
नीकौ हूँ लागत बुरौ, बिन औसर जो होय |प्रात भए फीकी लगे, ज्यौं दीपक की लोय ||-नागरीदास
वक्ता: ‘नीक’ माने अच्छा| जो अच्छा भी है, वो बुरा लगता है, यदि बिना अवसर के हो| ठीक वैसे जैसे की दीपक की लौ भी सुबह हो जाने पर व्यर्थ ही होती है|…

~ कबीर साहब
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…

प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।

आध्यात्मिकता का उद्देश्य व्यक्ति को बाहरी अधिकारों से आगे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाना है। विज्ञान और संविधान अपने-अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आत्म-भ्रम, गलत चुनाव और अहंकार से मुक्ति का मार्ग आत्मज्ञान से खुलता है। सच्चा गुरु शिष्य को निर्भर नहीं, स्वतंत्र बनाता है। साथ ही, शिष्य का आचरण उसके गुरु और शिक्षा का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए उसे नकल नहीं, समझ और विवेक के साथ जीना चाहिए।

सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।

सच्चा गुरु या मित्र पूजा का विषय नहीं, बल्कि दर्पण होता है, जो बिना स्वार्थ हमारी वास्तविक स्थिति दिखाता है। आध्यात्मिक मार्ग पर अंधभक्ति नहीं, बल्कि प्रेम, कृतज्ञता और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी आवश्यक है। मुक्ति किसी गुरु के भरोसे नहीं मिलती; स्वयं को बदलने का साहस स्वयं जुटाना पड़ता है। गुरु का कार्य केवल सत्य का प्रतिबिंब दिखाना है, चलना साधक को ही होता है।

प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।

समझ केवल जानकारी इकट्ठा करने या बातों को याद रखने से नहीं आती, बल्कि पूरी सजगता से वर्तमान में जीने और हर अनुभव को स्वयं देखने से आती है। जीवन हर दिन नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटी हुई बातें पर्याप्त नहीं होतीं। वास्तविक सीख तब होती है जब जिज्ञासा, प्रश्न और प्रत्यक्ष समझ विकसित होती है। स्मृति नहीं, बल्कि जागरूकता और समझ ही सही निर्णय, सीखने और जीवन को सार्थक दिशा देने का आधार बनती है।

आध्यात्मिक प्रगति अधिक गुरु, ग्रंथ या संस्थाएँ बदलने से नहीं, बल्कि एक सत्य को गहराई से जीने से होती है। सतही अध्ययन अहंकार को बढ़ाता है, जबकि वास्तविक अध्ययन स्वयं को बदल देता है। जो वास्तव में समझता है, उसे निरंतर नए उपाय नहीं चाहिए। विनम्रता से अपनी अधूरी समझ स्वीकार कर, एक प्रामाणिक स्रोत के साथ गहराई से जुड़े रहना ही आत्मज्ञान और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है।

धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।

क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।

डर और जड़ता से बाहर निकलने का रास्ता किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि एक छोटे-से सही कदम से शुरू होता है। अपनी समस्याओं का बार-बार विश्लेषण और वर्णन करने के बजाय उनसे दूर जाने का निर्णय आवश्यक है। सत्य के प्रति प्रेम जागने पर भय अपने-आप पीछे छूट जाता है और साहस जुटाना नहीं पड़ता। सही संगति, अनुकूल वातावरण और आत्मिक विकास के अवसरों को अपनाने से परिवर्तन सहज होने लगता है। अपनी कमजोरियों से मोह रखने के बजाय उनके प्रति वैराग्य विकसित करना ज़रूरी है। शिकायत, बहाने और आत्म-दया में उलझे रहने से कुछ नहीं बदलता; निर्णायक कर्म, सत्य के प्रति प्रेम और वर्तमान स्थिति के विरुद्ध विद्रोह ही ऊँचे जीवन की वास्तविक शुरुआत हैं.

ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है।

प्रेम कोई सामाजिक स्वीकृति, विवाह या रोमांटिक आकर्षण नहीं, बल्कि अहंकार के मिटने की प्रक्रिया है। सच्चा प्रेम अनुमति नहीं मांगता और न ही हार्मोन या परंपरा से पैदा होता है; वह सत्य और मुक्ति की ओर भीतर की यात्रा है। इसी तरह अहंकार सफलता पाने के लिए खुद को नहीं मिटा सकता — क्योंकि जब तक "मैं" बना हुआ है, तब तक हर त्याग, चाहे परिवार का हो, मित्रों का हो या स्वास्थ्य का, अहंकार का ही एक रूप रहता है। सही कर्म योजना बनाकर नहीं, बल्कि झूठे प्रभावों और बंधनों से मुक्त होकर स्वतः प्रकट होता है।

पढ़ना केवल पन्ने पूरे करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। जब किसी विषय को सचमुच समझा जाता है, तो जिज्ञासा स्वयं आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अधूरी किताबें अक्सर रुचि की कमी नहीं, बल्कि बिना समझे आगे बढ़ने का परिणाम होती हैं। इसलिए गति से अधिक महत्त्वपूर्ण है हर विचार को समझना, क्योंकि वास्तविक सीख वहीं से शुरू होती है।

अर्जुन की विशेषता उनकी पूर्णता में नहीं, बल्कि सत्य के प्रति उनकी ईमानदारी में थी। उन्होंने अपने भ्रम, भय, मोह और संदेहों को छिपाया नहीं, बल्कि उनका सामना किया। दूसरों की तरह किसी पक्ष से चिपकने के बजाय उन्होंने निष्पक्ष होकर देखने की इच्छा दिखाई और अपने से ऊँची बुद्धि के मार्गदर्शन को स्वीकार किया। वास्तविक श्रेष्ठता त्रुटिहीन होने में नहीं, बल्कि सीखने, बदलने और सत्य के लिए अपने अहंकार से ऊपर उठने की क्षमता में है।

प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।

डेटिंग ऐप, कुंडली मिलान और “मेरी पसंद” जैसी धारणाएँ अक्सर प्रेम नहीं, बल्कि डर, सामाजिक कंडीशनिंग और अहंकार से संचालित होती हैं। परंपरा के दबाव में किया गया चुनाव और केवल व्यक्तिगत पसंद पर आधारित चुनाव, दोनों ही भ्रमित हो सकते हैं। सच्चा प्रेम तब संभव होता है जब व्यक्ति स्वयं को जाने और ऐसा संबंध चुने जो उसके बंधनों, भय और अहंकार को चुनौती देकर उसे भीतर से मुक्त करे।

रिश्तों में प्रेम को अक्सर जन्म, परिवार या सामाजिक भूमिकाओं से जोड़ दिया जाता है, जबकि अधिकांश संबंध अपेक्षाओं, स्वामित्व और तयशुदा व्यवहारों पर टिके होते हैं। केवल माता-पिता या संतान का रिश्ता होने से प्रेम नहीं जन्मता। प्रेम कोई जैविक घटना नहीं, बल्कि सीखने और समझने की प्रक्रिया है। जहाँ “मेरा” और “मेरे लिए” का आग्रह घटता है, वहीं प्रेम सीमाओं को लाँघकर स्वतंत्रता, करुणा और वास्तविक संबंध का रूप लेता है।

रिश्तों में प्रेम अक्सर मान लिया जाता है, पर अधिकांश संबंध तय भूमिकाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक ढाँचों पर चलते हैं। माता-पिता, पति-पत्नी या परिवार के रिश्ते भी कई बार समझ, स्वतंत्रता और संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि आदत, अधिकार और “मेरापन” से संचालित होते हैं। सच्चा प्रेम सीमित नहीं होता; वह स्वामित्व नहीं, बल्कि समझ, स्वतंत्रता और विस्तार देता है। प्रेम जन्म से नहीं, जागरूकता से सीखा जाता है।

