वेनेज़ुएला और बांग्लादेश: सच्चाई हमारी-आपकी

Acharya Prashant

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वेनेज़ुएला और बांग्लादेश: सच्चाई हमारी-आपकी
कभी स्कूल गए हो वहाँ कभी किसी तीसरी क्लास के लड़के को पहली क्लास के लड़के को धुनते देखा है? देखा है? तो वही है ये। तीसरी क्लास वाले ने पहली क्लास वाले को पकड़ के पटापट- पटापट- धुन दिया, और यही है। इसका कुछ नहीं है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा जो सवाल है, वो हाल ही में अमेरिका द्वारा की गई वेनेज़ुएला स्ट्राइक को लेकर है। सवाल ये है कि अमेरिका में एक तरफ़ हमें सबसे पुराना लोकतांत्रिक ढाँचा देखने को मिलता है, और दूसरी तरफ़ वेनेज़ुएला में जो स्ट्राइक की है यूएस ने, वो किसी भी रूप में लोकतांत्रिक देश द्वारा।

आचार्य प्रशांत: मेरे पास कुछ नहीं है, बेटा, बोलने को। देखो, गुंडागर्दी की दुनिया है, तुम्हें उसमें सवाल क्या उठ रहा है। कोई भी किसी के घर से कुछ भी उठा ले जा सकता है। जिसके पास ताक़त है, जिसकी लाठी, उसकी भैंस। इसमें मैं क्या बता सकता हूँ? ये व्यवहारिक जगत है। क्या समझाया था? दो ही केंद्र होते हैं, या तो ट्रुथ का, नहीं तो पावर का। और जिस दुनिया में सत्य का केंद्र तिरस्कृत होता है, वहाँ सब कुछ पावर से चलता है। जिसके पास लाठी है, जिसके पास मिसाइल है, वो जो चाहे कर ले; वो तुम्हें तुम्हारे घर से उठा ले। तुम क्या कर सकते हो? इसमें कोई रहस्य नहीं है कि जिसका मैं आध्यात्मिक कुछ निदान दूँगा। ये तो वही है, छोटे गाँव-क़स्बों में अभी भी होता है, जहाँ पर कोई रूल ऑफ़ लॉ नहीं है। कोई भी कहीं भी घुस जाता है, किसी को उठा लेता है।

हमारे बिहार में तो अभी कुछ सालों पहले तक ये तक होता था कि अपहरण करके शादियाँ भी कर लेते थे; दुल्हन का ही नहीं, दूल्हे का। इसकी नौकरी-वौकरी लग गई, उसे घर से उठवा लिया, शादी कर ली हो गया, बस। क्या करें, इसमें कुछ नहीं है। मैं इसमें कोई गुप्त रहस्य निकाल के नहीं दे पाऊँगा।

कभी स्कूल गए हो वहाँ कभी किसी तीसरी क्लास के लड़के को पहली क्लास के लड़के को धुनते देखा है? देखा है? तो वही है ये। तीसरी क्लास वाले ने पहली क्लास वाले को पकड़ के पटापट- पटापट- धुन दिया, और यही है। इसका कुछ नहीं है। सड़क पर निकलते हो रातों को, पाँच-सात गबरू कुत्तों का झुंड आ जाए, खाए-पिए, मोटे-माटे, तो क्या करते हो? जल्दी बताओ। इधर-उधर भाग लेते हो, निकल लेते हो, कुछ तो कर लेते हो। और यही एक अकेली पिलाई सामने आ जाए तुम्हारे पास आधी जान की, इतनी बड़ी, वो भी कूं-कूं-कूं कर रही है। तो क्या करते हो? लातिया देते हो, और क्या है? यही चल रहा है, और कुछ नहीं।

अब इसमें जो जिओपॉलिटिकल एनालिस्ट्स हैं, वो कई परतें खोलकर लाएँगे। “इट्स ऑल अबाउट नेक्रो-टेररिज़्म। बताएँगे किस तरीके से कोकेन और ऑयल में एक हिस्टोरिकल रिलेशनशिप रही है। बेकार की बात। वेनेज़ुएला की पूरी तुम्हें हिस्ट्री बताई जाएगी, ह्यूगो शावेज़ ने ये किया, वो किया; फिर इसको कैसे मनोनीत किया, फिर इसका ये-वो। पढ़ लो, अच्छी बात है, रोचक बातें हैं पता होनी चाहिए। पर उस पूरी कहानी का, लंबी-चौड़ी कहानी होगी, उसका जो लंबो-लुबाब है, सार है वो यही है जिसकी लाठी, उसकी भैंस।

