कैसा होगा आपका पुनर्जन्म? (हिम्मत के साथ सुनिए!)

Acharya Prashant

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कैसा होगा आपका पुनर्जन्म? (हिम्मत के साथ सुनिए!)
जब तक ये प्रश्न शेष है कि “कब तक उठते रहें?” तब तक उठते रहो। जब ये प्रश्न ही मौन हो जाए कि “कब तक उठते रहें?” तब उठना-गिरना, ये सब अप्रासंगिक हो जाएगा। जब तक उठने के लिए कोई बचा है, तब तक उठते रहो। यही पुनर्जन्म है। उठते रहो, उठते रहो। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। बचपन से घर में ये बातें सुनता आया हूँ कि अगर इस जन्म में गलत काम किए तो अगले जन्म में उसका बुरा फल मिलेगा, और अच्छे कर्म किए तो अच्छा जन्म मिलेगा। इन्हीं बातों के डर से मैं कई बार गलतियाँ न दोहराने की कोशिश करता हूँ। लेकिन फिर भी वही गलती बार-बार हो जाती है। तो क्या सच में कर्म को सुधार कर अगला जन्म बेहतर बनाया जा सकता है?

आचार्य जी, एक बात और। मेरा एक दोस्त है, वो कहता है कि उसकी ज़िंदगी इस समय ठीक चल रही है। लेकिन वो भी बार-बार भविष्य की बातें करता रहता है। तो मैं इसमें उलझ सा गया हूँ, कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: इसी बात को इसीलिए आप ऐसे भी पूछ सकते थे, बिल्कुल पलट करके। अच्छा, वर्तमान से संतुष्ट हो। ये बताओ, पुरानी ज़िंदगी, पुरानी बातें, पुराने रिश्ते, ये सब कितना याद करते हो? वो जितना कहे ज़्यादा कि “ये याद करता हूँ”, ऐसा रहता है, मन खोया रहता है, ख़्याल, कल्पना, तसव्वुर में। उतना उसने और स्वीकार कर लिया कि वर्तमान से चैन है नहीं उसको।

हम जैसे आज हैं, हमें वैसा रहना नहीं है। तो हम समय पर भरोसा रखते हैं। हम समय का आश्रय लेते हैं। हम कहते हैं, कल, परसों, हम काश बेहतर हो पाएँ। समय ज़रूरी नहीं है। बेहतरी ज़रूरी है न। और बेहतरी ज़रूरी है तो उसमें जितना कम समय लगे उतना बेहतर है। ठीक? यही है न?

अगर कोई कहे कि उसको बेहतर होना है, लेकिन कहे मुझे बेहतर होने के लिए 1000 साल का समय चाहिए, तो आशय क्या निकलेगा? क्या निकलेगा आशय? इतना बेईमान तो नहीं है कि कह दे कि बेहतर होना ही नहीं है। इतना तो समझता है कि बदलाव चाहिए। भीतर कुछ उमड़ता-घुमड़ता रहता है, कुछ आवाजें करता रहता है, कुछ चुभता रहता है। उसके अनुभव को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। तो कहता है, नहीं, जैसा अभी चल रहा है खेल, ऐसा न चले कल कुछ बेहतर हो जाए। ठीक है। यहाँ तक ठीक है मामला।

पर कहता है, हज़ार साल चल जाए, सौ साल लग जाएँ। तो यहाँ आप कहोगे, यहाँ जो है, अब तेरा ईमान डगमगाया हुआ है, क्योंकि तूने दो बातें कही, दोनों साथ चलती नहीं हैं। एक ओर तू कह रहा है, जो भीतर है मैं उससे संतुष्ट नहीं; जो भीतर है वो स्वयं से संतुष्ट नहीं। और दूसरी ओर तू कह रहा है, कि पाँच साल, दस साल बाद देखेंगे; साठ साल बाद देखेंगे; दस हज़ार साल बाद देखेंगे। ये क्या है? अगर वास्तव में कुछ बदलना है, और वास्तव में तेरी बेचैनी में कुछ दम है, कुछ सबब है, वास्तव में तेरे आँसू गाढ़े हैं, तू झूठ-मूठ ही नहीं रो रहा, तो आँसू तो फ़रियाद हैं, और आँसू तो संकल्प होने चाहिए कि तत्काल बदलाव हो। तत्काल बदलाव हो।

इतना तो लोकधर्म भी मानता है कि जीव अभी जिस अवस्था में है, उस अवस्था में वो तृप्त, परिपूर्ण, संतुष्ट नहीं है। इतना तो माना जाता है। लेकिन जो अतृप्त है, वो स्वयं अपनी अतृप्ति का कारण है, अपनी हस्ती को मिटाए बिना अपना कर्म बदलने भर से वो तृप्त नहीं हो जाएगा, ये बात लोकधर्म नहीं मानता। बेचैनी है, ये तो पूरी दुनिया मानती है। हाँ, हम परेशान हैं, और प्रमाण ये है कि हर आदमी उम्मीद के भरोसे चल रहा है। इसी से स्पष्ट है कि सबने मान रखा है कि अभी जैसी हमारी हालत है, ठीक नहीं है। हमारा जो चल रहा है, ठीक ही चल रहा है।

तो वहाँ बस ये प्रश्न और कर लीजिए, अच्छा, कितनी उम्मीदें हैं भविष्य से? कितनी हैं। और जितनी वो उम्मीदें गिनाता चला जाए, उतना वो स्वीकारता जा रहा है कि वो वर्तमान से संतुष्ट नहीं है। सीधे ही पूछेंगे, क्या वर्तमान से असंतोष है? तो कह देगा, कोई असंतोष नहीं है, क्योंकि मान लिया असंतोष है तो आप उसको पकड़ लेंगे, कहेंगे, फिर इधर आ जाओ, बैठो, बात करो। वो सीधे-सीधे नहीं मानेगा कि वर्तमान से असंतोष है। वर्तमान से असंतोष ज़ाहिर होता है, प्रकट होता है, प्रमाणित होता है, भविष्य की कल्पना से, गत की स्मृति से, आगत की आशा से। और नहीं वर्तमान से चैन है ये बात ठीक है स्वीकारो, क्योंकि ईमानदारी की बात है। यथार्थ है। उसको स्वीकारोगे नहीं तो क्या करोगे? हाँ, नहीं है चैन।

नहीं है चैन तो अगला सवाल आता है, कि क्यों नहीं चैन ले आ लेते? यहाँ पर आम जीवन, आम व्यवहार, लोकधर्म गड़बड़ा जाता है। वो कहते हैं, हमारे प्रयासों से धीरे-धीरे बदलाव आएगा। किसके प्रयासों से? हमारे प्रयासों से धीरे-धीरे बदलाव आएगा, हम शनैः शनैः एक सुनहरे कल की रचना कर तो रहे हैं, हम प्रयासरत हैं कल की सुबह अलग करने के लिए।

