
जब तक ये प्रश्न शेष है कि “कब तक उठते रहें?” तब तक उठते रहो। जब ये प्रश्न ही मौन हो जाए कि “कब तक उठते रहें?” तब उठना-गिरना, ये सब अप्रासंगिक हो जाएगा। जब तक उठने के लिए कोई बचा है, तब तक उठते रहो। यही पुनर्जन्म है। उठते रहो, उठते रहो।


आचार्य प्रशांत: सातवीं-आठवीं की बात होगी, तो हमारे साथ एक पढ़ा करता था, और उसका आठवीं में ही नाम पड़ गया था क्लास में — बुढ़ऊ। क्यों पड़ गया था? क्योंकि वो कक्षा के औसत विद्यार्थी से उम्र में लगभग दो साल बड़ा था। और इतना ही नहीं था, कुछ

प्रश्नकर्ता: और गहरा समझना चाहूँगा कि जब धर्म की बात होती है तो पुनर्जन्म की बात तो होती ही होती है। तो इनके बीच का क्या सम्बन्ध है?

ऐसा नहीं कि पुनर्जन्म झूठी बात है, लेकिन पुनर्जन्म को जैसे समझा है लोगों ने, वो बिल्कुल झूठी बात है, वो श्रुति-विरुद्ध है। पुनर्जन्म होता है, निश्चित रूप से, पर उसका नहीं जिसका आप सोचते हो। और किसी भी पुराण में या किसी भी और किताब में अगर कोई ऐसी बात लिखी है जो सीधे-सीधे भगवद्गीता, उपनिषदों और अष्टावक्र गीता के विरुद्ध जाती है, तो हम क्यों पूछें कि किसने लिख दी? जिसने भी लिख दी, उससे हमें कोई लेना-देना नहीं।
भूतों का डर अक्सर किसी वास्तविक भूत से नहीं, बल्कि हमारी कल्पना, डर और सस्ते रोमांच की चाह से पैदा होता है। भूतिया फ़िल्में और कहानियाँ मन में ऐसी धारणाएँ बना देती हैं कि साधारण चीज़ें भी डरावनी लगने लगती हैं। डर से भागने के बजाय उसके आधार पर प्रश्न करना चाहिए। सस्ते रोमांच के बजाय ज्ञान, इतिहास और सार्थक चुनौतियों में वास्तविक आनंद और उत्साह खोजना अधिक उपयोगी है।

डर वास्तविकता से नहीं, बल्कि अस्पष्टता और कल्पना से ताक़त पाता है। वह कभी स्पष्ट नहीं बताता कि किस बात का भय है, बल्कि धुंधले संकेतों से मन को विचलित करता रहता है। डर से भागने के बजाय उसे सामने बुलाकर उसके हर दावे से स्पष्टता माँगनी चाहिए। जैसे ही भय को सटीक होने के लिए मजबूर किया जाता है, उसकी शक्ति समाप्त होने लगती है, क्योंकि उसका पूरा अस्तित्व भ्रम और धुंध पर टिका होता है।

डर बोलने से नहीं, बल्कि दूसरों की राय और अपनी छवि खोने के भय से पैदा होता है। जब हम अपनी पहचान को लोगों की स्वीकृति पर टिका देते हैं, तब साधारण काम भी कठिन लगने लगता है। गलती करना गलत होना नहीं है; गलती सीखने का अवसर है, पहचान नहीं। आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और दूसरों की राय से मुक्त होकर ही व्यक्ति निडर होकर बोल सकता है और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकता है।

अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि ज्ञान से आनंद और मस्ती जन्म लेते हैं। सच्ची मित्रता, प्रेम और शांति किसी को पकड़ने से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता देने से मिलते हैं। मन स्वयं चंचल नहीं होता; उसमें क्या भरा जाए, यह हमारी सजगता तय करती है। जीवन का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि ज्ञान से प्रेम करना, प्रश्न करना, आत्मावलोकन करना और अपने भ्रमों को पहचानकर भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ना है।

काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए।

मुक्त कर्म वही है जिसमें आनंद किसी भविष्य के परिणाम में नहीं, बल्कि कर्म करने में ही होता है। बच्चा खेलते समय किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता; खेल ही उसका सुख है। इसके विपरीत, बंधन और लालच से किए गए कर्म हमेशा हिसाब, मुआवज़े और भविष्य की आशा से भरे होते हैं। निष्काम कर्म वही है जहाँ कर्म स्वयं ही अपना पुरस्कार बन जाता है, और जीवन गणना नहीं बल्कि सहज उल्लास में बदल जाता है।

युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।

निर्वाण षट्कम को स्वयं तक पहुँचने का आख़िरी सूत्र भी माना जाता है। निर्वाण षट्कम के सब के सब श्लोक मात्र नकार में हैं। सब बस ये बता रहे हैं कि किसको ज़िंदगी में अहमियत नहीं देनी है। वो सब, जो मैं नहीं हूँ, जो मुझे बाँध कर रखता है, उसका नकार ही शिवत्व है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इनको बहुत महत्त्व नहीं देना है। इन सबका उपयोग कर लेना, उधर बढ़ने को, जिधर शुद्धता हो। हम में उस शुद्धता से प्रेम रहे। जहाँ कहीं भी कोई व्यक्ति अपनी सीमाओं को चुनौती दे रहा है, शिवत्व वहीं है।

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कतई नहीं है। एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति यह होती है, “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा, उससे कोई लेना-देना नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।” सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो।

शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।

जो जितना ज़्यादा दूसरों की नज़रों में अपनी झूठी छवि बनाकर रखना चाहता है, उस पर तानों का उतना ज़्यादा असर होता है। अगर तानों से बचना है, तो दूसरों की नज़रों में अपनी छवि की परवाह करना छोड़ो। आपको इसलिए बुरा नहीं लगता कि किसी ने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको इसलिए बुरा लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था, उसने वह खोल दिया। इतने बेहतर हो जाओ कि छुपाने के लिए कम-से-कम रहे। और बेहतर होने के बाद भी जो कमज़ोरियाँ बची रहें, उनको उद्घाटित रखो, प्रकट रखो।

दुनिया में मुझे बताना, कौन-सी चीज़ है जो कभी नष्ट नहीं हुई? सभ्यताएँ मिट गईं, संस्कृतियाँ बह गईं, धर्म ख़ाक हो गए; आदमी का बनाया कुछ भी नहीं बचता। जो चीज़ हमें पता है कि मरण-धर्मा है, वह मिट ही जाएगी; उससे पहले उसका उपयोग चेतना को बढ़ाने के लिए कर डालो। हर पल में ऐसे सतर्क रहो, जैसे यही बस एक पल हो। जिसने मृत्यु और मृत्यु की अनिवार्यता को स्वीकार कर लिया, जो मौत के होश में जीने लगा, उससे ज़्यादा मस्त कोई नहीं जीता। मौत को लगातार याद रखो, तब मौज आएगी!

यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह वास्तव में कुछ है क्या? यह जो अलग-अलग दिखाई देता है, यह संसार है, प्रकृति। प्रकृति में बस विविधताएँ होती हैं, अनेकताएँ होती हैं। उसमें वास्तव में कुछ अलग-अलग है क्या? अलग-अलग जो दृष्टा होते हैं, उन्हीं के कारण यह संसार सबके लिए अलग-अलग हो जाता है। तो अद्वैत कहता है, हम दृष्टा की पहले जाँच-पड़ताल करेंगे, दृश्य की बाद में बात करेंगे।

हमारे लिए धर्म का मतलब ही यही हो गया है कि ठीक-ठीक उसमें लिखा हो कि मेरा क्या कर्त्तव्य है। जीवन इतना बदलाव वाला है कि कोई आकर कैसे बता सकता है कि इस पल में क्या करना है? जब आँखें दी गई हैं तो सहारे की क्या ज़रूरत है? किसने बता दिया कि ‘यह करने योग्य है’? कर्त्तव्य क्या है? नासमझों की सज़ा! जिस दिन समझ जागेगी उस दिन तुम कर्तव्यों से मुक्त हो।

कभी स्कूल गए हो वहाँ कभी किसी तीसरी क्लास के लड़के को पहली क्लास के लड़के को धुनते देखा है? देखा है? तो वही है ये। तीसरी क्लास वाले ने पहली क्लास वाले को पकड़ के पटापट- पटापट- धुन दिया, और यही है। इसका कुछ नहीं है।

एक जगह धोखा खाया। अच्छा, वहाँ गए क्यों थे? धोखा खाने तो नहीं गए थे। वहाँ पर कुछ आशा थी, कुछ कामना थी, कुछ अच्छा-अच्छा सा लगा होगा। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि सामने जलेबी आई या कचौड़ी आई; लार तो वही की वही थी न। ये सब लोकधर्म है कि आपका किसी ने बुरा करा है, तो उसका कार्मिक बैलेंस ख़राब हो जाएगा। बाहर जो कुछ हो रहा है, सब रैंडम है। आपके पास एक ही चीज़ है: चॉइस, जिसको आप कह सकते हो कि आपकी है। उसके अलावा मत सोचिए कि आसमानों पर कहानियाँ लिखी गई हैं; मिट्टी हैं हम, धूल हैं हम।

