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मोटिवेशन नहीं स्पष्टता चाहिए || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: मेरा जो प्रश्न है वो ये है कि मेरा मोटिवेशन लेवल (प्रेरणा स्तर) बहुत फ्लकचुएट (उतार-चढ़ाव) होता है, दिन में ही कई बार बहुत गहरे में भी चला जाता है। ऐसा लगता है कि मुझे किसी साइकेट्रिस्ट (मनोचिकित्सक) या डॉक्टर (चिकित्सक) की हेल्प (मदद) लेनी चाहिए।

आपको जब सुनता हूँ तो मोटिवेशन लेवल अच्छा हो जाता है। एक-दो घंटे रहता है, फिर वही स्थिति बन जाती है।

कोई-न-कोई मैं विषय चुन लेता हूँ और डिमोटिवेट हो जाता हूँ। फिर मैं कुछ सुनता हूँ यूट्यूब पर या आपकी बुक्स पढ़ता हूँ तो मैं अपना मोटिवेशन लेवल वापिस सामान्य कर पाता हूँ।

लेकिन मैं चेतना का तल उतना नहीं बढ़ा पा रहा हूँ कि साहस हर समय बना रहे। तो ज़रा मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: आपने उसमें कितना समय और कितनी ऊर्जा लगा ली कि चेतना का तल उठ जाए? इतना सस्ता है काम, मैं जो बातें आपसे बोलता हूँ वो बातें बोलने के लिए मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी लगायी है। आपने कितने दिन, हफ़्ते या महीने या साल लगाये हैं?

प्र: आपको मैंने पिछले साल अक्टूबर से सुनना शुरू किया है और उससे पहले मैं ओशो को काफ़ी सुनता था।

आचार्य: आप समझ ही नहीं रहे मैं क्या कह रहा हूँ। हम नहीं जानते कि हम कितने पानी में हैं, इसलिए हमें नहीं पता होता कि हमें बाहर आने के लिए कितनी ज़्यादा मेहनत की ज़रूरत है। अभी बहुत समय लगेगा और बहुत श्रम। ये खेल इतना नहीं आसान है। और अगर आप मुझसे पहले कुछ और पढ़ते थे, सुनते थे, किन्हीं और चीज़ों में विश्वास करते थे, तो मेरा काम और कठिन हो जाता है। पहले तो वो पुरानी बातें रगड़ कर साफ़ करनी पड़ती हैं। दूना काम करना पड़ता है फिर।

तो ये ऐसा कुछ नहीं है कि एक तरह की ज़िन्दगी जी, फिर तीन-चार महीने गीता का कोर्स कर लिया, एकाध बार शिविर में आ गये, तो जल्दी से लाभ हो जाएगा। और लाभ न मिले तो कहें कि साहब बात बन नहीं रही है।

पुरानी कहानियाँ पढ़ते हैं, उसमें क्या रहता है कि ऋषि ने तपस्या की, ऐसे रहता है ढाई-ढाई दिन तपस्या की, पौने तीन हफ़्ते तपस्या की? क्या रहता है कहानियों में? कम-से-कम कितने साल रहते हैं? किसी का बारह साल, किसी का ऐसा रहता है कि पौने तीन सौ साल, एक सहस्र वर्षों तक तपस्या करते रहे, वो भी एक पाँव पर खड़े होकर। ये सब तो पढ़े होंगे बचपन में, घरों में चलती हैं ये सब। टीवी सीरियल में भी यही सब आता है।

एक गये थे तपस्या करने तो उनके शरीर में दीमक चढ़ गयी, बाँबी बना ली, ये सब सुना है? तब फिर कहते हैं कि नारायण प्रकट होते हैं और कुछ बात बनती है। वो कह रहे पिछले साल अक्टूबर से। लगे रहिए, धीरज धरिए, और कोई तरीक़ा नहीं है। समय अभी बहुत लगेगा क्योंकि काम कठिन है, बहुत पुराना मर्ज़ है, बहुत तकलीफ़देह है, इसलिए बहुत धीरे-धीरे जाता है। क्रॉनिक (दीर्घकालिक) बीमारी समय लेती है न, तो हम वो क्रोनिक बीमारी हैं।

