प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या सबसे जरूरी यही नहीं है कि हमें अपने पसंद के हिसाब से चलने की आजादी होनी चाहिए?
आचार्य प्रशांत: न, न, न, पसन्द की बात नहीं है यह कि तुम्हें कौन पसन्द है। अन्तर समझना। पसन्द तो अहंकार की होती है, अहंकार दो दिशाओं में बढ़ता है — और यह भेद बहुत साफ़-साफ़ समझो — एक दिशा होती है उसकी पसन्द की और एक दिशा होती है उसकी मुक्ति की और दोनों ही दिशाओं में बढ़ने को वो आतुर रहता है। एक दिशा होती है जिसमें वो कहता है कि मैं अपनी फ़्रीडम का इस्तेमाल कर रहा हूँ, मुझे जो चीज़े पसन्द है मैं उनकी ओर बढ़ रहा हूँ। और एक दिशा होती है बढ़ने की जहाँ वो कहता है कि मुझे फ़्रीडम चाहिए और ये दोनों बहुत अलग-अलग दिशाएँ हैं। एक होती है फ़्रीडम ऑफ़ ईगो (अहंकार की मुक्ति) और एक होती है फ़्रीडम फॉर ईगो (अहंकार के लिए मुक्ति) दोनों का अन्तर समझना।
तुम यहाँ बैठे हो, तुमको पिज़्ज़ा खाने का मन है, यह क्या है? फ़्रीडम ऑफ ईगो। फ़्रीडम कह रही है यह मेरी फ़्रीडम की बात है मुझे पिज़्ज़ा खाना है, मैं खाऊँगा। कौन है जो मुझे रोक सकता है? मेरी ज़बान, मेरा पैसा, मेरा पेट, मेरा पिज़्ज़ा, मैं खाऊँगा, यह मेरी फ़्रीडम की बात है और कोई मुझे रोकेगा तो मैं पुलिस बुला दूँगा। और कानून तुम्हारा समर्थन भी करेगा, भाई तुम्हारा हक़ है पिज़्ज़ा खाना, तुम पैसा दे रहे हो तो खाओ। लेकिन पिज़्ज़ा खाने से मुक्ति तो नहीं मिल जाएगी। यह हुई फ़्रीडम ऑफ ईगो। इसके लिए भी ईगो बहुत तत्पर रहती है कि मुझे अपनी फ़्रीडम की दिशा में बढ़ना है, अपनी पसन्द की दिशा में बढ़ना है।
अध्यात्म में पसन्द दो कौड़ी की चीज़ है। अध्यात्म पिज़्ज़ा चुनने का नाम नहीं है। अध्यात्म है फ़्रीडम फॉर ईगो, कि जब अहंकार कहता है कि मैं उसको पसन्द करना चाहता हूँ जो मुझे मिटा दे। पिज़्ज़ा खाते वक़्त अहंकार कह रहा है मैं उसको पसन्द कर रहा हूँ जो मुझे बढ़ा देगा, मुझे और मोटा करेगा, और अध्यात्म में अहंकार बढ़ता है स्वयं से मुक्ति की ओर; वो कहता है मुझे अपनेआप से ही आज़ादी चाहिए। मुझे अब वो नहीं चाहिए जो मुझे बढ़ा दे, मुझे वो चाहिए जो मुझे मिटा दे।




