मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है लेकिन स्वभाव में जीना है या नहीं जीना — ये तुम्हारा चुनाव है। आवश्यक नहीं है कि सब मुक्ति को चुनें। मुक्ति स्वभाव है इसीलिए सदा उपलब्ध है पर तुम उसको चुनोगे ही, ये कोई आवश्यक नहीं है। तुम कुछ और भी चुन सकते हो। ये इंसान पैदा होने की विडंबना है। जो इंसान पैदा हुआ है उसको दुर्भाग्यवश ये विकल्प मिला हुआ है कि स्वभाव में चाहे तो जिए और न चाहे तो न जिए।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अगर मुक्ति हमारा स्वभाव है तो जैसे हमें भूख और प्यास लगती है वैसे ही हमें मुक्ति की छटपटाहट क्यों नहीं लगती?
आचार्य प्रशांत: इसीलिए नहीं लगती क्योंकि मुक्ति को तो भूख और प्यास नहीं लगती न। तुम अपने आप को वो बना लेते हो जिसे भूख और प्यास लगती है। अगर तुम मुक्तिमात्र ही होते तो तुम क्या कहते कि मुझे भूख लगी है, प्यास लगी है?
फिर शरीर को भूख लगती, प्यास लगती, मन-बुद्धि उस भूख-प्यास की तृप्ति का इंतज़ाम करते रहते। एकसाथ तुम दोनों बातें नहीं कह सकते कि कहो कि मैं वो हूँ जो सदा-सर्वदा मुक्त है और साथ-ही-साथ उसी साँस में तुम ये भी कह दो कि मैं वो हूँ जिसे भूख-प्यास लगती है। अब गड़बड़ हो जाएगी।
सत्य को भूख-प्यास लगती है क्या? कि सत्य इधर-उधर घूम रहा है, ‘थोड़ा पानी दे दो भाई।’ हम वही बन जाते हैं जिसे भूख-प्यास लगती है। शरीर से हम वो हो जाते हैं जो शरीर के काम हैं और मन से हम वो हो जाते हैं जो मन के संस्कार हैं।




