
प्रश्नकर्ता: जैसा आपने बताया कि कोई अन्तिम अवस्था नहीं होती है। हमें निरन्तर जीवनपर्यन्त अपनेआप को शुद्ध करते रहना होगा। तो हम जिन जीवनमुक्त महात्माओं के बारे में हमने जो पढ़ा है ‘निसर्गदत्त महाराज’,’रमण महर्षि’, ‘परमहंस योगानन्द’। वो जिस निरन्तर अवस्था में रहते हैं, वो जो बिलकुल फ्री फ्लो एटीटयूड…


प्रश्नकर्ता: मेरा जो प्रश्न है वो ये है कि मेरा मोटिवेशन लेवल (प्रेरणा स्तर) बहुत फ्लकचुएट (उतार-चढ़ाव) होता है, दिन में ही कई बार बहुत गहरे में भी चला जाता है। ऐसा लगता है कि मुझे किसी



इस संसार में कर्म करते हुए ही (मनुष्य को) सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। हे मानव! तेरे लिए इस प्रकार का ही विधान है, इससे भिन्न किसी और प्रकार का नहीं है। इस प्रकार कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करने से मनुष्य कर्म में लिप्त नहीं

प्रश्न: उपनिषद् भी कहते हैं *“*एकोहम् बहुष्यामि”






श्रीकृष्ण, श्रीराम और अन्य अवतारों को केवल उनके मानवीय जीवन से समझना भ्रम पैदा करता है। साकार रूप सीमित होता है, जबकि उसका उद्देश्य मनुष्य को निराकार सत्य की ओर ले जाना है। देह, परिवार या घटनाओं में कमियाँ खोजने के बजाय उनके संदेश का सार समझना आवश्यक है। विवेक, कृतज्ञता और सही दृष्टि ही आध्यात्मिक समझ का आधार हैं, जबकि हर बात में दोष ढूँढ़ना केवल अहंकार को पोषित करता है।



प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। एक छोटी सी कन्फ़्यूज़न थी कि अब तक मैं समझता था कि जिसको हम लोग जीवात्मा कह रहे थे वो आत्मा है। और जिसको हम आत्मा कह रहे थे वो परमात्मा है, जिसे हम सत्य कहते थे। ये मेरी अपनी समझ थी।
तो मुझे अभी तक…
आपको जब सुनता…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कबीर साहब ने बहुत बार वेदों और पुराणों की निंदा क्यों की है?
आचार्य प्रशांत: उनको वेद-पुराण की न निंदा करनी थी, न स्तुति करनी थी। जिस जगह जो बात ठीक लगी, उसको कहा 'ठीक;' जिस जगह जो बात ठीक नहीं लगी, उसको कहा 'नहीं ठीक।' उन्हें…
प्रश्नकर्ता: “पूर्ण से पूर्ण को निकाल लो, पूर्ण ही शेष रहता है,” इसका मर्म, मुझे तो अर्थ से नहीं समझ में आया, क्योंकि जो...
आचार्य प्रशांत: कहीं और की बात हो रही है, दुनिया की चीज़ों में ऐसा नहीं होता।
दुनिया की चीज़ों में कितनी भी बड़ी चीज़ से…
वक्ता:ये उसके मन में होती है जिसे बहुत दिख रहे हैं। इश्वर न बहुत है न एक है; जब…
“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।
धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।
मन को संसार, लोगों और वस्तुओं से नहीं, सत्य में स्थिर रखना ही वास्तविक एकांत है। अकेलापन शरीर का नहीं, मन का होता है। जब मन दुनिया से पाने की आशा छोड़ देता है, तभी वह मुक्त होता है। वस्तुओं और रिश्तों का आकर्षण भी अंततः भोग की इच्छा से ही पैदा होता है, जबकि सच्चा प्रेम केवल सत्य, मुक्ति या श्रीकृष्ण के प्रति हो सकता है। संसार से आशा दुःख देती है, इसलिए मन को केवल सत्य की ओर लगाना ही योग है।
काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए।
मुक्त कर्म वही है जिसमें आनंद किसी भविष्य के परिणाम में नहीं, बल्कि कर्म करने में ही होता है। बच्चा खेलते समय किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता; खेल ही उसका सुख है। इसके विपरीत, बंधन और लालच से किए गए कर्म हमेशा हिसाब, मुआवज़े और भविष्य की आशा से भरे होते हैं। निष्काम कर्म वही है जहाँ कर्म स्वयं ही अपना पुरस्कार बन जाता है, और जीवन गणना नहीं बल्कि सहज उल्लास में बदल जाता है।

