
प्रश्नकर्ता: इफ देयर इज नो कासेप्ट ऑफ रिबर्थ, देन व्हाई एंड हु रोट द गरुड़ पुराण? व्हाट इज इट्स एक्चुअल मीनिंग?
आचार्य प्रशांत: गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद जीवात्मा से संबंधित बहुत सारे वृतांत हैं। कर्मकांड कैसा होना चाहिए? शरीर से निकल के जीवात्मा कैसी यात्रा करती है? ये सब वहाँ पर है।
प्रश्न इसीलिए उठ रहा है क्योंकि बारह सत्र हो चुके हैं और आपने एक भी सत्र का अवलोकन नहीं लिखा है। एक भी बार आपने जाकर कुछ नहीं लिखा है। देखिए, मैं सौ साल तक बोलता रहूँगा, आप सौ साल तक यूँ ही बैठकर सुनते रहेंगे, लाभ नहीं होगा।
ये जो आपने अभी प्रश्न पूछा है न, ये प्रश्न कब का आपका सुलझ गया होता? प्रत्येक सत्र ये क्षमता रखता है कि आपके सब सवालों के उत्तर दे दे। पर हमारे सवाल सारे बिल्कुल बचे रह जाते हैं और वो बचे ही रह जाएँगे। आप मुझसे ही प्रश्न पूछ रहे हो और मैंने ही जो आपको प्रक्रिया सुझाई है, कि सत्र को सुनो और फिर जाकर अपने दिमाग लगा के, ख़ुद जो समझ में आया है, वो लिखो। आप उस प्रक्रिया का पालन एकदम ही नहीं करना चाहते। जीरो आउट ऑफ 12।
आप ये सम्मान दे रहे हैं अगर ज्ञान की पूरी प्रक्रिया को, तो आपको फिर कैसे समझ में आएगा? अब ये जो आपने प्रश्न पूछा है, ये बहुत ही एकदम प्राथमिक तल का है। एकदम साधारण है। कब का इसका उत्तर मिल गया होता।
इस प्रश्न के पीछे आपकी मान्यता ये है कि क्या पता वो सब होता ही हो, कि शरीर से चिड़िया निकली, उड़ गई, यात्रा कर रही है। गीता के दर्जनों श्लोकों की जब हम कर चुके हैं व्याख्या, और हर एक में यही बात निकलकर के आ रही है कि कोई व्यक्तिगत पुनर्जन्म जैसी चीज़ होती नहीं है। तो फिर ये प्रश्न बचना क्यों चाहिए था?
गीता तो छोड़िए, अभी कल परसों में ही अष्टावक्र गीता का हमने श्लोक लिया। जहाँ ऋषि समझा रहे थे कि तुम्हारे इतने पुनर्जन्म हो चुके हैं और हर जन्म में तुमने शरीर से, मन से, वाणी से, कर्म से इतना प्रयास किया है। अरे, अब तो संभल जाओ, सुधर जाओ। और उसमें हमने पुनर्जन्म के सिद्धांत की एक बार फिर से पूरी व्याख्या की, लेकिन आप ने कुछ सुना नहीं, आपने कुछ समझा नहीं। आप कह रही हैं, “इफ देयर इज नो कॉन्सेप्ट ऑफ रीबर्थ।” कभी मैंने ये कहा, इफ देयर इज नो कॉन्सेप्ट ऑफ रीबर्थ?