यहाँ तक भी बात बहुत गड़बड़ न लग रही हो तो हमारे प्रयासों, “हमारे प्रयासों से बदलाव आएगा,” इसको पकड़ लीजिए। वो कह रहे हैं, कर्ता को वही रखते हुए कर्म को सघन कर दूँगा। कर्म की तीव्रता बढ़ा दूँगा तो बदलाव आ जाएगा। पकड़ कर चलिए, नहीं तो फिर आप कहेंगे कि हम समझा नहीं पाते। किसको वही रखते हुए? कर्ता को पुराना रखते हुए कर्म बदलूँगा तो बदलाव आ जाएगा। लिख लो इसको एक बार।

कर्ता को पुराना रखते हुए, या कर्ता को रक्षित रखते हुए, असल में ‘रख’ शब्द ही ‘रक्ष’ से आया है। रखना माने रक्षा करना। जो आप कहते हो न, ‘रखा है,’ रखा, वो रक्षा है। वो ‘क्ष’ जो है संस्कृत का, वो आम भाषा में ‘ख’ बन गया। कर्ता की रक्षा करते हुए, कर्ता को पुराने जैसा ही रखते हुए, मैं कर्म बदल दूँगा, इससे एक नई प्रभात आएगी। यही है न?

अब ये बात समझिए कि दर्शन में कैसे अनुवादित होती। वहाँ जो ये पुराना कर्ता है, ये बन जाता है पुरानी जीवात्मा। ये बची रहेगी और जो नया कल है, वो बन जाता है नया जन्म। आपके वाक्य में क्या है? पुराना कर्ता। पुराना कर्ता, खनिभूत प्रयास, ज़्यादा प्रयास, ज़्यादा तीव्र प्रयास; पुराना कर्ता, ज़्यादा प्रयास, नया कल। ये पहले वाक्य में आपने तीन बातें लिखी थीं। पुराना कर्ता; पुराना रहते-रहते उसने और ज़ोर लगाया; तीव्र प्रयास; नया कल।

यही बात लोकधर्म में दर्शन की भाषा में ऐसे बदल जाती है। जो पुराना कर्ता है वो बन जाता है जीवात्मा, और ज़्यादा प्रयास बन जाता है कर्मकांड। और नया कल बन जाता है नया जन्म। तो बात फ़िलोसॉफ़िकल एरर की है। आप जो दार्शनिक आधार लेकर चल रहे हो न अपनी मान्यता का, वो दार्शनिक आधार ही गड़बड़ है। आपके दार्शनिक आधार में ये है कि जीवात्मा दूसरे प्रकार के कर्म करेगी तो अगला नया बेहतर जन्म पाएगी।

कुल मिलाकर के आप कर्ता को बचाए जा रहे हो, और उसका कर्म बढ़ाए जा रहे हो और परिणाम में आप एक नया कर्ता चाहते हो, जो कि इसमें विरोधाभास है, कंट्राडिक्शन है, समझ में आ रहा है? मैं कर्ता बचा रहा हूँ। बचा ही नहीं रहा, मैं उसे खाना-पीना खिला रहा हूँ ताकि वो और ज़ोर से प्रयास करे, और ज़ोर से कर्म करे। कर्ता को बचाया, कर्ता की मालिश करी, उसे खाना-पीना खिलाया, उसे सुरक्षित रखा ताकि उससे और कर्म कराया जाए। और और कर्म कराने के बाद आशा क्या है? कर्ता बदल गया। बदल गया!

तुम ही उसे बचा रहे हो तो बदल कैसे गया? तुम परेशान किससे थे? पुराने कर्ता से। पर तुमने कर्ता को मिटाने का निर्णय लिया ही नहीं, क्योंकि तुम ही वो कर्ता हो। तो कर्ता को मिटाने का निर्णय लगता है जैसे आत्मघात हो गया। “हाँ, मेरा क्या होगा?” मैं ख़ुद से परेशान हूँ, पर मैं ख़ुद को मिटाने का साहस, साहस भी नहीं स्पष्टता, करेज नहीं क्लैरिटी, ला ही नहीं पा रहा। तो मैं क्या करता हूँ कि मैं जैसा हूँ, ऐसा रहे रहे मैं अब कुछ तो करूँगा, क्योंकि परेशान हूँ। तो ऐसा रहे रहे मैं और ज़ोर से एक्सेलरेटर दबाता हूँ। इंजन ख़राब है, तो मैं क्या कर रहा हूँ? मैं उसको रेस दे रहा हूँ। इंजन क्या है? कर्ता। रेस, आर.पी.एम., मूवमेंट, ये क्या है? कर्म।

जो इसमें दार्शनिक त्रुटि है, वो समझ में आ रही है? ख़राब इंजन को एक्सेलरेट करने से इंजन थोड़ी ही ठीक हो जाएगा। और दुख भोगने वाला कौन है? इंजन ही, कर्ता ही। भूलना नहीं कर्ता ही भोगता है, अहम् ही कर्ता है, अहम् ही भोक्ता है। ये जो इंजन है भीतर, ये किससे दुखी है? सड़क से।? सड़क तो वो स्थिति पैदा करती है, जिसमें इंजन को अपने दुख का एहसास होता है। इंजन न ट्रैफिक से दुखी है, न सड़क से दुखी है। अच्छा, इंजन एग्ज़ॉस्ट से दुखी होगा, धुआँ बहुत मार रहा है। वो एग्ज़ॉस्ट दुख का कारण नहीं है, दुख का उत्पाद है। अगर काला धुआँ निकल रहा है बहुत सारा, तो क्या वो दुख का कारण है? आपने तो कार्य-कारण को ही बिल्कुल पलट कर रख दिया। वो दुख का कारण नहीं है, वो किसी त्रुटि का उत्पाद है, परिणाम है। आपने इफ़ेक्ट को कॉज़ बना दिया।

और इंजन कह रहा है, ये धुआँ न, कोई गिरफ़्तार कराओ इसको। इस धुएँ ने ही ज़िंदगी बर्बाद कर दी है। वो धुआँ आया कहाँ से? तुझसे ही तो आया है, इंजन। बात आ रही है समझ में?

