
Science can examine material claims, but Advaita Vedanta deals with the subjective self, ego, suffering, bondage, and liberation—areas outside science’s objective framework. Vedanta need not be accepted because of one’s religion or tradition; its value lies in whether its insights can be personally verified and help free one from suffering. The ultimate responsibility is not toward any philosophy, but toward oneself: to live a truly free life.

When words arise from an honest observation of life, then those words are called "divine."


Acharya Prashant (AP): Two favorite tendencies of the ego are being called out, discounted, exposed as false. What are those two tendencies or inclinations?




इस संसार में कर्म करते हुए ही (मनुष्य को) सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। हे मानव! तेरे लिए इस प्रकार का ही विधान है, इससे भिन्न किसी और प्रकार का नहीं है। इस प्रकार कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करने से मनुष्य कर्म में लिप्त नहीं


First the board percentage, then the CGPA, the money, the house: we keep ticking things off and reaching for the next, as if we were items on a conveyor belt that started the day we were born. When we do not know what we want, we end up wanting everything. The same unexamined words, success, love, settling down, decide what we call a true calling. If the seeker is false, how can what we seek be true? What if we first looked honestly at our own ideas of life and success?
The mind of a sage is continuously sensing a reality beyond appearances, a reality beyond limits. There is a constant realization that all the diversities share commonalities and there is something beyond the diversities that contain all the diversities. This feeling is being given a poetic manifestation in this particular verse. What matters here is the sense that there is something definitely beyond; that which is perceivable, all that which can be experienced between the Earth and the sky is of little importance compared to that.
Unmoving, the One, than the mind is swifter.
The senses fell back as ahead It speeded.
Though standing, It passes all others running.
The air by Its presence supports the waters.
It moves and yet It does not move. It is far and also near.
It is found within all…
Different indeed, they say, is the result of vidya and different indeed, they say, is the result of avidya. Thus have we heard from the wise who had explained it to us. He who knows both vidya and avidya together, transcends mortality through avidya and reaches immortality through vidya.
~…
The first one is ‘sambhūti’ – and remember that while the ego is being addressed, the aim is the Immeasurable as we said – so the…
यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥
yasminsarvāṇi bhūtānyātmaivābhūdvijānataḥ | tatra ko mohaḥ kaḥ śoka ekatvamanupaśyataḥ || 7 ||
When to the man of realization all beings become the very Self, then what delusion and what sorrow can there be for that seer of oneness? (Or--…
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥
andhaṁ tamaḥ praviśanti ye'vidyāmupāsate tato bhūya iva te tamo ya u vidyāyāṁ ratāḥ
Those who worship avidyā enter blind darkness. Those who delight in vidyā enter darkness as it were, yet deeper.
~ Ishavasya Upanishad,…
प्रश्नकर्ता: जैसा आपने बताया कि कोई अन्तिम अवस्था नहीं होती है। हमें निरन्तर जीवनपर्यन्त अपनेआप को शुद्ध करते रहना होगा। तो हम जिन जीवनमुक्त महात्माओं के बारे में हमने जो पढ़ा है ‘निसर्गदत्त महाराज’,’रमण महर्षि’, ‘परमहंस योगानन्द’। वो जिस निरन्तर अवस्था में रहते हैं, वो जो बिलकुल फ्री फ्लो एटीटयूड…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। एक छोटी सी कन्फ़्यूज़न थी कि अब तक मैं समझता था कि जिसको हम लोग जीवात्मा कह रहे थे वो आत्मा है। और जिसको हम आत्मा कह रहे थे वो परमात्मा है, जिसे हम सत्य कहते थे। ये मेरी अपनी समझ थी।
तो मुझे अभी तक…
आपको जब सुनता…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कबीर साहब ने बहुत बार वेदों और पुराणों की निंदा क्यों की है?
आचार्य प्रशांत: उनको वेद-पुराण की न निंदा करनी थी, न स्तुति करनी थी। जिस जगह जो बात ठीक लगी, उसको कहा 'ठीक;' जिस जगह जो बात ठीक नहीं लगी, उसको कहा 'नहीं ठीक।' उन्हें…
प्रश्नकर्ता: “पूर्ण से पूर्ण को निकाल लो, पूर्ण ही शेष रहता है,” इसका मर्म, मुझे तो अर्थ से नहीं समझ में आया, क्योंकि जो...
आचार्य प्रशांत: कहीं और की बात हो रही है, दुनिया की चीज़ों में ऐसा नहीं होता।
दुनिया की चीज़ों में कितनी भी बड़ी चीज़ से…
तो क्या ये जो कल्पना होती है, वो इश्वर के मन में होती है कि, ‘’मैं एक हूँ, और बहुत हो जाऊं?’’
वक्ता:ये उसके मन में होती है जिसे बहुत दिख रहे हैं। इश्वर न बहुत है न एक है; जब…

