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योग बिना वियोग नहीं || आचार्य प्रशांत, संत धरनीदास पर (2014)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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'धरनी' पलक परै नहीं, पिय की झलक सुहाय। पुनि-पुनि पीवत परमरस, तबहूँ प्यास न जाय।।

~ संत धरनीदास

आचार्य प्रशांत: “पुनि-पुनि पीवत परमरस, तबहूँ प्यास न जाय” धरनीदास के वचन हैं, सवाल है कि 'प्यास बुझेगी क्यों नहीं, प्यास बुझती क्यों नहीं?' प्रेम अनंत है। अनंत का क्या अर्थ है? अनंत का अर्थ है कि उसकी कोई सीमा कभी आएगी ही नहीं, उसके चरम पर कभी पहुँचोगे नहीं, उसको जितना पाओगे कम पड़ेगा, प्यास बनी ही रहनी है। अनंतता का यही अर्थ है कि जब शिखर पर पहुँचोगे तो नए शिखर खुलेंगे, कि तुम जितना पाते हो तुम्हारी पात्रता उतनी बढ़ती जाती है, कि तुम जितना पाते हो, पा-पाने की क्षमता तुम्हारी उतनी बढ़ती जाती है, यही अनंतता है।

मन में ये छवि बिलकुल मत बनाइएगा कि परम कोई वस्तु है, जिसे पा लिया और बात ख़त्म, कहानी ख़त्म। कहानी कभी ख़त्म नहीं होती। एक बार मैंने आपसे कहा था कि रियलाइजेशन इज नॉट ऐन एंड, इट इज अ कॉन्टिनअस बिगनिंग (समझना अंत नहीं है, एक सतत् शुरुआत है)। कहानी कभी ख़त्म नहीं होती। हाँ, चूँकि हम वस्तुओं को ही देखने के आदी हैं, मन वस्तुलीन रहता है, भाषा वस्तुपरक है तो इसीलिए हम जब सत्य की, प्रेम की, परम की भी चर्चा करते हैं तो वहाँ हम कुछ इस तरीके से बोलते हैं कि प्रेम पा लिया, मोक्ष हो गया, सत्य मिल गया। इस तरह की उक्ति ही नासमझी की है। कभी पाया नहीं जाता, कभी पूरा नहीं पड़ता।

पानी से जो प्यास बुझती है, वो बुझ सकती है क्योंकि गला भी वस्तु है, पानी भी वस्तु है, और ये प्यास पूरी तरह पदार्थनिष्ठ है, ये बुझ सकती है। अनंत की प्यास कभी बुझेगी नहीं। हाँ, वो प्यास और, और, और सूक्ष्म होती जाएगी, उस प्यास के अर्थ बदलते जाएँगे, मायने बदलते जाएँगे। मैंने आपसे कहा कि ये कभी न सोचिएगा कि प्यास बुझ सकती है, कृपा करके दूसरे छोर पर न कूद जाएँ। ये भी मत सोचने लगिए कि आप सदा प्यासे ही रहेंगे। न मैं आपसे ये कह रहा हूँ कि प्यास बुझ सकती है, न मैं ये कह रहा हूँ कि आप सदा प्यासे ही रहेंगे। आप बदलते हैं, आपकी प्यास का स्वरूप बदलता जाता है। आप वही थोड़ी रहते हैं जो प्यासा था। आप जैसे–जैसे पाते हैं, आप बदलते जाते हैं। आप बदलते हैं, आपकी प्यास वही कैसे रह जाएगी।