लोग ऋषिकेश शांति या आत्मबोध के लिए नहीं, बल्कि अपनी वही तनावपूर्ण और भ्रमित जीवनशैली को बनाए रखने के लिए आते हैं। महादेव का अर्थ अंत और अहंकार की समाप्ति है, पर तीर्थ भी मनोरंजन और पलायन का साधन बन गया है। दुख से मुक्त होने के बजाय लोग उसी दुख को बचाए रखने के उपाय खोजते रहते हैं।

आप आस्था खोज रहे हैं, पर क्या आस्था कभी ज़बरदस्ती पैदा होती है? आस्था फूल है, जो सही बीज, सही मिट्टी और सही संगति मिलने पर अपने आप खिलती है। शुरुआत श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होती है। सम्मान से नहीं, संदेह से होती है। परखिए, पूछिए, प्रयोग करिए। जहाँ वास्तविक लाभ होगा, वहाँ आस्था अपने आप जन्म लेगी, बनावटी नहीं।

आस्था और ज़िम्मेदारी अलग नहीं हैं; सच्ची आस्था खुद ज़िम्मेदारी बन जाती है। धर्म के नाम पर प्रकृति का नुकसान और अंधविश्वास, धर्म नहीं बल्कि अज्ञान है। वास्तविक धर्म समझ और सत्य पर आधारित है, न कि परंपराओं की अंधी नकल पर। अंधविश्वास पर प्रश्न उठाना धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे बचाने का काम है।

आचार्य प्रशांत कलिंग में युवाओं से संवाद करते हैं। वे कहते हैं कि दर्शन सत्य की खोज है, जो आत्म-अनुसंधान से शुरू होती है। परंपरा सदा से चली आ रही है, बस रूप बदल गया है। विकृत धर्म बाजार बन गया है। युवाओं को अपनी बीमारी पहचानी चाहिए। सोशल मीडिया एल्गोरिदम मन को नियंत्रित कर रहा है। सच्चा शिक्षक वह है जो आपकी झूठी धारणाओं को चुनौती दे।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

अपने आप को लग्ज़री देने से पहले मैं क्या पूछूँगा? क्या मेरा काम इस लायक है? बस। और जितना मेरे काम का स्तर बढ़ता जाएगा, उतना मैं अपने आप से कहता जाऊँगा, “हाँ, काम अब माँग रहा है एक नया मोबाइल फ़ोन। काम अब माँग रहा है लैपटॉप। काम माँग रहा है कि मैं ऐसी जगह पर न रहूँ जहाँ बहुत भीड़-भड़ाका हो, क्योंकि भीड़-भड़ाके में काम नहीं हो पाता।” तो मैं उस हिसाब से फिर काम की ख़ातिर, काम के सेवक की तरह, काम के साधन की तरह, काम के निमित्त की तरह, मैं अपने आप को फिर सुविधाएँ देती चलूँगी। उससे पहले नहीं।

थोड़ी जीवन में ठसक होनी चाहिए, एक्सक्लूसिविटी। एक शान, ऐरी-गहरी चीज़ों को भाव नहीं देना, ऐरे-गैरों को मुँह नहीं लगाना। “तू क्यों है ऐरा-गैरा?” मैं तेरा अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं तुझे प्रेरणा दे रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है तू भी वही संभावना रखता है, जो किसी ऊँचे-से-ऊँचे व्यक्ति में है। तू अपनी संभावना क्यों नहीं साकार कर रहा? और जिस दिन तक तू अपनी संभावना साकार नहीं करता, उस दिन तक मैं तुझे स्वीकार नहीं करता।

ये घटना है जो आपको परेशान कर रही है। मैं चाहता हूँ कि आप सिद्धांत की ओर जाएँ, और ये आपको एक बहुत बेहतर और गहरे तरीके से सुरक्षित करेगा। एक बात ये है कि कोई आपको बताता है, “ओह, यूरेनियम की गेंदों के साथ मत खेलो, कुछ बुरा हो सकता है।” एक बात ये है कि आप सिद्धांत जानते हैं। आप ठीक-ठीक जानते हैं कि *क्रिटिकल मास,* गेंद का *रेडियस,* और ऐसी चीज़ें कैसे गणना की जाती हैं। आप क्या चाहेंगे? आप सिद्धांत के बारे में जानना चाहेंगे, है न?

