असली प्रेम फ़िल्मों में नहीं, अध्यात्म में मिलता है

Acharya Prashant

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असली प्रेम फ़िल्मों में नहीं, अध्यात्म में मिलता है
दुनिया की सबसे ज़्यादा रोमांटिक पिक्चरें भारत में बनती हैं। आप घोर नाक़ाबिल हो, सारी नाक़ाबिलियत आपकी छुप जाती है जब कोई आकर बोलता है, "तुम मेरे सब कुछ हो।" मौत जैसी होती है आशिक़ी, हॉल में बैठकर आँसू बहाने से नहीं होती, मैदान में ख़ून बहाने से होती है। आशिक़ी बहुत प्यारी चीज़ होती है, पर आशिक़ी दमदार लोगों के लिए है। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा सवाल ये है कि हाल ही में मैंने एक फ़िल्म देखा बिकॉज़ ऑफ इट्स क्रेज “सैयारा,” कि लोग हॉल में बेहोश हो रहे हैं, रो रहे हैं। तो जब मैंने फ़िल्म देखा, तो वही था फ़िल्म में ओल्ड स्क्रिप्ट था। लड़का-लड़की मिलते हैं, सेक्स होता है और फिर एंडिंग में यही रहता है कि मैरेज, लाइक दे हैप्पीली लिव फ़ॉरएवर।

तो आज आचार्य जी, आपने सेशन में जो समझाया कि हम दूसरों की स्क्रिप्ट को अपना जीवन बना लेते हैं, तो सदियों से चले आए इस प्रोपेगैंडा से हम कैसे बचें?

आचार्य प्रशांत: मुझे तो दिखा दो पहले पिक्चर, शास्त्र तो है नहीं कि मैंने पढ़ रखा होगा पहले ही। मुझे नहीं पता, मैंने नहीं देखी भाई। अख़बार में ज़रूर आया था कि दो-चार ये 18 वर्षीय प्रजाति के मर-वर भी गए शायद हॉल में। एक था वो नंगा होकर स्क्रीन पर लोटने लग गया, इस तरह की कुछ ख़बर आई थी। बाक़ी पिक्चर तो नहीं देखी मैंने। क्या हो गया? क्या था उसमें ऐसा? आप देखे?

प्रश्नकर्ता: यस सर। सर मैंने मतलब रील्स में ही देखा है कि बहुत ज़्यादा क्रेज था इस फ़िल्म के ऊपर, और ख़ासकर जेन ज़ी को ही टारगेट किया गया है।

आचार्य प्रशांत: जेन ज़ी माने क्या? अभी 25 साल से नीचे का ना? तो ठीक है देखो जाकर, क्या है उसमें। इतना क्या बावले हो रहे हो, क्या देख लिया उसमें? क्या था? जुरासिक पार्क है क्या है, मतलब ऐसा क्या देख लिया जो अति मानवीय है या परा-प्राकृतिक कोई घटनाएँ थीं उसमें? भूत-भूतनी, क्या था ऐसा? क्यों? कुछ बताओ तो मुझे नहीं पता, उत्सुकता बढ़ा दी बस।

प्रश्नकर्ता: नहीं सर, मतलब वही कह रही हूँ वो पुराना ही जो स्क्रिप्ट है, वही था।

आचार्य प्रशांत: अरे, तो कुछ तो उसमें नया होगा ना? पुराना स्क्रिप्ट होता तो फिर फ्लॉप भी हो जाती, क्या नया था?

प्रश्नकर्ता: मुझे तो कुछ नया मतलब लगा नहीं, मुझे तो वही लगा पुराना वाला।

आचार्य प्रशांत: ये गुनगुना रहा था गंजा, “सैया रे, तू तो बदला नहीं है।"

प्रश्नकर्ता: मतलब सॉन्ग अच्छा है।

आचार्य प्रशांत: “सॉन्ग अच्छा है।” कैसे-कैसे तो निकलवाना पड़ता है। अगली पंक्ति क्या है इस दोहे की? श्लोक को आगे बढ़ाएँ, “सैया रे, तू तो बदला नहीं है…" आगे आधी साखी अभी बाक़ी। क्या? बोलो-बोलो।

प्रश्नकर्ता: मुझे याद नहीं।

आचार्य प्रशांत: “मुझे याद नहीं।” अरे! ऐसे कैसे। तुम में से कौन देख आया? कोई देख आया? कैसे तुम तीर्थ यात्रा से वंचित रह जाते हो, देवी-देवता उतरे हैं साक्षात दर्शन, लाभ नहीं लिया।

