
यमराज तो यमराज ठहरे। हमारे स्वार्थों और हमारी भावनाओं से क्या लेना देना? तो वह पहली बात यह स्पष्ट कर देते हैं कि श्रेय और प्रेय आपस में अलग-अलग हैं। या तो यह पकड़ लो या यह पकड़ लो। यह दो नावों पर तुम एक साथ सवारी नहीं कर पाओगे। अपनी चालाकियां अपनी जेब में रखो। दुनिया भी ना छूटे और दिलदार भी मिल जाए, ऐसा नहीं होगा। जो दिलदार दुनिया छोड़े बिना मिल जाए वो दुनिया की ही धूल होता है। वहां फिर दिल जैसा कुछ होता भी नहीं। यह किसी की फिजूल जिद नहीं है कि दो में से एक ही मिल सकता है। यह अस्तित्व का एक साधारण नियम है।


प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं आपकी काफ़ी सारी यूट्यूब लेक्चर्स देखे या सेशन (सत्र) देखे। तो जो आप चेतना की जो बात करते हो, अगर जो आपकी इच्छा या आपकी कोशिश है, मुझे पता नहीं कोशिश है कि नहीं। अगर एक कामना करते हैं या एक हाइपॉथेटिकल सिचुएशन (काल्पनिक स्थिति)…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कह रहे हैं कि व्यक्ति में ख़ुद के प्रति प्रेम होना चाहिए। आपके अनुसार हमें अपने आन्तरिक कष्ट से मुक्ति की कोशिश करनी चाहिए। एक तरीक़े से यह स्वार्थ तो गहन अहंकार हुआ।






आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कठोपनिषद, द्वितीय अध्याय की द्वितीय वल्ली, श्लोक संख्या पंद्रह पर देवेश (प्रश्नकर्ता) जिज्ञासा कर रहे हैं। कह रहे हैं कि, "इस श्लोक में ऐसा लग रहा है जैसे परम अवस्था, ब्राह्मी अवस्था एक गहरी नींद है जहाँ कुछ भी चेतना में नहीं है, और उससे

आचार्य प्रशांत: एक पिछले सत्र में, मैंने गुफ़ाओं और दर्पणों की बात करी थी। मैंने कहा था कि "सत्य के साधक का कर्तव्य होता है कि वो अपने जीवन को दर्पणों से भर ले, वो अपने-आपको अपने हक़ीक़त के इतने साक्ष्य दे कि उसके लिए न बदलना असंभव हो जाए।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, एक द्वैत है जो मुझमें लगातार बना रहता है, सदैव डरा रहता है, मुझे बचाए रखना चाहता है। मेरी जितनी भी संपदा है उसे भी बचाना चाहता है। घबराता है कि मेरी मृत्यु के पश्चात मेरे परिवार का क्या होगा। और दूसरा भी एक हिस्सा है

प्रश्नकर्ता: जब ध्यान राम के पास नहीं होता, तो उस समय नहीं पता चलता, बाद में होश आता है। कैसे हर पल पता रहे कि ध्यान कहाँ है?

प्रश्नकर्ता: मौत के सामने खड़े होने का क्या अर्थ है?


आचार्य प्रशांत: प्रश्नकर्ता पूछते हैं, "आचार्य जी, प्रणाम। कई बार ये प्रश्न मेरे मन में उठता है, आज के सूत्रों से फिर उठ बैठा।" सूत्र संख्या लिखी नहीं। आगे कहते हैं, "हमारी इन्द्रियाँ बहिर्मुखी हैं, ये तो तथ्य है, इनका मूल स्त्रोत परमात्मा है, ये भी ठीक, और इन्द्रियों के

यदिदं किं च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम्।

प्रश्न: उपनिषद् भी कहते हैं *“*एकोहम् बहुष्यामि”