तुम एक झूठी मान्यता में जीना चाहते हो कि इंसान बाय डिफॉल्ट होता तो अच्छा है, बस वो पावर उसको करप्ट कर देता है। पावर ने इंसान को नहीं करप्ट किया, इंसान पावर को करप्ट करता है। मौका देकर देखो, पूरी दुनिया की आबादी आ जाएगी एप्स्टीन फ़ाइल्स में। पर आप सारा दोष डाल दोगे व्यवस्थाओं पर, कुछ लोगों पर। बात उन व्यक्तियों की नहीं है। हमारी प्रजाति के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट की है — अहंकार। उसी डिफेक्ट को ठीक करने के लिए जो होता है, उसको बोलते हैं अध्यात्म, आत्मज्ञान।

जिसको तुम कहते हो रोमांटिक लव, इसका बाज़ारवाद से बहुत सीधा ताल्लुक है। अच्छे कपड़े पहन लिए, तोहफ़े दे लिए और मज़े कर लिए, लेकिन कुछ पूरा नहीं पड़ रहा; एक अधूरापन, एक कसक रह जाती है। आपकी बेचैनी वैसी की वैसी है। प्रेम का मतलब है कि जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोल दो; वो ख़ुद को जानने लगे, मन को समझने लगे, यही प्रेम है। लेकिन ये करना आसान नहीं होता। ये करने की क़ीमत चुकानी पड़ती है। ये करने के लिए तुम्हें अपना सर्वस्व भी निछावर करना पड़े, तो कर दो। यही है वैलेंटाइन डे।

समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।”

मुझे बड़ा ताज्जुब होता है। एक से एक नमूने, ज़िंदगी में जिनको कुछ नहीं समझ में आता, कुछ नहीं जानते। 14 साल के होंगे, 16 साल के होंगे, तभी से एक लफ्ज़ वो जान जाते हैं, क्या? प्यार। और ऐसे कभी सामने पड़ें, मैं कहूँ कि तुझे गणित नहीं आती, तुझे भूगोल नहीं आता, तुझे यहाँ से लेकर वहाँ तक सीधे चलना नहीं आता, तुझे किसी आदमी से दो बात करना नहीं आता, तुझे अपना गुस्सा संभालना नहीं आता, तुझे कहीं पर समय से पहुँचना नहीं आता, तुझे इंसान बनना नहीं आता, तुझे प्रेम करना कहाँ से आ गया?

ये ऐसी सी बात है, कि “मैं क्या करूँ? मैं दस कदम आगे चलता हूँ। पीछे से वो कॉल करके पकड़ लेती है।” वो तुम्हें कॉल करके पकड़ रही है या पहले तुमने मोबाइल फोन पकड़ रखा है? वो तुम्हें पकड़ ले, इसका इंतजाम पहले से करके कौन बैठा है? तुम अगर चाहते ही होते कि वो तुम्हें न पकड़े, तो फोन पीछे नहीं छोड़ के आए होते।

गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।

जब ये सब उठे, तो कहो, “तू उठ, तेरा काम है उठना पर तू मैं नहीं है।” और प्रमाण इसका ये है कि मैं तुझे देख सकता हूँ, मैं तेरी हर गतिविधि पर नज़र रख सकता हूँ। यही प्रमाणित करता है कि तुझमें और मुझमें भेद है। तू दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। हम दोनों एक नहीं हैं। मैं साक्षी हूँ तेरा, तू अपना काम कर, मैं बैठा-बैठा देखूँगा। मैं बैठा-बैठा देखूँगा तो मेरे पाँव मेरे पाँव हैं, और मेरा हाथ मेरा हाथ है, और मेरी ऊर्जा मेरी ऊर्जा है; वो तुझे नहीं मिलेगी। मैं तुझसे कोई रिश्ता बनाऊँगा ही नहीं।

प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रहकर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है; ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता, लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम…

