
जीवन सीमित है, इसलिए उसका केंद्र मृत्यु के बाद की कल्पनाएँ नहीं, बल्कि जीवित रहते हुए जागरूकता और मुक्ति होनी चाहिए। रस्में, कर्मकांड और मृत्यु के बाद की कथाएँ अक्सर जीवन की वास्तविक ज़िम्मेदारियों से ध्यान हटाती हैं। जो प्रेम, सहायता और सम्मान देना है, वह जीवित लोगों को देना सार्थक है। मृत्यु की स्मृति समय का मूल्य सिखाती है, अधूरी कहानियों को छोड़ना सिखाती है, और वर्तमान जीवन को पूरी गंभीरता और ईमानदारी से जीने की प्रेरणा देती है।







![ये खास सीख छुपी है मौत के डर में [भागो मत, कुछ सीखोगे]](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-c068fdb6-b693-408e-bc35-3d220d048888/30/image.jpg)







प्रश्नकर्ता: वायरस की आपने बात कही तो ये ऑमिक्रॉन (कोरोना वायरस का एक वेरिएंट) और एक के बाद एक आते जा रहे हैं। मैं जानती हूँ आप बहुत बार इस पर भी बात कर चुके हैं, पर यह क्या एक

आचार्य प्रशांत: जिस दिन आपको पूरा भरोसा हो गया, आप अच्छी तरह साफ़-साफ़ जान गए कि इस शरीर से कुछ नहीं है जो आगे चला जाना है, उस दिन आपके ऊपर दो असर होंगे — पहली बात, आप ज़िंदगी को सही जीना जान जाएँगे। आपको साफ़ सुनाई देगी घड़ी की


प्रश्नकर्ता: और गहरा समझना चाहूँगा कि जब धर्म की बात होती है तो पुनर्जन्म की बात तो होती ही होती है। तो इनके बीच का क्या सम्बन्ध है?


आचार्य प्रशांत: तुम जो इतना विचार करते हो कि पति क्या कर रहा होगा, पत्नी क्या कर रही होगी; और क्या है माथे का भार? दिन भर और क्या सिर पर चलता रहता है? नात, रिश्तेदार, काम, सम्बन्ध, पति, पत्नी, बच्चे, माता, पिता — यही मन है। इसी को कबीर

'धरनी' पलक परै नहीं, पिय की झलक सुहाय। पुनि-पुनि पीवत परमरस, तबहूँ प्यास न जाय।।

प्रश्नकर्ता: सगे-सम्बन्धियों में, मित्रों में बहुत लोगों को संक्रमण हुआ और कुछ लोगों की दुर्भाग्यवश मृत्यु भी हो गयी है। अब वो ताकत कहाँ से लाएँ कि जी पाएँ बिना बहुत गहरी पीड़ा, दुख के, और इस प्रश्न से मुक्ति कैसे पाएँ कि ईश्वर इसमें हमारी क्या ग़लती थी? (अभिषेक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, माता-पिता की मृत्यु का भय सताता है, कि कैसा जीवन रहेगा। मतलब जीवन में कुछ करने की हिम्मत होगी या नहीं? मतलब, मेरे अंदर ऐसा लगता है कि...

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं अभी बहुत दबाव में हूँ। पिता जी को दिल का दौरा पड़ा था, उनको लेकर अस्पताल पहुँचा और आगे का इलाज करवाया। पर अस्पताल पहुँचकर मैं बहुत हिल गया। एक साल से मैं आपको सुन रहा हूँ। हम आपसे सीखते हैं कि हम असंग हैं,

आचार्य प्रशांत: जैसे पात गिरे तरुवर से, मिलना बहुत दुहेला। न जाने किधर गिरेगा, लगया पवन का रेला।।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या मरने के बाद ही मृत्यु को जाना जा सकता है?