“जो यज्ञ करने वालों के लिए सेतु के समान है, उस नाचिकेत अग्नि को, तथा जो भय शून्य है और संसार को पार करने की इच्छा वालों का परम आश्रय है, उस अक्षर ब्रह्म को जानने में हम समर्थ हों।” ~ (कठोपनिषद, प्रथम अध्याय, तृतीय वल्ली, श्लोक २)
प्रश्नकर्ता: आचार्य…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा रेगुलर वर्क (नियमित कार्य) ही नहीं ख़त्म हो पाता है। मैं अपना काम समय से पूरा नहीं कर पाती हूँ। आप कहते हैं कि गीता सत्र सुनो पर वो भी नहीं सुन पाती हूँ, नियमित काम ही चलता रहता है। मैं न स्पोर्ट्स जा पाती हूँ…
आचार्य प्रशांत: हाँ, तो वो गहन अहंकार चाहिए। गहन माने गहरा। गहरा अहंकार…
1. अहं ब्रह्मास्मि — "मैं ब्रह्म हूँ" (बृहदारण्यक उपनिषद्, प्रथम अध्याय, चतुर्थ ब्राह्मण, श्लोक क्रमांक १०)
2. तत्त्वमसि — "वह ब्रह्म तू है" (छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय ६, अष्टम खण्ड, श्लोक क्रमांक ७)
3. अयम् आत्मा ब्रह्म — "यह आत्मा ब्रह्म है" (माण्डूक्य उपनिषद्, अध्याय १, श्लोक २)
4. प्रज्ञानं ब्रह्म…
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥
‘उठो, जागो, वरिष्ठ पुरुषों को पाकर उनसे बोध प्राप्त करो। छुरी की तीक्ष्ण धार पर चलकर उसे पार करने के समान दुर्गम है यह पथ – ऐसा ऋषिगण कहते हैं।‘
~ कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, श्लोक १४…
आचार्य प्रशांत: मुक्ति तो हो ही जानी है। जो हाथ आपको मुक्त करने के लिए आ रहा है, वो आपकी इच्छा की प्रतीक्षा नहीं करेगा, आपकी सहमति का इंतज़ार करता नहीं बैठेगा, हो जाएगा। पर आप ज़रा सुविधा दें, आप ज़रा स्वीकृति दें तो काम जल्दी बन सकता है। आरम्भ…
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कठोपनिषद्, तृतीय वल्ली, श्लोक क्रमांक चौदह। "उपनिषद्कार कहते हैं कि सत्य छुरे की धार जैसा है, 'क्षुरस्य धारा'।" तो पूछ रही हैं कि, "जो ध्यानस्थ हो, उसके लिए तो सत्य सहज और सरल भी है। तो, क्यों उसको छुरे की धार जैसा कहा जा रहा…
प्रश्नकर्ता: नचिकेता को तो मौत के पास उनके पिता ने भेजा। क्या संभव है कि किसी माध्यम के बिना मौत तक पहुँचा जाए, मौत का सामना किया जाए?
आचार्य प्रशांत: कितनी भोली हैं आप। कह यूँ रही हैं जैसे मौत कोई दूर की कौड़ी हो। पूछ रही हैं, "क्या संभव…
प्रश्नकर्ता:
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूस्वाम।।
आत्मा प्रवचन सुनने से नहीं मिलेगी, ना ही तुम्हारी बुद्धि से, ना ही सुनी सुनाई बातों से। आत्मा उसी को मिलती है जिसे वह स्वयं चुनती है।
~ कठ उपनिषद् (1.2.23)
यह आत्मा…
(कठोपनिषद, अध्याय 2, वल्ली 3, श्लोक 2)
ये जो कुछ सारा जगत है प्राण—ब्रह्म में, उदित होकर उसी से, चेष्टा कर रहा है। वो ब्रह्म महान भय रूप और उठे हुए वज्र के समान है। जो इसे…
वक्ता:ये उसके मन में होती है जिसे बहुत दिख रहे हैं। इश्वर न बहुत है न एक है; जब…
“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।
स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।
लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।
भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।
डर वास्तविकता से नहीं, बल्कि अस्पष्टता और कल्पना से ताक़त पाता है। वह कभी स्पष्ट नहीं बताता कि किस बात का भय है, बल्कि धुंधले संकेतों से मन को विचलित करता रहता है। डर से भागने के बजाय उसे सामने बुलाकर उसके हर दावे से स्पष्टता माँगनी चाहिए। जैसे ही भय को सटीक होने के लिए मजबूर किया जाता है, उसकी शक्ति समाप्त होने लगती है, क्योंकि उसका पूरा अस्तित्व भ्रम और धुंध पर टिका होता है।

डर बोलने से नहीं, बल्कि दूसरों की राय और अपनी छवि खोने के भय से पैदा होता है। जब हम अपनी पहचान को लोगों की स्वीकृति पर टिका देते हैं, तब साधारण काम भी कठिन लगने लगता है। गलती करना गलत होना नहीं है; गलती सीखने का अवसर है, पहचान नहीं। आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और दूसरों की राय से मुक्त होकर ही व्यक्ति निडर होकर बोल सकता है और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।

