये तो कोई बात नहीं हुई। अगर ऐसा होता, पता ही होता कि ढंग की चीज़ अगर आप देंगे ऑडियंसेस (दर्शकों) को, बिलकुल भी नहीं लेंगे, तो ये हमने चार कैमरे काहे को लगा रखे हैं? (अपने आसपास के कैमरों की ओर इशारा करते हुए)। हम यहाँ पर कोई ’आइटम नम्बर’ तो कर नहीं रहे, न मैं यहाँ पर डॉन बनकर बैठा हूँ, बन्दूकें भी नहीं चल रहीं। यहाँ कुछ भी मनोरंजक तो हो नहीं रहा है, तो फिर ये हम रिकॉर्ड क्यों कर रहे हैं, हम क्यों इसको अपलोड करेंगे। हम करेंगे भी अपलोड और लोग देखेंगे भी, ठीक है। और सब, थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है, और मेहनत करने में फिर ज़िन्दगी का आनन्द भी है न।

अगर अच्छी चीज़ें दुनिया के द्वारा, इंसान, समाज के द्वारा अस्वीकार ही अस्वीकार की जातीं, तो फिर मेरे जैसा तो कोई अस्तित्व में हो ही नहीं सकता था। हम ख़ुद सबूत हैं इस बात का कि आप ढंग का काम करके भी आगे बढ़ सकते हो। इंस्टाग्राम पर वो सब भी हो सकता है जो होता है, इंस्टाग्राम पर हम भी हैं, यूट्यूब पर भी हम हैं और मिलियंस में पहुँच गए हैं। ठीक है, मेहनत बहुत पड़ी है, लेकिन जो भी हुआ है, जैसा भी हुआ है, काम चल तो रहा है न और बढ़ तो रहा है न।

तो ऐसा थोड़े ही है कि कोई कहे कि अजी साहब! जो अच्छा काम करते हैं, वो तो असफल ही रहते हैं, और कुत्ते की मौत मरते हैं, भिखारी हो जाते हैं और खाने को नहीं पाते हैं और दुरदुराए जाते हैं। ऐसा होता है क्या, ऐसा तो कुछ भी नहीं है। मस्त हूँ, बैठा हुआ हूँ, वज़न भी थोड़ा ज़्यादा ही है सामान्य से, कपड़े भी पहन ही रखे हैं, मैं न नंगा हूँ, न भूखा हूँ और भीतरी ठसक भी है कि अच्छा काम करके जी रहा हूँ।

प्र३: और अगर यह मान लिया है आपने कि यह सही दिशा है, फिर पलटने की बात ही कहाँ उठती है।

आचार्य: पलटने की बात भी नहीं उठती है, चुनौतियाँ बहुत आती हैं। ठीक है, हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है, शारीरिक भी, मानसिक भी। लेकिन उसका भी एक ज़ायका होता है। जैसे गन्दगी का लोगों को स्वाद, आदत लग जाती है न, वैसे ही किसी भी क़ीमत पर सही ज़िन्दगी जीना भी एक अभ्यास और आदत की बात होती है। एक बार आपको उसकी आदत लग गयी, फिर आप नीचे गिरना बर्दाश्त ही नहीं करते। आप कहते हो, ‘जान दे दूँगा, नीचे नहीं गिरूँगा। अपने लिए अब एक तल निर्धारित कर दिया है, ऊँचे, ऊँचे और ऊपर ही जाना है उससे, नीचे जाना बर्दाश्त नहीं है।’

प्र३: आपने जो कही थी न एक बात, मेरे ज़हन में तब से घूम रहा है। कि हममें जो एक खालीपन है वो एक होल (छेद) जैसा है जो कभी भरता नहीं है। और फिर मैं एक सुन्दर स्त्री को देखता हूँ और बोलता हूँ कि अब मैं इससे क्या लूँ, जो ये मैं भरूँ। इनको देखता हूँ, जैसे इनका काम है तो हम किसी दूसरे जीव को देखते हैं तो बोलते हैं कि इस जीव से हम क्या ले सकते हैं, कैसे शोषण करें कि मैं यह होल भरूँ। पर यह भरता कभी नहीं है और वो हम लगे रहते हैं। खालीपन और ये...