अगर एक कमरा खाली है, उसमें मुझे घुसने से डर लग रहा है, तो इसका मतलब ये है कि कमरा अज्ञात नहीं छोड़ा मैंने। मैंने उसके ऊपर अपनी ज्ञात कल्पनाएँ डाल दीं, और अब मैं कह रहा हूँ कि इस कमरे के भीतर शेर है, या चोर है, या भूत है, या कुछ है। अगर आप भविष्य को अज्ञात का अज्ञात ही रहने दें, तो डर कहाँ से आएगा? ये होता है आत्म-अवलोकन, कि पीछे जाकर देखना कि ये जो एंड प्रॉडक्ट निकला है, फियर नाम का, ये किन-किन चीज़ों के कॉम्बिनेशन से आ रहा है। और आप जैसे ही ये देख लेते हो, आज़ाद हो जाते हो।

यह जो ‘मैं’ है, जिसे सेल्फ कहते हैं, यह अपने आप में बहुत तपती हुई और अशांत चीज़ है। यह निरुद्देश्य हो कैसे सकती है? जैसे किसी आदमी को एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो और वो कहे कि मैं डिज़ीज़लेस हूँ। एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो तो आपके पास एक धधकता हुआ उद्देश्य होना चाहिए। क्या? बुखार उतारना है भाई! इसी तरह से जब तक ‘मैं’ है, उद्देश्य होना चाहिए। और वो उद्देश्य होगा उस ‘मैं’ की शांति।

गिरोगे, मिट्टी लगेगी चेहरे पर, क्रोध भी आएगा, हारते हुए भी प्रतीत होओगे। ये सब अनुभव होंगे, और जब अनुभव हों तो ये मत सोच लेना कि प्रक्रिया टूट गई। होता है भाई। बल्कि हार रहे थे हारते-हारते जीत गए, तब तो और मज़ा है।

जब 'मोह-माया' कहते हैं, तो मोह से आशय होता है कि भीतर एकदम कोहरा फैल गया है, और माया से आशय होता है कि बाहर अब कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा। मोह माने जादू, जैसे किसी ने आपकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया हो। और जब बाहर सब धुंधला दिखाई देने लगता है, तो उसको कहते हैं — माया। आमतौर पर बाहरी चीज़ों को माया माना गया है, इसीलिए भीतर वाली माया को मोह कह दिया गया; नहीं तो मोह भी माया ही है।

वो जो भीतर बैठ के ये भी कह रहा है कि "मैं बर्बाद हो गया," वो बस यही कह रहा है कि जो ऑब्जेक्ट मुझे अच्छा लगता था, मुझे वो नहीं मिला। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसके पास अब कोई ऑब्जेक्ट नहीं है। इसका मतलब ये है कि वो अभी भी कोई और ऑब्जेक्ट पकड़ कर बैठा ही हुआ है। तो सारे दुख की वजह ये नहीं होती कि ऑब्जेक्ट नहीं है। उसकी वजह होती है कि ईगो अभी भी है, डिज़ायर अभी भी है। और "मुझसे कुछ नहीं होगा" ये आईडिया अभी भी है।

अहंकार पूरी ज़िंदगी आत्मरक्षा के अलावा और कुछ नहीं कर रहा होता। 'मुझे अपने आप को बचाना है,' और अगर उसे अपने आप को बचाना है, तो वो अपने लिए कोई कठिन लक्ष्य चुनेगा क्या? यह मत कहो कि 'मुझे जो पसंद है, मैं वो काम करूँगा,' तुम वो काम करोगे तो फिर कुछ बदलेगा भी नहीं। जहाँ दिख रहा है कि कमज़ोरी है, वहाँ जाओ — भले ही वहाँ कुछ लाभ न हो रहा हो, भले ही वहाँ कोई पूछने वाला न हो। वहाँ पर ठीक है, पोल खुलेगी, थोड़ी बेइज़्ज़ती होगी, लेकिन कमज़ोरी टूटेगी।