अगर आप ये बात समझ रहे हैं, तो फिर ये भी समझेंगे कि ये जो पूरी आशा रहती है कि मेरा कुछ कल्याण अगले जन्म में हो जाए। पंडित जी, बताओ कहाँ पर पूजा-पाठ, कुछ हवन वग़ैरह करना है, बताओ। हटाओ इस बहस को भी, कि जीवात्मा होती है कि नहीं, वो भी छोड़ो। जो पूरी बात कही जा रही है, उसमें आधार में ही खोट है। तुम उसको देखना ही नहीं चाह रहे, जो हैरान, परेशान, बेचैन रहता है भीतर। तुम कह रहे हो, कुछ करूँगा तो आगे लाभ हो जाएगा। तुम समय का सहारा ले रहे हो। तुम समय का सहारा भी नहीं ले रहे, तुम समय की ओट में छुप रहे हो। तुम छुप भी नहीं रहे, तुम समय की ओट में स्वयं को रक्षित कर रहे हो। इसलिए जिन्होंने जाना, उन्होंने कहा है, “आशा ही परम दुखम्।”

आशा से बड़ा दुख नहीं है, क्योंकि आशा उसको रक्षा दे देती है, जो स्वयं अपने दुख का कारण है। आशा उसको रक्षा दे देती है, जो स्वयं अपने दुख का कारण है।

अहंकार जब सस्ता नशा कर लेता है, तो जीवात्मा बन जाता है। और इस जन्म का दुख जब सस्ता नशा कर लेता है, तो अगले जन्म की आशा बन जाता है।

तुझे दुख है, तो तू अभी मिटाएगा या चालीस साल बाद? तू कितना बेईमान है। यहाँ कितने लोग दवाई लेते हैं किसी-न-किसी चीज़ की। तब की दवाइयाँ ले लो, इकट्ठा कर लो, अगले जन्म में देंगे। अगले जन्म में देंगे और ब्याज के साथ देंगे। क्यों बताओ अगले जन्म में क्यों न दें? क्या जवाब है आपके पास? क्यों न दें अगले जन्म में? तकलीफ़?

श्रोता: अभी है।

आचार्य प्रशांत: अब समझ में आ रहा है? ये जो व्यक्तिगत पुनर्जन्म की पूरी बात है, इसमें खोट क्या है? इसमें बेईमानी क्या है? ये अपनी ही तकलीफ़ को बढ़ाने का इंतज़ाम है। तू कल की बात करता ही इसीलिए है क्योंकि तू आज से असंतुष्ट है। तुझे दुख आज है। तुझे दुख आज है। तो यथासंभव प्रयत्न करके उसको आज मिटा न।

कल मिटाना भी धोखा है। कल भी धोखा है, तूने तो अगले जन्म में टांग दिया सब। कल भी धोखे की बात है, और तूने उसको ले जाकर वहाँ टांग दिया। “जो होगा, अब आगे होगा, आगे देखा जाएगा। पुण्य इकट्ठा कर रहा हूँ, आगे लाभ होगा।” ये पुण्य नहीं है फिर, ये तो खाताबाज़ी है। ये अकाउंट कीपिंग है। पुण्य तो मात्र निष्कामना में हो सकता है। ये कौन-सा पुण्य है, जिसमें तुम कह रहे हो कि कामना जुड़ी हुई है, कि अभी इतना है। ब्राउनी पॉइंट्स। इतने नंबर मिल गए मुझे। हाँ, चल प्लस वन कर। अभी-अभी कबूतर को दाना डाला, प्लस वन कर। अब अगले जन्म में मुझे भी कोई दाना डालेगा। पुण्य और प्रेम अलग-अलग तो नहीं चल सकते न।

और प्रेम ऐसे गिनती करके तो नहीं देता, कि देता है? प्रेम तो देता भी नहीं है। प्रेम से तो स्वयमेव बंट जाता है, देने में भी कोई कर्ता होता है। प्रेम में तो कोई दाता भी नहीं होता। कोई देने वाला भी नहीं होता कि मैंने दिया। जब तक कोई भीतर बैठा हुआ है, मैंने दिया। तब तक उसने दिया नहीं है। उसने क्या किया है?

श्रोता: भोगा ही।

आचार्य प्रशांत: एक दिया है कि सवा लौटेगा। समय को यूँ ही धोखा नहीं कहा गया। सत्य को यूँ ही अकाल या कालातीत नहीं कहा गया। एक प्रमुख वजह, या कह दो जो केंद्रीय वजह है उसको व्यक्त करने का एक सशक्त तरीका ये हो सकता है कि कहो कि काल मुक्ति को कल पर टाल देता है। इस अर्थ में काल पाप है।

आपके हाथ में बेड़ियाँ हों, तो आप कह लो कि अभी एक साल लगेगा गलाने में। वो ठीक है, पर अहंकार का बंधन वस्तुगत नहीं होता। अस्तित्वगत होता है। वो सिर्फ़ अपनी नज़रों में है, इसका (कलम को इंगित करते हुए) संबंध काल से निश्चित है, समझो। बिना समय के ये तैयार नहीं हो सकता और बिना समय के कुछ लिख भी नहीं सकता। इससे आप एक अक्षर भी लिखोगे तो क्या लगेगा?

श्रोता: समय।

आचार्य प्रशांत: और क्या ये बिना समय के तैयार हो सकता है? इसका जो कुछ है सब समय में है और इसको आप रख दो, नहीं भी इस्तेमाल करो, तो कुछ समय बाद ही ख़राब हो जाएगा। भौतिक पदार्थ के बदलाव के लिए समय चाहिए। ये बना भी समय में है, लिखता भी समय में है, और मिटेगा भी?

श्रोता: समय पर।

आचार्य प्रशांत: अहंकार के भौतिक परिणाम होते हैं, भौतिक हस्ती नहीं होती। यदि वो स्वयं भौतिक होता, तो कोई हर्ज़ नहीं था। वो कहता, मुझे समय चाहिए बदलने के लिए, बेहतर होने के लिए। तब हम उसकी दलील मान लेते। हाथ में अगर अभी कहा हथकड़ी है, तो हथकड़ी क्या वस्तु है? भौतिक है। वहाँ आप नहीं कह सकते कि तत्क्षण ये विलुप्त हो जाए। हम नहीं कह रहे, बाबा। इतने पागल नहीं हैं कि किसी को बीमारी हो और कहें कि बस पलक झपकते तेरी बीमारी चली जाएगी। बीमारी क्या है? भौतिक है, भाई। कोई ट्यूमर हो सकता है, भीतर कोई रसायन ऊपर-नीचे हो सकता है। कुछ भी हो सकता है, हड्डी टूटी हुई है। टूटी हड्डी थोड़ी पलक झपकते जुड़ जाएगी।

यद्यपि बाबा लोग हैं वो घूमते हैं; आपके आसपास बहुत घूमते हैं। वो कहते हैं, मेरी हड्डी टूटी थी और पलक झपकते जुड़ गई। ये फ़िलोसॉफ़िकल इलिटरेसी है। पलक झपकते कुछ हो सकता है। क्या हो सकता है? भ्रम मिट सकता है। भौतिक नहीं मिटेगा, भूत नहीं मिटेगा, भ्रम मिटेगा। पलक झपकते भ्रम मिटेगा।

ये चार हज़ार साल पुरानी चारमीनार की इमारत है। ये दिख रही है? ये कितने साल पुरानी है? चार हज़ार साल पुरानी है। इसको गिराना है, कितना समय लगेगा? अभी आप बिल्कुल यही मान रहे हो, चार हज़ार साल पुराना चारमीनार यहाँ खड़ा कर दिया है। इसको गिराने के लिए, इसको गिराना है कितना समय लगेगा?