प्रश्नकर्ता: भगवान बुद्ध महल छोड़कर जंगल क्यों गये?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कह रहे हैं कि व्यक्ति में ख़ुद के प्रति प्रेम होना चाहिए। आपके अनुसार हमें अपने आन्तरिक कष्ट से मुक्ति की कोशिश करनी चाहिए। एक तरीक़े से यह स्वार्थ तो गहन अहंकार हुआ।


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज आपसे मैं पुनर्जन्म के बारे में बातचीत करना चाहता हूँ। मेरे मन में इसको लेकर कुछ सवाल हैं और जिनसे मैं बातचीत करता हूँ, उनके मन में तो काफ़ी हैं। तो कुछ प्रश्न हैं मेरे, वो मैं आपके सामने रखूँगा।
जब मैं बात करता हूँ पुनर्जन्म…

आचार्य प्रशांत: ठीक है, तुम्हें ये दिख रहा है कि आज एक बच्चा पैदा होता है तो उसके घर पर उत्सव हो रहा है — ये बात तुम्हें दिख रही है — पर जब ये देखो तो ईमानदारी से स्वीकार करो कि तुम भी ऐसे ही पैदा हुए थे। आज

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे मृत्यु से बहुत डर लगता है। स्वयं को मृत्यु के लिए कैसे तैयार करूँ?

आचार्य प्रशांत: (प्रश्नकर्ता का परिचय देते हुए) ये थोड़े उम्रदराज़ लग रहे हैं। सवाल बताता है कि या तो वृद्ध हैं या कम-से-कम अधेड़ उम्र के हैं। कह रहे हैं, ‘अगर किसी का पूरा जीवन ही झूठ में और मोह में और भ्रम में बीता हो तो जीवन के अंतिम

प्रश्नकर्ता : ऐसा, मतलब जैसे की न इस चीज़ को हम याद रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमेशा नहीं याद होता है हम नश्वर हैं। मतलब हमेशा नहीं याद रहता है कि दिन में हर पल याद रहता है, ऐसा नहीं है, लेकिन दो-तीन बार हम याद करने की

आचार्य प्रशांत: यहाँ पास में ही एक कॉलेज है। वहाँ के छात्रों को अक्सर मैं यहाँ लाता रहा हूँ, दसों बार। ये अपनेआप में एक मूक सत्र रहता है कि बस देखो, मुझे बहुत ज़्यादा बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती। आप लोगों ने तो फिर भी यहाँ कम समय बिताया,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने एक सत्र में कहा था कि कमज़ोर आदमी ख़ुद को नहीं मार सकता, आत्महत्या बहादुर ही कर सकता है।

आचार्य प्रशांत: जन्म से पूर्व भी कोई दिखायी नहीं देता, कोई अनुभव नहीं होता उसका। मृत्यु के पश्चात भी कोई दिखायी नहीं देता, कोई अनुभव नहीं होता उसका। ये बीच में अचानक कुछ आ जाता है, जिसको हम जीवन बोलते हैं। तो कृष्ण अर्जुन से कह रहें हैं, ‘अगर कोई

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा एक प्रश्न है श्रीमद्भगवद्गीता से संबंधित। श्रीकृष्ण अर्जुन को बोल रहे हैं कि धर्म की स्थापना करो और बल दे रहे हैं कि कर्म करो। पीछे मत हटो, कर्म करो और धर्म की स्थापना करो।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा सवाल डर पर है। असल में पिछले दो-तीन महीनों से मैं शारीरिक रूप से एक परेशानी से जूझ रहा हूँ। अभी इलाज तो नहीं चल रहा है,


आचार्य प्रशांत: अभी वहाँ से एक पत्ता गिरा नीचे। आम आदमी हरियाली में ही खोया रहता है, अपने पाँव के नीचे जो पत्ते हैं उनको थोड़ा कम ही देखता है। बुद्ध का मन ऐसा कि एक पत्ते को गिरता हुआ देखा और पूछने लगे कि सब पत्ते गिरेंगे क्या। जवाब


प्रश्नकर्ता: मेरी पत्नी का देहांत कुछ वर्ष पहले हुआ था, उनकी आत्मा मेरी छह वर्ष की भतीजी पर बराबर आती है। मुझे समझ नहीं आ रहा क्या करूँ?

