उत्तर भारत, विशेषकर बिहार वो जगह है जहाँ न पैसा है, न शिक्षा है, पर कामना में कोई कमी नहीं है। हमने ये धारणा बना ली है कि जो कुछ भी पाना है, वो या तो शरीर से, या मानसिक कल्पना, अंधविश्वास और मन्नत माँगने से मिल जाएगा। आप गरीब और अशिक्षित हो — घर आते हो, बच्चों को मारते-पीटते हो और पत्नी का बलात्कार करते हो, वही चीज़ फिर फिल्मों में आ जाती है। शिक्षा और वास्तविक धर्म की ज़रूरत है। जिस दिन सचमुच ही साक्षर होने लग गए हमारे यूपी, बिहार, उस दिन भारत का और पूरी दुनिया का नक्शा बदल जाएगा।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं बिहार से हूँ, मेरा सवाल भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री से संबंधित है। बीते कई सालों से मैंने यह देखा है कि कोई भी कंटेंट ड्रिवेन सिनेमा ये इंडस्ट्री ने नहीं दिया है। ज़्यादातर सिनेमा और संगीत में फूहड़ता होती है, वही अगर मैं बाकी रीजनल सिनेमा को देखूँ जैसे कि हिंदी हो गई, दक्षिण के सारे राज्य हो गए — मराठी, पंजाबी, हरियाणवी, इन सब में कुछ लोग ऐसे ज़रूर होते हैं जो कंटेंट ड्रिवेन सिनेमा बनाते हैं। जैसे कि मराठी में आनंदी गोपाल करके मूवी है मैंने देखी थी कुछ सालों पहले। और ऐसा नहीं है कि इन इंडस्ट्रीज में फूहड़ सिनेमा नहीं बनता है, वहाँ पर भी है, लेकिन वहाँ पर अच्छी मूवीज बनाने वाले लोग भी हैं।
ऐसा क्यों होता है कि इतने गौरवशाली इतिहास वाले राज्य के पास पटकथा के तौर पर बस फूहड़ता है या कोई घिसीपिटी कहानी है?
आचार्य प्रशांत: देखो सारी चीज़ तो इंसान के मन पर निर्भर करती है। एक बार आप किसी को भरोसा दिला दो कि जोड़-तोड़ से, जुगाड़ से नैय्या पार हो सकती है, कि आस्था कामना, मान्यता, रूढ़ि, अंधविश्वास ये सब चीज़ें जीवन में सुख ला सकती हैं, तो उसके बाद वो किसी आगे की चीज़ को चाहता ही नहीं, क्यों चाहे? कल वो किसी से बात हो रही थी, किसी की बात पढ़ी मैंने तो उन्होंने फिल्म है, ‘द स्टॉकर’ तो वो मुझे रिकमेंड करी, सबको करी, कम्युनिटी पर आया था। अब वो जो फिल्म है, वो किसी की आंतरिक पीड़ा का नतीजा है। मैं अभी तक देख नहीं पाया हूँ। हालांकि उसका यूट्यूब लिंक आ गया है, मैंने रख लिया है, तीन घंटे की है, उसको समय निकाल के देखूँगा।