श्रोता: दो-चार दिन।

आचार्य प्रशांत: अपने-अपने टेंडर भेजो। (श्रोता से पूछते हैं।) हाँ, भाई? आप 10 महीने।

ठीक है? सब समय की ही कुछ यूनिट्स का नाम ले रहे हैं। कुछ ने साल बोला, कुछ ने महीने बोला, किसी ने मिनट भी बोला, पर वो भी समय की इकाई है। ठीक है? ये चार मीनार नहीं है, चारमीनार कहाँ गई? मिट गई न। कितना समय लगा? कितना समय लगा?

श्रोता: नैनो-सेकंड।

आचार्य प्रशांत: मटेरियल चेंज में टाइम रिलेवेंट होता है। मटेरियल चेंज में टाइम रिलेवेंट होता है। कॉग्निटिव एरर में इर्रिलेवेंट होता है। क्योंकि अब आपको कुछ गिराना नहीं है, यू जस्ट हैव टू करेक्ट एन एरर इन परसेप्शन।

अहंकार कोई भौतिक वस्तु नहीं है भीतर। वो सिर्फ़ क्या है? वो जो है नहीं। वो जो है नहीं, पर लग रहा था है। ये क्या लग रहा था?

श्रोता: चारमीनार।

आचार्य प्रशांत: ये अहंकार है। ये अहंकार है, जो है नहीं पर लग रहा था है। क्यों? क्योंकि उसके कुछ हमें भौतिक परिणाम देखने को मिल रहे थे। हमने कहा, कर्म है तो कर्ता भी होगा। हमने क्या किया? हमने स्पेकुलेट किया। इसको बोलते हैं, पॉज़िटिंग। जाना नहीं, मान लिया। अनुमान लगा दिया। अनुमान लगाया कि इंद्रियों ने बोला है, दिख रहा है तो होगा। और इंद्रियों ने कहा, इसकी तो छाया भी है। और छाया किसकी होती है सिर्फ़? भौतिक पदार्थ की होती है।

इसी तरह से हम कहते हैं, कर्म अगर कर रहा है तो करने वाला कोई। हम भूल जाते हैं कि कर्म यदि प्रकृति में हो रहा है तो करने वाली भी तो हो सकता है कि प्रकृति ही हो। हमें लगता है, कर्म हुआ तो करने वाला यहाँ भीतर बैठा होगा। ज़रूरी है भीतर बैठा हो? पर हम बड़े तुर्रम-खाँ हैं। हम कहते हैं, कर्म हुआ है तो मैंने ही किया होगा, तो कर्ता भीतर होगा। स्पेकुलेशन, तुक्केबाज़ी। हाँ, कर्म हुआ, तुमने झूठ नहीं बोला। तुम्हें दिखाई दिया कि कर्म हुआ, पर कर्ता नहीं है कोई यहाँ पर। तो कहोगे, अच्छा, बिना कर्ता के कर्म कैसे हो गया? करता कौन है? बड़ी माँ। वो कर रही है, तुम नहीं कर रहे।

तुमने क्या किया? तुम ख़ुद पैदा हुए हो? जब तुमसे यही नहीं किया गया, अम्मा को करवाना पड़ा ये सब, बड़ी माँ को। तो तुम और क्या कर लोगे? ख़ुद साँस ले रहे हो। दिल किसका धड़क रहा है ख़ुद ही? कौन-कौन बैठा हुआ है, उसको ऐसे-ऐसे धड़का रहा है? पर कह रहे हो, कर्म हो रहा है तो कर्ता कोई न कोई तो होगा। तो मेरा दिल मैं धड़का रहा हुने। तुम नहीं धड़का रहे, बड़ी माँ धड़का रही है।

अहंकार क्या है एक? त्रुटि है, एरर है। कॉज़ एंड इफ़ेक्ट का फ़ॉल्स एट्रिब्यूशन है। इफ़ेक्ट को देख के हम कॉज़ को फ़ॉल्सली एट्रिब्यूट कर देते हैं। किसको? टू एन इनर एजेंसी। इफ़ेक्ट तो दिख रहा है, मैं नहीं इंकार कर रहा। इफ़ेक्ट तो है, उसी को कर्म-गति बोल रहे हैं हम। श्रीकृष्ण बोलते हैं दूसरे अध्याय में, एक पल को भी कहीं पर, इतना सा भी नहीं रुकती प्रकृति। तो गति तो हो ही रही है, पर फ़ॉल्स एट्रिब्यूशन। वो क्या है? देखा कि कुछ हिल रहा है तो मैंने ही किया होगा। तुमने नहीं किया, किसने किया?

श्रोता: प्रकृति ने।

आचार्य प्रशांत: अब ये (टेबल की सतह) थोड़ी-सी टेढ़ी हो, ऐसे। इसमें ढलान हो, स्लैंटिंग हो। तो ये (सतह पर रखी हुई कलम) धीरे-धीरे भाई क्या करेगा? अब मैं आपसे बात कर रहा हूँ, इधर ये धीरे-धीरे क्या कर रहे हैं? ये दिख रहा है? मैं आपसे बात कर रहा हूँ और इसमें ऐसे ढलान थी, 5 डिग्री की, ज़्यादा नहीं 5 डिग्री। ये धीरे-धीरे जा रहे हैं, जा रहे हैं, जा रहे हैं, जा रहे हैं। आधे घंटे बाद टपक गए। और चिल्लाना शुरू कर दिया, “हैं! पेन नीचे गिरा दिया इन्होंने। मारो!” कुछ हो सकता है, होली पेन! और दो-चार आ गए मारने के लिए। पीछे से कोई चिल्लाया, “लिंच हिम!”

अरे, कर्म हुआ, पर किसने करा? इतने बड़ा ये जो गोला बैठा है पृथ्वी, इसने करा। मैंने थोड़ी करा है। ये अगर नीचे गिरा है तो वो भी ग्रैविटेशनल पुल है जिसने इसको नीचे गिराया है। पर मैं इसके पास था, तो ऐसा लगा जैसे मैंने किया हो। ये है, एरर इन एट्रिब्यूशन। करा किसी और ने, और श्रेय ले गया या इल्ज़ाम ले गया एक भीतर का छद्म बिंदु, एक फ़ॉल्स एजेंसी, एक काल्पनिक छाया, वो श्रेय भी ले जाती है और इल्ज़ाम भी ले जाती है। उसको प्रशंसा भी मिल जाती है और दोष भी मिल जाता है, जबकि वो भीतर है ही नहीं।

अब आगे की मज़ेदार बात सुनो। जितना तुम उसको कहोगे कि वो है, तुम्हारे उतना कहने से वो हो जाएगी। क्योंकि कहने वाले तुम ही हो। वो थी नहीं, पर ख़ुद को उसने रेफ़र कर-कर के पैदा कर दिया। वो सेल्फ-रेफ़रेंशियल है। वो किसी और की निगाह में नहीं होती, वो बस अपनी निगाह में होती है।