हाँ भाई, सुनील ऐसे लजा रहे हैं जैसे घर में होता है ना कोई बड़ा, उसके सामने लजाते हैं। “अरे रोमांटिक गाना कैसे बता दें।” तुम लजाते ही रह जाओगे, मैं निर्लज्ज हो के पूरा गा दूँगा, फिर क्या करोगे? तुम्हें क्या लग रहा है कि मुझे बस श्लोक की पहली पंक्ति पता होगी, दूसरी भी पता है ही। देखकर तुम आए हो तुम बताओ ना उसमें क्या ख़ास है? क्या ख़ास है? कुछ नहीं।

श्रोता: सैया रे तू तो बदला नहीं है, मौसम ज़रा सा रूठा हुआ है।

प्रश्नकर्ता: सर, वहाँ पर मुझे एक चीज़ मिला कि जो हीरो है, वो ऐसा कहता है कि मुझे बहुत फेम चाहिए, सक्सेस चाहिए। मतलब, मैं ये समझने की कोशिश कर रही थी कि वो कह रहे थे लड़की को, वो उसका सच्चा प्यार मानता था। तो वो जब उससे दूर जाता था, तो वो सब कुछ छोड़कर वो वापस लड़की के पास ही आता है। फेम वग़ैरह, कि सब कुछ है लेकिन कुछ नहीं है, कि भीतर एक खाली। मतलब सब कुछ है फेम है, पॉपुलैरिटी है, सक्सेस है लेकिन वो भीतर जैसे कुछ नहीं है।

आचार्य प्रशांत: क्या नहीं है?

प्रश्नकर्ता: फ़िल्म में यही दिखाया गया कि जो है…।

आचार्य प्रशांत: तुम बताओ, तुम्हें अच्छा सा लगा कि नहीं लगा, जब वो सब कुछ छोड़ कर के लड़की के पास वापस आया? “फेम छोड़ दूँगा, पैसा छोड़ दूँगा, सक्सेस है लेकिन कुछ और नहीं है।”

प्रश्नकर्ता: यस सर।

आचार्य प्रशांत: अच्छा लगा ना, हो गया यही तो है जिसके लिए सब कुछ छोड़ दिया जाए वो भगवान होता है और अहंकार क्या बोलता है? "अपुनईच भगवान है।" तो पर्दे पर देख लिया बिल्कुल भगवान और भगवती को लीला करते हुए। यही तो हम कहते हैं, जो उच्चतम है उसी के लिए बाक़ी सब छोड़ दिया जाता है। तो ऐसी कोई लड़की है, आप कहो, "मैं तेरे लिए सब कुछ छोड़ के आ गया हूँ।" तो वो लड़की क्या बन गई?

प्रश्नकर्ता: उच्चतम।

आचार्य प्रशांत: हो गया तो, वो यही तो कलप रही थी, अहंकार यही तो चाह रहा था कि कोई तो आकर बोल दे कि "अपुनईच भगवती है।" उसने आकर बोल दिया, "मैं सब कुछ छोड़ के तेरे लिए आ गया हूँ।" वो बन गई भगवान, एक झटके में बन गई। तप, जप, तंत्र, मंत्र कुछ नहीं, एक झटके में यूँ ही वो सिद्ध हो गई। यही है और कोई बात नहीं है।

हर प्रेम कहानी में दो कुपात्र, अयोग्य, अनडिज़र्विंग किरदार होते हैं जो एक-दूसरे को भगवान साबित करने पर तुले होते हैं, ये है कुल। दो लोग जो किसी गत के नहीं, किसी हैसियत के नहीं वही जो आज की पूरी बात थी, ये साबित करने में लगा हुआ, "ये भगवती है" और ये साबित करने में लगा हुआ, "ये भगवान है," और दोनों एक-दूसरे के साथ हो गए हैं तो पक्का भरोसा आ जाता है कि "अपुनईच तो हैं।" बस यही बात है।