इसलिए तुम लोगों को भी बोलता हूँ:

बेटा, व्यवहारिक तल पर जीना है तो अपने बाज़ू मज़बूत रखो। और दोनों तरह की ताक़त होती है, भौतिक भी और मानसिक भी।

भौतिक ताक़त में तुम लोग कमज़ोर नहीं हो, अच्छे हो, तुम्हारी समस्या मनोवैज्ञानिक कमज़ोरी की है। भीतर से दबे हुए हो। और जो दब्बू होता है, उसको दुनिया और दबाती है। सत्य इसलिए चाहिए होता है ताकि दुनिया के सामने न दबना पड़े। तुम लोग दुनिया के सामने बहुत दब के चलते हो, और वहाँ जितना दबोगे न, वो उतना चढ़ेगी।

विरोध भी वही कर पा रहे हैं जिनके पास दम है। चीन ने कर दिया खुला विरोध, रूस ने भी कर दिया। और थोड़े ही कोई खुला विरोध कर पा रहा है। भारत ने नहीं किया, बस इतना बोल दिया, “ग्रेव कंसर्न, एम्बिगस।” यूके ने बोल दिया, “अरे, वो कोई अच्छा आदमी नहीं था; वी आर नॉट गोइंग टू ग्रीव ओवर हिज़ कैप्चर।” पावर का खेल है इसमें तो। इसमें ये भी समझो कि ये व्यवहार पर जितनी बातें होती हैं न सिद्धांतों की, आदर्शों की, ये खोखली होती हैं। दो ही चीज़ें हैं दुनिया में, या तो सत्य, नहीं तो बल। और सांसारिक बल भी अगर चाहिए हो तो उसके लिए श्रेष्ठ उपाय सत्य ही है।

वो बेचारा हमारा नॉर्थ कोरिया वाला कैसा महसूस कर रहा होगा अभी, ये सब कुछ टीवी पर देख के। “हैं! ये लोग घर में घुस के उठा ले जाते हैं!” नहीं घुसेंगे वहाँ, क्योंकि पाँच-सात उसने इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइलें पकड़ ली हैं। जो भी आपकी एंटी-मिसाइल कैपेबिलिटी है, उसके बाद भी ये एक अनबेयरेबल रिस्क है कि वहाँ जाकर उसको पकड़ रहे थे, और इतने में एक मिसाइल धोखे से भी चल गई, और इंटरसेप्ट नहीं हो पाई, और उड़ा दिया उसने वेस्ट कोस्ट पर कोई शहर, टेक वाले सब इधर ही हैं वेस्ट पर; तो क्या होगा? उसको घुस के नहीं पकड़ेंगे।

ऐसी है बाबू दुनिया। और जब देख लेते हो न कि ऐसी है, तभी घिना जाते हो। जब तक तुम ये मानते रहोगे कि ये दुनिया आदर्शों पर, सद्भावना पर, भाईचारे पर, सिद्धांतों पर चलती है, तब तक विरक्ति उठेगी ही नहीं। तब तक यही लगा रहेगा, *अरे भाई, रूल ऑफ़ लॉ है। हम अच्छे लोग हैं, शांतिप्रिय लोग हैं, सिद्धांत-प्रिय लोग हैं।” ये सब कमज़ोरों को और ग़रीबों को दिए जाने वाले दिलासे हैं। दुनिया चलती तो बल पर ही है, क्योंकि आदमी की वृत्ति तो पाशविक ही है। जंगल में कौन-सा नियम-क़ायदा चलता है? द लॉ ऑफ़ द जंगल, व्हिच इज़ द लॉ ऑफ़ माइट। जिसकी लाठी, उसकी भैंस।