हम आमतौर पर बस ऐसे ही छवि बना लेते हैं कि संघर्ष या दबाव सिर्फ़ व्यवसाय में या सांसारिक मसलों में ही है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। दबाव और संघर्ष अध्यात्म में भी उतने ही करने पड़ते हैं, जितने कि संसार में, बस उसकी श्रेणी, उसकी गुणवत्ता अलग है। बाहर तुम दबाव झेलते हो कुछ और अतिरिक्त हासिल कर लेने के लिए, और अध्यात्म में, जिसको तुमने नाहक पा लिया है, वह दबाव बनाता है कि मुझे मत छोड़ो। भीतर वाली लड़ाई जीत लो, बाहर की सब लड़ाइयाँ तुम पाओगे कि तुम्हारे लिए बहुत आसान हो गई हैं।

तुम कहीं गए, तुमने किसी की चरण स्पर्श कर लिए। यह कोई सम्मान है? यह आदर है। सम्मान दूसरी बात है। सम्मान का अर्थ होता है, ध्यान से समझना। जो अपने मन की समझ नहीं रख सकता, वह किसी और को कैसे समझ जाएगा? पर दावा हमारा यह है कि हम दूसरे का सम्मान करते हैं। दूसरे का सम्मान तो तब हो जब आत्म-सम्मान हो। आत्म-सम्मान मतलब खुद को समझना। पहले अपना सम्मान कर लो। अपना सम्मान मतलब, आत्म-ज्ञान! आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान है।

दार्शनिक बना नहीं जाता। ये कोई कैरियर थोड़ी होता है। ये तो ज़िंदगी बना देती है। पहले ज़िंदगी ऐसे जियो कि उसकी परतें उघड़ें कुछ, उसका नंगापन सामने आए। और उसके लिए ज़िंदगी के बहुत क़रीब आना पड़ता है। ज़िंदगी के क़रीब जाना माने झूठ अब टूटेगा। और झूठ साँस है, झूठ रीढ़ है, झूठ प्राण बन गया है हमारा। सब टूटेगा। ज़िंदगी को देखो। ज़िंदगी से लात खाओ फिर तुमसे जो कुछ भी अभिव्यक्त होगा, वह दर्शन होगा।

अगर मैं कोई माल बेच रहा हूँ, तो वही तो बेचूँगा जो आप ख़रीदना चाहते हो। गुरु जी वही करते हैं। आपको वही सुना देते हैं जो आप सुनना चाहते हो, बस थोड़े सोफ़िस्टिकेटेड तरीके से। तो ज़्यादातर जिसको आप स्पिरिचुअलिटी बोलते हो, वो सेंटिमेंटल कंसोलेशन होती है बस। थोड़ी देर के लिए आपको सुकून मिल जाएगा, पर आपकी ज़िंदगी में वास्तव में कुछ नहीं बदलेगा। अपनी कामना पूरी करने के लिए आप जहाँ भी जाओगे, वह बाज़ार ही होगा। गुरु को भी बाज़ार बना लिया, तो अब क्या बचा।

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।

दो तरह का शोषण चलता आया है धर्म के नाम पर, एक, महिलाओं का; और एक, तथाकथित निचली जातियों और वर्णों का। और लोकधर्म की लगभग बुनियाद है ये शोषण। अब लोकधर्म अगर जात-पात, छुआ-छूत और स्त्री-शोषण, इनके बिना चल ही नहीं सकता; तो जहाँ कहीं भी स्त्रियों को उठाने की बात आएगी और जाति को हटाने की बात आएगी, लोकधर्म उससे बहुत ख़ौफ़ खाएगा। ख़ौफ़ खाएगा और उस बात को कह देगा? ये लेफ्टिस्ट बात है।

आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।

आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।

धर्म होता है ख़ुद को समझने के लिए, ताकि आपकी चेतना उड़ान ले सके। समझ में आ रही है बात? और यही दो कोटियों के लोग होते हैं दुनिया में; एक, वो जो अपने पुराने ढर्रों पर चल रहे हैं इन्हें आप बोल सकते हैं अधार्मिक लोग। वह पुराने ढर्रे दो तरीक़ों के हो सकते हैं — ये बात बहुत रोचक लगेगी बहुत लोगों को। जो पुराने शारीरिक ढर्रे पर चल रहा है, वो तो अधार्मिक है ही। लेकिन जो पुराने सामाजिक ढर्रे पर भी चल रहा है, वो भी अधार्मिक है। धर्म किसी ढर्रे का नाम नहीं होता, धर्म जानने का नाम होता है।