ज़िंदगी में कोई श्रम नहीं करना, कोई ऊँचाइयाँ नहीं हासिल करनी, कोई चुनौतियाँ नहीं लेनी है। एक लड़की आ जाए वो भी सेक्सी सी हो तो बेहतर है, लड़का आ जाए वो भी। सोचो यही जो तुम्हारा होगा इसमें किरदार, वो मोटरसाइकिल जो ठेले से उतरे वो भी इतनी मोटी तोंद लेके। फिर? “अच्छा सा नहीं लगा कुछ आपके कहते।” रंगीन, रूमानी काँच में दरारें। नहीं बस यही है, ये न होती तो इसे भगवान कहलाने के लिए ना जाने कितना श्रम करना पड़ता। ज़िंदगी में कोई सार्थक चुनौती उठानी पड़ती, बहुत कुछ करना पड़ता इसे ऊँचाइयाँ हासिल करने के लिए। ये आ गई तो इसने ऐसे बोल दिया, "तुम मेरे भगवान हो।" बस हो गया, कितना सस्ता है। बदले में बस ये माँगती है कि "तुम मुझे भगवती बोल दो।" हो गया, यही है।

आप घोर नाक़ाबिल हो, सारी नाक़ाबिलियत आपकी छुप जाती है जब कोई आकर बोलता है, "तुम मेरे सब कुछ हो।" बस इसलिए अच्छा लगता है।

सैंयाँ, साईं, स्वामी — ये तो सत्य के लिए है। सत्य से आता है, उसको ही मात्र है जो स्वामी है। स्वामी से ही आता है साईं, वहीं से सैंयाँ। तुम यही किसी झुन्नूलाल को "सैंयाँ" बोल रहे हो। ऐसा ही है वो, उसको तुम कहाँ सर पर चढ़ा रहे हो? “नहीं, मैं सर पर ही नहीं चढ़ाती, जितने अंग हैं सब पर चढ़ाती हूँ,” यही प्रेम है, सी-सॉ, सी-सॉ। और क्या है?

90-80 का जो दशक था, उसमें बहुत सारी ये सब फ़िल्में बनती थीं। उनमें बहुत ज़्यादा वॉयलेंस होता था और हिंदी फ़िल्मों में हिंसा, वॉयलेंस 70 वग़ैरह की दशक में इतनी ज़्यादा नहीं होती थी। उस समय तक ऐसे हीरो होते थे वो कोई बहुत मसलमैन भी नहीं होते, धर्मेंद्र वग़ैरह को छोड़ दो। तो वो अपने साधारण हीरो होते थे, अब संजीव कुमार है वो कोई मसलमैन थोड़ी है। तो उसमें तो लड़ते भी थे तो ऐसे होता था पीछे से आवाज़ आती थी, "ढिशुम-ढिशुम-ढिशुम।"

तो 80 के दशक में पहली बार ये हुआ कि भयानक हिंसा वाली फ़िल्में बनने लगीं। मैं छोटा था, तो उनका कोई डायरेक्टर, प्रोड्यूसर रहा होगा, कुछ रहा होगा। तो उसको जाकर किसी पत्रकार ने घेर लिया, हिंदी अख़बार था उसमें पूरा वह साक्षात्कार छपा था। तो पत्रकार उससे पूछता है, "आप ये बार-बार हिंसा से भरी हुई फ़िल्में बनाते हैं, आप इतनी हिंसा क्यों दिखा रहे हैं?" और वो चलने लग गई थी उस समय यही फ़िल्में कि जीप में बम फोड़ दिया, जीप उड़ गई और ये सब, या एक आदमी ने 10 की गर्दन काट दी। इस तरह वो पहली बार हुआ था हिंदी सिनेमा में। तो बोलता है "तो क्या बनाऊँ? वही रोमांस वाली पिक्चरें बनाऊँ?" वो भी ऐसे ही अपना वो फूहड़-सा वो डायरेक्टर, साधारण सी फ़िल्में बनाने वाला बोलता है, "तो क्या करूँ? रोमांस की पिक्चरें बनाऊँ? यही रोमांटिक पिक्चरें तो देख-देख के लोग वापस जाते हैं और देश की आबादी बढ़ाते हैं।" तो कुल ये है कहानी और कुछ भी नहीं है वहाँ पर।

जो आँसू गिर रहे हैं ना उनको आप प्रजनन का द्रव्य मानो, वो और कुछ नहीं है। वो बस वही है शरीर मचल रहा है प्रजनन के लिए, उसको भावना नहीं मानना उसको वासना ही मानना, वो भावना वासना के अलावा कुछ नहीं है। और किसी से जाकर के संभोग कर लेने में भी कोई बुराई नहीं हो गई, पर वो इंसान किसी गत का तो हो।