आचार्य प्रशांत: मैं सवाल को थोड़ा सा पलट देता हूँ। किसी चीज़ का अगर पता ही हो कि खो जाएगी और फिर वह खो जाए, तो ज़्यादा बुरा लगता है या किसी चीज़ के बारे में धारणा हो कि नहीं खोएगी, फिर वह खो जाए तो ज़्यादा बुरा लगता है,

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे एक चीज़ पूछनी थी कि जैसे आपकी चेतना है या ओशो रजनीश की चेतना, हम ये मान के चल रहे हैं कि आप लोगों की चेतना एक आम चेतना से बहुत ऊपर है। तो क्या हम ये मान के चलें जब ऐसे धर्मगुरु शरीर छोड़ते हैं

प्रश्नकर्ता१: सर, हम ये भी अक्सर बोल देते हैं कि हमारे शरीर में

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे पापाजी को फोर्थ स्टेज (चौथे स्तर का) कैंसर है। मैं आपको पिछले साढ़े चार साल से सुनता हूँ। उनको तीन साल हो चुके हैं और
अगर बीमारी वह चीज़ होती है, जिसके बाद मौत आती है, तो ज़िंदगी ही बीमारी है। तो एक तरह से सभी बीमार हैं। और उस बीमारी का नाम ही क्या है? लाइफ़। सबको ही जाना है। प्रश्न मृत्यु का नहीं है, प्रश्न जीवन का है। बात यह है कि जब तक हम जी रहे हैं, तब तक कैसे जी रहे हैं? मरने से आधे घंटे पहले भी जीवन की बात करो। जब मर जाएँगे, उसके बाद हम मौत की बात करेंगे। अध्यात्म सही जीवन जीने की कला है; इतना सही जीना, इतना सही जीना, कि मौत भूल ही जाए। और कोई मौत याद दिलाए, तो मौत चुटकुले जैसी लगे।
मृत्यु डरावनी होती ही इसीलिए है, क्योंकि वह एक अधूरी कहानी का अंत होती है। जब कोई अपना चला जाता है, तो हम रोते हैं कि अभी सोचा था इनके साथ यह बातें करेंगे, नहीं कर पाए। अभी सोचा था, इनको साथ ले वहाँ घूम आएँगे, नहीं घूम पाए। बहुत कुछ संभव था, जो हो नहीं पाया। मृत्यु का कष्ट है ही अधूरेपन में, तो मरने से पहले ही पूरे हो जाओ। मरो मरो हे जोगी मरो, मरो मरण है मीठा — मुक्त हो जाओ।
हम सब जिनको चाहते हैं, या तो वह हमसे पहले चले जाते हैं या हम उनसे पहले चले जाते हैं। यह विदाई बताती है कि जैसे तुमने मुझे चाहा, लेकिन पाया कि मैं खो गया, वैसे ही तुम जो कुछ भी चाह रहे हो, वह सब खो जाना है, नष्ट हो जाना है। तो जाने वाला अपनी अन्तिम और उच्चतम इच्छा आपको बता रहा है कि कुछ ऐसा चाह लो, जो विदा न हो सकता हो, जिसको मौत भी तुमसे न छीन सके। तुम सही ज़िंदगी जियो, अपना जीवन पूर्ण करके दिखाओ — यही वास्तविक श्रद्धांजलि है।
तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी है, जो आग में ना जले, जिसे समय ना मिटा दे? जब तुम्हारे पास ऐसा कुछ नहीं है, तो बताओ मृत्यु के बाद क्या बचेगा? कभी तुमने किसी ऐसे का संसर्ग किया है जो समय, संसार के पार का हो? अगर किया होता, तो तुम जानते होते कि क्या है वो, जो कभी मरता नहीं। तुम्हारा कुछ नहीं बचने वाला, तुम राख ही हो जाने वाले हो। जो बचेगा वो कुछ और है, पर जो बचेगा उससे तुमने कोई संबंध बनाया नहीं।
जितना अपनों की मृत्यु का दुख होता है, उतना ही अपनी मृत्यु का भय होता है। उनकी मृत्यु हमारी मृत्यु की याद दिलाती है। किसी की भी मृत्यु के दुख के मूल में अज्ञान बैठा है। जब अज्ञान नहीं रहता, तो रिश्ते में बिछुड़ने का डर नहीं रहता। रिश्ते में एक संपूर्णता रहती है। अभी ही पूरा है, तो आगे के लिए कुछ बचा नहीं है। जब रिश्ता ऐसा होता है, तो फिर उसमें विदाई भी सहज रहती है। किसी के साथ कामना का रिश्ता बनाओगे, तो दुख ही पाओगे।