तो तुम उसको, तुम्हें ही उसका होना प्रमाणित करना है। तुम्हें माने उसको ही, उसको ही अपना होना प्रमाणित करना, और उसको ही देखना है अपने होने को कि काल्पनिक है। याद है? पिछले सत्र में कहा था, द सीयर डज़ नॉट सर्वाइव द सीइंग। उसको ही स्वयं को देखना है कि मैं नहीं हूँ। और जितनी बार वो कहता रहेगा, मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ, वो सचमुच हो जाता है। वो जितना कहेगा, मैं हूँ, उतना वो हो भी जाएगा। किसकी नज़र में? अपनी नज़र में।

और जो जितना नहीं समझेगा कि उसके कर्मों का कर्ता वो स्वयं नहीं, वो उतना ज़्यादा दूसरों में भी कर्तृत्व देखेगा। बुद्ध का लोग अपमान कर दें, कोई उन्हें बैठने की जगह न दे, एक बार तो कोई आकर थूक गया उनके मुँह पर। तो उनके साथ जो ये सब चलते थे, अब तब चलते थे कि बाद में ये सब हुआ, हम नहीं जानते पर बोध-कथा है। तो मंजुश्री है, आनंद है, ये लोग हैं। तो इतिहास नहीं पता होता इन मामलों में। इन मामलों में आपको जो दिया जाता है, वो इसलिए दिया जाता है कि उससे आपकी ज़िंदगी बेहतर हो सके। इसलिए नहीं कि आप हिस्ट्री रटने लगेंगे।

तो उनसे पूछा, आप क्रोधित क्यों नहीं होते? और छोटे-मोटे आदमी नहीं आप भी राजपुत्र हो। और अब तो आपने अपना ये संघ वग़ैरह कर लिया है। आपके साथ लोग चलते हैं और ऐसे ही आदमी आया, वो थूक गया। वो पंडित आया, और आपने उसकी जिज्ञासा का उत्तर भी दे दिया। फिर भी वो आपके मुँह पर आपका अपमान कर गया। तो बुद्ध कहे, सुंदर उत्तर है। किस पर नाराज़ हो जाऊँ? क्या है उत्तर? किस पर नाराज़ होऊँ?

मुझे क्रोध आ भी रहा है, मान लो। किस पर क्रोध करूँ? सामने बस प्रक्रिया है, बहाव है, फ्लक्स है। कोई सेंट्रल एजेंसी है ही नहीं जो कर्म कर रही हो। भीतर कोई केंद्रीय कर्ता बैठा ही नहीं है जो कर्म कर रहा हो। मैं अगर दोष देना भी चाहूँ तो दूँ किसको बताओ? हवाएँ आई घर की छत पर कपड़े सूख रहे थे। उनको उड़ा ले गई, नीचे गिरा दिया उनमें धूल लग गई। गुस्सा आ भी रहा है तो करें किस पर? किस पर करें?

प्रक्रियाएँ हैं। प्रक्रियाओं को गाली दें क्या? हवा को पकड़कर थप्पड़ मारे क्या? ज़्यादातर लोग जानते भी नहीं कि वो नहीं है। इसलिए वो एक भीतरी भ्रम को ताक़त दे देते हैं, और उसके कारण उनके कर्म भी विकृत हो जाते हैं। वरना ये जो देह है, वो रची नहीं गई है पाप करने के लिए, न! बिल्कुल भी नहीं। मन भी ऐसा नहीं है कि उसमें दोष, विकार और व्यर्थ की चीज़ें भरी रहें न। इनकी प्राकृतिक संरचना ऐसी नहीं है। आप जो बोलते हो न, “आँखें चंचल हैं। अरे, नैना चंचल हैं। इनको क़ाबू में करके रखियो। अरे नहीं, चालान कट जाएगा।” ये सब व्यर्थ की बात है।

ये जो उपकरण है देह नाम का, इसमें कोई पाप नहीं हो गया है और न इसकी संरचना में कोई खोट है। आप तो बड़ी माँ की भी दादी बनना चाहते हो। आप कहते हो, उसने देह पैदा करी है, देह गड़बड़ थी, मन गड़बड़ था। “अरे-अरे विषय, वासना, वृत्ति, विकार, व्यर्थ है सारा संसार। लाओ बच्चा, कहाँ है हमारा उपहार? जय बाबा जी! बोले सारा संसार।” कुछ नहीं; बड़ी माँ भूल करेगी भी तो छोटी करेगी। ठीक है?

वहाँ की फ़ैक्ट्री में गड़बड़ माल तैयार नहीं होता। इसलिए जब बच्चा आता है तो हम सबको प्यारा लगता है, ताज़ा-ताज़ा माल है। वहाँ से गड़बड़ माल तैयार होता ही नहीं है, इसीलिए पशुओं के बच्चे भी हमें अच्छे लगते हैं। आपके पास मगरमच्छ का भी एक छोटा बच्चा आ जाए, आपकी हथेली पर रख दिया जाए, तो आपको क्यूट लगेगा। जो भीतर ये बैठ जाता है ना मनुष्य के, कि “मैं कर्ता हूँ।” वो सब कर्मों को डिस्टॉर्ट कर देता है, विकृत कर देता है। उसको हटा दो, तो देह अपना काम जानती है। देह में दोष नहीं है। और जिसको आप मन कहते हो, सूक्ष्म शरीर, वो भी स्थूल शरीर की पैदाइश ही है। जब देह में दोष नहीं, जब स्थूल में दोष नहीं, तो सूक्ष्म में भी कोई दोष नहीं आ जाएगा।

सारा दोष आ जाता है, वो जो नकली भीतरी कर्ता बनकर बैठ जाता है। वो सब गड़बड़ कर देता है। सारे कर्म बदल देता है वह। इसलिए अहंकार-युक्त कर्म अलग होता है और अहंकार-मुक्त कर्म अलग होता है।

अहंकार क्या है? The false doer, जिसकी ज़रूरत नहीं, जो कुछ कर सकता नहीं; पर जो कर्म हो रहा है वो उसमें आकर भांजी मार देगा और उसको गड़बड़ कर देगा, गंदा कर देगा, घिनौना कर देगा। समझ में आ रही है बात? वो वास्तव में एक भ्रम है, लेकिन वो ऐसा भ्रम नहीं है जो हानि न दे पाए या दे भी तो छोटी-मोटी। वो बहुत बड़ी हानि दे देता है, बहुत बड़ी हानि। लगभग ऐसे जैसे आप हैं बड़े तेज़-तर्रार, गुस्सेबाज़, और यहाँ बगल में आप रिवॉल्वर खोसकर चलते हैं। ठीक? और आप घर गए, आपको खाना परोसा गया और उसमें कुछ था ऐसा और आपको लग गया कि वो साँप है।

परोसने वाले ने आपको क्या परोस दिया? साँप। क्या सचमुच साँप परोसा गया है? नहीं। पर वो एक भ्रम है मात्र। और आपने क्या करा? (गोली मारने का अभिनय करते हैं।) ये अहंकार है, है तो भ्रम पर उसके भौतिक परिणाम बहुत घातक होते हैं। ये एक भ्रम था न, जिसका बहुत घातक भौतिक परिणाम हुआ। वैसे ही अहंकार एक भीतरी भ्रम है, जिसके बहुत घातक भौतिक परिणाम होते हैं। वो सब कर्मों को विकृत कर देता है। और बहुत कोई अच्छी, स्वादिष्ट, पौष्टिक, आज आपके लिए लज़ीज़ चीज़ बनाई गई थी। होना ये चाहिए था कि आप शुक्रिया अदा करते। और कर क्या दिया? “अच्छा! जानलेवा साज़िश, मेरे खाने में साँप रखा गया है!” आ रही है बात समझ में?

