प्रश्नकर्ता: और गहरा समझना चाहूँगा कि जब धर्म की बात होती है तो पुनर्जन्म की बात तो होती ही होती है। तो इनके बीच का क्या सम्बन्ध है?
आचार्य प्रशांत: अरे भाई, धर्म ये जानने में है कि ये जन्म झूठा है। अगला जन्म कहाँ से आ जाएगा? अगला जन्म तो तब होगा न जब पहले ये वाला जन्म हो। जो है ही नहीं वो अपने अगले जन्म की बात कर रहा है। उसे पूछो कि तेरा ये वाला जन्म कब हुआ।
जिसका आज नहीं है वो अपने कल की बात कर रहा है। अपने बीते हुए कल की भी और आने वाले कल की भी। हम आज ही ज़िन्दा नहीं हैं। हमें अगला जन्म कहाँ से मिल जाएगा? लोग पूछते हैं, ‘अगला जन्म नहीं होता?’ मैं पूछता हूँ, ‘किसका? तुम मुर्दे हो, तुम अभी भी ज़िन्दा नहीं हो। तुम अगले जन्म में कैसे पहुँच जाओगे?’ कोई नहीं ज़िन्दा है। सब मृत हैं। सब प्रकृति की प्रक्रियाएँ मात्र है। प्रक्रियाओं को हम जीवित कैसे बोल दें?
मैं ये कुर्सी का हत्था है (कुर्सी पर हाथ से चोट करते हुए), इसे मैंने ऐसे मारा तो इसने आवाज़ करी तो हम क्यों नहीं बोलते कि ये ज़िन्दा है। इसने अभी-अभी आवाज़ करी। जैसे ये हत्था आवाज़ कर रहा है। इस पर किसी का आघात हुआ, ये बोल पड़ा, वैसे भी तुम्हारे मन पर कोई चोट कर दूँ तुम चिल्ला दोगे मुझ पर। तो तुममें और इस कुर्सी में क्या अन्तर है? कोई अन्तर नहीं है। कुर्सी को तुम ज़िन्दा बोलते नहीं, तो तुम ज़िन्दा कैसे हो गये?
मैं कुर्सी पर चोट करता हूँ, तो कुर्सी आवाज़ कर देती है। मैं किसी इंसान पर भी चोट अगर कर दूँगा, हाथ से नहीं शब्द से तो इंसान भी बोल पड़ेगा, भड़क जाएगा। तो कुर्सी में, उस इंसान में अन्तर क्या है? मैं कैसे बोलूँ इंसान ज़िन्दा है? हम ज़िन्दा हैं ही नहीं।