प्र२: नमस्ते आचार्य जी, मैं ईशावास्य उपनिषद् पढ़ रहा था जिसमें नौवाँ, दसवाँ और ग्यारहवाँ वर्स (पद्य) था विद्या और अविद्या पर। तो उसमें लिखा था , ”अविद्या इज ऑब्जेक्टिव नॉलेज़ एंड विद्या इज अविद्या विद सेल्फ़ नॉलेज़।” (अविद्या वस्तुपरक ज्ञान है और विद्या आत्मज्ञान के साथ वस्तु का ज्ञान है।)

तो जितना मैं पढ़ा उससे ये समझ में आया कि विद्या और अविद्या दोनों को जानना ज़रूरी है। और अभी आप जब भगवद्गीता शुरू किये तब आपने कहा कि सही जिज्ञासा करें। तो सही जिज्ञासा हो रही है ये कैसे पता चले। कैसे पता चले कि ये विद्या की है या अविद्या की है? जिज्ञासा सही है, इसको कैसे समझ सकते हैं?

आचार्य: सही जिज्ञासा में 'मैं' शब्द हमेशा सम्मिलित रहता है। सही जिज्ञासा विद्या सम्बन्धित होती है, उसमें दुनियादारी की बात हो सकती है, लेकिन 'मैं' फिर भी मौजूद रहेगा। हो सकता है कि पूरा प्रश्न आपका सांसारिक ही हो, लेकिन फिर भी 'मैं' उसमें मौजूद रहेगा। आपको ये पता होगा कि आप ये बात क्यों जानना चाहते हैं।

रूस और यूक्रेन के बीच क्या हो रहा है, ये एक प्रश्न है। और इससे कहीं बेहतर प्रश्न है — रूस और यूक्रेन में क्या हो रहा है और उसका मुझसे क्या रिश्ता है और मेरी उसमें उत्सुकता क्यों है? ये उससे ऊँचा प्रश्न है। तो आपने जैसे कहा न, 'विद्या इज अविद्या प्लस सेल्फ़ नॉलेज़।’ तो रूस, यूक्रेन की बात तो पूछनी है, साथ-ही-साथ एक नज़र इस पर भी रखनी है कि मेरा उससे क्या नाता है। नाता तो है ही, तभी आपने वो सवाल पूछा। वो नाता खोल कर रखना है।

प्र२: जिज्ञासा से ही सम्बन्धित प्रश्न था कि उठती है वो जब भी आपने उस पर ध्यान दे दिया। जिज्ञासा से ही सम्बन्धित था कि रोज़ कुछ-न-कुछ क्रियोसिटी (उत्सुकता) रहती है जानने की, कुछ-न-कुछ जानने की।

आचार्य: अच्छी बात है कि क्रियोसिटी रहती है, उसमें साथ में ये भी पता होना चाहिए कि क्यों उस चीज़ के बारे में जानना चाहते हो। जिस चीज़ के बारे में जानना है, वो सांसारिक है तो ये अविद्या कहलाता है और 'मैं उस चीज़ के बारे में जानना चाहता हूँ’, ये विद्या के अन्तर्गत आता है। 'मैं जानना चाहता हूँ।’

प्र३: प्रणाम आचार्य जी, आज के सत्र से मैंने मैं कुछ नोट्स बना रहा था। तो बताइएगा कि ये सारी बातें ठीक हैं या नहीं। जैसे आपने लिखा हुआ था कि धृतराष्ट्र तो अन्धा व्यक्ति है लेकिन वो जन्म से अन्धा है। तो अभी आप जैसे बोले कि हम जन्म से ही ठीक नहीं होते हैं, तो क्या यही बात बताने के लिए बताया गया है कि वो जन्म से ही अन्धे हैं।

आचार्य: अब ये तो शायद ऐतिहासिक तथ्य है कि धृतराष्ट्र नाम का एक व्यक्ति हुआ है जो जन्मान्ध था। ये तो एक ऐतिहासिक तथ्य है शायद, लेकिन उस तथ्य का उपयोग तुम प्रतीकात्मक करना चाहते हो, तो ठीक है, कोई बुराई नहीं। कह सकते हो कि धृतराष्ट्र की अन्धता सिर्फ़ शारीरिक नहीं मानसिक भी है। ऐसे देखना चाहते हो तो देख सकते हो।

प्र३: हाँ, वही मैं कह रहा था। और दूसरा ये था कि जैसे आप पहले दिन समझा रहे थे कि 'मैं' अगर पर्याप्त नहीं है, तभी 'मम्' पिक्चर में आता है। तो वही बात दुशासन में मैंने देखी कि 'मैं' पर्याप्त नहीं था इसलिए वो कह रहा था, 'मेरे सेना में ये है, मेरे सेना में ये है’, वो मम् गिना रहा था।