मन को संसार, लोगों और वस्तुओं से नहीं, सत्य में स्थिर रखना ही वास्तविक एकांत है। अकेलापन शरीर का नहीं, मन का होता है। जब मन दुनिया से पाने की आशा छोड़ देता है, तभी वह मुक्त होता है। वस्तुओं और रिश्तों का आकर्षण भी अंततः भोग की इच्छा से ही पैदा होता है, जबकि सच्चा प्रेम केवल सत्य, मुक्ति या श्रीकृष्ण के प्रति हो सकता है। संसार से आशा दुःख देती है, इसलिए मन को केवल सत्य की ओर लगाना ही योग है।

जीवन सीमित है, इसलिए उसका केंद्र मृत्यु के बाद की कल्पनाएँ नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए जागरूकता और मुक्ति होनी चाहिए। रस्में, कर्मकांड और मृत्यु के बाद की कथाएँ अक्सर जीवन की वास्तविक ज़िम्मेदारियों से ध्यान हटाती हैं। जो प्रेम, सहायता और सम्मान देना है, वह जीवित लोगों को देना सार्थक है। मृत्यु की स्मृति समय का मूल्य सिखाती है, अधूरी कहानियों को छोड़ना सिखाती है, और वर्तमान जीवन को पूरी गंभीरता और ईमानदारी से जीने की प्रेरणा देती है।

मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।

दुनिया में मुझे बताना, कौन-सी चीज़ है जो कभी नष्ट नहीं हुई? सभ्यताएँ मिट गईं, संस्कृतियाँ बह गईं, धर्म ख़ाक हो गए; आदमी का बनाया कुछ भी नहीं बचता। जो चीज़ हमें पता है कि मरण-धर्मा है, वह मिट ही जाएगी; उससे पहले उसका उपयोग चेतना को बढ़ाने के लिए कर डालो। हर पल में ऐसे सतर्क रहो, जैसे यही बस एक पल हो। जिसने मृत्यु और मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया, जो मौत के होश में जीने लगा, उससे ज़्यादा मस्त कोई नहीं जीता। मौत को लगातार याद रखो, तब मौज आएगी!

बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।

मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो। आप मान लीजिए, शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक… नहीं, नहीं, नहीं। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो। कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर।

अगर बीमारी वह चीज़ होती है, जिसके बाद मौत आती है, तो ज़िंदगी ही बीमारी है। तो एक तरह से सभी बीमार हैं। और उस बीमारी का नाम ही क्या है? लाइफ़। सबको ही जाना है। प्रश्न मृत्यु का नहीं है, प्रश्न जीवन का है। बात यह है कि जब तक हम जी रहे हैं, तब तक कैसे जी रहे हैं? मरने से आधे घंटे पहले भी जीवन की बात करो। जब मर जाएँगे, उसके बाद हम मौत की बात करेंगे। अध्यात्म सही जीवन जीने की कला है; इतना सही जीना, इतना सही जीना, कि मौत भूल ही जाए। और कोई मौत याद दिलाए, तो मौत चुटकुले जैसी लगे।

अगर एक कमरा खाली है, उसमें मुझे घुसने से डर लग रहा है, तो इसका मतलब ये है कि कमरा अज्ञात नहीं छोड़ा मैंने। मैंने उसके ऊपर अपनी ज्ञात कल्पनाएँ डाल दीं, और अब मैं कह रहा हूँ कि इस कमरे के भीतर शेर है, या चोर है, या भूत है, या कुछ है। अगर आप भविष्य को अज्ञात का अज्ञात ही रहने दें, तो डर कहाँ से आएगा? ये होता है आत्म-अवलोकन, कि पीछे जाकर देखना कि ये जो एंड प्रॉडक्ट निकला है, फियर नाम का, ये किन-किन चीज़ों के कॉम्बिनेशन से आ रहा है। और आप जैसे ही ये देख लेते हो, आज़ाद हो जाते हो।

मृत्यु डरावनी होती ही इसीलिए है, क्योंकि वह एक अधूरी कहानी का अंत होती है। जब कोई अपना चला जाता है, तो हम रोते हैं कि अभी सोचा था इनके साथ यह बातें करेंगे, नहीं कर पाए। अभी सोचा था, इनको साथ ले वहाँ घूम आएँगे, नहीं घूम पाए। बहुत कुछ संभव था, जो हो नहीं पाया। मृत्यु का कष्ट है ही अधूरेपन में, तो मरने से पहले ही पूरे हो जाओ। मरो मरो हे जोगी मरो, मरो मरण है मीठा — मुक्त हो जाओ।