आचार्य: और उस शोषण को शोषण का नाम भी नहीं देते।

प्र२: वह ग़लत लगता ही नहीं है।

आचार्य: ग़लत लगता भी नहीं है, ग़लत लगने की सम्भावना भी ख़त्म कर देते हैं ये बोलकर कि ये तो लेनदेन है, या कि रिश्ते ऐसे ही तो होते हैं, या कि ये मेरी ज़िम्मेदारी है या ये मेरा हक़ है। साहब! ये हमारा जो रिश्ता है, उस रिश्ते में दोनों के कुछ हक़ होते हैं। ये मेरा हक़ है, मैं शोषण थोड़े ही कर रहा हूँ। मैं तो बस अपने अधिकार का प्रयोग कर रहा हूँ।

प्र३: क्योंकि बदले में यह भी लेती है मुझसे।

आचार्य: बदले में ये भी लेती है, बराबर की जानवर है ये बगल में। वो थोड़े ही छोड़े दे रही है। दो जानवर हैं, दोनों एक-दूसरे का मुँह नोच रहे हैं। और दोनों इसको ज़िम्मेदारी बोल रहे हैं, अधिकार बोल रहे हैं, कर्तव्य, प्रेम बोल रहे हैं। पता नहीं क्या-क्या बोल रहे हैं और दोनों बदहाल हैं। और जैसे उनकी बदहाली पर्याप्त नहीं थी, तो बदहाली की श्रृंखला को आगे बढ़ाने के लिए और वो नन्हे-नन्हे जानवरों की कतार लगाते जाते हैं— ये हमारी कुल कहानी है, जंगल से बाहर निकलकर।

प्र३: बहुत बार मेरा ऐसा मन बोलता है, मैं बोलता नहीं हूँ क्योंकि ये बोलने में ख़राब लगता है कि इंसान आपस में जो करना है कर लो यार! मर लो, पर उन जानवरों को छोड़ दो। उनका जो हमने बेहाल किया, उनका जो हम शोषण कर रहे हैं, वो तो हमारे इस लेनदेन में नहीं आता।

प्र१: वो तो बेज़ुबान हैं। हम तो कम-से-कम व्यक्त कर सकते हैं; वे तो बेज़ुबान हैं। कम-से-कम उन्हें तो...

आचार्य: ये जो आप कह रहे हैं न, ये है ’क्लासिकल वीगन फैलसी’ (शास्त्रीय शाकाहारी भ्रम)। कि हम तो वही रहे आएँगे जैसे हैं, पर हम जानवरों को बख़्श देंगे। आप जैसे हैं अगर आप वैसे ही रहे आएँगे, तो आप जानवरों को बख़्श सकते ही नहीं। और दुनिया भर में, भारत में भी जो पूरा ‘वीगन आन्दोलन’ चल रहा है, इसका कहना यही है कि वीगनिज़्म एक आइडियोलॉजी है, एक विचारधारा है।

अपनी ज़िन्दगी जैसी चल रही है चले, ठीक है। मेरी ज़िन्दगी में कोई सृजनात्मकता नहीं है, कोई प्रेम नहीं है, कोई आत्मज्ञान नहीं है। मैं उसकी बात नहीं करना चाहता क्योंकि वो सब अध्यात्म के दायरे में आता है और अध्यात्म से मुझे डर लगता है, लेकिन मैं जानवरों के प्रति बड़ा प्रेमपूर्ण रहूँगा। मैं डॉगी (कुत्ते) को जाकर खिला देता हूँ, मैं ये सब कर देता हूँ, मैं वीगन हूँ — ये नहीं चलेगा बाबा।

वीगनिज़्म सिर्फ़ एक जगह से आ सकता है, और वो है ‘अध्यात्म, आत्मज्ञान’। अहिंसा सिर्फ़ और सिर्फ़ ज्ञान से आ सकती है। अगर अध्यात्म है, तो अहिंसा उसकी छाया की तरह अपनेआप पीछे-पीछे आ जाएगी। और अगर आत्मज्ञान नहीं है और आप वीगन बने घूम रहे हो, तो वो वीगनिज़्म झूठा है।