गति लगातार रहती है, उपनिषद् इसी को कहते हैं, “चरैवेति, चरैवेति”। चलते लगातार रहते हो, उसमें थमना कहीं नहीं है। हाँ, आपके चलने का आकार, प्रकार, ढंग सब बदल जाता है। चलते तो बुद्ध भी हैं, कौन-सा बुद्ध कभी थम गया! और दूर से देखोगे तो ऐसा ही लगेगा कि जैसे साधारण आदमी चलता है, वैसे बुद्ध चल रहे हैं। पर उनके चलने में और साधारण चलने में बड़ा अंतर आ जाता है। तुम भी बोलोगे, चलोगे, गति करोगे, सबकुछ रहेगा, गति करने वाला बदल चुका होगा। जब ऐसा होता है तो गति की दिशा, गति की लयात्मकता, सब बदले हुए होते हैं। शब्द तो वही रहेंगे, सोचेगा मन ही, प्रकट शब्दों से ही करोगे, कर्म शरीर के ही माध्यम से होंगे। पर ये सब जहाँ से उद्भूत होते हैं, वो केंद्र बदलता रहेगा। और उसमें कभी कोई आखिरी प्राप्ति नहीं होगी, कभी नहीं।

इसीलिए आप देखेंगे कि संतों के वचन हमेशा दो प्रकार के होते हैं। आपको हैरत होती होगी, कभी तो वो गाते हैं कि पा लिया, पा लिया और फिर उतनी ही कशिश से वो कहते हैं कि विरह है, नहीं पाया, नहीं पाया। बात विरोधाभासी लगेगी, विरोधाभासी बिलकुल भी नहीं है। जिसने बिलकुल ही न पाया हो सच तो ये है, उसको एहसास ही नहीं होगा कि नहीं पाया। जो जितना पाता है, उसको पाने की प्यास और बढ़ती है, उसको अपनी अपूर्णता और स्पष्ट दिखाई देती है। तो संत से ज़्यादा तीव्रता से इस पीड़ा को कोई अनुभव नहीं करता है कि नहीं पाया।

आप कहेंगे, ‘अजीब बात है, संत गा रहा है नहीं पाया ! आम आदमी गाए तो गाए, और अगर संत ने भी नहीं पाया तो फिर हमारे लिए क्या उम्मीद है?’ ये बड़ी सूक्ष्म बात है, बड़ी मज़ेदार बात है, इसको समझना पड़ेगा। ये जानने में कि नहीं जाना, बड़ा आनंद है। और उससे भी ज़्यादा आनंद है, ये जानने में कि जाना जा नहीं सकता। ये बात अहंकार को ज़रा भी नहीं सुहाएगी क्योंकि अहंकार कहता है कि मज़ा तो तब आया न जब जान लिया, मज़ा तो तब आया न जब ज्ञान हो गया। ये पांडित्य की भाषा है कि ज्ञान हो गया, जान लिया, पा लिया, ये संतत्व के वचन नहीं हैं। संतत्व में तो आप इसी में मस्त हो लेते हो कि अरे, हम जान ही नहीं सकते, इतना बड़ा है कि पा ही नहीं सकते। अपनी नाकामी में कामयाबी का जश्न मना लेते हो कि वो जो परम है, जो पिता है, जो पिया है, वो इतना बड़ा है कि कभी उसको पा नहीं पाएँगे, पूरा नहीं पड़ेगा। हमारे हाथों में समाएगा नहीं।

प्रिया ने सवाल पूछा और मुझे लगता है, प्रिया ने ही कुछ दिन पहले दो-तीन बड़ी खूबसूरत पंक्तियाँ भेजी थीं, “तू अम्बर की आँख का तारा, मेरे छोटे हाथ, सजन मैं भूल गयी ये बात"। किसी ने भेजी थी। मैंने आप लोगों तक फिर पहुँचायी भी थी। बस ऐसा ही है, “तू अम्बर की आँख का तारा, मेरे छोटे हाथ, सजन मैं भूल गयी ये बात”।

उसको कोई ज़िद नहीं है कि वो कभी आपको पूरा न मिले, उसने ठान नहीं रखा है कि आप तड़पें और आपकी प्यास बनी रहे। आप तो आप हैं न, हाथ छोटे हैं, वो समाता नहीं। और वो क्या करे, वो तो वही रहेगा, और आपने भी तय कर रखा है कि आप, आप ही रहेंगे।