सोशल एंग्ज़ायटी इसलिए है क्योंकि तुम्हारे पास जो है, वो बस सोशल ही सोशल है — सोशल मीडिया, सोशल इन्फ्लुएंसर्स, सोशल लाइफ़। ये जितने लोग जो तुम्हारे रोल मॉडल बने हैं, ये सब तुम्हें जीने के गलत तरीकों से लगातार भरे हुए हैं; उनको बर्ख़ास्त करो। अपने सामान्य ज्ञान को गहरा करो। विज़डम लिटरेचर और साधारण आध्यात्मिक कहानियों से होते हुए उपनिषदों तक पहुँचो। वो डर का आख़िरी इलाज है।

तुमने जब भी कोई संकल्प उठाया है, अपनी इच्छित वस्तु को पाने का ही तो उठाया है न? और तुम उसी वस्तु की इच्छा करोगे जो तुम्हारे ही जैसी होगी। इन संकल्पों को त्यागने की बात करी जा रही है। ये छोटे संकल्प हैं। संकल्प बनाओ, पर सब संकल्पों के केन्द्र में श्रीकृष्ण को बिठाओ। जो कुछ भी करने से श्रीकृष्ण मिलते हों, वो ज़रूर करो और जो करने से तुम संसार के कारागार में ही कैदी रह जाते हो, वो बिल्कुल मत करना।

आमतौर पर हमने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को जीवन का लक्ष्य माना है। माना गया है कि धर्म, अर्थ और काम रहेगा, तो अन्ततः मोक्ष उतरेगा — यह भ्रम है। हमने यह बड़ी-से-बड़ी गलती की है कि धर्म को अर्थ और काम को प्राप्त करने का साधन बना लिया है। हमारी इच्छाओं की पूर्ति का नाम धर्म नहीं हो सकता; वो तो कोई दुकान होगी। ऋषि अष्टावक्र कहते हैं कि यदि धर्म वो है जो अर्थ और काम की सेवा में लगा हुआ है, तो अर्थ और काम को ही नहीं, धर्म को भी त्याग दो — इनको त्यागना ही मोक्ष है।

आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…

देवी कोई व्यक्ति नहीं हैं। आपके चित्त की मूल अहं–वृत्ति ही देवी महामाया हैं, जो संसार बनकर हमें दृष्टिगत होती हैं। वह देवी स्वयं संसार भी हैं और संसार की दृष्टा और अनुभोक्ता भी। उस मूल अहं–वृत्ति से अनेकों वृत्तियाँ निकलती हैं, जिनको अलग-अलग देवियों का नाम दे सकते हैं। मूल प्रकृति ही आगे चलकर तीन गुणों में विभाजित हो जाती है, जो तीन देवियों के नाम से जानी जाती हैं — सतोगुणी सरस्वती, रजोगुणी लक्ष्मी और तमोगुणी काली।

गीता आपको यह बताने के लिए है कि आपकी सब चिन्ताओं के साथ-साथ जो आपकी चिन्ताओं को नष्ट कर सकता है, वो भी आपको उपलब्ध है। आपको चुनाव करना है और मूल्य चुकाने को तैयार रहना है। अर्जुन के एक ओर माँ प्रकृति हैं जो कह रही हैं, ‘मेरे बहाव में बहो,’ और दूसरी ओर श्रीकृष्ण हैं जो कह रहे हैं, ‘मेरी ओर बढ़ो और रास्ते में जो भी आता है, उसे सहो।’ सही काम में जो पीड़ा मिले अगर उसे प्रेम का उपहार मान कर सीने से नहीं लगा सकते, तो उसे दवाई का कड़वा घूँट ही मानकर बस सह लो। सच्चाई के मार्ग पर जो तमाम अनुभवों में अडिग रहता है, वो आनन्द का अधिकारी है।

आप मुक्त हो तो आपकी आँखें सुंदर, आपकी काया सुंदर, आपके कर्म सुंदर, आपके वचन सुंदर, आपका जीवन सुंदर। अगर आप मुक्त हो तो आपका जो कुछ है, सब सुंदर हो जाएगा। और अगर आप मुक्त नहीं हो तो आपका जो कुछ है, वो सब बहुत ही विकृत और कुरूप रहेगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका घर भी सुंदर हो जाएगा। आप मुक्त हो जाओ, आपका ग्रह भी सुंदर हो जाएगा। ग्रह भी और गृह भी।