आप आस्था खोज रहे हैं, पर क्या आस्था कभी ज़बरदस्ती पैदा होती है? आस्था फूल है, जो सही बीज, सही मिट्टी और सही संगति मिलने पर अपने आप खिलती है। शुरुआत श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होती है। सम्मान से नहीं, संदेह से होती है। परखिए, पूछिए, प्रयोग करिए। जहाँ वास्तविक लाभ होगा, वहाँ आस्था अपने आप जन्म लेगी, बनावटी नहीं।

आस्था और ज़िम्मेदारी अलग नहीं हैं; सच्ची आस्था खुद ज़िम्मेदारी बन जाती है। धर्म के नाम पर प्रकृति का नुकसान और अंधविश्वास, धर्म नहीं बल्कि अज्ञान है। वास्तविक धर्म समझ और सत्य पर आधारित है, न कि परंपराओं की अंधी नकल पर। अंधविश्वास पर प्रश्न उठाना धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे बचाने का काम है।

मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।

आचार्य प्रशांत कलिंग में युवाओं से संवाद करते हैं। वे कहते हैं कि दर्शन सत्य की खोज है, जो आत्म-अनुसंधान से शुरू होती है। परंपरा सदा से चली आ रही है, बस रूप बदल गया है। विकृत धर्म बाजार बन गया है। युवाओं को अपनी बीमारी पहचानी चाहिए। सोशल मीडिया एल्गोरिदम मन को नियंत्रित कर रहा है। सच्चा शिक्षक वह है जो आपकी झूठी धारणाओं को चुनौती दे।

अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।

ये घटना है जो आपको परेशान कर रही है। मैं चाहता हूँ कि आप सिद्धांत की ओर जाएँ, और ये आपको एक बहुत बेहतर और गहरे तरीके से सुरक्षित करेगा। एक बात ये है कि कोई आपको बताता है, “ओह, यूरेनियम की गेंदों के साथ मत खेलो, कुछ बुरा हो सकता है।” एक बात ये है कि आप सिद्धांत जानते हैं। आप ठीक-ठीक जानते हैं कि *क्रिटिकल मास,* गेंद का *रेडियस,* और ऐसी चीज़ें कैसे गणना की जाती हैं। आप क्या चाहेंगे? आप सिद्धांत के बारे में जानना चाहेंगे, है न?

तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफॉल्ट होता तो अच्छा है, बस वो पावर उसको करप्ट कर देता है। पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, कुछ लोगों पर। बात उन व्यक्तियों की नहीं है। हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है — अहंकार। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान।

समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।”

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कतई नहीं है। एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति यह होती है, “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा, उससे कोई लेना-देना नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।” सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो।

अब लोकधर्म में क्या हो गया है कि ईश्वरवादिता को ही आस्तिकता मान लिया गया है। पर ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है, आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है। सही बात तो ये है कि ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। ज़्यादातर लोग जो ईश्वरवादी हैं, वो आस्तिक नहीं हैं, वो घोर नास्तिक हैं। क्योंकि सत्य को समर्पित नहीं हैं वो। आस्तिक वो है, जो सत्य को समर्पित हो।

गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।

ये जो तुम आसमानों में ईश्वर बैठा देते हो, ये बस तुम्हारा एक बहुत बचकाना प्रयास है, सत्य को भी ऑब्जेक्टिफ़ाई करने का। किन्हीं आसमानों में तुमसे दूर कोई नहीं बैठा हुआ है। बाहर कोई नहीं ताक़त है जो तुम्हारी ज़िंदगी चला रही है। “तत्त्वमसि,” वो तुम हो, वो तुम्हारा ऑब्जेक्ट नहीं है। इसीलिए उस “तत्” को और “आत्म” को अभिन्न भी कहा गया। तुम्हारी सच्चाई और परम सत्य एक है।