जब तक ‘मैं’ का आखिरी निशान भी घुल नहीं जाता, जब तक वक्ता और उसका वक्तव्य अभी शेष है, तब तक ये कहना बड़बोलापन होगा, नासमझी होगी कि मैंने पा लिया। यही कारण है कि कई धार्मिक परंपराओं में 'अहम् ब्रह्मास्मि' जैसे वाक्यों पर रोक है। क्योंकि तुम्हारा 'अहम् ब्रह्मास्मि' कहना शोभा देता नहीं है। तुम कैसे पूरा पा लोगे, ब्रह्म माने अनंत जिसका ओर–छोर नहीं और अहम् माने छोटा, छुद्र, सीमित, तो अहम् ब्रह्म कैसे हो जाएगा? अहम् को ब्रह्म होने के लिए तो आत्मरूप होना पड़ेगा।

आत्मा ब्रह्म हो सकती है, ‘अयमात्मां ब्रह्म’। आत्मा ब्रह्म हो सकती है, पर जब आप कहते हो, 'अहम् ब्रह्मास्मि' तो अहम् को पहले आत्मा होना पड़ेगा। और आपका अहम् जुड़ा हुआ है पचास और चीज़ों से, शरीर से, देह से, मन से, धारणाओं से। तो ब्रह्म कभी पाओगे कैसे, होओगे कैसे? तो उचित ही है कि विरह की पीड़ा को अनुभव करो।

संत प्यार के, इंतज़ार के, मनोहार के गीत गाता है, लगातार द्वार खुले रखता है कि तुम आओ। और फिर यदाकदा, बीच-बीच में वो कहता है कि पा लिया। पर उसका पाना भी ऐसा नहीं होता कि मेरा हक़ था तुझ पर तो पा लिया, अपने अधिकार स्वरूप पा लिया। वो पाना भी ऐसा होता है कि तुम आये, तुम उतरे, तुम्हारी अनुकंपा।

मैं दोहरा रहा हूँ, जितना पाते जाओगे उतना अपने सूनेपन का एहसास बढ़ता जाएगा। यही तो उसका तरीक़ा है तुम्हें और पाने को प्रेरित करने का। वो जिस पर कृपा करता है उसे प्यास देता है, उसे दुख देता है, उसे विरह की पीड़ा देता है। सौभाग्यशाली हैं वो जिन्हें जीवन में रिक्तता का एहसास होता है, जिन्हें उनका सूनापन कचोटता है, वो सौभाग्यशाली हैं। क्योंकि वो सूनापन कचोटता ही उन्हें है जिन्हें अब कुछ मिलने लगा है, नहीं तो न कचोटता।

दुनिया भरी हुई ऐसे लोगों से जिन्हें ये लगता ही नहीं कि कोई कमी है। आप उनसे जाकर के पूछिए कि हाँ भई, कोई दिक्कत, कोई तकलीफ़? ‘कोई तकलीफ़ नहीं, सब बढ़िया है, बिस्तर मुलायम है, चादर साफ़ है, बग़ल में खाने को रखा है, घर में उपकरण हैं, गैजेट (उपकरण) हैं, सुख-सुविधाएँ हैं, कोई तकलीफ़ नहीं। बीवी है, बच्चा है, सम्मान है, कोई तकलीफ़ नहीं। बस सब ठीक चल रहा है, बहुत बढ़िया। आइए थोड़ा घूम के आते हैं, कुछ ख़रीद के आते हैं, कोई तकलीफ़ नहीं।‘ दुनिया भरी हुई है ऐसे लोगों से और वो झूठ नहीं बोल रहे हैं। उन्हें वास्तव में नहीं दिख रहा कोई तकलीफ़ है। बहुत बड़ी तादाद है ऐसों की, वो प्रसन्न हैं।

इसीलिए आपसे कहता हूँ कि प्रसन्नता से ज़्यादा क्षुद्र चीज़ कोई होती नहीं। प्रसन्नता बड़ी सस्ती बात है, बाज़ार में बिकती है, ख़रीदी जा सकती है, बिलकुल ख़रीदी जा सकती है। जो लोग कहते हैं कि पैसा खुशी नहीं ख़रीद सकता, उन्होंने कभी बाज़ार जाकर के देखा नहीं। खुशियाँ बिक रही हैं, पैसे से ही तो बिक रही हैं।