आपको लगता है कि अब आपकी चीज आपसे छिन गई, वो छिनी नहीं है, वो कहीं और पहुँची है, बिखर गई है, हजार जगह पहुँच गई है, लेकिन वो जहाँ भी पहुँची है, वहाँ पर, तो आप भी मौजूद हो। तो आपसे भिन्न कहाँ हुआ वो आपसे अलग कहाँ हुआ आपसे बिछड़ा कहाँ, वो? जो आपको दिखाई देता है कि वो जहाँ भी जायेगा वो आपको ही पायेगा। तो फिर आपको दुख थोड़े ही होगा।
हम अपनी हस्ती को अपने संबंधों से जानते हैं। 'मैं' की अपेक्षा 'मेरा' के माध्यम से जानते हैं। किसी अपने के गुज़र जाने पर ऐसा लगता है कि आंशिक मृत्यु हमारी भी हो गई हो। जिन संबंधों के साथ हम रहते हैं, वहीं अधिकतम संभावना होती है कि हम उन्हें प्रेम की गहराई और बोध की ऊँचाई दे सकें। रिश्ते में अगर यह गहराई हो, तो शारीरिक मृत्यु दुखदाई नहीं होती क्योंकि संबंध अपनी पूर्णता हासिल कर चुका होता है।
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी! आचार्य जी, मैं बचपन से ही ऐसे माहौल में रहा कि पापा से बहुत डर लगता था। पापा बहुत मारते-पीटते थे। चाचा भी बहुत मारते-पीटते थे। तो बहुत डर लगता था। फिर कॉलेज चला गया। कॉलेज में ऐसा था कि हम एक ग्रुप में रहते थे, …
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी जब किसी का जन्म होता है तो उसका उत्सव मनाया जाता है, मृत्यु का उत्सव क्यों नहीं मनाया जाता?
आचार्य प्रशांत: ज़बरदस्ती की बात कि कोई मरता है तो उत्सव क्यों नहीं मनाते। क्यों मने उत्सव भाई! मैं नहीं कह रहा हूँ कि कोई मरे तो तुम…
जीवन अवसर मात्र है, जितना भी जियो, पूरा जियो। वर्षों की लंबाई मायने नहीं रखती। जीवन में गहराई हो, तभी बात बनती है। भगत सिंह - इक्कीस साल। जीज़स, विवेकानंद, जॉन ऑफ़ आर्क - इनमें से कौन लंबा जिया था? मृत्यु को सदा याद रखो, क्योंकि वो लगातार घटित हो रही है, सामने है तुम्हारे; और जो सामने है, उसका डर कैसा? जीने का एक ही उद्देश्य है - शरीर मरे, इससे पहले मरने का डर मर जाए।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे एक चीज़ पूछनी थी कि जैसे आपकी चेतना है या ओशो रजनीश की चेतना, हम ये मान के चल रहे हैं कि आप लोगों की चेतना एक आम चेतना से बहुत ऊपर है। तो क्या हम ये मान के चलें जब ऐसे धर्मगुरु शरीर छोड़ते हैं…
आचार्य प्रशांत: अपनी हस्ती पर भरोसा करिए। आप अपनेआप को जितना जानते हैं, आप उससे कहीं ज़्यादा सामर्थ्यवान हैं। अपना आकलन आप बड़ी हीनता में करते हैं, अंडरएस्टिमेशन (कम आँकना)।
छोटे नहीं हैं आप, विश्वास करिए। उसी ऊँचे विश्वास को श्रद्धा भी कहते हैं। कि जाने दो जो जाता है,…
अन्तरिक्षचयाणां च दानवोत्तम पक्षिणाम्। उत्तिष्ठते यथाकालं मृत्युर्बलवतामपि।।
दानवश्रेष्ठ! आकाश में विचरणे वाले बलवान पक्षियों के समक्ष भी यथासमय मृत्यु आ पहुँचती है। ~ आजगर गीता, श्लोक १६
दिवि सञ्चरमाणानि ह्नस्वानि च महन्ति च। ज्योतींष्यपि यथाकालं पतमानानि लक्षये।।