और दुशासन जब ये कह भी रहा था तो पहले वो बहिर्गामी था। वो पहले पांडवों की सेना की ओर देखा फिर अपनी सेना की ओर देखा।

आचार्य: ठीक।

प्र४: और एक सवाल ये था कि दुशासन तो भयग्रस्त है, उसको कहीं-न-कहीं पता ही था कि मैं ग़लत हूँ। लेकिन वो ये बात कभी ओनेस्टली (ईमानदारी से) मानता नहीं है। लेकिन अर्जुन कह देता है कि मैं डरा हुआ हूँ, मैं भयभीत हूँ। वो ओनेस्टली मानता है, लेकिन दुशासन ओनेस्टली नहीं मानता है।

आचार्य: दुर्योधन (संशोधन करते हुए)।

प्र३ और आख़िरी सवाल ये था कि गीता में बहुत सारे कैरेक्टर्स (चरित्र) हैं। सभी में ऐसा है कि उसका नाम लिखा हुआ है, उसके बाद उवाच् लिखा है, जैसे 'अर्जुन उवाच्’, 'दुशासन उवाच्’, 'संजय उवाच्'। लेकिन कहीं पर 'श्रीकृष्ण उवाच्' नहीं लिखा हुआ है। हर जगह लिखा हुआ है, 'श्रीभगवान उवाच्’। तो क्या ये बात, ये बतलाने के लिए है कि श्रीकृष्ण निर्वैयक्तिक रूप से आत्मा हैं यहाँ पर। वो व्यक्ति मात्र नहीं हैं, आत्मा बोल रही है।

आचार्य: कुछ बताने के लिए नहीं है। एक माहौल में कोई भी कृति जन्म लेती है। ठीक है? गीता का जो पूरा माहौल है, उसमें श्रीकृष्ण पार के हैं। वो अन्य चरित्रों जैसे नहीं हैं। वो अन्य चरित्रों से पार के हैं, तो जिस तरीक़े से अन्य चरित्रों को सम्बोधित किया गया है या चित्रित किया गया है, वैसे उनको नहीं किया जाएगा। तो ये बस एक जैसे छोटा सा नमूना है, एक प्रमाण है कि गीताकार ने अपनी निष्ठा दर्शाने के लिए इस तरीक़े का एक अपवाद खड़ा करा है। ये उनको नाम से नहीं बोल रहे, 'श्रीभगवान' कह रहे हैं। और इसमें कुछ बात नहीं है।

प्र४: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, जैसे आपने अभी सही जिज्ञासा की बात करी, सही सवाल उठाने की बात करी। तो मेरा ये प्रश्न काफ़ी समय से था ही कि सही माँग क्या होती है। जैसे हम गुरुबाणी में भी पढ़ते हैं, “जो माँगे ठाकुर अपने ते सोई-सोई देवे।” जो माँगा वो मिला। तो, आचार्य जी, सही माँग कैसे होती है? अगर उस ब्रह्म से माँगना है तो सही माँग कैसे माँगते हैं? यही प्रश्न है।

आचार्य: बहुत स्पष्ट सी बात है। देखो, शारीरिक तौर पर देख लो। अब ये है मेरे सामने नारियल पानी (गिलास को दिखाते हुए), ठीक है? मेरा गला प्यासा है तो मैं माँग रहा हूँ कुछ पीने के लिए। माँग का निर्धारण माँगने वाले की स्थिति करती है न। मेरी स्थिति प्यासे की है, प्यासे ने तय कर दिया कि उसको क्या चाहिए। माने माँगने के लिए आत्मज्ञान ज़रूरी है।

अपनी हालत का संज्ञान लिये बिना अगर हम माँग करेंगे, तो पहली बात ये कि जो माँगेंगे उसमें हो सकता है फ़िज़ूल समय, ऊर्जा लगा दें। दूसरी बात, वो लगाकर भी अगर मिल गया तो काम आएगा नहीं। मुझे लगी हो प्यास और मैं माँगू तकिया, बात बनेगी नहीं। जो हमारी मूल प्यास है, वो हो सकता है किसी बहुत साधारण वस्तु की हो, सर्वसुलभ वस्तु की हो, सर्व उपस्थित वस्तु की हो, लेकिन हम माँगते हैं विशिष्ट चीज़ें।

जगत में जो कुछ होता है वो विशिष्ट होता है, स्पेसिफिक, पर्टिकुलर। और वो जो विशिष्ट चीज़ें होती हैं, उनको अर्जित करने में बहुत समय लग जाता है, ज़िन्दगी ही लग जाती है। और उनको अर्जित करने के बाद भी पता चलता है कि इनसे बात तो बन नहीं रही है। तो सही माँग से पहले माँगने वाले को आईने के सामने खड़ा होना पड़ेगा, 'मैं हूँ कौन, कहाँ पर अपूर्णता है मुझमें?’