प्र३: अधूरा है।

आचार्य: झूठा है। मैं अधूरा क्यों बोलूँ? जैसे कि कुछ हो गया हो थोड़ा-सा। मैं थोड़ा भी नहीं मान रहा। वीगन बनकर लोग घूम रहे हैं और उनके कंज्यूमरिज्म (उपभोगवाद) में कोई कमी नहीं आ रही, बच्चे वे दनादन पैदा कर रहे हैं, जीवन के उनके जितने भी चुनाव हैं, वो सब-के-सब जीवन-विरोधी ही हैं, तो बताइए वो जानवरों का भी क्या कल्याण कर देंगे। बस उन्होंने अपनेआप को ही एक दिलासा और ये गौरव दे रखा है कि मैं दूध नहीं लेता, मैं अण्डा नहीं लेता और मैं चमड़े की बेल्ट नहीं पहनता हूँ, मैं चमड़े की बेल्ट नहीं पहनता हूँ।

बैंगलोर में जो बाढ़ आयी है, उसका बहुत बड़ा कारण ये है कि वहाँ जो नेचुरल ड्रेनेज (प्राकृतिक जल-निकास) था और वहाँ बहुत सारे छोटे-छोटे, छोटे-छोटे सब न तालाब और सरोवर है, तो ये सब है। उस पर बिल्डरों (भावन निर्माताओं) ने घर खड़े कर दिये और जो पानी के बहाव का रास्ता था उसको भी रोक दिया वहाँ कंस्ट्रक्शन (भवन-निर्माण) करके, तो वो पानी बह तो सकता नहीं, तो भर गया— यही हुआ है। ठीक है।

अब वो जहाँ पानी रहा होगा, वहाँ पर पानी से सम्बन्धित एक इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तन्त्र) था, जीव-जन्तु भी रहे होंगे। अब मैं एक बहुत बड़ा वीगन एक्टिविस्ट (शाकाहारी कार्यकर्ता) हूँ, और मैंने उसी अपार्टमेंट में, उसी सोसाइटी में घर ले रखा है और मैं कह रहा हूँ कि मैं वीगन हूँ। और कोई मुझसे जाकर कहेगा भी नहीं कि तुमने ये जो घर ख़रीदा है, यही सबसे बड़ी हिंसा है। लेकिन मैं तो वीगन हूँ, मैं तो वीगन हूँ। और घर मैंने क्यों ख़रीदा है? क्योंकि मैंने शादी एक ऐसी लड़की से करी है जो कह रही है, ‘घर चाहिए, घर चाहिए, घर चाहिए, नन्नू चाहिए, जल्दी से बच्चा पैदा करना है।’

आप वीगन नहीं हो सकते अगर आपको सही प्रेम नहीं आता, अगर आपको सही जीवन जीना नहीं आता, अगर आपको जीवन को समग्रता में देखना नहीं आता।

वीगनिज़्म कोई विचारधारा नहीं है; वीगनिज़्म का सीधा-सीधा मतलब है ‘आत्मज्ञान, स्वयं को जानना’। वो है, तो अहिंसा अपनेआप आ जाएगी।

प्र१: समझ गयी इस उदाहरण से। तो ये इंसान जो है, जो लोग पशुओं को बख़्शते हैं, पर कहीं और से तो अपनी उस बेचैनी की निवृत्ति तो कर रहा है न, किसी और के ज़रिए। मे बी (हो सकता है) अपनी वाइफ़ (पत्नी) के ज़रिए, अपने काम के ज़रिए, पैसों के ज़रिए, घर के ज़रिए, मटेरियलिज़्म (भौतिकतावाद) से।

प्र२: तो हम अहिंसा को समझे ही नहीं। जो सारे धर्म अहिंसा के बारे में बात कर रहे हैं लेकिन हम सिर्फ़ उसको मीट (माँस) नहीं खाना, अण्डा नहीं खाना, उससे ही सिर्फ़ रिलेट (सम्बन्धित) कर रहे हैं, लेकिन पूरी अहिंसा को नहीं समझ रहे हैं।

