प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे एक चीज़ पूछनी थी कि जैसे आपकी चेतना है या ओशो रजनीश की चेतना, हम ये मान के चल रहे हैं कि आप लोगों की चेतना एक आम चेतना से बहुत ऊपर है। तो क्या हम ये मान के चलें जब ऐसे धर्मगुरु शरीर छोड़ते हैं तो उनकी चेतना के शरीर छोड़ने के बाद क्या वो लोगों की मदद कर पाने के लिए सक्षम होते हैं? या फिर एक आदमी की चेतना और आप जैसे लोगों की चेतना में कोई फ़र्क है, या नहीं है? अगर है फ़र्क तो क्या वो लोगों की बाद में भी सेवा कर पाते हैं, मदद कर पाते हैं?
आचार्य प्रशांत: माने मैं मर जाऊँगा तो भूत बन के कुछ करूँगा कि नहीं?
(श्रोतागण हँसते हैं)
प्रश्नकर्ता: नहीं, नहीं। एक आम और एक अच्छे इंसान की चेतना में…
आचार्य प्रशांत: मुझे लगा आपका मुद्दा बदल गया होगा। आप भूतकाल में ही चल रहे हैं।
ये कृष्ण ने बोला? मैंने बोला? ये किसने बोला? अगर आप कह रहे हैं आप यहाँ इसलिए आए हैं क्योंकि आप मुझे सुन रहे हैं। मैंने कब बोला कि मरने के बाद वो चेतना निकल करके कुछ करती है या कुछ निकलता भी है? ऐसा मैंने बोला?
प्रश्नकर्ता: नहीं, आप कहते हैं आत्मा तो होती नहीं है। वो आत्मा के लिए पर्यायवाची शब्द यूज़