We have all put down a book that could have helped us, or dozed off halfway through something that mattered. A man who could not keep food down was given medicine, and he threw that away too, since it went in by the same route. Most of us strike a similar deal: we move into a place that stinks and, within a week, call the smell normal. Show our fifteen-year-old self the life we lead now and they would scoff. What would change if we admitted we do not like our condition?

किसी के मुँह से सुनते ही कि उसे सच मिल गया है, हम उसके पीछे चल पड़ते हैं, जेब भी ढीली कर आते हैं। फिर हम जैसे दो-चार लोग मिलकर एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि हमें भी मिल गया। पर जो सबसे ऊँचा है, वह जेब में डालने की चीज़ नहीं। जो उसे छूने निकला है, वह अभी पूरा बचा हुआ है, और छूते ही उसे अपनी कहानी का पात्र, अपना औज़ार बना लेता है। जिसका सच से सचमुच नाता है, उसकी ज़बान तो नाम लेने में भी काँपती है। तो हम सच खोज रहे हैं, या अपने झूठ को देखने से बच रहे हैं?


First of all, we have to realize what our life is like. You know, I can’t change something without firstly understanding its processes and its actuality. I must know what this thing called my life is. We keep living without knowing a thing about life. And we’re blinded by names and identities.

प्रश्नकर्ता: आत्मा और अहंकार ये सारी इंटेलेक्चुअल लेवल (बौद्धिक स्तर) पर समझ में आती हैं। लेकिन अनुभव के स्तर पर कहीं-न-कहीं हम इनको एक तरीक़े से मान रहे हैं, जान नहीं पा रहे अन्दर से कि हम आत्मा हैं। ये परिवर्तन कैसे हो?
आचार्य प्रशांत: कुछ नहीं समझना होता, जीना…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कई सालों से अध्यात्म के साथ हूंँ, लेकिन फिर भी एक खालीपन महसूस होता रहता है, इससे बाहर कैसे निकलूंँ? कृपया मार्गदर्शन कीजिए।
आचार्य प्रशांत: मैं आपको इतना बताए देता हूंँ कि खेल बिलकुल आपके हाथ में है। बात यहांँ ग्रह-नक्षत्रों, चांँद-तारों की बिलकुल नहीं है कि…

प्रश्नकर्ता: अगले प्रश्नकर्ता आपके साथ गोवा शिविर में भी थे और वहीं से ही वे उद्धृत करते हैं। आपने कहा था, ‘आदमी वास्तव में जान जाए उनके ऊपर कौन है। तो आगे लिखते हैं कि आचार्य जी, इस बात को मैं कैसे समझूँ और जान पाऊँ कि ज़िन्दगी निजी भोग…

प्रश्नकर्ता: मन क्यों हमेशा सुरक्षा की तलाश में लगा रहता है? क्या हैं मन के सदा असुरक्षित अनुभव करने के कारण? मैं तो अध्यात्म में, आप में और शिविर इत्यादि में भी सुरक्षा की तलाश कर रहा हूँ कि संसार में सुरक्षा न मिली तो सत्य में मिल जाए। मैं…

प्रश्नकर्ता: सत श्री अकाल आचार्य जी। आज सुबह से टीवी (दूरदर्शन) पर देख रहा हूंँ कि हमारे सिख भाई अफ़गानिस्तान से जान बचाकर भागने पर मजबूर किये जा रहे हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब जी को सिर पर धारण करके बुरी हालत में उन्हें देखकर मुझे दुख भी है और गुस्सा…