हिरण के साथ गलत हो गया, वो किस अदालत में जाकर गुहार करेगा? “माय लॉर्ड, मैंने क्या बिगाड़ा था, मैं तो घास चर रहा था, जाने पीछे से झपट्टा मारा।” कुछ नहीं। शेर के पास एक ही दलील है, और वो काफ़ी है। उस दलील का नाम है, दाँत। शेर को वहाँ कोई और सबूत, साक्ष्य, प्रमाण, तर्क रखने की ज़रूरत नहीं है। दहाड़ मारकर बस दाँत दिखाना है अस्तित्व की अदालत को, और हिरण का वध वैध घोषित हो जाएगा।

इसी तरह आज तुम अमेरिका से जाकर सवाल-जवाब करो कि क्यों उठा लाए उसको? स्वाधीन देश है, संप्रभु देश है। वो जो भी है, वहाँ तानाशाह का जो भी था। पर तुम ऐसे उठा के कैसे ले आए? अमेरिका को भी कुछ और नहीं करना है। दहाड़ के बस अपने दाँत दिखाने हैं, और जो प्रश्न करता है वो दुबक के पीछे भाग जाएगा।

ये भावनाएँ, ये आदर्श, ये नियम, ये क़ायदे, इन सब के पीछे बस पार्श्विक बल बैठा होता है। नियम, क़ायदे, क़ानून, आदर्श सब दंड-संहिताएँ, ये भी वही लिखते हैं जो दंड देने के लिए बैठे हुए हैं। जिसको दंड दिया जा रहा है, क्या वो लिखता है दंड-संहिता? उससे पूछ के लिखी जाती है क्या? और जिसको लाठी चलानी है, वो तुम्हारे रैशनल माइंड को संतुष्ट करने के लिए रैशनलाइज़ेशन खोज लेता है।

वो सुनाई थी न ईसप की कहानी, भेड़िए की और मेमने की? कुछ याद है? क्या थी बताओ? ऐसे ही मुंडी हिला दी।

तो नदी बह के आ रही है उधर से इधर को। ठीक है? बाएँ से दाएँ को नदी बह रही है। भेड़िया उधर खड़ा हुआ है बाईं तरफ़, और मेमना इधर खड़ा है छोटा-सा। भेड़िया पानी पी रहा है, इधर भेड़िया ने देखा मेमना भी पानी पी रहा है। भेड़िया मेमने को बोलता है, “मेमने, बदतमीज़, दुराचारी, दुष्ट! तुझे बड़ों का ज़रा भी लिहाज़ नहीं है। तू मुझे अपना जूठा पानी पिला रहा है?”

मेमना ऐसे हाथ जोड़ के कहता है, “अरे चाचा, नदी तो तुम्हारी ओर से बह के मेरी ओर आ रही है। तो मैं तुम्हें अपना जूठा कहाँ पिला रहा हूँ?” भेड़िया कहता है, “अच्छा, तू नहीं पिला रहा। लेकिन तू ही है न वो जिसकी माँ ने मुझे जूठा पानी पिलाया था पिछले महीने।” मेमना कहता है, “महाराज, मेरी माँ को आप ही छह महीने पहले मार के खा चुके हो। तो वो पिछले महीने आपको जूठा पानी कैसे पिला सकती है?”

तो भेड़िया कहता है, “कितना बदतमीज़ और गुस्ताख़ मेमना है, इतनी देर से मुझसे बहस करे जा रहा है। तुझे किसी ने सिखाया नहीं बड़ों से बहस नहीं लड़ाते, तुझे सज़ा मिलेगी।” पट से मार के खा जाता है। “बदतमीज़ है, बहस करे जा रहा है। मैं कुछ भी बोल रहा हूँ, मेरी बात काट रहा है।” जिसको जो करना है, वो करने के लिए वो कारण गढ़ लेता है।

मामला तेल का है। और तेल के इस मामले में कोई नहीं कह रहा कि अरे, ग्रीन एनर्जी कहाँ गई? अरे, क्लाइमेट क्राइसिस कहाँ गई? वेनेज़ुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े ऑयल रिज़र्व्स हैं। अमेरिका पी लेगा उसको, बड़ी अच्छी बात है, पी तो लोगे पर ऑयल माने क्या होता है? कार्बन डाइऑक्साइड। कहाँ गया सीओपी-30? कहाँ गया 2030? कहाँ गया पेरिस एग्रीमेंट?