प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा…

अपने ख़िलाफ़ जाना ही सबसे मुश्किल होता है। जो अपने ख़िलाफ़ जा सकता है, वही ‘अपने’ को पाता है। आमतौर पर हम एक संस्कारित मशीन की भाँति पुराने बहाव में बहे चले जाते हैं। लेकिन अपनी वृत्तियों और संस्कारों के बहाव को तोड़ा जा सकता है। संस्कारों का तूफ़ान आता है और तुम उसमें थोड़ी देर के लिए अडिग खड़े हो जाओ — यह तुम्हारा विद्रोह हुआ। इसी विद्रोह का नाम अध्यात्म है।

कर्म के परित्याग से, श्रेष्ठ है नियत कर्म। कर्मयात्रा पर चल पड़े, जिस क्षण लिया जीव जन्म।

मन जहाँ बार-बार जाकर बैठे उसी का नाम माया है। जो ही विचार मन में लगातार भरे रहें, उसी का नाम माया है। कबीर साहब कहते हैं — ‘एक माया ऐसी भी है जो राम से मिला देती है।’ मन ही है जो यत्र-तत्र भागता है। इसी मन को ऐसा क्यों न कर दें कि ये राम की ओर भागे। यही कला है जीने की कि क्या चुनें और क्या न चुनें। उसको चुनो जो तुम्हें तुम्हारे क़रीब ले आता हो और उससे बचो जो तुम्हें तुमसे दूर ले जाता हो।

अपना दृष्टा होने का मतलब ये होता है कि मैं बस देखूँगा कि मैं कितना बिगड़ा हुआ हूँ। सुधारने का मेरा कोई इरादा नहीं है, कोई इरादा नहीं है। इरादा लेकर के जो ख़ुद को देखेगा, वो फंस गया। परपज़लेस, पूरे तरीक़े से परपज़लेस होना चाहिए आत्म-दर्शन, आत्मवलोकन।

यूँ ही कुछ हो नहीं जाता, सब कुछ चुनाव है। बहुत समय तक तुम एक ही चुनाव को दोहराते रहे हो। अब तुम्हारे सिस्टम ने उस चुनाव को पकड़ लिया है और डिफ़ॉल्ट बना दिया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कभी भी तुमसे चुनने का अधिकार छीना जा सकता है। तुम्हारे ही चुनाव से तुम्हारी दुर्गति हुई है और तुम्हारा ही चुनाव तुम्हारा कल्याण करेगा। कोई बाहरी ताक़त आकर तुम्हारा उद्धार नहीं करने वाली। तुम्हारा जो कुछ भी है, वो बस तुमसे है।

यहाँ जिस प्रेम की बात हो रही है, वो वो प्रेम है जहाँ दूसरे के होने से आपका होना मिट जाता है, गाढ़ा नहीं हो जाता, बढ़ नहीं जाता। "तुम ही हो जिसमें सारी सत्यता है। और तुम यदि सामने हो, तो मैं पूरी तरह असत्य हो गया।" ग़ज़ब का प्रेम है ये। "सारी सत्यता तुम में है, तो फिर तुम्हारे सामने मैं क्या हो गया? मैं असत्य हो गया और असत्य माने, जो फिर है ही नहीं। नकली, मिथ्या।"

तुम्हारे पास सम्यक युद्ध नहीं है लड़ने को तो फिर तुम अपनी परेशानियों से लड़ोगे, क्योंकि युद्धरत तो सबको रहना है। कोई है जो असली लड़ाई लड़ रहा होता है, और जो असली लड़ाई में नही उतरेगा वो फिर नकली लड़ाई लड़ता है। नकली लड़ाई यही होती है, अरे मैं परेशान हूँ! अरे मुझे यह दुःख है!

जब भी विज्ञान और लोकधर्म आमने-सामने आएँगे, लोकधर्म मुँह की खाएगा, क्योंकि लोकधर्म किससे बना है? कल्पना और भावना से। और कल्पना और भावना, तथ्य से नीचे की बातें होती हैं, विज्ञान तथ्यों पर चलता है। लेकिन विज्ञान से भी ऊपर क्या है? अध्यात्म। क्योंकि विज्ञान, सब कुछ हटा देने के बाद भी कल्पना, भावना, इत्यादि कचरा हटा देने के बाद भी, एक द्वैत में तो विश्वास करता ही है न?