मैंने कहा है, पुनर्जन्म तो होता है पर उसका नहीं जिसका लोकधारणा में प्रचलित है। पुनर्जन्म तो होता है पर व्यक्तिगत अहंकारी का नहीं होता, अहम् वृत्ति है जो बार-बार जन्म लेती रहती है। वो आपके सामने इतनी बार जन्म लेती है मरती है। आपके चारों ओर अहम् वृत्ति का ही तो जन्म मरण का खेल चल रहा है। भूतकाल में भी वही चल रहा था, भविष्य में भी वही चलता रहेगा। इतना समझा कर के अभी कल परसों में ही हमनें उस पर बात करी है; कल तो भगवद्गीता था, परसों। पर आपने या तो सुना नहीं, और अगर सुना तो आपने कुछ लिखा नहीं। संभावना यही है कि आपने सुना तो है शायद, पर आप लिखते कुछ नहीं हो।
हर तीसरे-चौथे सत्र में हम पुनर्जन्म पर वापस आते हैं। बार-बार आते हैं, और इतना सुंदर सिद्धांत है पुनर्जन्म का। अष्टावक्र गीता के माध्यम से हमने समझा कि वो सिद्धांत है ही इसीलिए ताकि हम विरक्त हो सकें, उपराम हो सकें।
जो एक बार समझ जाएगा कि पुनर्जन्म क्या होता है, वो फिर क्यों इस संशय में पड़ेगा कि पुराणों में क्या लिखा हुआ है?
अगर कहीं कोई ऐसी बात लिखी है जो श्रुति-विरुद्ध है, वेदान्त-विरुद्ध है, तो जिसने भी लिखी हो, वो अज्ञानी ही होगा। यही उत्तर है। कि वेदान्त-विरुद्ध और श्रुति-विरुद्ध बात जो भी लिख रहा है, आप पूछ रहे हो उसका क्या नाम है? मैंने कहा, अज्ञानी है उसका नाम और क्या नाम हो सकता है? जिस परंपरा ने आपके मन में पुनर्जन्म की बात डाली है, उसी परंपरा ने ये भी तो बताया है न, कि श्रुति-विरुद्ध कोई भी बात हो तो उसको तुरंत अस्वीकार कर लेना। कहा है न? हाँ तो पुनर्जन्म का जो सिद्धांत है, जिस रूप में वो प्रचलित है, वो श्रुति-विरुद्ध है।
ऐसा नहीं कि पुनर्जन्म झूठी बात है, लेकिन पुनर्जन्म को जैसे समझा है लोगों ने, वो बिल्कुल झूठी बात है, वो श्रुति-विरुद्ध है। पुनर्जन्म होता है, निश्चित रूप से, पर उसका नहीं जिसका आप सोचते हो। और किसी भी पुराण में या किसी भी और किताब में अगर कोई ऐसी बात लिखी है जो सीधे-सीधे भगवद्गीता, उपनिषदों और अष्टावक्र गीता के विरुद्ध जाती है, तो हम क्यों पूछें कि किसने लिख दी? जिसने भी लिख दी, उससे हमें कोई लेना-देना नहीं।
मैं आपको आपके धर्म के विरुद्ध कोई बात नहीं सिखा रहा हूँ। मैं आपको बता रहा हूँ कि आपका ही धर्म क्या कहता है। आप सनातनी कहते हो न अपने आप को, मैं आपको बता रहा हूँ कि सनातन धर्म के ही जो केंद्रीय ग्रंथ हैं, वो क्या बात कहते हैं। पुराण वग़ैरह स्मृति-साहित्य हैं, स्मृति-साहित्य माने वो जो मनुष्य द्वारा रचित है, कल्पित है। और स्मृति-साहित्य का ऐसा है कि उसे कोई भी इंसान कभी भी लिख भी सकता है और कभी बदल भी सकता है, और नए ग्रंथ भी लिखे जा सकते हैं स्मृति में।
श्रुति अकेला है, जिसे माना गया कि वो प्रकट हुआ है, रिवील्ड है, अपौरुषेय है। अपौरुषेय है माने, इंसान ने नहीं लिखा है, माने हमारे साधारण मन की वो कल्पना या उपज नहीं है। इसलिए श्रुति का स्थान स्मृति से बहुत ऊपर रखा गया है और साफ़ नियम है कि स्मृतियों की जो भी बात श्रुति के विरुद्ध जाएगी, तुरंत उसको छोड़ दो।