आचार्य: भाई! बाज़ार का जो स्वरूप है वो कन्ज़म्प्सन (उपभोग) पर ही आधारित है और वह चाहता है कि आप और, और, और कंज्यूम (भोग) करें, ठीक है। जो एक वहाँ पर दुकान है, एक शॉपिंग मॉल में, जिसमें वो मुर्गा बेच रहे हैं, ठीक है! फ्राइड (तला-भूना हुआ) मुर्गा बेच रहे हैं, फ्राइड चिकन। उसके बगल में बाक़ी सब जो दुकाने हैं, सब दुकानें एक हैं, वो सब दुकानें एक हैं। आप ये नहीं कह सकते कि आप उसमें से एक दुकान के ग्राहक हो, लेकिन आप मुर्गे की दुकान के ग्राहक नहीं हो, तो आप वीगन हो गए। भूलना नहीं होगा कि वो पूरा एक इकोसिस्टम है अपनेआप में, एक इंटीग्रेटेड इकोसिस्टम (एकीकृत पारिस्थितिकी तन्त्र) है। आप उस बात को समझ ही नहीं रहे हो।

आप सोचते हो, मैंने एक चीज़ को छोड़ रखा है तो मैं वीगन हो गया, वैसे नहीं बात बनेगी। आप कह रही हैं, ‘सारे धर्म अहिंसा की बात करते हैं।’ अब कितने ही ऐसे त्यौहार होते हैं धर्मों के जो आधारित ही हैं जानवरों का क़त्ल करने पर। हम कहते हैं कि सारे, सब अच्छी ही बात हो रही है, सब अच्छी ही बात हो रही है। मैं वीगन हूँ, लेकिन मैं लोगों को सब त्यौहारों की बधाइयाँ दे रहा हूँ। और वहाँ मैं बात करने से कतरा रहा हूँ कि असलियत चल क्या रहा है, तो मैं वीगन कहाँ से हो गया।

प्र२: मैं वही बोलना चाहती थी कि यह जो एबिलिटी (योग्यता) है टू थिंक, टू सी (सोच पाने, देख पाने की) कि जैसा है वैसा है। उसको जैसा है वैसा देखो।

आचार्य: एंड द करेज टू एक्सेप्ट व्हाट यू हैव कम टू इन योर थॉट (और जो आपके विचार में आया है उसे स्वीकार करने का साहस) क्योंकि विचार आप करोगे—अच्छी बात होती है सोचना—सोचोगे तो आपको कुछ दिखेगा। जो दिखता है वो स्वीकार करने की हमारी हिम्मत ही नहीं पड़ती। तो हम कहते हैं, ‘बहुत सोच लिया। चलो भाई लगाओ, टीवी लगाओ।’

प्र१: भागते हैं हम ख़ुद से वापस।

प्र२: और आइ थिंक (मुझे लगता है) जब सोचना ऐसा चालू करेंगे, तब अपनेआप से, अपने जो एम्बिशन्स (महत्वाकांक्षाएँ) हैं, वो कम होते जाएँगे।

आचार्य: एम्बिशन कम भी करने की बहुत ज़रूरत नहीं है। आज के समय में तो हमें बहुत-बहुत एम्बिशियस (महत्वाकांक्षी) लोग चाहिए। हमें सही एम्बिशन की ज़रूरत है। हमें चाहिए ‘सही एम्बिशन’।

प्र२: नॉट मैटेरियलिस्टिक (भौतिकतावादी नहीं)।

आचार्य: मैटेरियलिस्टिक डोमेन (भौतिकतावादी कार्यक्षेत्र) में भी ‘सही एम्बिशन’। देखिए, बड़ी दिक्क़त हो जाती है जब अध्यात्म शुरू में ही बात करने लग जाता है कि एम्बिशन त्याग दो, मटेरियल (भौतिक) मत रहो। इंसान को ऐसा लगता है, उसे रूह वगैरह बनाया जा रहा है, उड़ जाएगा अभी। तो एकदम डर जाते हैं हम। नहीं, ऐसा नहीं है।

अध्यात्म का मतलब है, इसी दुनिया में सही काम करके जीना है।

और सही काम तो मटेरियल ही होता है न। जो इममटेरियल (अभौतिक) है, जो बियॉन्ड मटेरियल (भौतिक से परे) है, वो तो भीतर है। दुनिया में तो आप जो भी कुछ करोगे, वो मटेरियल डोमेन (भौतिक क्षेत्र) में ही होगा। तो इस मटेरियल डोमेन में, इस भौतिक क्षेत्र में ही जो सुन्दर-से-सुन्दर और ऊँचे-से-ऊँचा काम है, वो करना है। वो कर जा सकता है।

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