धन्यभागी हैं वो जिन्हें बाज़ार अब सुहाता नहीं। धन्यभागी हैं वो जिन्हें जो चाहिए वो बाज़ार में मिलता नहीं। वो दुकान-दुकान तलाशते हैं पर पाते नहीं। और जब पाते नहीं तो वो जान नहीं पाते कि कहाँ मिलेगा, किसी दुकान पर तो बिकता नहीं। कहाँ जाएँ, कहाँ ढूँढें। और जितना उन्हें दिखता जाता है, किसी दुकान पर मिलता नहीं, उतना ही उनके भीतर आनंद भी जागृत होता जाता है। कोई यही न सोचे कि तड़प भर रहे हैं, आनंदित भी हैं। बात अजीब है, सुनने में बहुत विचित्र लगेगी। जो विरह में तड़प रहा है, उसको यही न सोचना कि तड़प ही भर रहा है। वो ऊपर-ऊपर तड़प रहा है, अंदर-ही-अंदर उसके पास वही है, गूँगे का गुड़।

और उससे उल्टा है आपका साधारण संसारी वो ऊपरऊपर प्रसन्नचित्त है, और अंदर-ही-अंदर उसका मन गहराई में उद्वेलित है। पर वो इतना संवेदना हीन हो चुका है कि उसे अपने ही मन के कष्ट से कोई सरोकार नहीं रहा। जैसे कि आपके शरीर का कोई हिस्सा सुन्न पड़ जाए और आपको पता ही न चले कि उसमें बड़ा कष्ट है, आप अपनी ही वेदना के प्रति जागरूक न रहें।

वेदना शब्द ही बड़ा सांकेतिक है। विद् से उठा है, विद् माने जानना। जो जानता है उसे ही वेदना उठती है। वेदना शब्द वहीं से आ रहा है, जहाँ से विद्या और वेद। वेदना का शुद्ध अर्थ जानना है और जानने के साथ पीड़ा उठती है। कौनसा जानना? ज्ञान वाला जानना नहीं, बोध। विद्या, वेद, बोध। जहाँ बोध है वहाँ पीड़ा रहेगी। एक बुद्ध के लिए सारे संसार का दुख उसका अपना दुख है। वो उस पूरे दुख से अनछुआ भी है लेकिन फिर भी वो पूरा दुख उसने अपने ऊपर ले लिया है, यही वेदना है। और वेदना का सहज प्रतिफल होता है करुणा।

तो संत क्या करता है? संत जानता है, संत के पास बोध है, संत के पास विराह है, वेदना और है संत के पास करुणा। तीनों एक साथ हैं। तीनों के मूल में, भूलिएगा नहीं, बोध बैठा है, विद्या, समझना, जानना, या यूँ कहिए पाना। पाया है, मगन है, आनंदित है और पाएगा, इसी का नाम विरह है।

मैं इस बात को ऐसे भी कह सकता हूँ कि योग जितना गहराता है वियोग की प्रतीति भी उतनी बढ़ती है। बिना योग के वियोग नहीं है। यदि मामला इतना सीधा होता कि जो केंद्र से, परम से जितना दूर है, उसमें उतना वियोग उठेगा तो दुनिया फिर वियोगियों से भरी होती, और ये सब लगातार रामधुन ही गा रहे होते। आपको ऐसा दिखाई पड़ता है क्या? एक तथ्य तो ये है कि आपके आसपास जितने भी आपको लोग दिखाई देते हैं वो अपने केंद्र से बहुत-बहुत छिटके हुए हैं। केंद्रयुक्त नहीं हैं, टूटे हुए हैं। योगी नहीं हैं, बिखरे हुए हैं। योग का अर्थ होता है, जुड़ना। वो जुड़े हुए नहीं है, टूटे हुए हैं। तो एक बात ये है, और दूसरी बात, उनमें आ मिलने की कोई स्पष्ट अभीप्सा भी नहीं है। तो ऐसा बिलकुल भी नहीं होता है कि दूर छिटके रहने से ही आप में पास आने की प्रेरणा बढ़ जाए, बिलकुल भी नहीं।

