प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमन। चेतना के विषय में सन्तों से शास्त्रों में बहुत सुना है, दर्शनशास्त्रियों ने भी इस मुद्दे पर बहुत गहन चर्चाएँ करी हैं, किताबें लिखी हैं। कभी चेतना को न्यूरोसाइंस (तन्त्रिका विज्ञान) से तो कभी फिज़िकल साइंस (भौतिक विज्ञान) से जोड़कर देखा जाता है, और कभी ये मूलत: अध्यात्म का मुद्दा बनकर भी सामने आता है। आचार्य जी, इस विषय में मुझे स्पष्टीकरण चाहिए।
आज जब शमशान घाट में शरीर को जलते हुए देखा तो ये प्रश्न बार-बार उठा कि शरीर तो गया, अब बचा क्या? क्या चेतना भी माइंड, बॉडी (मन और शरीर) की तरह एक फिज़िकल एंटिटी (भौतिक इकाई) है, जो समय के साथ रहती है और फिर मिट जाती है? क्या ये यूनिवर्सल (सार्वभौमिक) है या व्यक्तिगत है?
आचार्य प्रशांत: चेतना वो गाँठ है जो भौतिक और पराभौतिक के बीच में पड़ी हुई है। बड़ी विलक्षण बड़ी अद्भुत और तर्क की दृष्टि से देखें तो बड़ी असम्भव चीज़ है चेतना। एक ओर तो बिना एक भौतिक मस्तिष्क के चेतना हो नहीं सकती, दूसरी ओर भौतिक जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे किसी भी तरीक़े से, किसी भी प्रक्रिया या विधि से जोड़-तोड़कर खड़ा कर दिया जाए तो वो चैतन्य हो जाए। चेतना की अद्भुत स्थिति को समझिए। पहली बात तो ये कि मस्तिष्क नहीं तो चेतना नहीं। माने चेतना का सम्बन्ध, हमारी चेतना का सम्बन्ध पदार्थ से निश्चित रूप से है है। आप शराब पी लेते हैं, चेतना में लहरें आ जाती है चेतना का स्तर आप कहते है कि गिर गया। और शराब क्या चीज़ है? रसायन ही तो है न।
तो माने हमारी चेतना का सम्बन्ध मटेरियल से, भौतिक जगत से निश्चित रूप से है। दूसरी ओर हमारी चेतना अगर पदार्थ से ही बनी होती जैसे कोई मशीन बनती है पदार्थ से, कोई कपड़ा बनता है पदार्थ से, कोई घर बनता है पदार्थ से; तो फिर ये सम्भव होता कि अलग-अलग पदार्थों को किसी एक तरीक़े से, किसी एक अनुपात से एकसाथ लाया जाए और उनसे एक चैतन्य इकाई पैदा कर दी जाए कि बीस ग्राम ये चीज़ लाये, चालीस ग्राम वो चीज़ लाये, फिर वो लाये, वो लाये, उनको इस तरीक़े से जोड़ा-तोड़ा, इतने समय तक पकाया, इतने समय तक खौलाया, इस प्रक्रिया से उनको गुज़ारा। और ये सब करने के बाद हमको क्या मिल गया? एक चैतन्य जीव। पर ये तो हो नहीं पाता।




