प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अभी हम जो एक मूवी (फ़िल्म) देखकर के आ रहे हैं ‘चार्ली ट्रिपल सेवन’। उसमें एक व्यक्ति है, बन्दा है, करीबन शायद पैंतीस साल के अराउंड (आस-पास) होगा, तीस से पैंतीस साल के अराउंड। और उसका जो जनरल (सामान्य) पूरा बिहेवियर (व्यवहार), कैरेक्टर (चरित्र) दिखाया गया है वो बिलकुल ऐसा है, जैसे वो अकेले रहता है। ज़्यादा किसी से इतना कोई सोशलाइज (समाजीकरण) नहीं करता, न उसे किसी का इतना कोई मतलब रहता है।
लोग अगर उससे मदद माँगने भी आते हैं, तो वो उनकी मदद करने में कोई ख़ास ऐसा इंटरस्टेड (रुचि) नहीं रहता। अपना जैसा डेली (दैनिक) का जॉब (नौकरी) होता है वो उसका चल रहा है जहाँ पर जाता है; वो काम करता है, वापस आता है। और वहाँ पर भी जो लोग होते हैं, उनके प्रति उसका रुख कोई बहुत अपनेपन का या उस तरीक़े से नहीं होता है। एक जॉब है, उसको कर रहा है और वापस आ जाता है।
आचार्य प्रशांत: इमोशनलेस (भावनाहीन) दिखाया गया है।
प्र१: इमोशनलेस दिखाया गया है।
आचार्य: इमोशनलेस और रिलेशनशिपलेस (सम्बन्धविहीन)। न उसके पास इमोशन (भावना) है और न रिश्ते हैं। एकदम अकेले रहता है, किसी से कोई लेना-देना नहीं और कोई ज़्यादा बातचीत करे तो उसे पीट-पाट और देता है।