उसमें क्या योग्यता है? अब तुम जाकर के उसके साथ कह रहे हो कि रहेंगे, बसेंगे, सहवास करेंगे, फिर परिवार खड़ा करेंगे, फिर बच्चे भी आ जाएँगे। तो तुमने कुछ जाँचा परखा? तुम्हें कुछ पता है वो कौन है? वो किसी गत, किसी हैसियत का आदमी है या औरत है? तुम क्या देख के अब अपनी ज़िंदगी उसके सुपुर्द करने चल दिए? बस ऐसे ही वायरल धुनें, हम्..हम्..हम्।

दुनिया की सबसे ज़्यादा रोमांटिक पिक्चरें भारत में बनती हैं। पश्चिम में रोमांस एक कैटेगरी होती है, आप बोलोगे एक जॉनर है, एक श्रेणी है। भारत में रोमांस डिफ़ॉल्ट होता है, 90–95% फ़िल्में रोमांस ही हैं। वहाँ किसी फ़िल्म में अगर गाना आ जाए तो अपवाद होता है, यहाँ एक पिक्चर में आठ गाने ना हों तो बात करो। और फिर समझ में नहीं आता कि यहाँ आदमी के पास और कोई काम क्यों नहीं है। यही काम है, 20–22 साल के होते नहीं कि प्रकृति काम सौंप देती है, अब यही करो।

20-22 तो ज़्यादा बोल दिया, जेन ज़ी वाले तो वहाँ पर 12-12 साल वाले लोट रहे हैं। हाँ, एक पॉपकॉर्न खाकर आत्महत्या करना चाहता था, एक बार और देख के आओ। एक बार और देखो, मेरी कमेंट्री सुनने के बाद देखो अब कैसी लगती है। “ये आचार्य तो पैदा ही हुआ है भोली-भाली जनता की खुशियों में आग लगाने के लिए।”

काली, सूनी, बंजर ज़िंदगियाँ मृतप्राय, उत्तेजित होने का कोई तो बहाना चाहिए ना। ऐसे ही कृत्रिम उत्तेजना है, प्राण नहीं बन सकती।

माया का सबसे हसीन धोखा होती है, जवानी।

और आप उसकी चालें कितनी काट दो ये नहीं काटी जाती, सचमुच ऐसा लगता है भगवान भगवती खड़े हो गए सामने। जब वो ज़ुल्फें उड़ाती और अदाएँ दिखाती, इठला के, बलखा के, मचल के सामने आती है अच्छे-अच्छों की गीता छूट जाती है। और जब भीतर हार्मोन बिल्कुल उबल रहे हों, सीटी मार रहे हों तो गधहवा भी कामदेव लगता है। खैनी खा रहा हो तो गाना गाते हो, “पान खाए सैंयाँ हमार।” हो क्या रहा था? गधा खैनी चबा रहा था, “मोहनी सूरतिया होठ लाल-लाल।”

हाँ ठीक है, दो हैं ये स्त्री-पुरुष, रहेंगे साथ संगत करेंगे पर क्या पशुओं की तरह? या कुछ होश रखोगे? संगत में, रिश्ते में कोई बुराई नहीं, सेक्स में भी कोई बुराई नहीं पर बेहोशी तो बुरी चीज़ है ना। बच्चे पैदा करना भी ठीक हो सकता है, पर बेहोशी कैसे ठीक हो सकती है?

तुम्हें कुछ पता है, तुमने किसको चुन लिया, यूँ ही किसी को पकड़ लिया परिवार खड़ा कर दिया, बस ऐसे ही। पीछे मुड़ कर देखो कहाँ से आए थे सारे फ़ैसले? “ऐसे ही मोहल्ले का पंडित रिश्ता लेके आया, ताऊ जी ने बोला, लड़का अच्छा है, अभी पटवारी है कल अफ़सर बनेगा। बाप ऐसे ही परेशान था एकदम जवान हो गई है, 18 साल की बूढ़ी होती जा रही है, जल्दी से इसको धकेलो बाहर घर से। पंडित बोला, 36 गुण मिल रहे हैं,” हो गया ब्याह।

ये क्या है? क्या कि हम दोनों ना कॉलेज के फ़ेस्ट में मिले थे, वो वॉलीबॉल टीम की ओर से आया था और मैं डांसिंग करने गई थी। डांस वाली हो गई, एक तो गाना भी है "ना तेरा कसूर ना मेरा कसूर, ना तूने सिग्नल देखा ना मैंने सिग्नल देखा एक्सीडेंट हो गया, रब्बा रब्बा।" दोनों खुश हैं, “एक्सीडेंट हो गया, रब्बा रब्बा।”