सोशल एंग्ज़ायटी इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास जो है, वो बस सोशल ही सोशल है — सोशल मीडिया, सोशल इन्फ्लुएंसर्स, सोशल लाइफ़। ये जितने लोग जो तुम्हारे रोल मॉडल बने हैं, ये सब तुम्हें जीने के गलत तरीकों से लगातार भरे हुए हैं; उनको बर्ख़ास्त करो। अपने सामान्य ज्ञान को गहरा करो। विज़डम लिटरेचर और साधारण आध्यात्मिक कहानियों से होते हुए उपनिषदों तक पहुँचो। वो डर का आख़िरी इलाज है।

आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…

हम सब जिनको चाहते हैं, या तो वह हमसे पहले चले जाते हैं या हम उनसे पहले चले जाते हैं। यह विदाई बताती है कि जैसे तुमने मुझे चाहा, लेकिन पाया कि मैं खो गया, वैसे ही तुम जो कुछ भी चाह रहे हो, वह सब खो जाना है, नष्ट हो जाना है। तो जाने वाला अपनी अन्तिम और उच्चतम इच्छा आपको बता रहा है कि कुछ ऐसा चाह लो, जो विदा न हो सकता हो, जिसको मौत भी तुमसे न छीन सके। तुम सही ज़िंदगी जियो, अपना जीवन पूर्ण करके दिखाओ — यही वास्तविक श्रद्धांजलि है।

जब जीवन को चुनौती दिए बिना स्वयं को स्वतंत्र मान लिया जाता है, तो वह अध्यात्म नहीं, पलायन होता है। सच्ची ज़िंदगी जीना माने टूटना — 'आग का दरिया है, डूबकर जाना है।' अध्यात्म बड़े योद्धाओं के लिए होता है। बड़ी लड़ाई उठाइए, तब गीता को दिल से महसूस कर पाएँगे। आप कितने स्वतंत्र हो पता तो तब चलेगा न जब आप बेड़ियों को चुनौती दोगे। जो चुनौती नहीं दे रहा है उसे पता क्या!

मात्र विशिष्ट संगीत है, जो बंधनों को काटता है। अधिकांशतः संगीत उत्तेजक ही होता है, क्योंकि वो तुम्हें नए तरीक़े के अनुभव दे जाता है। जबकि शास्त्रीय संगीत अलग आयाम का होता है, इसीलिए वो बाज़ारू नहीं होता। संगीत का सबसे सुंदर और प्रभावी मेल होता है — शास्त्रीय संगीत पर संतों के वचन। इनके अलावा, बाकी सबकुछ जो संगीत के नाम पर चल रहा है, वो तुम्हारे आंतरिक कोलाहल को ही बढ़ाएगा।

एक से मुक्त होओगे तो दूसरे के पास चले जाओगे। ये कोई मुक्ति नहीं है, एक से मुक्त होकर के दूसरे की ओर आकर्षित हो जाना कोई मुक्ति नहीं है। और जब भी एक से मुक्ति की बात करोगे, तो दूसरे की ओर आकर्षित होओगे ही होओगे, क्योंकि तुम्हारी मुक्ति किसी संदर्भ में है।

डर चेतना की सबसे बड़ी बीमारी है। यह आदमी को संकुचित कर देता है। डर मान्यता से उठता है। जहाँ मान्यता है, वहाँ डर होगा ही। इस बात पर डरे रहो कि कहीं ज़िंदगी से सच्चाई विदा न हो जाए — लेकिन लोग डरे हुए हैं कि कहीं ज़िंदगी से बंधन न छिन जाए। विषयों को ज़िंदगी से खदेड़ने की बात नहीं है; सच्चाई के आधार पर जीने की बात है। उसके बाद न कुछ बहुत प्यारा लगता है, न कुछ बहुत डरावना लगता है।

जिस किसी में सत्य के प्रति अर्जुन जैसी प्रगाढ़ निष्ठा होगी, उसे श्रीकृष्ण मिल ही जाएँगे। तुम्हारे भीतर वो प्रश्न उठें तो सही, जो अर्जुन में उठते थे। केन्द्रीय बात है मुक्ति और बोध की — वो अगर है, तो फिर कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। जिसे चाहिए, उसे मिल ही जाता है, चाह मूल है। हर मार्ग पर तुम्हें अपनी मुमुक्षा का, अपनी आतुरता का परिचय देना ही पड़ता है — उसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।

‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।

मैं ज़िन्दा हूँ और मैं अभी दुख में हूँ, ये दुख कैसे हटाया जाए — धर्म इसका विज्ञान है। मरने के बाद कोई जीवन होता है (आफ्टर लाइफ) — उससे धर्म का कोई रिश्ता नहीं है। इतना तो ज्ञानियों ने चेताया है कि “हीरा जनम अमोल है, कौड़ी बदले जाय।” तो जब तक जीवित हो, तब तक मुक्ति मिल सकती है — उसके बाद कुछ नहीं है।

तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी है, जो आग में ना जले, जिसे समय ना मिटा दे? जब तुम्हारे पास ऐसा कुछ नहीं है, तो बताओ मृत्यु के बाद क्या बचेगा? कभी तुमने किसी ऐसे का संसर्ग किया है जो समय, संसार के पार का हो? अगर किया होता, तो तुम जानते होते कि क्या है वो, जो कभी मरता नहीं। तुम्हारा कुछ नहीं बचने वाला, तुम राख ही हो जाने वाले हो। जो बचेगा वो कुछ और है, पर जो बचेगा उससे तुमने कोई संबंध बनाया नहीं।

डर दो तरह का होता है। हम सब तरीक़े के छोटे–छोटे डरों में लिप्त रहते हैं; और जो एक डर हमें लगना ही चाहिए, उसे हमने छुपा रखा है। हम पूरी दुनिया से डरते हैं, बस जीवन के व्यर्थ चले जाने से, अमुक्त रह जाने से नहीं डरते। असली डर अगर जीवन में आ गया, तो ये सब छोटे–छोटे, क्षुद्र डर विदा हो जाएँगे।

मैं तुमसे कह रहा हूँ कि डरो मत, नक़ली हटेगा तो असली चमकेगा। तुमको ऐसा लगता है जैसे कोई तुम्हारी करोड़ों की जमापूँजी है और मैं उसको तुमसे छीने ले रहा हूँ। तुम्हारे पास कुछ नहीं है, जिन रिश्तों को तुम पकड़ कर बैठे हो बेटा, वो रिश्ते धूल बराबर हैं क्योंकि वह प्रेम पर आधारित नहीं हैं। ईमानदारी से अपने दिल को टटोलोगे तो जान जाओगे। तो वह गन्दगी अगर मैं तुमसे छीन भी रहा हूँ तो उसे छिनने दो, प्रतिरोध मत करो। गन्दगी हटेगी तो साफ़-साफ़ कुछ और चमकेगा, मस्त रहोगे, प्रसन्न रहोगे।

टूटफूट ही वो जरिया है जो आपको बताएगा कि आपके पास कुछ ऐसा भी है जो टूट नहीं सकता। जब सब बिखरा पड़ा होगा उसके बीच ही अचानक आपको पता चलेगा, अरे एक ऐसी चीज है जो नहीं बिखरी बड़ा मजा आएगा। उसके बाद यही लगेगा कि इसको और बार-बार पटको और जितना बार-बार पटको और जितना यह नहीं टूटता उतना इसमें विश्वास और गहरा होता जाता है और आदमी और खुलकर खेलता है। यह सबके पास है। यह सबके पास है। हमें इसका पता इसीलिए नहीं है क्योंकि हमने इसको कभी आजमाया ही नहीं।

जितना अपनों की मृत्यु का दुख होता है, उतना ही अपनी मृत्यु का भय होता है। उनकी मृत्यु हमारी मृत्यु की याद दिलाती है। किसी की भी मृत्यु के दुख के मूल में अज्ञान बैठा है। जब अज्ञान नहीं रहता, तो रिश्ते में बिछुड़ने का डर नहीं रहता। रिश्ते में एक संपूर्णता रहती है। अभी ही पूरा है, तो आगे के लिए कुछ बचा नहीं है। जब रिश्ता ऐसा होता है, तो फिर उसमें विदाई भी सहज रहती है। किसी के साथ कामना का रिश्ता बनाओगे, तो दुख ही पाओगे।

आपको लगता है कि अब आपकी चीज आपसे छिन गई, वो छिनी नहीं है, वो कहीं और पहुँची है, बिखर गई है, हजार जगह पहुँच गई है, लेकिन वो जहाँ भी पहुँची है, वहाँ पर, तो आप भी मौजूद हो। तो आपसे भिन्न कहाँ हुआ वो आपसे अलग कहाँ हुआ आपसे बिछड़ा कहाँ, वो? जो आपको दिखाई देता है कि वो जहाँ भी जायेगा वो आपको ही पायेगा। तो फिर आपको दुख थोड़े ही होगा।