बात दूसरी है, आप जितने पास आते हैं उतनी ज़्यादा पास आने की प्रेरणा बढ़ती है। क्योंकि पास आने की प्रेरणा भी आपको कौन देगा, संसार देगा क्या? जिसके पास आ रहे हो वही तो पास आने की प्रेरणा भी देगा न। तुम्हें सिखाएगा कौन पास आना? दुनिया के जितने करीब जाते हो दुनिया क्या सिखाती है, दुनिया तो यही सिखाती है, अपने केंद्र से दूर हो जाओ। केंद्र के पास आना भी तुम्हें केंद्र ही सिखाएगा और कोई नहीं सिखा सकता, ख़ुद नहीं जान पाओगे।

कोई मुझसे पूछ रहा था, कहता है, 'संतों ने गुरु की इतनी महिमा गाई है, तो मन में शक उठता है कि कहीं ये इसलिए तो नहीं कि उनके मन में शिष्य बनाने का लोभ था। संतों को ज़रूरत क्या थी? और जिसको देखो वही बिना किसी अपवाद के सब गुरु-गुण गा रहे हैं, क्यों?' मैंने कहा, इसलिए क्योंकि गुरु क्या है, ये भी तुम्हें सिर्फ़ गुरु ही बता सकता है। जब वो दुनिया को सबकुछ बता रहे हैं — और दुनिया इतनी नासमझ है कि कुछ भी ख़ुद नहीं समझती — तो गुरु क्या है, ये भी तो गुरु को ख़ुद ही समझाना पड़ेगा न। या तुम ख़ुद ही समझ जाओगे? तुम इतने ही समझदार होते तो बाकी सबकुछ भी अपनेआप ही समझ गए होते। सुख क्या है, माया क्या है, मोह क्या है, परम क्या है, ईश्वर क्या है, ब्रह्म क्या है, प्रेम क्या है, सत्य क्या है, ये सब जब कबीर को तुम्हें समझाना पड़ रहा है, तो कबीर को ये भी तो समझाना पड़ेगा न कि गुरु क्या है। तो गुरु की स्थिति बड़ी विकट होती है, उसे अपने ही मुँह से बताना पड़ता है कि सुनो, जानो गुरु को।

यही मैं तुमसे कह रहा हूँ, केंद्र के अलावा तुम्हें और कोई प्रेरणा नहीं देगा केंद्र के पास आने की, ठीक इसी तरह से गुरु के अलावा कोई और तुम्हें नहीं प्रेरणा देगा गुरु के पास आने की, संसार तो तुम्हें गुरू से दूर ही खींचेगा। तो गुरु की स्थिति बड़ी विषम होती है। वो इस बात का इंतज़ार नहीं कर सकता कि तुम ख़ुद जान जाओ, कि तुम ख़ुद समझ जाओ और उसके निकट आओ और जानो और सीखो। उसे बताना पड़ता है कि जानो, ऐसा है। और जहाँ वो सौ बातें बताता है, वहाँ उसे एक बात ये भी बतानी पड़ती है।

आपमें से भी जो लोग इस प्रक्रिया का अनुभव कर रहे होंगे, उन्होंने दो-दो बातें अनुभव करी होंगी, गहरा आनंद भी और गहरी रिक्तता भी। कोई ये न सोचे कि आनंद बढ़ता जाएगा और रिक्तता कम होती जाएगी। जो होता है वो बड़ा अद्भुत है, आनंद और रिक्तता एक दूसरे में विलीन होते जाते हैं। अभी आपकी स्थिति ये है कि आनंद आपको पूर्णता का एहसास देता है और रिक्तता आपको खालीपन का एहसास देती है। रिक्तता को आप वियोग बोलते हैं, रिक्तता को आप कम करना चाहते हैं। आप जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे, ये होने जा रहा है कि आनंद और रिक्तता एक-दूसरे में मिलना शुरू कर देंगे, एक होते जाएँगे।