“यज्ञ” का अर्थ है — जो कुछ भी किसी निचले स्तर पर है, उसे उठाकर ऊँचे स्तर पर रख देना। जो भी संसाधन आपके पास है — समय, ध्यान, चिंतन, धन, श्रम — उसे उच्चतम को समर्पित कर देना, यज्ञ है। एक बार जान जाओ कि कोई चीज़ ऊँची है, सर्वस्व समर्पित कर दो। अपने लिए कुछ बचाकर मत रखो। “आरोहण है गीता” — नीचे से ऊपर की ओर बढ़ते चलो, यही यज्ञ है।

बाहर से जो कुछ भी आ रहा है, सब अविद्या है। जानते हो, बड़े से बड़े विद्वान के वचन भी आपके लिए तो अविद्या ही हैं क्योंकि वो बाहर से आ रहे हैं। ऊँची से ऊँची बात भी अगर अभी किसी और की है, तो वो अविद्या है। और जिस क्षण आपने ध्यान में, अपना और उस बात का रिश्ता देख लिया, तब विद्या हुई।

शारीरिक रूप से तो परनिर्भरता रहेगी, लेकिन जब परनिर्भरता मानसिक बन जाती है, तो वह बहुत ख़तरनाक हो जाती है। अगर आप देह हैं, तो परनिर्भरता ठीक है, लेकिन आप देह भर नहीं हैं। जब हम स्वयं को देह ही समझ लेते हैं, तो देह का दर्द चेतना का दुख बन जाता है — यह बहुत बड़ी ग़ुलामी है। आपके भीतर कुछ ऐसा है जो आज़ादी के लिए फड़फड़ाता है। जब आपका होना किसी भी विषय के होने से आज़ाद हो जाता है, तब आपका होना सार्थक हो जाता है, और आप सही तरीक़े से जीने के लिए मुक्त हो जाते हो।

एक से मुक्त होओगे तो दूसरे के पास चले जाओगे। ये कोई मुक्ति नहीं है, एक से मुक्त होकर के दूसरे की ओर आकर्षित हो जाना कोई मुक्ति नहीं है। और जब भी एक से मुक्ति की बात करोगे, तो दूसरे की ओर आकर्षित होओगे ही होओगे, क्योंकि तुम्हारी मुक्ति किसी संदर्भ में है।

डर चेतना की सबसे बड़ी बीमारी है। यह आदमी को संकुचित कर देता है। डर मान्यता से उठता है। जहाँ मान्यता है, वहाँ डर होगा ही। इस बात पर डरे रहो कि कहीं ज़िंदगी से सच्चाई विदा न हो जाए — लेकिन लोग डरे हुए हैं कि कहीं ज़िंदगी से बंधन न छिन जाए। विषयों को ज़िंदगी से खदेड़ने की बात नहीं है; सच्चाई के आधार पर जीने की बात है। उसके बाद न कुछ बहुत प्यारा लगता है, न कुछ बहुत डरावना लगता है।

गीता में पहली बात तो कहीं लिखा नहीं है कि "कर्म कर और फल की चिंता मत कर" — ऐसा कोई श्लोक नहीं है। श्रीकृष्ण बस ये कहते हैं: सही कर्म कर, बस। अगर आपने सही काम उठा लिया, तो फल की चिंता आएगी ही नहीं। आपने सही काम उठाया है या नहीं — ये आप इसी बात से जाँच सकते हो कि आपको भविष्य कितना याद आ रहा है। अगर आपको बार-बार ये सोचना पड़ रहा है कि इस काम से मुझे क्या मिलेगा, तो आपने काम गलत उठाया है।

गीता एक एलीट डॉक्यूमेंट है, उत्कृष्टता है इसमें। इससे प्यार वही कर पाएँगे, जिन्हें ऊँचाइयों से प्यार है, जिन्हें एक्सीलेंस चाहिए। और जिनको ऐसे ही बीच में पड़े रह जाना है — मिडियॉकर — उन्हें गीता रुचेगी ही नहीं। जीवन में जो भी ऊँचे-से-ऊँचा, श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठतर हो सकता है, वो निष्काम कर्म से ही मिलेगा। घोर कर्म करना है, जज़्बे से खेलना है, दिल से चाहना है, डूबकर जीना है — ये श्रीकृष्ण का उपदेश है।

डर दो तरह का होता है। हम सब तरीक़े के छोटे–छोटे डरों में लिप्त रहते हैं; और जो एक डर हमें लगना ही चाहिए, उसे हमने छुपा रखा है। हम पूरी दुनिया से डरते हैं, बस जीवन के व्यर्थ चले जाने से, अमुक्त रह जाने से नहीं डरते। असली डर अगर जीवन में आ गया, तो ये सब छोटे–छोटे, क्षुद्र डर विदा हो जाएँगे।