और अभी भी जो बात हो रही है, सारी जिओपॉलिटिकल लेंस से हो रही है। क्लाइमेट लेंस से तो कोई बात ही नहीं कर रहा इसकी। ये जो हुआ है, इसके क्लाइमेट पर अब क्या प्रभाव होंगे? क्या दुष्परिणाम? उसकी तो कोई बात ही नहीं कर रहा है। और खेल सारा ऑयल का है।

मिडिल ईस्ट में भी खेल किसका था? ऑयल का था। सद्दाम हुसैन को कुवैत क्यों चाहिए था? ऑयल के लिए। अमेरिका वहाँ क्यों घुसा? ऑयल के लिए। हाँ, आपको दिखाया ये जाएगा जैसे यहाँ मामला सारा लॉफुल है। “देखो, बाक़ायदा अदालत में मुक़दमा चला के सद्दाम हुसैन को फाँसी दी गई है।” उसे कोई फाँसी नहीं दी जाती, उसको तो हथियार दिए गए थे। ईरान-इराक युद्ध लगभग दस साल तक चला था, और बाक़ायदा दोनों सुपर-पावर्स ने एक पक्ष को हथियार दिए थे। ख़ुद न लड़ पाते इतना, दस साल।

जिसको तुमने हथियार दिए थे, आज उसी को तुम फाँसी दे रहे हो। और एक पक्ष को नहीं, तुम दोनों के दुश्मन हो। तुम इराक वाले को भी फाँसी दे रहे हो, आज तुम ईरान वाले के भी जानी दुश्मन हो। उनको जाकर बम गिरा रहे हो, और कह रहे हो जो काम अभी इसके साथ किया, वेनेज़ुएला के साथ, कुछ महीने पहले लगभग वही काम तुम तेहरान में करने वाले थे। उनके आयातुल्लाह को उठा लाएँगे।

और उन्हीं को तुमने बहुत, अभी साल नहीं कुछ दशक पहले ही, क्या दे रहे थे? हथियार। दस साल चली उनकी लड़ाई। सारा खेल किसका था? तेल का। तेल का खेल। खेल का तेल, तेल का खेल।

तेल माने क्या? एनर्जी। एनर्जी किस लिए चाहिए? अब और आ जाओ, अब थोड़ा मामले को बना ही देता हूँ आध्यात्मिक। एनर्जी चाहिए किस लिए? कामनाएँ पूरी करने के लिए। और क्या करोगे एनर्जी का? इंसान की भावनाएँ, कामनाएँ एनर्जी माँगती हैं। जंगल काटना, एनर्जी चाहिए। बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी करनी हैं, एनर्जी चाहिए। हमर से भी बड़ी हमर बनानी है तो उसके लिए और एनर्जी चाहिए। और एनर्जी जितनी सस्ती होगी दुनिया के बाज़ार में, तुम्हारा माल उतना कम्पिटिटिव हो जाएगा। तो इधर-उधर से अगर तुम्हें मुफ़्त का ही तेल मिल जाए, तो वैश्विक व्यापार पर भी तुम्हारा क़ब्ज़ा हो जाएगा।

और मैं कोई, जो गिरफ्तार हुआ है व्यक्ति, क्या नाम है उसका? मैं कोई उसका तरफ़दार नहीं हूँ। वो बिल्कुल ड्रग डीलर था। मैं ग्लोरिफ़ाई नहीं करूँगा उसको कुछ और बोल के कि “ही वाज़ कम्प्लिसिट इन नारकोटिक्स ट्रेड।” जैसे जिसकी लाठी उसकी भैंस चलता है, वैसे ही होता है न। गली-मोहल्ले के जो ये बेच रहे होते हैं स्कूल-कॉलेज के सामने, ड्रग्स, कोकीन, गांजा-वांजा, वैसे ही वो है। वो राष्ट्रपति होकर भी यही काम कर रहा है। पर काम यही कर रहा है वह।