मैं हूँ और यह दुनिया है, तो सबको यह सवाल उठेगा कि, “डज़ गॉड एग्ज़िस्ट?” अब इसमें तुमने सवाल लगाया है ‘गॉड’ पर। यह छोड़ो कि गॉड माने क्या, पहले बताओ ‘एग्ज़िस्टेन्स’ माने क्या? इसलिए फ़िलॉसफ़ी ज़रूरी है। उसके बिना ये सारी जो बहसें हैं, ये बस ऐसे ही हैं, बेकार की बात, दोनों तरफ़ से। आस्तिकता बिल्कुल अलग बात है, ईश्वरवादिता बिल्कुल अलग बात है। आस्तिक होने का अर्थ है, सत्य को समर्पण। मेरी निष्ठा सत्य के प्रति है। तुम अगर गॉड, गॉड करोगे भी, तो मैं कहूँगा, सत्य ही गॉड है।

एक जगह धोखा खाया। अच्छा, वहाँ गए क्यों थे? धोखा खाने तो नहीं गए थे। वहाँ पर कुछ आशा थी, कुछ कामना थी, कुछ अच्छा-अच्छा सा लगा होगा। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि सामने जलेबी आई या कचौड़ी आई; लार तो वही की वही थी न। ये सब लोकधर्म है कि आपका किसी ने बुरा करा है, तो उसका कार्मिक बैलेंस ख़राब हो जाएगा। बाहर जो कुछ हो रहा है, सब रैंडम है। आपके पास एक ही चीज़ है: चॉइस, जिसको आप कह सकते हो कि आपकी है। उसके अलावा मत सोचिए कि आसमानों पर कहानियाँ लिखी गई हैं; मिट्टी हैं हम, धूल हैं हम।

बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।

मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो। आप मान लीजिए, शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक… नहीं, नहीं, नहीं। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो। कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर।

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

डॉक्टर अंबेडकर मृत्यु की रात को भी क्या कर रहे थे? वह धर्म पर ही किताब लिख रहे थे, और उन्हें बड़ी हड़बड़ी थी कि इसको पूरा कर दें। तबीयत बहुत ख़राब थी, दिख रहा था कि जाने वाले हैं। उनकी मृत्यु के बाद वह किताब प्रकाशित हुई, ‘The Buddha and His Dhamma.’ वह कोई पॉलिटिकल या इकोनॉमिक्स की किताब नहीं लिख रहे थे। वह धर्म पर लिख रहे थे। जो भारतीय दर्शन रहा है, उसकी सारी खूबियाँ बौद्ध धर्म में ज़बरदस्त तरीके से मौजूद हैं। बौद्ध धर्म तो पूरा ही जिज्ञासा का धर्म है, रूढ़ियों के लिए वहाँ एकदम ही कोई जगह नहीं है।

धर्म तो सबसे ऊँची बात होनी चाहिए न? तो धर्म के नाम पर ऐसे काम क्यों कर रहे हो, जो एक छोटे बच्चे को भी दिख रहा है कि गलत है? और सबसे खौफ़नाक बात ये है, कि हमारे बच्चों को धीरे-धीरे झटका लगना बंद हो जाता है। वो इसी माहौल के हो जाते हैं, रच-बस जाते हैं। ज़िंदगी हिसाब करेगी, जवाब माँगेगी और तब लज्जित होने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

जो बाहर रहता है ना भगवान, जो आँखों से दिखाई देता है, जिसको तुम कहते हो, ‘यह जगह है, ये ऐसा-ऐसा;’ वो तो तुम्हारा भगवान है। तुम उस पर अपने सब पसंद–नापसंद आरोपित कर देते हो। उसकी सारी कहानियाँ तुम अपनी सुविधा के हिसाब से बना लेते हो। "हरि मरें तो हम मरें, और हमरी मरे बलाय। साँचे गुरु का बालका, मरे ना मारा जाय, कबीरा।।” यहाँ दिल में बैठा लिया है, यहाँ वाला जो भगवान होता है, वो राजा होता है। उसको तुम अपने हिसाब से नहीं चला सकते। तुम्हें उसके हिसाब से चलना होता है।

