राज कपूर ने फ़िल्म बनाई — 'मेरा नाम जोकर', दिल से बनाई हुई फ़िल्म थी वो और दो दिन नहीं चली क्योंकि हमें दिल से नफ़रत है जबकि एक घटिया फ़िल्म 800-1000 करोड़ कर जाती है। हम जैसे हैं, वैसी हमारी फ़िल्में होती हैं। आज लोगों को न समझदारी चाहिए, न दिल से उठे हुए गीत चाहिए। बदलाव हम में आएगा, तो ही हमारी फ़िल्में बदलेंगी। कोई फ़िल्म अच्छी लगी है, तो ख़ुद उसके प्रचारक बनो। अगर सब तक नहीं पहुँचाओगे, तो अगली बार वैसी कोई फ़िल्म बनेगी भी नहीं।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर। मेरा सवाल था कि फ़िल्मों का हमारी लाइफ़ में क्या रोल रहता है? और जिस तरीक़े की इंडियन सिनेमाज़ फ़िल्म्स बनाती हैं, जो फ्रूटलेस फ़िल्म्स होती हैं कम्पैरिज़न टू जो हॉलीवुड फ़िल्म्स होती हैं, वो ज़्यादा लॉजिकल होती हैं और ज़्यादा रियलिज़्म पे बेस्ड होती हैं। तो क्या हमें अच्छे डायरेक्टर्स की या स्टोरीटेलर्स की ज़रूरत है? और क्या ये फ़िल्म मेकिंग एक अच्छा करियर ऑप्शन हो सकता है, अगर इसे कोई आर्ट के तरीक़े से देखता है?
आचार्य प्रशांत: तो ये हिंदुस्तान है और यहाँ फ़िल्में बनती हैं। यहाँ का ही डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, स्क्रिप्ट राइटर, फ़ाइनेंसर होता है। यहाँ का ही डिस्ट्रीब्यूटर होता है। यहाँ की ही ऑडियंस, माने दर्शक होते हैं। जो हो रहा है, सब हमारे ही दायरे में तो हो रहा है ना। कहाँ से लाएँ अच्छे लोग? अमेरिका से लाएँ? कहाँ से लाएँ? चीन से लाएँ? कहाँ से लाएँ? वो फ़िल्म वही बनाएँगे जो आप देखना चाहते हो।




