प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं गर्ल्स हॉस्टल (लड़कियों का छात्रावास) में रहती हूँ, इंदौर में। तो वहाँ पर बहुत बड़ा हॉस्टल है। सौ-डेढ़ सौ लड़कियाँ रहती हैं तो उसमें से फ़िफ़्टी पर्सेन्ट या सिक्स्टी पर्सेन्ट (पचास या साठ प्रतिशत) कह सकते हैं, एयर होस्टेस (विमान परिचारिका) बनना चाहती हैं। मैंने पूछा कि एयर होस्टेस क्यों बनना है, मतलब कैसे डिसाइड (निर्णय) किया? तो उनका आन्सर (जवाब) होता है, ‘इंस्टाग्राम पर देखा था।‘
अधिकतरों का यही है कि इंस्टा पर देखकर आये हैं और, मतलब बहुत फ़्री टाइम (खाली समय) होता है उनके पास। दिनभर करने को कुछ भी नहीं। कॉलेज के दो-तीन घंटे होते हैं, उसमें भी उनका मन नहीं होता और कॉलेज में बेसिक इंग्लिश (शुरुआती अंग्रेजी) सिखा रहे हैं, मतलब बच्चों वाली। नोज़ (नाक), फ़िंगर्स (उँगलियाँ), एलबोज़ (कोहनी); मतलब इस लेवल (स्तर) की इंग्लिश सिखा रहे हैं उन्हें और उन्हें गारंटी (पक्का) है कि उनका सिलेक्शन (चयन) हो जाएगा। स्टडीज़ (पढ़ाई) वगैरह सब छोड़ दी है। मतलब स्पोर्ट्स (खेल) वगैरह में भी कुछ नहीं, ढंग से मैप (नक्शा) भी यूज़ (इस्तेमाल) करना नहीं आता।
और बस यही सोचते हैं कि एक बार बस सिलेक्शन हो जाए; सब हो जाएगा। पैरेंट्स (अभिभावक) को तो इतनी चिंता रहती है कि दिन में तीन-तीन, चार-चार बार बस कॉल ही करते रहते हैं कि बेटा कैसी है करके। कभी बाहर घूमने नहीं जाते, हॉस्टल के आसपास का एरिया (इलाका) तक ठीक से देखा हुआ नहीं है।