तो समझ लो कि एक गुंडे ने एक ड्रग डीलर को उठा लिया। ये घटना ग्लोबल लेवल पर घटी है, तो इसलिए ऐसा लग रहा है जैसे कुछ और हुआ है। पर ले-दे के यही हुआ है। यही हर छोटे गाँव-शहर में भी होता रहता है कि एक ऐसा ही था कोई, क्या? गुंडा, और एक था जो इधर-उधर ड्रग्स थोड़ा-बहुत किया करता था। तो गुंडा जाकर ड्रग डीलर को उठा लाया है, बीवी समेत। यही है।

प्रश्नकर्ता: सर, इसमें एक छोटा-सा फ़ॉलो-अप और है। जैसे आपने भी काफ़ी बार पहले बात की है, जो मतलब पॉज़िटिव साइट्स हैं अमेरिका जैसे देश की, वहाँ की यूनिवर्सिटीज़, गेम्स, और जो यूनिवर्सिटीज़ में भी टाउनशिप्स हैं, उन सभी को लेकर। तो वहाँ पर इतनी सारी पॉज़िटिव चीज़ें होने के बाद, मतलब ऐसे नेता पावर में कैसे एक्ज़िस्ट कर पा रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: भाई, वो उसको वोट दे दिया, वो चढ़ गया। इस वक़्त पर उसकी अप्रूवल रेटिंग 36-38% है। अब रोते होते रहो, अब एक बार उसको तो चढ़ा ही दिया है। और जब तक आएगा दोबारा चुनाव, तब तक वो कुछ और कर देगा। इधर-उधर ले लो। वहाँ भी तो फ्री-बी चलते हैं, आके कोई और बात कर दी। धर्म वहाँ भी चलता है। “गॉड ने ये करा है, गॉड ने वो करा है;” गॉड का नाम ले लो, और कोई कंज़र्वेटिव बात बोल दो। वहाँ भी तो आबादी बहुत है।

लेकिन इस वक़्त पर ज़्यादातर लोग अमेरिका में भी ट्रंप को पसंद नहीं कर रहे हैं। 36-38% अभी एकदम जो ख़ालिया अप्रूवल रेटिंग्स हैं वो चेक कर लेना। पर 40% के नीचे ही-नीचे हैं। पर अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गई खेत। देखो, क्या होता है न इन चुनाव-वग़ैरह में, विनर टेक्स ऑल होता है। 51% पर भी आपको एब्सोल्यूट पावर्स मिल जाते हैं। तो माने आधा देश तो पहले ही आपके ख़िलाफ़ था, लेकिन फिर भी आपको एब्सोल्यूट पावर्स तो मिल ही गए हैं न। और एब्सोल्यूट पावर एक बार नहीं मिले, वो अब चार साल के लिए मिले हैं।

प्रश्नकर्ता: सर, साथ में जो अभी ये जो इंसिडेंट हुआ है, इसमें मैंने कुछ मीडिया हाउसेज़ के आर्टिकल्स को देखा, वो इसको वर्ल्ड वॉर थ्री की तरफ़ इंगित कर रहे हैं।

आचार्य प्रशांत: तभी तो तुम वो पढ़ोगे, और क्लिकबेट कर रहे हो सब। हर दिन आठ या दस बार वर्ल्ड वॉर थ्री शुरू हो जाता है। जहाँ युद्ध नहीं भी हो रहा होता, मीडिया वहाँ भी युद्ध की ख़बर बता देता है। जहाँ कुछ हो रहा है, वहाँ तो फिर छोटा-मोटा युद्ध थोड़ी बताया जाएगा, वहाँ तो विश्व युद्ध ही बताया जाएगा।

पर कोई युद्ध-युद्ध नहीं होने वाला; वो वेनेज़ुएला की क्या हैसियत है कि वो अमेरिका से जाकर कुछ करेगा। बल्कि अब तुम्हें बताता हूँ आगे क्या होने वाला है। मेरी बात को परख लेना। अब आगे बैठेगी पंचायत। जानते हो क्या तय करेगी? तेल का बँटवारा कैसे करना है। ये दुनिया है, यहाँ जब शिकार मार दिया जाता है तो फिर अदालत इस बात पर नहीं बैठती कि मारना सही था या गलत। फिर पंचायत इस बात पर बैठती है कि अब मांस बँटना कैसे है।