आकाश में जो छोटे-बड़े ज्योतिर्मय नक्षत्र विचर रहे हैं, उन्हें भी मैं यथासमय…
प्रश्नकर्ता: उच्चतम स्थान किसका है? क्या सत्य और ईश्वर एक हैं? जो उच्चतम है, उसके प्रति प्रार्थना का क्या अर्थ है? और दूसरा मुद्दा, दूसरा प्रश्न — रक्षा माने क्या?
आचार्य प्रशांत: हम जैसे होते हैं, रक्षा शब्द का तात्पर्य हमारे लिए वैसा ही होता है। और हम जैसे होते…
आचार्य प्रशांत: आपको जिस भी चीज़ का डर लगेगा वो कभी-न-कभी तो होनी ही है कि नहीं होनी? दुनिया में मुझे बताना कौन-सी चीज़ है जो नष्ट कभी हुई नहीं, न होने वाली है। और डर सदा इन्हीं चीज़ों का होता है न — कुछ नष्ट हो जाएगा, कुछ नहीं…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी, मेरा प्रश्न ये है कि जैसे न आत्मा जन्म लेती है न मरती है, तो जो आम धारणा यह है कि उसकी आत्मा भटक रही है या आत्मा अतृप्त है। तो जैसा कि आप बताते हैं कि आत्मा तो जन्मती ही नहीं है, न…
आचार्य प्रशांत: अरे भाई, धर्म ये जानने में है कि ये जन्म झूठा है। अगला जन्म कहाँ से आ जाएगा? अगला जन्म…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमन। चेतना के विषय में सन्तों से शास्त्रों में बहुत सुना है, दर्शनशास्त्रियों ने भी इस मुद्दे पर बहुत गहन चर्चाएँ करी हैं, किताबें लिखी हैं। कभी चेतना को न्यूरोसाइंस (तन्त्रिका विज्ञान) से तो कभी फिज़िकल साइंस (भौतिक विज्ञान) से जोड़कर देखा जाता है, और कभी ये…
आचार्य प्रशांत: “पुनि-पुनि पीवत परमरस, तबहूँ प्यास न जाय” धरनीदास के वचन हैं, सवाल है कि 'प्यास बुझेगी क्यों नहीं, प्यास बुझती क्यों नहीं?' प्रेम अनंत है। अनंत का क्या अर्थ है?…
आचार्य: अभी वो हैं। अभी वो हैं, अभी उनके साथ कैसा जीवन बिता रहे हो, इस पर ध्यान दो…
बहुत क्षणिक अवसर है ये और इस अवसर के अलावा आपके पास कोई सहारा नहीं है। बीता पल लौटकर नहीं आता। और उस बीते पल को आपने मुक्ति की…
आचार्य प्रशांत: शरीर के भीतर उसको तलाशोगे जो शरीर के साथ ख़त्म नहीं होगा तो मिलेगा नहीं। तलाशोगे नहीं तो वो मौजूद है और तुम्हें शांति दे रहा है।
तुम कहोगे कि गये थे; आचार्य जी ने बोला कि कबीर तो मौत पर हँसते हैं; उन्हें कुछ ऐसा मिला हुआ…
आचार्य प्रशांत: हाँ, तो वो गहन अहंकार चाहिए। गहन माने गहरा। गहरा अहंकार…
लेकिन टीवी पर जो भागवत कथा सुनाते हैं, उनकी शुरुआत…
बिरहिन ओदी लाकड़ी, सकुचे और धुधुआए। छूट पड़े या विरह से, पूरी ही जरि जाये।।
आचार्य प्रशांत: (आचार्य जी ने उपरोक्त दोहा बच्चों को लिखवाया) थोड़ा सा मज़ेदार है। बॉन-फायर करी है? बॉनफायर में जो लकड़ी डालते हो और वो गीली हो, तो क्या होता है?
श्रोता१: आवाज़ करती है।…
मरते मरते जग मुआ, बहुरि न किया विचार। एक सियानी आपनी, परबस मुआ संसार।।
मरते मरते जग मुआ, औरस मुआ न कोय। दास कबीरा यों मुआ, बहुरि न मरना होय।।
~कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: मरते सभी हैं, 'एक सयानि आपनी', एक मौत होती है जो अपनी होती है। बाक़ी संसार…
आचार्य प्रशांत: जिनकी मृत्यु हुई, वो तो चले ही गए। लेकिन इस पूरे कार्यक्रम में एक छोटी बच्ची, दो थोड़ा ज़्यादा बड़े…
आचार्य जी, मैं आपसे यह चाहता हूँ कि आप कुछ…