लेकिन पुनर्जन्म की बात जहाँ आएगी, वहाँ फिर भूत-प्रेत भी आ ही जाएगा। वहाँ फिर पाप-पुण्य भी आ जाएगा। आप देखते नहीं हो कि बहुत सारे लोगों के उसके साथ स्वार्थ जुड़े हुए हैं। इसीलिए वो लोग उन बातों को बिल्कुल ज़िंदा रखते हैं। जिसको आत्मा के नाम पर कमाई होती है, वही आत्मा के बिल्कुल विकृत स्वरूप को ज़िंदा रखता है। ये बोल के कि आत्मा वो चीज़ है जो छाती से निकलती है और हवा में घूमती है, ये वही आदमी है जो आत्मा के नाम पर कर्मकांड करके कमाई भी करता है। आपको इसमें स्वार्थ का सीधा खेल नहीं दिखाई देता। हम भोले हैं कि क्या है? और ये सारी बात मुझे आपसे इसलिए करनी पड़ रही है क्योंकि आपने एक भी सत्र का अवलोकन नहीं लिखा।
देखिए, गलती आपकी, सज़ा मैं भुगत रहा हूँ। आपने सत्रों का अवलोकन लिख लिया होता तो अभी मैं मुक्त होता कि मैं और दूसरा कोई प्रश्न ले लेता। या कि मैं आपसे भी किसी ऊँचे मुद्दे पर बात कर पाता। अब मैं फिर से उसी मुद्दे पर बात करने को मजबूर हो गया जिस मुद्दे पर मैं पहले सैकड़ों बार बात कर चुका हूँ और परसों अभी बात करी थी, इतने विस्तार में बात करी थी।
लेकिन आप लोग न सत्र सुनते, न अवलोकन लिखते। वही-वही प्रश्न घुमा-फिरा करके फिर से मेरे पास ले आते हो। इतना तो मेरा अधिकार है नहीं कि मैं आपको आदेश दे सकूँ, तो मैं प्रार्थना करता हूँ, जाकर वहाँ लिखा करिए, आपको नहीं समझ में आ रही है बात। ठीक वैसे जैसे आपने कभी शायद अपने छात्र-जीवन में गंभीरता से पढ़ाई-लिखाई नहीं की। आप अभी भी गंभीरता से पढ़ाई-लिखाई नहीं करना चाह रहे। ये आपका मौका है एक अच्छे छात्र बनने का, जो शायद आप अपने बचपन और जवानी में कभी नहीं बने।
आपके जो भी तब जब नंबर आए होंगे, अब फिर से आपको जीवन ने एक मौका दिया है कि एक ऊँची पढ़ाई में अच्छे अंक, अच्छा स्थान, अच्छा दर्जा प्राप्त कर सको। लेकिन आप अपनी वही आदतें दोहरा रहे हो, जो आपकी छठी क्लास, आठवीं क्लास, दसवीं क्लास और कॉलेज में थी।
जैसे कॉलेज में आपका था, कुछ पढ़ा, कुछ नहीं पढ़ा, बस किसी तरीके से घिसट रहे थे। उसी तरह से घिसटने का काम हम लोग गीता श्रृंखला में भी कर रहे हैं, बस घिसट रहे हैं। तो फिर वही नतीजा निकलेगा जो स्कूल, कॉलेज की पढ़ाई से निकला था। जब जीवन ने एक नया सुंदर ऊँचा अवसर दिया है, तो उसका लाभ आप क्यों नहीं उठा रहे हो, भाई? डाँट नहीं रहा हूँ, बुरा भी आप लोग जल्दी मान जाते हो और डर भी जाते हो। “ऐसा कह दिया, वैसा बोल दिया।”
करे हैं अठारह सत्र और अवलोकन लिखे हैं तीन और सवाल हैं, जिसका जवाब मैं पंद्रह साल से दे रहा हूँ।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप बोलते हैं हम सब ज़िंदा हैं ही नहीं, सभी मुर्दा हैं। जब भी कोई पूछे, ‘कैसे हो?’ तो जवाब है, मुर्दा हैं। तो मेरी समझ में ये नहीं आती कि हम मुर्दा कैसे हैं और मुर्दा की परिभाषा क्या है? और अगर जो ज़िंदा हैं, तो हम उन्हें ज़िंदा कैसे मान लें? कोई ज़िंदा होता भी है कि नहीं? ज़िंदा की परिभाषा क्या है?