अन्यथा आपकी जो माँगे होंगी वो बस समाज से अनुप्रेरित होंगी। दुनिया ये माँगती है, ये कमाना चाहती है, ऐसी इच्छा करती है, तो मैं भी करता हूँ। वो अन्धी चीज़ है, उससे कुछ लाभ नहीं होता। जिन्होंने भी ख़ुद को जानने का श्रम करा है, उन्होंने फिर एक ही चीज़ माँगी है। उसी के विषय में गुरुवाणी कहती है।

उसी के विषय में जितने भी योग्य ग्रन्थ हैं, सब कहते हैं। और इसीलिए तुम पाते हो कि शायद ही कोई ऐसा तुम्हें ग्रन्थ मिलेगा पूरे विश्व में, जो कह रहा हो कि राज्य माँगो, सल्तनत माँगो, बहुत सारा रुपया-पैसा माँगो। ऐसा कोई नहीं मिलता। शायद इसलिए कि जो हमारे भीतर बैठा है माँगने वाला, उसको ये सब चीज़ें चाहिए ही नहीं है या उसको ये सब चीज़ें अगर चाहिए भी हैं, तो बस माध्यम की तरह, साधन की तरह। ये चीज़ें अगर उसके हाथ में होनी भी चाहिए, तो इसलिए कि इनका उपयोग करके वो कुछ और पा सके या इनका उपयोग करके वो कुछ और हटा सके, काट सके, मिटा सके।

बहुत अच्छा प्रश्न है। सौ बार सोचे व्यक्ति माँगने से पहले, क्योंकि जो माँगा है वो मिल जाता है। गीता में इतनी बार कहते हैं श्रीकृष्ण, “जिसकी जो सकाम कामना होती है, मैं वो भी पूरी कर देता हूँ।” तो सकाम होने से पहले डरना, कामना सोच-समझकर करना, कहीं पूरी न हो जाए! तीन दिन से हम उन्हीं का दर्द सुन रहे हैं जिनकी कामनाएँ पूरी हो गयीं।

चौथे अध्याय का शायद ग्यारहवाँ श्लोक है, जिसमें वो कहते है, “जो मुझे जिस रूप में भजता है, मैं उसे उसी रूप में प्राप्त हो जाता हूँ।” आप कोई भी कामना करो, वो रूप श्रीकृष्ण का ही है। पर सही रूप में माँगो न उनको। उस रूप में माँगो जिस रूप में वो तुम्हारे काम आएँगे। अब पानी ही है, लेकिन नहाना है, तो बर्फ़ थोड़े ही माँगोगे, ये थोड़े ही कहोगे कि सब रूप तो उसी के हैं, क्या फ़र्क पड़ता है?

जाड़े में नहाने जा रहे हो, कोई बर्फ़ दे दे तुमको और कहे ये तो उसी का तो रूप है जो तुम्हें चाहिए। ठीक है, सबकुछ वही है, लेकिन तुम सीधे उनको ही माँग लो। उनके इधर-उधर के रूपों को क्यों माँगते हो, सीधे वो जो एक ओंकार है, उसको ही माँग लो न। 'एक' शब्द इसीलिए बड़ा महत्वपूर्ण है। 'एक' कह दिया न। और रूप कितने हैं उसके? अनन्त। नहीं कह रहे हैं कि तुम अनन्त जगह भटकते फिरो, कह रहे हैं 'एक’। अनन्त सब उसके नीचे-नीचे ही हैं। अनन्त भी उसी के हैं। पर उनमें जाकर के काहे को समय ख़राब करना?