भौतिक कोई समस्या हो नहीं सकती, क्योंकि भौतिक जगत तो वास्तव में एक इंटीग्रेटेड होल है। इस जगत में कुछ भी ऐसा नहीं है जो खंडित हो। हाँ, हमें दिखाई थोड़ा-सा पड़ता है, तो हम कहते हैं, खंड-खंड, खंड-खंड। हम ही खंड हैं अपनी नज़र में, तो हमें दिखाई भी सब छोटा-छोटा पड़ता है। नहीं तो ये जो जगत है, ये अपने-आप में एक संपूर्ण, एकीकृत इकाई है, यूनिफ़ाइड होल है। इसमें कुछ अच्छा-कुछ बुरा नहीं हो सकता। इसमें जो है, वो है। समझ में आ रही है बात ये?

अहंकार उसमें जाकर, रॉन्ग परसेप्शन के कारण, मिथ्या दृष्टि के कारण अपने लिए ही दोष पैदा कर देता है और फिर जो उसके सब आसपास होंगे, उन्हें भी उन दोषों को भुगतना पड़ता है। भौतिक जगत में कुछ बदलने की ज़रूरत नहीं फिर, क्योंकि वो पहले ही क्या है एक? एक यूनिफ़ाइड होल है। उसमें अगर कहोगे बदलना है, सचमुच बदलना है आपकी बात मान भी लें बदलना है, तो पूरा बदलना पड़ेगा। पूरा बदलना पड़ेगा, नहीं तो कुछ नहीं।

कुछ भी बदला नहीं जा सकता आंशिक तौर पर। आंशिक तौर पर जो भी बदलोगे वो बदलाव का भ्रम मात्र होगा। बदलना कहाँ पर है? बदलना भीतर है। और भीतर जो बदलना है उसकी कोई प्रक्रिया नहीं होती। ठीक वैसे जैसे भ्रम को हटाना कोई प्रक्रिया की बात नहीं होती। दर्शन की बात होती है। दर्शन, देख लिया; अब कोई आपको कितना भी बोले कि ये चारमीनार है, मानोगे क्या? क्योंकि देख लिया।

अच्छा, इतना आसान है तो अध्यात्म का तो पन्ना यहीं पर निपट गया पूरा। नहीं, भीतर थोड़ा-सा खेल अलग होता है। भीतर इस क्षण भ्रम खड़ा होता है चारमीनार बनकर, और अगले क्षण खड़ा होगा; ये क्या है? अच्छा, ये अमेरिका का पतझड़ है। ठंड बहुत चल रही है न, तो पत्ते पीले-पीले हो गए हैं। तो ये सब गिर रहा है, ऑटम है। कनाडा का ऑटम है यह। एक से मुक्ति मिली, दूसरा खड़ा हो गया। ये चारमीनार था, ये कनाडा है और मैं अलीबाबा हूँ। नहीं, तो उससे मुक्त हो जाओगे तो क्या कुछ नहीं है।

तो इसलिए मुक्ति लगातार चाहिए होती है। आसान है बहुत आसान है बहुत पानी; और उतनी ही आसान है गवानी। क्या मुक्ति बहुत आसान है? तत्क्षण, अभी, इंस्टेंटेनियस, अभी। गड़बड़, लेकिन एक रह गई; जितनी आसान है पानी, उतनी ही आसान है गवानी। चारमीनार से बचे, कनाडा में अटके। तो भ्रम को लगातार हटाना पड़ता है, लगातार। भ्रम को लगातार हटाना पड़ता है। हर नए भ्रम का उदय ही एक नया जन्म है, और उस भ्रम को मिटाना ही उस जीवन का अंत। पर किसी दूसरे भ्रम का उदय, अतः पुनर्जन्म है।

पुनर्जन्म प्रतिपल है। और ये बहुत अच्छी बात है, क्योंकि इससे ये साबित हो रहा है कि हमें जो मौके मिलते हैं, उनकी आवृत्ति अनंत है लगभग। अगर आपको ज़िंदगी जो मौके, जो चांसेज़ देती है, उनकी फ़्रीक्वेंसी हो वन इन अ हंड्रेड ईयर, तो सौ साल तक कतार में खड़े हो। ये बस सौ साल में एक बार आती है। एक बार छूट गई तो अब कब आएगी? सौ साल बाद। हमारे लिए अच्छी बात ये है कि ये बस भी कंटीन्युअस है। ये बस नहीं है, जैसे धीरे-धीरे चलती हुई एक अनंत रेल के डिब्बे हैं। एक डिब्बा छूट गया, अगला आ जाएगा।

पुनर्जन्म लगातार होगा, जब तक जन्म और मृत्यु से ही मुक्त नहीं हो जाते।

आप यहाँ बैठे हो, यहाँ बैठे-बैठे आपके आठ-दस जन्म हो चुके हैं। समझ में आ रही है बात? तो सबको बेचैनी है न? सबको परेशानी है न? अगले जन्म का इंतज़ार मत करिए। अगला जन्म सामने खड़ा है। अरे, वो बीत गया? कोई बात नहीं, अगला डिब्बा आ गया। उसमें चढ़ जाओ।

क्या पुनर्जन्म सत्य है? होता है? बिल्कुल होता है, लेकिन सौ साल बाद नहीं होता। अभी होता है, अभी होता है। क्योंकि जन्म ही किसका होता है? भ्रम का। और भ्रम एक गया, तो दूसरा आया। कब तक भ्रम आते रहेंगे? कोई अंत नहीं है, जब तक वो भ्रमित होने वाला स्वयं से ऊब नहीं जाता। क्योंकि यहाँ जो भ्रम है और जो भ्रमित है, ये दोनों अलग-अलग नहीं हैं। जो डिल्यूडेड वन है और जो डिल्यूज़न है, ये दोनों एक हैं। तो पुनर्जन्म लगातार है, लगातार है।

और अगर आपको फिर उम्मीद चाहिए, तो उम्मीद भी लगातार है, अच्छी बात है चलो। नहीं तो बेईमानी है कि मुझे ठीक होना है, पर सौ साल बाद। ठीक होना है न? तो चलो, अगले ही पल में अवसर है। तुम समय का ही इस्तेमाल करना चाहते हो, तो समय की सबसे छोटी इकाई है, द मोमेंट उसका इस्तेमाल कर लो। तुम बेहतर होना चाहते हो न? तो अगले ही पल बेहतर हो लो न, सौ साल इंतज़ार क्यों करोगे? क्यों करोगे?