यही सब तो जब कोई देखने लगता है साफ़-साफ़, तब दुनिया के प्रति नाउम्मीदी और नापसंद जगती है, और वो विरक्ति ही अध्यात्म की दिशा में पहला कदम होती है। घिन उठती है कि दुनिया ऐसी है और अगर सचमुच ऐसी है, तो मुझसे क्या झूठ बोला गया था? नियम, क़ायदा, संविधान, संयुक्त राष्ट्र, शांति, परस्पर सद्भाव, पंचशील, ये सब फिर क्या हैं? अगर सब कुछ बस बाहुबल से और पार्श्विक ताक़त से ही तय होना है, तो तब जाकर के विरक्ति उठती है।

और ये बात दो राष्ट्रों के बीच की नहीं है, ये बात घर-घर की है, बेटा। घर में भी यही हो रहा है। आठ लोग रहते हों किसी परिवार में, जिसके पास पैसा है, जिसके पास सत्ता है, बाक़ी सात उसके कहे अनुसार चलेंगे। और जिसके पास पैसा है, सत्ता है, वो उन बाक़ी सात में से जिसको चाहे पीट भी देगा। जो घर-घर में होता है, वही देश-विदेश में होता है। क्योंकि करने वाला तो वही है न, पुराना इंसान और उसका पुराना अहंकार।

तुम्हें क्यों लग रहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो हो रहा है, उसका कर्ता कोई और है? द ईगो इज़ द डूअर, वेधर इट्स बिटवीन टू पर्सन्स ऑर टू नेशन्स।

लिख रहा हूँ। इस बार का जो मेरा लेख आएगा ‘पायनियर’ में, वो इसी पर रहेगा। वेनेज़ुएला और बांग्लादेश को लिया है, इनकी तुलना करी है। दोनों ही जगह पर हिंसा हुई है। इन दोनों को लेकर लिखा है। अभी आ जाएगा, दो-चार दिन में। अब बांग्लादेश मत पूछने लगना। जो लिखना है, बांग्लादेश पर लिख रहा हूँ अभी छप जाएगा, दो-तीन दिन में।

वहाँ माइनॉरिटीज़ हैं कमज़ोर, तो उनको पकड़ के रगड़ दिया। यहाँ वेनेज़ुएला ही कमज़ोर था, तो उसको पकड़ के रगड़ दिया। कोई अंतर है? जहाँ जो कमज़ोर होता है, वो रगड़ा जाता है। यही चल रहा है।

बांग्लादेश में हिंदू 8% की जगह 28% होते, तो थोड़े रगड़े जाते, जैसे वो रगड़े जा रहे हैं। क्योंकि कौन-सा हम किसी की सच्चाई की क़ीमत करते हैं। कौन-सा हमारे रिश्ते प्रेम के होते हैं। हम तो बस ये देखते हैं कि जिसके पास ताक़त है, उससे दब के रहो; और जो कमज़ोर है, अल्पमत में है, उसको पकड़ के रगड़ दो।

या मान लो वेनेज़ुएला रूस के न्यूक्लियर अंब्रेला में होता, तो भी नहीं रगड़ा जाता। आप वेनेज़ुएला पर आक्रमण करेंगे, तो वो रूस पर आक्रमण माना जाएगा। तो अमेरिका नहीं करता ये सब। बात अमेरिका की, वेनेज़ुएला की, हिंदू की, मुसलमान की नहीं है। बात उसी पुराने पाशविक अहंकार की है, जो जिसको कमज़ोर देखता है उसी का शिकार कर लेता है। जिसको अपने स्वार्थ के आगे और कुछ सूझता ही नहीं, जो प्रेम जानता ही नहीं।

प्रश्नकर्ता: सर, दुर्भाग्य के साथ एक इंसिडेंट अभी नॉर्थ-ईस्टर्न स्टूडेंट का भी हमने देखा। जिसको मिसअंडरस्टैंडिंग से।