प्यार होना चाहिए न। बात सारी उस ज़िंदगी की है, जिसके दिल में प्यार धड़क रहा हो। मैं साधारण प्यार की बात कर रहा हूँ, अभी मान लीजिए आदमी–औरत वाले ही प्यार की। आपको प्रेम है किसी से, पंद्रह लोग आकर कह रहे हैं, “इसको हमारे हवाले कर दो।” छोड़ोगे क्या? मैं बताता हूँ, छोड़ देते हो, क्योंकि अपनी ज़िंदगी में तुम अपने दम पर, अपने पुरुषार्थ पर, एक लड़की को भी नहीं रख सकते, तो भगवान को कैसे रखोगे? जैसे अपना प्यार समाज के सुपुर्द कर देते हो न, वैसे ही फिर अपना भगवान भी समाज के सुपुर्द कर देते हो।

प्रश्न: ‘भगवान’ क्या हैं?
वक्ता: इसका जवाब देना बहुत आसान हो जाता अगर तुमको वाकई पता ही ना होता, अगर पहले ये शब्द कभी सुन ही न रखा होता। अगर कोई बिल्कुल साफ़ स्लेट के साथ ये सवाल पूछे, ‘भगवान का क्या मतलब है?’ तो इसका जवाब देना…

मेरे घर का मंदिर साफ़ रहेगा, बाकी मंदिर गंदे हैं तो रहें। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मैं जाकर अपने उद्धार के लिए गंगा में डुबकी मार रहा हूँ और गंगा को गंदा कर रहा हूँ? दुनिया में किसी देश में इतनी गंदी नदियाँ आपको नहीं मिलेंगी। वाराणसी शायद दुनिया का सबसे पुराना नगर है, भोले बाबा की नगरी है, और जाकर देखो गंदगी। ख़ुद साफ़-स्वच्छ होकर रहे आना धर्म नहीं होता। ‘तुझे साफ़ करने की ख़ातिर मुझे ख़ुद मैला होना स्वीकार है,’ यह धर्म होता है।

The spirit of question. दो लोगों का साथ बैठ के कोशिश करना कि हम समझें कि दुनिया क्या है? ज़िंदगी क्या है? हम कहाँ कैसे सोच रहे होते हैं? हमारी ड्रीम्स कहाँ से आती हैं? डेथ क्या है? लाइफ़ क्या है? लव क्या है? When you go into these questions and not just once, but continuously, you are continuously observing life — वो ट्रू रिलिजन है। उसमें जादू, ये कहानी, वो कहानी इन सब के लिए कोई जगह नहीं होती। नो मिरेकल, नो सुपरस्टिशन, बट डीप डीप ऑनेस्टी।

भारतीय चित्त बहुत हद तक ऐसा हो गया कि हमें कुछ नहीं चाहिए, कुछ नहीं करना। नींद आ रही? नहीं आ रही। खाओगे? नहीं खाएँगे। कपड़ा चाहिए? नहीं चाहिए। पैसा चाहिए? नहीं चाहिए। तू जी ही क्यों रहा है फिर, जब तुझे कुछ नहीं चाहिए तो? भीतर कामना भरी हुई है और बाहर से संस्कारी दिखना है। जो खुल के नहीं बता सकता कि उसकी कामना क्या है, उसके पास छुपी हुई बहुत बड़ी कामना है। सरल हो जाओ। प्रकृति ने पैदा किया है। प्रकृति को ही हम महा-माँ बोलते हैं। जैसे भी हो, वैसे हो, पैदा ही ऐसे हुए हो, शर्माने-लजाने की क्या बात है इसमें?

धर्म की आज के समय में जो आपको हानि दिख रही है, वह इसीलिए है क्योंकि हमारा धर्म आचरणवादी, परंपरावादी हो चुका है। कुछ भी ढकोसला या अंधविश्वास चल रहा हो, हम तत्काल उसका संबंध धर्म से जोड़ देते हैं। ऐसे काम, जो कोई आम आदमी अपनी ज़िंदगी में करे तो कहेंगे—'पागल है, मूर्ख है, यह सबके लिए ख़तरा है, इसे पागलखाने में डालो'—वही काम जब धर्म के नाम पर होते हैं, तो सम्माननीय हो जाते हैं।