प्रश्नकर्ता: मेरा शरीर यादों से भरा हुआ है। यहाँ तक कि मैं अपने बालों के रंग, अपनी आँखों के रंग को भी स्मृति ही कहूँगा। और ये स्मृतियाँ मुझे पुरानी पीढ़ियों से मिली हैं क़रीब-क़रीब विरासत के तौर पर।
तो हम इन मेमोरीज़ को, स्मृतियों को फॉरमैट कैसे कर सकते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, स्वधर्म क्या है? क्या स्वधर्म का पालन करते हुए आजीविका चलायी जा सकती है?
आचार्य प्रशांत: स्वधर्म का कोई सम्बन्ध आपके रोटी-पानी के जुगाड़ से नहीं है, कि ये ऑक्युपेशन (व्यवसाय) कि वो ऑक्युपेशन। आप जिसको वर्क (काम) बोलते हैं, वो और क्या होता है? आजीविका का…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरे मन में जो है सैक्स (यौन क्रिया) से सम्बन्धित बहुत विचार आते हैं तो उन्हें कैसे कम या नियन्त्रित कर सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ज़िन्दगी यूँ ही छोटी है, उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो, जो तुमको पता है…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न विज्ञान से सम्बन्धित है। तो काफ़ी समय से वैज्ञानिक समुदाय और प्रकृति में एक तरीक़े का एक तकरार चल रहा है और काफ़ी हद तक विज्ञान सफल भी हुआ है, कोविड वैक्सीन का उन्होंने निर्माण किया और शायद प्रकृति की जो योजना थी उसको…

Acharya Prashant: Hell is a place where you get a lot of sympathy, consolation, condolence, and commiseration. You're told that we agree that you are in a miserable state. Your neighbor comes to you, puts his hand on your shoulder, and with a grave face tells you that you are…

Acharya Prashant: Desire means that you are not alright with yourself and you want something else to happen, correct? So, we are anyway not living for ourselves. We are rather living to change ourselves. And are these not two very different things? If you are living for yourself as you…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हम संघर्ष करते हैं तो वह समय हमें बहुत कुछ सिखाता है, लेकिन फिर हम उसे कठिन समय क्यों कहते हैं? और जब समय अनुकूल चल रहा हो तो हम कुछ ऐसे काम कर देते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए था। मुझे यह समझ नहीं…

Acharya Prashant: The spiritual soldier, the religious warrior has to be extremely intelligent. You could go to the extent of saying that he has to be cunning in the service of Truth; I’m choosing this word with all deliberation.
He has to be cunning in the service of the Truth;…

आचार्य प्रशांत: अगर हमारे बीच वास्तव में कोई रिश्ता है तो मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा कि आप वैसे ही कोई ज़िन्दगी जी रहे हो जैसे कोई आम आदमी जीता है। मुझे अपनेआप पर और अपनी बात पर घिन आएगी। आप अगर कहते हो आप दो साल से मेरे साथ…

प्रश्नकर्ता: सबको प्रणाम। आज की इस धर्म चर्चा में आपका स्वागत है। आज हमारे बीच में एक ऐसी विभूति या कहें शख्सियत आचार्य प्रशांत जी हैं। आपके बारे में मैं थोड़ा सा बताना चाहूँगा। आप बहुत ही ज्ञानी और पढ़े-लिखे एक आचार्य हैं। इन्होंने आइआइटी से इंजीनियरिंग की, आइआइएम से…

Vedanta does not talk of a personal past life, the person that you are or I am, we have no past or future life. Rebirth or reincarnation happens at a general, at a macro level, not at a personal level. It’s the “I” tendency that exists and keeps repeating its existence. Read more...