एक्सीडेंटल प्लैनेट, एक्सीडेंटल पॉप्युलेशन, एक्सीडेंटल एग्ज़िस्टेंस और जिसमें कोई तकलीफ़ नहीं होती अगर तकलीफ़ नहीं होती पर तकलीफ़ बहुत ज़्यादा है, सारी सफ़रिंग वहीं से आ रही है। "एक्सीडेंट हो गया, रब्बा रब्बा।" और मूरख इतने हैं कि बाद में भी लोग बता रहे हैं, "हमें तो जी कुछ पता ही नहीं था, वो तो जी ये डांस कर रही थी, तभी उनका वो ऊप्स मोमेंट हो गया। बस ऐसा लगा मुझे मेरा दिल ऐसे उछल के मेरे मुँह से बाहर आ गया है, मेंढक की नाईं कूद रहा है। मैंने तो जी मौका देख के वॉलीबॉल मार दी।" ये तुम्हारी आशिक़ी है।

आशिक़ी बहुत प्यारी चीज़ होती है, पर आशिक़ी दमदार लोगों के लिए है। ये स्कर्ट उड़ गई, वॉलीबॉल गिर गई, एक्सीडेंट हो गया, ऐसे आशिक़ी होती है कोई?

मौत जैसी होती है आशिक़ी, हॉल में बैठकर आँसू बहाने से नहीं होती, मैदान में ख़ून बहाने से होती है।

और मैं अभी पारमार्थिक प्रेम की बात नहीं कर रहा कि सत्य के प्रति हो, स्त्री-पुरुष में भी हो सकता है आपस में प्रेम, बिल्कुल हो सकता है, पर वो उसके लिए भी एक दमदार स्त्री, एक दमदार पुरुष चाहिए ना।

ये गीली मिट्टी के कच्चे पुतले, ये आशिक़ी करेंगे? और एक दूसरे को लुभाने की इनकी पात्रता कुल इतनी है कि, तू भी गीला, मैं भी गीला पर अगर इतने गीले हो तो बेटा कच्चे भी होओगे। जिसको ज़िंदगी में और किसी चीज़ की तमीज़ नहीं वो आशिक़ कैसे हो सकता है।

बोले, "मुझे कुछ नहीं आता, मैं कुछ नहीं जानता दुनिया में क्या चल रहा है, मुझसे कोई बात पूछ लो दुनिया की मुझे कुछ नहीं पता। मुझे ना बाहर का कुछ पता, ना अपने अंदर का कुछ पता, बट आइ ऐम इन लव।" क्या सूँघ कर आए हो?

किताबें दे दो पढ़ी नहीं जाती, दुनिया की और किताबें छोड़ दो जो मेरे अपने पाठ्यक्रम की, विषय की किताबें हैं वो भी मुझसे नहीं पढ़ी जाती। दुनिया में किसी भी क्षेत्र में मैं कोई प्रवीणता, कोई उपलब्धि, कोई महारत नहीं रखता, ना रखती लेकिन फिर भी "मुझे इश्क़ हो गया है।" इतनी सस्ती चीज़ है कि निकम्मों को भी इश्क़ हो जाए और निकम्मों को ही ज़्यादा इश्क़ होता है। ज़िंदगी में आज तक मुझे कोई ढंग का फ़ैसला लेना नहीं आया, बिना सहारे के अपने पैरों पर खड़ा होना नहीं आया। भूत-प्रेत से लेकर दुनिया की हर मूर्खता पर मेरा विश्वास है, अंधविश्वासियों में नंबर एक हूँ, कायरों में नंबर एक हूँ, अज्ञानियों में नंबर एक हूँ लेकिन मुझे इश्क़ हो गया है। तुझे इश्क़ हो ही नहीं सकता, तुझे कोई बहुत जलील चीज़ ही हो सकती है, जाकर चेक करा कोई बीमारी हुई होगी।

प्यार उपलब्धि है, प्यार पुरस्कार है, प्यार खड़ी चढ़ाई है। बिस्तर पर गिर पड़ने को प्यार नहीं कहते।

सब बेकार बातें हैं याद मत रखना टिकट कटाओ गाना-वाना लगाओ, क्या कर रहे हो बैठ के।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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