आचार्य प्रशांत: वहाँ भी वही बात है, बिल्कुल। वहाँ भी यही बात है। छोटे-छोटे राज्य हैं हमारे उत्तर-पूर्व के, आबादी भी कम है उनकी। और उनमें से कुछ गिने-चुने दिल्ली में, मुंबई में शिक्षा के लिए आ जाते हैं, तो वो और कम दिखाई देते हैं, तो आप उनका मज़ाक उड़ा लेते हो।

ये लोग जो मज़ाक उड़ा रहे हैं, बाक़ी छोड़ो कि राष्ट्रीय एकत्व की भावना होनी चाहिए, राष्ट्रीय भाईचारा, बंधुत्व, ये हटाओ। ये जो फ़ब्तियाँ कस लेते हैं हमारे उत्तर-पूर्व के भारतीय नागरिकों पर, इनको कहो: तुम जाओ नागालैंड जाओ, मेघालय जाओ, और वहाँ यही बातें बोलकर दिखाओ जो तुम बोलते हो। “चिंकि-मोमो, नूडल,” जो भी तुम कर रहे हो, जाओ वहाँ कोहिमा में करके दिखाओ। नहीं कर पाएँगे। क्यों? क्योंकि वहाँ ये अल्पमत में हैं, वहाँ इनको पता है कि नालायकी करोगे, बदतमीज़ी करोगे, तो पीट दिए जाओगे। ऐसा नहीं कि इनको वहाँ जाकर हमारे नॉर्थ-ईस्ट के भाइयों के लिए बड़ा प्रेम आ गया है। प्रेम-वग़ैरह कुछ नहीं आया, पर वहाँ ये सलीके से रहेंगे, क्योंकि पता है पीटे जाएँगे।

इस दुनिया में यही चलता है, बेटा। डंडा ही चलता है। बस कोई आदमी अगर सलीके से चल रहा है, तो ज़्यादा बड़ी वजह यही होगी कि उसे डंडे का ख़ौफ़ है। दो ही बातें होती हैं न, या तो भय, या तो प्रेम; या तो बल, या तो सत्य। प्रेम होता क्या है? हम जानते नहीं। तो हमारे सारे रिश्ते, चाहे वो व्यक्तिगत हों कि अंतरराष्ट्रीय हों सब भय पर ही चलते हैं। जिसको कमज़ोर देखोगे, उसको मार दो, रगड़ दो, कुछ भी कर दो।

पर ये बहुत घातक बात है। इसका मतलब ये है कि फिर दुनिया का हर राष्ट्र कहेगा कि मुझे भी न्यूक्लियर वेपनरी चाहिए। क्योंकि अगर मैं कमज़ोर रह गया, तो अमेरिका मेरे साथ कुछ भी कर सकता है। एक ही चीज़ चल सकती है, डिटरेंट। अगर रिटेलिएशन का भय हो, डिटरेंस खड़ी हो, तो फिर कुछ नहीं होगा आपके साथ। मतलब समझ रहे हो न इस बात का?

अमेरिका में चलता भी यही है। जो गन कल्चर है, वो और क्या है? वो कहते हैं, अब जब सबके पास बंदूक है, आप हमें बंदूक नहीं रखने दोगे, तो डिटरेंस कैसे रह जाएगी? क्योंकि अब तो सबके पास है।

प्रश्नकर्ता: लाइसेंसिंग पॉलिसीज़ काफ़ी ईज़ी हैं वहाँ पर, या शायद हैं ही नहीं।

आचार्य प्रशांत: तो ऐसी ही दुनिया बन जाएगी। जैसे एक-एक इंसान के पास, एक-एक घर में बंदूक है, वैसे ही एक-एक राष्ट्र के पास न्यूक्लियर वेपन होंगे। क्या है समाधान? समाधान तो वहीं पर होगा न, जहाँ बीमारी है। और बीमारी है इंसान की छाती में। ये मत समझना कि बात संसदों की, और विधानसभाओं की, और संविधानों की और संयुक्त राष्ट्रों की है। बात इंसान के दिल की है। और इस दिल को जब तक साफ़ नहीं किया जाएगा, तब तक जो चल रहा है ऐसे ही चलेगा।

प्रश्नकर्ता: थैंक यू, आचार्य जी।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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