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, आप हमेशा बोलते हैं कि ऊँचे उद्देश्य रखने चाहिए जिससे कि उसमें किसी भी तरीक़े का कोई डेविएशन नहीं होता है। अब ऊँचे उद्देश्य रखने की सामर्थ्य और साहस नहीं मिल पाता है क्योंकि अपनेआप को बहुत जगह मैं बेहोश पाता हूँ। कभी कुछ चीज़े साफ़…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न मेरे वैवाहिक जीवन से है। किसी भी अन्य रिश्ते में मुझे अभिव्यक्ति करना सरल लगता है पर अपनी बातें अपनी पत्नी तक पहुँचाना बहुत ही कठिन लगता है। यह रिश्ता इतना गहरा है फिर इतनी मुश्किल क्यों?
आचार्य प्रशांत: अब तुम्हें यहाँ पर एक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। आचार्य जी, पिछले एक साल से आपको सुन रहा हूँ और आपकी अनुकम्पा से ग्रन्थ भी पढ़ने शुरू किये हैं तो अभी प्रतिदिन कुछ नया सीखने को मिलता है, मन बिलकुल लगा रहता है और जैसा पहले चला करता था, उससे बिलकुल बदल गया है जीवन।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्कार। आपकी शिक्षाओं की वजह से मेरी निजी ज़िन्दगी में काफ़ी परिवर्तन आया है और एक चीज़ जो मैंने सीखी है वह है वर्तमान क्षण में जीना, जो आपने बहुत दिन पहले शुरुआती दिमाग वाली बात बतायी थी, वह निजी ज़िन्दगी में बहुत अच्छी तरह से काम…

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव। न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन।।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, छठा अध्याय, दूसरा श्लोक।
जिसको संन्यास कहते हैं उसको तू योग जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी व्यक्ति योगी नहीं होता।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। मैं संकल्पों के त्याग का तात्पर्य समझना चाहता…

आचार्य प्रशांत डिप्रेशन तब तक नहीं हो सकता जब तक अपनेआप को बहुत मजबूर अनुभव न करो। और मजबूर हम नहीं होते, मजबूर हमें हमारी अन्धी कामनाएँ बनाती हैं। अन्यथा कोई मजबूर नहीं है। कामनाओं में भी कोई दिक्क़त नहीं है, अगर वो अन्धी न हों। जो कामना आपको अन्धेरे…

भाषा हमें बहुत सारे देती है नाम। और ये जो सारे नाम हैं, ये हमें भरोसा दिला देते हैं कि अपूर्ण अहंकार, पूर्ण हो सकता है। ‘इस नाम से बात नहीं बनी तो उस नाम से बात बनेगी; तो उस नाम से बात बनेगी, तो उस नाम से बात बनेगी।…

n some sense, spirituality is all about unleashing yourself, which is freedom from bondage. The leash is the bondage. Read more....

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि हमारे सामने जब कोई परिस्थिति आती है तो हम उसके तथ्य को देखने के बजाय, उसे उसके अतीत से जोड़कर देखते हैं। इसका कारण क्या है? जैसे कि कभी हम कोई लड़ाई हार जाते हैं तो आगे की लड़ाइयों में संशय और…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। थोड़ा-सा पहली बार आया हूँ तो थोड़ा-सा बता दूँ कि कैसे आप तक पहुँचा। बहुत ज़ोर से भाग रहा था, मास्टर्स (स्नातकोत्तर) में एडमिशन (प्रवेश) लिया। कैरियर के लिये ही तमाम चीज़ें, आशाएँ और एम्बिशन्स (महत्वाकांक्षा) ढेर सारे। ज़ोर से भाग रहा था, आपकी वीडियो अचानक…

प्रश्नकर्ता: नमस्ते सर, मेरा नाम अंकिता रावत है। सर, जैसे कि मन हमेशा चीज़ों की ओर आकर्षित होता है तो आकर्षित का मतलब होता है कि हमें वहाँ खुशी मिलेगी, हम उसके पीछे भागते हैं और वो और अन्त में हमें दुख ही होता है, मतलब खुशी और दुख का…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं आपको पिछले दो सालों से सुन रहा हूँ। ये मेरा पहला सत्र है। तो पिछले काफ़ी टाइम से में तनाव में रहा। सत्र में आने से पहले काफ़ी चीज़ों, आपके सारे पुराने वीडियोज़ में देख रहा था। तो उसमें आपने ये कहा था कि अपनेआप…