आपको क्या लगता है, यह जो अलग-अलग तरह के स्पोर्ट्स हैं, यह क्यों इतने प्रचलित हो गए? क्योंकि स्पोर्ट्स होगा तभी तो ऐड होगा। वह विज्ञापन बेचने का ज़रिया है और विज्ञापनदाता ऐसे नए-नए ज़रिए खोजते रहेंगे। चाहे वह विज्ञापन हो, चाहे बाबा जी की PR हो, चाहे आपको धार्मिक आधार पर भड़काने वाला कोई WhatsApp फ़ॉरवर्ड हो, वह सब बहुत केयरफुली क्राफ्टेड होते हैं। बहुत सतर्क रहा करिए, बहुत सतर्क; सब कुछ सिर्फ़ इसलिए है ताकि कोई आपसे अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके।

डॉक्टर अंबेडकर मृत्यु की रात को भी क्या कर रहे थे? वह धर्म पर ही किताब लिख रहे थे, और उन्हें बड़ी हड़बड़ी थी कि इसको पूरा कर दें। तबीयत बहुत ख़राब थी, दिख रहा था कि जाने वाले हैं। उनकी मृत्यु के बाद वह किताब प्रकाशित हुई, ‘The Buddha and His Dhamma.’ वह कोई पॉलिटिकल या इकोनॉमिक्स की किताब नहीं लिख रहे थे। वह धर्म पर लिख रहे थे। जो भारतीय दर्शन रहा है, उसकी सारी खूबियाँ बौद्ध धर्म में ज़बरदस्त तरीके से मौजूद हैं। बौद्ध धर्म तो पूरा ही जिज्ञासा का धर्म है, रूढ़ियों के लिए वहाँ एकदम ही कोई जगह नहीं है।

जो एक का नहीं होता, उसे सौ का होना पड़ता है। अपने आप को सौ जगह टुकड़ा-टुकड़ा करके उसको बाँटना भी पड़ता है। असली आदमी होता है, वो काम ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ, और साथी भी ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ। तो जब दोनों को ही 24 घंटे कम पड़ रहे हैं, तो वो 48 से ज़्यादा घंटे कहाँ से लाएगा? क्या करेगा फिर वो? वो काम को ही साथी बना लेता है, या साथी को ही काम बना लेता है, या साथी ऐसा बनाता है जो काम में भी साथ हो।

धर्म तो सबसे ऊँची बात होनी चाहिए न? तो धर्म के नाम पर ऐसे काम क्यों कर रहे हो, जो एक छोटे बच्चे को भी दिख रहा है कि गलत है? और सबसे खौफ़नाक बात ये है, कि हमारे बच्चों को धीरे-धीरे झटका लगना बंद हो जाता है। वो इसी माहौल के हो जाते हैं, रच-बस जाते हैं। ज़िंदगी हिसाब करेगी, जवाब माँगेगी और तब लज्जित होने के अलावा कुछ नहीं बचेगा।

हिमालय से ऋषि चलते थे और सीधे दक्षिण भारत तक पहुँच जाते थे। या वो कहते थे कि मैं हिमालय का हूँ, वही रहूँगा? कबीर साहब जीवन भर चलते रहे। नानक साहब अरब तक पहुँच गए, चीन से यात्री चलते थे और ज़्यादातर ज्ञान की खोज में होते थे, वह तिब्बत पार करके हिमालय लाँघ करके भारत आ जाते थे। आपको यात्रा करने से किसने रोका है? यात्रा ही बहुत कुछ सिखा देती है। विदेश न जाओ, भारत तो घूम लो। पृथ्वी पूरी तुम्हारी है, जहाँ जा सकते हो, जाओ।