आचार्य प्रशांत: कितनी बार इसका उत्तर दें, भाई? ये तो छोड़ो कि सत्रों में इस पर चर्चा होती है। सत्रों के बाद जो दोहे गाए जाते हैं, उनमें तक में इसका उत्तर होता है, महीने में तीस दिन, “मरने पहले जो मरे, अजर-अमर फिर होए।” मिल गया सारा उत्तर। और ये कितनी बार तो दोहा गाया जा चुका है, पर न सत्र सुनते, न वहाँ जाकर रिफ्लेक्शन लिखते। आज तक तीन पोस्ट की हैं आपने।
मुझे आपसे खिलवाड़ करना चाहते हैं, मुझे आपसे मज़ाक करना चाहते हैं? मेरा वहाँ कोई निजी स्वार्थ है कि मैं आपसे बोल रहा हूँ कि वहाँ लिखो? आपको चीज़ें नहीं समझ में आ रही हैं और क्योंकि आपको चीज़ें नहीं समझ में आ रही, इसीलिए आपकी ज़िंदगी नहीं बदल रही है। चीज़ें नहीं समझ में आएँगी, ऐसे ही आप स्क्रीन के सामने बैठ जाते हो। कभी-कभार आप सोचते हो, “आपने सत्र सुन लिया।” ऐसे नहीं होता, बाबा। उसमें अपने आप को अप्लाई करना पड़ता है। पैसिव रिसीवर बन करके कुछ नहीं होता। जो सुना है, उसके साथ कुश्ती करनी पड़ती है, उसको अपने सिस्टम में इंटीग्रेट करना होता है। उसके साथ एंगेज करना होता है। और उस एंगेजमेंट का जो रिज़ल्ट है, उसको जाकर लिखना होता है।
यही डायक्लेक्टिकल प्रोसेस है। यही सुकरात का प्रोसेस था, यही उपनिषदों का प्रोसेस है। लर्निंग का पूरा प्रोसेस यही है कि इधर से जो आ रहा है स्क्रीन से, और इधर (अपनी तरफ़ इंगित करते हुए) से जो आ रहा है, इन दोनों में आपस में एक जीवंत क्रिया हो। और फिर उस क्रिया का जो उत्पाद निकलता है, वो आपको ऊपर उठाता है।
पर आप क्रिया करते ही नहीं। बस मैं स्क्रीन से आपकी तरफ़ चीज़ें उछालता रहता हूँ, उछालता रहता हूँ, आप उसके पैसिव रिसीवर हो। इसीलिए आपको बहुत साधारण बातें भी समझ में नहीं आती। ये तो छोड़िए कि ये प्रश्न सत्रों में मैंने कई बार लिया है, यूट्यूब पर इससे संबंधित कुछ नहीं तो तीन सौ वीडियो मेरे पड़े होंगे, इसी बात से संबंधित।
इसमें कोई मेरे व्यक्तिगत मान-अपमान की बात नहीं है कि मैं आपको कुछ निर्देश देता हूँ। आप उसका पालन नहीं करते। मुझे बुरा ये लगता है कि आपको जो लाभ हो सकता है, वो हो नहीं रहा है।
अब आपको क्या करना है? यही अपने ही प्रश्न का उत्तर पीछे के सत्रों को सुनकर, या फिर यूट्यूब पर जो वीडियो हैं उसको लेकर के, या फिर किन्हीं किताबों से पढ़कर के, आपको स्वयं ही इसका उत्तर लिखना है कम्युनिटी पर। ठीक है? मैं इसका उत्तर नहीं दूँगा। आपको ख़ुद ही खोजना है और लिखना है। और ख़ुद एकदम खोज नहीं पाए, अपनी चेष्टा के अंत तक पहुँचो। तब मैं मौजूद हूँ सहारा देने के लिए, पर आप अपनी कुछ चेष्टा तो करिए और लिखिए।