“नहीं, बड़े-बड़े काम हैं एक पल में थोड़ी हो जाते हैं।” भौतिक कामों में समय लगता है, भ्रम मिटाने में समय नहीं लगता, ऐसे मिटता है। अहंकार भौतिक नहीं है, तो भ्रम मात्र को मिटाने में समय भी नहीं लगना चाहिए। क्यों कह रहे हो कि मुझे अभी इतना समय चाहिए, उतना समय चाहिए? नहीं पर भीतर का काम ठीक करने में समय नहीं लगता। बाहर का काम भी तो ठीक करना पड़ेगा न? बाहर का काम बिगाड़ा किसने? भीतर वाले ने। भीतर वाले को ठीक कर दो, बाहर काम अपने आप ठीक हो जाएगा। वो बड़ी माँ का डिपार्टमेंट है, तुम क्यों परेशान हो रहे हो? उनके डिपार्टमेंट को जिसने ख़राब कर रखा है, तुम उसको मिटा दो। नहीं तो उसको मिटाने में तो समय लगेगा ना? गोल-गोल मत घूमो। अभी समझाया न, गुस्सा मत दिलाओ। भीतर वाला, भीतर वाला है ही नहीं। और जो है ही नहीं, उसको हटाने में कितना समय लगता है?

“नहीं, पर बाहर वाला? भीतर वाला मिटा दिया, पर बाहर भी तो गड़बड़ है। हम ठीक हो गए तो क्या हुआ? दुनिया। दुनिया! ये दुनिया बड़ी गंदी चीज़ है।” दुनिया बड़ी गंदी चीज़ है। तो ये दुनिया तो प्रकृति है। क्या प्रकृति गंदी चीज़ है? नहीं। दुनिया गंदी चीज़ नहीं है, दुनिया को दुनिया वालों ने गंदा किया है। तो दुनिया वाला जो भीतर बैठा हुआ है, जो दुनियादारी में बड़ा अपना रस रखता है, इसका यथार्थ देख लो। दुनिया अपने आप ठीक हो जाएगी।

क्लाइमेट चेंज तुम्हारे कुछ करने से नहीं मिटेगा, वो तुम्हारे कुछ न करने से मिटेगा। जो तुम कर रहे हो, बस करना छोड़ दो। क्लाइमेट तो साल में ठीक हो जाएगा।

कोविड के दौरान ही सड़कों पर हिरण वग़ैरह निकल आए थे, नीलगाय निकल आई थी। जो ऊँची इमारतें होती हैं, उन पर लोग चढ़ जाते थे और कहते थे, “वो देखो, दूर की पहाड़ी दिखने लगी।” जन्मों में नहीं दिखी थी। तीन-चार-पाँच महीने भी पर्याप्त थे प्रकृति ने अपनी मरम्मत अपनी हीलिंग शुरू कर दी थी।

आप कहते हो, अभी हमें बहुत काम करना है, यू नो फेस द क्लाइमेट चैलेंज। तुम्हारे काम से ही आई है सारी बर्बादी, काम बंद करो। ऐसे कह रहे हो जैसे बर्बादी आई है नेप्च्यून से, और अब पृथ्वी वाले उन एलियंस का मुकाबला करेंगे जो हमारे प्यारे ग्रह को बर्बाद करना चाहते हैं, लेट्स ऑल गेट टुगेदर टू फेस दिस क्राइसिस। बट व्हेयर इज़ द क्राइसिस? द क्राइसिस इज़ हियर? व्हाट डू यू मीन बाय लेट्स ऑल गेट टुगेदर एंड यू नो यूनिफ़ाइड मिशन एंड कंसोलिडेटेड एफर्ट्स? ये किसको बेवकूफ़ बना रहे हो? कुछ आ रही है बात समझ में?

तो बाहर की मरम्मत स्वयमेव हो जाएगी। फोड़ दो ये अहंकार, ये अभिमान कि मुझे सब ठीक करना पड़ेगा। जो गलत है, वो तुमने किया है। और उसको ठीक करने का तरीका है तुम्हारा विथड्रॉल। तुम्हारा डीपर एंगेजमेंट नहीं चाहिए। क्योंकि तुम तो तुम ही हो न। तुम ही हो बर्बाद करने वाले तत्व, कर्ता, एजेंसी और तुम कह रहे हो, “मैं अभी और करूँगा तो ठीक कर दूँगा।” कैसे?

जैसे बड़ी माँ की रंगोली हो, रंगोली। और बड़ी-सी रंगोली है। एक घुस गया है उसमें छोटा झुन्नू और उसने क्या किया? उसने ऐसे-ऐसे कर दी। तो पीछे से आकर के माँ ने चपत लगाई, “क्या कर दिया?” तो बोल रहा, “अच्छा, ठीक करता हूँ।” कूद पड़ा बीच में। बोल रहा है, मेरी भूल, मैं ही सुधारूँगा। जो बचा-कुचा था, तो वो भी बर्बाद कर देगा। तेरा काम है, दूर से देख; यही साक्षित्व है। सब अपने आप ठीक हो जाएगा।

नॉन-एंगेजमेंट, डीपर डीलरशिप नहीं। हम एंगेज नहीं करेंगे, ये तो कायरता की बात है। अगर हम ही पीछे हट गए, आज के हम जवान, तो कौन इस जगत की समस्याएँ सुलझाएगा? पागल! उन समस्याओं को सुलझाने कोई भगवान नहीं आएगा। तुम ही सुलझाओगे पर तुम्हारे माध्यम से सुलझेंगी। अब तुम्हारे कर्तृत्व से नहीं सुलझेंगी, कर्ता होना और निमित्त होना दो अलग-अलग बातें हैं। तुम ही करोगे, पर अब तुम माँ से अभिन्न होकर के करोगे। अब तुम होल के प्रतिनिधि बनकर करोगे। पहले तुम क्या बन रहे थे? आई ऐम अ फ़्रैगमेंट इन मायसेल्फ, “अब मैं कुछ करूँगा।” तुम कह रहे थे, कि प्रकृति ये है और मैं उससे बाहर खड़ा हुआ हूँ। तुम कह रहे थे, आई ऐम स्टैंडिंग आउटसाइड ऑफ़ रियलिटी एंड नाउ आई विल रिपेयर द रियलिटी। नहीं।

अब तुम क्या कर रहे हो? अभी भी तुम्हारे ही माध्यम से कुछ होगा। तुम्हारे माध्यम से होगा, तुम्हारे कर्तृत्व से नहीं होगा। करोगे तुम ही पर फिर भी तुम नहीं कर रहे होगे, तब समझना कुछ शुभ हो रहा है। जब तुम ही कर रहे हो और उसके लक्षण, प्रमाण क्या होते हैं? उसमें तुम्हारे लिए कुछ नहीं होगा, न अच्छा, न बुरा; न सुख, न दुख; न लाभ, न दंड। समझ में आ रही है बात ये?