बिलकुल सम्भव है कि किसी भी रूप को पकड़ लो और उसके माध्यम से तुम पहुँच जाओ उस एक तक। हो सकता है ऐसा। इतना लम्बा रास्ता लेकिन क्यों लेना? रमण महर्षि कहते थे बिलकुल सीधा रास्ता लो, द स्ट्रेट पाथ, सीधा रास्ता। क्योंकि ये तो निर्विवाद है कि सारे रास्ते जाने उसी तक हैं। पर तुम क्या दस हज़ार साल जीने के लिये आये हो? इतना समय है तुम्हारे पास बर्बाद करने के लिए? तो तुम बिलकुल सीधा रास्ता लो, सीधा रास्ता। टेढ़ी चाल चलने की सोचो भी मत। ख़ुद को देखो, साफ़ जानो तुम कौन हो, कहाँ खड़े हो और फिर जो बात सामने आये, उस पर डट कर अमल करो। कुछ दायें-बायें छितराना नहीं, कहीं भटकना-बहकना नहीं, जमाने को लेकर के बहुत सोच-विचार नहीं। बस।

प्र३: आचार्य जी, मैंने एक तरह से ये आज थोड़ा प्रीएटेम्पट (पुनः प्रयास) करा ही था। पर आचार्य जी, फिर हर जगह इतना घुमा-घुमाकर यही चीज़ क्यों लिखी हुई है कि फ़लाने ने ये चीज़ माँगी और फ़लाने ने ये चीज़ माँगी?

आचार्य: मजबूर हो जाते हैं। बताने वाले भी मजबूर हो जाते हैं। ये मजबूरी उनकी विवशता से नहीं आ रही है, ये मजबूरी उनकी करुणा से आ रही है। वो समझाना चाहते हैं, सुनने वाला राजी नहीं है। तो फिर एक बिन्दु आता है जहाँ उन्हें सुनने वाले के तरीक़े से सुनाना पड़ता है। तो आपको दोनों तरह के ग्रन्थ मिलेंगे। कई बार एक ही ग्रन्थ में आपको दोनों तरह के उल्लेख मिलेंगे। एक जहाँ बिलकुल सीधी बात बोल दी गयी है, एकदम सीधी। चार शब्दों में, चौदह शब्दों में बात ख़त्म। वो उनके लिए है जो तैयार हैं सीधी बात को समझने के लिए।

और दूसरे ग्रन्थों में या कई बार उसी ग्रन्थ के किसी दूसरे अध्याय या विभाग में आपको वही बात इतनी घुमा-फिराकर के मिलेगी कि सिर चकरा जाए। जैसे आप सोच रहे हैं, तो ऐसे बहुत लोग सोचेंगे कि इतनी लम्बी कहानी क्यों रची। क्योंकि जो सामने बैठा है, वो विचित्र नमूना है। जब तक उसको इतनी बड़ी कहानी न बताओ, वो कान ही नहीं खोलता। ठीक है?

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि अगर आप सीधी बात समझ सकते हैं, तो भी आप कहानी का आसरा लें। उस कहानी की कोई विशेष ज़रूरत नहीं है। बल्कि कहानियों के साथ ख़तरा जुड़ा रहता है। सीधी बात के बहुत विकृत अर्थ नहीं किये जा सकते, लेकिन कहानियाँ बहुत तोड़ी-मरोड़ी जा सकती हैं। उनमें हज़ार तरीक़े के मनमाफ़िक रंग और अर्थ भरे जा सकते हैं। और ऐसा हुआ भी खूब है, जैसे पौराणिक कहानियाँ।

लेकिन क्या करें? या तो वो स्थिति ले लें जो कुछ विद्वानों ने ली। जिसमें उन्होंने कह दिया कि अध्यात्म विद्या सबके लिए है ही नहीं। ठीक है? ऐसी बात भी बोली गयी है। तो उन्होंने बड़ी लम्बी-चौड़ी शर्तें रख दीं। उन्होंने कहा, ‘अगर आप इतने अधिकारी हैं, आप यदि इतनी शर्तों को पूरा कर पाते हैं, तो ही आप ग्रन्थ में प्रवेश करें।‘ और ऐसी लम्बी-चौड़ी शर्तें कि लाख में से एक आदमी ही योग्य निकले। तो एक तो रास्ता वो होता है। वो शंकराचार्यों का रास्ता है। और दूसरा रास्ता सन्तों का होता है, जहाँ वो अयोग्य व्यक्ति को भी योग्य बनाने की कोशिश में लग जाते हैं। ये एकदम दुष्कर काम है।