प्रेम भी इच्छा ही है, वो बहुत ऊँचे स्तर की इच्छा है। प्रेम नहीं आया, इच्छा ही कम कर ली तो मुर्दा हो गए।

बहुत ज़रूरी है कि सनातन धर्म को रिक्लेम किया जाए। उसको वापस ऋषियों के पास पहुँचाया जाए। नहीं तो ये जो उल्टा-पुल्टा अर्थ चल गया है, आस्तिकता-नास्तिकता का। अभी तो चलिए, फिर भी मेरे जैसे कुछ हैं जो बता देंगे। काल की धार आगे बढ़ेगी, ये बताने वाला भी कोई नहीं रहेगा। आने वाली पीढ़ियों को यही लगेगा कि यही होती है आस्तिकता, कि जैसे पश्चिम में गॉड बिलीवर और गॉड फियरिंग होता है। इसी को आस्तिक बोलते हैं भारत में। वो यही मानने लग जाएँगे।

आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…

ये दुनिया किसी को भी प्यार दे सकती है। कृष्णों, बुद्धों को थोड़ी प्यार दे देगी। यही महाभारत है, यही दुख है, यही सर्वनाश है। सब प्यारे हैं, सिंहासन प्यारा है, दुशासन प्यारा है, यार प्यारा है, परिवार प्यारा है — सत्य प्यारा नहीं है। सोचो, क्या कर रहे हैं लोग? ये बाण अर्जुन पर चला रहे हैं, सारथी कौन बैठे हैं? श्रीकृष्ण। इन्हें ख़्याल तो आया होगा कि एक आध भूला-भटका बाण श्रीकृष्ण को भी लग सकता है, आया तो होगा न? और लगे भी होंगे बाण, पर अपने आग्रहों के लिए ये श्रीकृष्ण का खून बहाने से भी नहीं चूक रहे।

प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…

हर वो चीज़ जो हमारे भीतर के "जानवर" को अच्छी लगती है, वह तुरंत प्रसिद्ध हो जाती है। आप लोकप्रिय होना चाहते हो? कोई बहुत अच्छा या ऊँचा काम मत करना—कोई एकदम घटिया काम कर दो, तुरंत पॉपुलर हो जाओगे। कोई ऐसा काम करो जो एकदम ही गिरे हुए तल का हो। ऊँचा काम करोगे, तो लोगों को समझ में नहीं आएगा, दिखाई भी नहीं देगा और लोग डर भी जाएँगे—क्योंकि ऊँचाई खतरा होती है और ऊँचाई कुर्बानी मांगती है। कौन ऊँचा चढ़े? श्रम भी बहुत लगता है। तो बिल्कुल, कोई एकदम साधारण या साधारण से भी नीचे का कुछ करने लगो, लोग आकर्षित हो जाते हैं आपकी ओर।

सबके ऊपर ये एक बहुत बड़ा फ़ितूर होता है कि अगर बिकेंगे नहीं, तो जिएँगे कैसे? पैसा कहाँ से आएगा? जितना तुमको चाहिए, सचमुच उतना आ जाएगा। और अनाप-शनाप पैसा चाहने की कोई सीमा होती नहीं है। इसीलिए हर इंसान बिक जाता है इन दो चीज़ों पर — एक, कंचन (कंचन माने सोना, पैसा); और दूसरा, कामिनी (कामिनी माने वासना)। इन दो से बचे रहो, तो हो गई क्रांति — एक सही ज़िंदगी अपने आप जीने लगोगे।

मात्र एक धर्म है, जो सचमुच महिला का मित्र है, और वह है वेदांत धर्म। बाकी सब लोक-धार्मिक परंपराओं में महिलाओं के लिए बस अपमान और शोषण है। जैसे, विच-हंटिंग और सती प्रथा के नाम पर हज़ारों स्त्रियाँ जलाई गईं। लोकधर्म महिला की भावनाओं से खेलना जानता है; इसीलिए आज भी स्त्रियाँ ही ज़्यादा हैं जो बाबाओं की शरण में जाती हैं। यदि महिला को अपनी निजता को अभिव्यक्ति देनी है, तो उसे उपनिषदों की ओर आना ही होगा। वेदांत अकेला है, जहाँ आत्मा का कोई लिंग नहीं है।