पुनर्जन्म से सीख है यदि तो यह, कि नया हो जाता हूँ। अभी जो मैं बना हुआ हूँ, इस जन्मे हुए में दोष है। इसको हटा करके स्वयं को नया जन्म दे लेता हूँ। कब? अभी। और ये जानते हुए अपने आप को नया जन्म दे रहा हूँ कि जो नया भी जन्म होगा, उसमें भी खोट तो होगी ही पर फिर भी नया जन्म दूँगा। क्योंकि नेति- नेति से ही आगे बढ़ना है। अभी जो है, इसको ठुकराया। कुछ थोड़ी ऊँचाई आई। ऊँचाई ही आई है, आकाश नहीं आ गया। जहाँ पहुँचे हैं, वहाँ भी जमकर तंबू गाड़ कर नहीं बैठ जाएँगे। फिर वहाँ भी नेति-नेति कर देंगे। पर कम से कम अभी जहाँ इसको ठुकराया, यहाँ थे; यहाँ से ऊपर आए, इसको हम क्या कहेंगे? ये क्या हो गया? नया जन्म हो गया।

ये कब तक चलाते रहना है? जब तक चलाने के लिए कोई है। जब तक ये प्रश्न शेष है कि “कब तक उठते रहें?” तब तक उठते रहो। जब ये प्रश्न ही मौन हो जाए कि “कब तक उठते रहें?” तब उठना-गिरना, ये सब अप्रासंगिक हो जाएगा।

जब तक उठने के लिए कोई बचा है, तब तक उठते रहो। यही पुनर्जन्म है। उठते रहो, उठते रहो।

अभी जो मैंने पुनर्जन्म की आपसे बात करी, वो अहंकार के संदर्भ में करी। जब हम प्रकृति के, यानी होल के; अभी जो बात थी, अहंकार, ये जो फ़िक्शनल फ़्रैगमेंट है, अभी उसके संदर्भ में करी। जब हम प्रकृति के संदर्भ में पुनर्जन्म की बात करते हैं, तब हम क्या कहते हैं? पुनर्जन्म क्या है? चेंज ऑफ फॉर्म, जैसे पेड़ पर नए पत्तों का आना; जैसे मौसमों का बदलना जैसे हवाओं का चलना; जैसे सागर का लहराना; जैसे उसी मिट्टी पर नए फूलों का खिल जाना, ये पुनर्जन्म है। पर वो पुनर्जन्म की बात, वही मैं ज़्यादा करता हूँ। वो पुनर्जन्म की बात किसके लिए है? होल के लिए, प्रकृति के लिए, कि जो पूर्ण है, जो सागर है, वही लहराता रहता है। और आज जो हमने पुनर्जन्म की बात करी, वो किसके लिए करी है? अहंकार के लिए। क्योंकि अहंकार ही है जिसको कुछ नया चाहिए।

आप में से कितने लोग बोलते हैं, बोर हो गए, चलो, कुछ नया हो जाए। तो “नया हो जाए” नहीं, “नए हो जाएँ”। क्या? कुछ नया हो जाए नहीं, हम नए हो जाएँ। कब? अभी। ये अहंकार के लिए व्यवहारिक परिभाषा हो गई पुनर्जन्म की। दुख अभी है, तो जो दुख का कारण है मूल, माने दुखी, द सफ़रिंग वन, क्यों न अभी उसको ठिकाने लगाएँ? और ठिकाने कैसे लगाएँ? हथौड़ा-वग़ैरह, रिवॉल्वर-वग़ैरह? कैसे? देख-के, देख-के, है न। तभी तो मैं कहता हूँ, भ्रम में भरोसा कर ही रहे हो तो पूरा ही करो फिर। बहुत बार बोला है। जब आप लोग ज़िद बहुत दिखाते हो न कि “नहीं, भ्रम नहीं है; असली चीज़ है”, तो मैं तो कहता हूँ, असली चीज़ है न। तो फिर पूरा भरोसा करो। एक काम करो, पाँच-सात आओ, चारमीनार पर चढ़ जाओ। अगर ये चारमीनार है तो चढ़ के दिखाओ। आओ न।

हम पूरा भरोसा भी नहीं करते, भीतर ही भीतर पता होता है कि दावे खोखले हैं। जो भी विधि लगाओ, चाहे दर्शन की, चाहे प्रयोग की। दर्शन की विधि क्या है? वहाँ बैठे-बैठे दिख गया कि “ये चारमीनार।” और प्रयोग की विधि क्या है? कि लेट मी नाउ प्ले ट्रू टू माय कन्विक्शन। मुझे इतना ही अगर कन्विक्शन है, इतना ही भरोसा है, इतना ही दावा है कि यही चारमीनार है, तो ठीक है उसकी चोटी पर जाकर बैठ जाओ। जाओ, बैठ के दिखाओ। एक काम करो, जाकर के वो जो उसकी चोटी है उस पर अपना पर्स टाँग दो। इतना तो करके दिखा दो, तुम्हें नहीं चढ़ना तो।

ये प्रयोग की विधि है। जो भी विधि लगाओ, लेकिन अपने भ्रम को ठिकाने पहुँचाओ। पकड़ के मत बैठे रहो, हम जाँचते भी नहीं। जब मैं कहूँगा कि “इतना ही असली लग रहा है” तो उसी पर बैठ जाओ, पास आ जाओगे। “नहीं, लेट्स चेंज द टॉपिक,” नहीं मतलब। लेट्स चेंज द टॉपिक नहीं, इसको बोलते हैं क्या? अंग्रेज़ी में, पुट योर मनी व्हेयर योर माउथ इज़। ये सचमुच तुम्हें चारमीनार लग रहा है तो चढ़ के दिखाओ।

नहीं, “हमारा अतीत बहुत अच्छा था” तो अतीत जैसा ही रह के दिखाओ। नहीं, “वो सब कुछ जो हमारे पुरखे कहते थे, वही बिल्कुल-बिल्कुल एकदम सही है।” समस्या आ जाएगी। इतनी बातें मुझे आपसे फिर कहनी पड़ेंगी करने को, जो आपको अस्वीकार हो जाएँगी। आसपास घूम रहे होते हैं न अतीतवादी, द गोल्डन पास्ट, तो मैं उनको कहूँगा, पास्ट में ही रहकर दिखाओ। वैसे ही जैसे जब चलता था तब। समस्या आ जाएगी, यू आर नॉट पुटिंग योर मनी व्हेयर योर माउथ इज़। आ रही है बात समझ में?

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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