अगर आसान होता तो दूसरों ने भी कर दिया होता। उन्होंने भी बहुत मजबूर होकर के शर्तें लगायी थीं। जब उन्होंने कहा, उदाहरण के लिए, कि कुछ विवेक हो तो ही अगले पन्ने पर आना। मन को और इन्द्रियों को सम्भालने का माद्दा हो, शमन और दमन जानते हो, तो ही आगे बढ़ना। जब उन्होंने ये शर्तें लगायी थीं, तो मैं देख पा रहा हूँ कि उन्होंने भी डूबते हुए दिल के साथ लगायी होंगी क्योंकि उन्हें पता है कि इन शर्तों पर बहुत कम लोग खरे उतरेंगे। लेकिन उन्होंने देखे होंगे दुष्परिणाम कि जब अयोग्य आदमी के हाथ में ही श्लोक पड़ जाते हैं, तो फिर कैसा उनका घिनौना अर्थ होता है और उनका उपयोग करके कितने तरीक़े के अनाचार होते हैं। एक तरीक़े से उन्होंने ठीक ही किया कि शर्तें लगायीं।

लेकिन सन्तों का मन दूसरे तरह का होता है, वो सबकुछ जानते हुए भी स्वीकार करने को तैयार नहीं होते कि कुछ लोगों के लिए ब्रह्मविद्या है ही नहीं। वो कहते हैं कोई कैसा भी हो, हम कोशिश करेंगे, क्या पता बात बन जाए। और एक बटा एक लाख सम्भावना तो होती ही है कि पत्थर से भी पानी निकल आये। तो वो पत्थर से पानी निकालने की कोशिश में लगे रहते हैं।

शायद यही वजह है कि भारत ने सन्तों को ज़्यादा प्रेम दिया है ऋषियों की अपेक्षा। मैं आपसे कहूँ सन्तों के नाम बताइए, आप तत्काल बता देंगे। मैं आपसे ऋषियों के नाम पूछूँ, आपको दो-चार बताने में भी समस्या हो जाएगी। कारण सीधा है, चूँकि सन्तों ने बहुत प्रेम दिया है, इसीलिए फिर लोगों ने भी सन्तों को बराबर का प्रेम दिया है।

हम ऋषियों को सम्मान बहुत दे देते हैं, लेकिन प्रेम तो हम सन्तों को ही देते हैं और सन्तों का प्रेम ऐसा ही रहा है कि उनके सामने एक लकड़ी का ठूँठ भी आ जाता है तो वो कहते हैं, 'चलो हम इसको भी बन्दा बना देते हैं। तू आ बैठ, तुझसे भी हम जरा भगवद् चर्चा कर लेते हैं, हरि नाम कर लेते हैं।' कोई भी मिल जाए, कोई फ़र्क नहीं पड़ता, सब आ जाओ।

तो ऋषियों ने क्या किया? ऋषि चले गये दूर जंगल में घुस गये। वो बोले, ‘जो सुपात्र होगा, वो ख़ुद ही हमें खोजता हुआ आ जाएगा।‘ उनकी बात ठीक थी। जो सुपात्र होगा वो खोजता हुआ आ जाएगा। सन्तों ने क्या करा? वो आपके गलियों में, मुहल्लों में, शहरों में, घरों में घुसे। वो बोले, ‘नहीं फ़र्क पड़ता तुम कौन हो — अपराधी हो, शराबी हो, जुआरी हो, कबाबी हो, तुम कोई हो, तुम महामूर्ख हो — आओ, फिर भी बैठो, हम तुमसे बातें करेंगे और तुम्हारी भाषा में बात करेंगे।

अब ये भावना तो बड़ी सुन्दर और बड़ी उदात्त है, 'तुमसे बात करेंगे, तुम्हारी भावना में बात करेंगे।' लेकिन अब बात करें कैसे, वो जो सामने बैठा है वो अलग ही ग्रह से है। तो फिर कभी गीत लिखे जाते हैं, कभी मिथक रचे जाते हैं, कभी ऐसी बात, कभी वैसी बात। 'फिर भगवान जी उतरे, फिर बड़े भगवान जी से छोटे भगवान जी ने ये कहा, फिर ये हुआ, फिर वो हुआ।' क्योंकि उस आदमी को यही बात समझ में आती है। तो उसको फिर इस भाषा में बोल दिया जाता है। ये सन्तों का प्रेम है।

लेकिन अगर आप समझ सकते हो, तो जैसा रमण महर्षि ने कहा, ‘जो सबसे सीधा रास्ता है, वो लो, व्यर्थ घूमो-फिरो नहीं।’

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