उसी को उपनिषद कहते हैं, "पूर्ण शून्य है और शून्य पूर्ण है"। एक रिक्त आनंद। अभी तो आपकी जो अनुभूति है, उसमें कहीं-न-कहीं द्वैत है। पाते हो तो पाने का उल्लास है और पा के पता चलता है कि कितने खाली थे, उसका अवसाद है। अभी तो उल्लास और अवसाद के बीच झूलते हो झूला, दोनों को अनुभव करते हो, दो अलग-अलग अनुभवों के रूप में।

जैसे-जैसे तुम्हारा पाना गहराता जाएगा, वैसे–वैसे ये दोनों अनुभव एक होते जाएँगे। इनमें अंतर नहीं रह जाएगा। फिर कह नहीं पाओगे कि उल्लास है या अवसाद है। फिर कह नहीं पाओगे कि पूर्णता का अनुभव हो रहा है या शून्यता का। सब एक होता जाएगा। और जब उत्सव और अवसाद एक में मिल जाते हैं, तुम जान ही नहीं पाते कि मन का अभी माहौल क्या है, तब समझना कि मन मिटा, जानने वाला मिटा। अब न द्वैत का ये सिरा शेष है, न वो सिरा शेष है। न मुझे यह लग रहा है कि बहुत कुछ मिल गया और न मुझमें यह प्यास बाकी है कि बहुत कुछ पा लूँ, अब मात्र मौन है और वो आख़िरी होता है। पर मौन की भी छवि न बना लेना, कि निर्वाण का अर्थ है मौन की उपलब्धि। उस मौन के भी हज़ार तल हैं, वो भी गहराता जाता है।

तो मैंने दो-तीन जो बातें कहीं वो ये कि आम स्थिति में आम व्यक्ति को, आम मन को न योग है न वियोग है, ये हमारी साधारण स्थिति है। न योग हैं न वियोग है, आप सड़क पर चलते हुए आम आदमी को देखिए उसको न योग उपलब्ध हुआ है, इसी कारण उसे वियोग भी नहीं उपलब्ध हुआ है, उसे कोई दुख नहीं है। आप बाज़ार में जाइए, आप घरों में जाइए, आम बाज़ारू आदमी को, आम गृही को देखिए, आपको उस में कोई दुख नज़र आता है? वो प्रसन्न है, जैसे कोई शराबी झूम रहा है। उसको न योग है, न उसने कुछ पाया है, न उसे ये अनुभूति है कि मैंने नहीं पाया है। तो ये सबसे निम्न तल है।

उससे ऊपर वो तल है जहाँ आप पाना शुरू करते हैं। जैसे-जैसे आप पाते जाते हैं वैसे-वैसे पाने की अभीप्सा भी बढती जाती है। जैसे-जैसे योग बढ़ता है, वैसे-वैसे वियोग की अनुभूति भी बढ़ती है। तो वियोग शुभ है, कष्ट शुभ है, कह रहा था न आपसे एक बार, "पीड़ा पैगाम परम का"। कि पीड़ा की यदि अनुभूति हो रही है तो समझिए कि कोई शुभ घटना घट रही है आपके जीवन में। ये दूसरा तल है, इस दूसरे तल में मिलने के गीत हैं और इंतज़ार की पीड़ा है। इस दूसरे तल पर वेदना शब्द उपयुक्त हो जाता है। वेदना शब्द के दोनों अर्थ प्रासंगिक हो जाते हैं। क्या दो अर्थ हैं वेदना के, पाना – बोध पाना और कष्ट पाना।

वेदना के दोनों अर्थ है, बोध और कष्ट, दोनों अर्थ प्रासंगिक हो जाते हैं इस दूसरे तल पर। कि जानता जा रहा हूँ और जितना जानता जा रहा हूँ उतना ज़्यादा पीड़ा से भरता जा रहा हूँ। जैसे–जैसे जानना बढ़ता है, वैसे–वैसे इस कष्ट का स्वरुप बदलता है, सूक्ष्म होता है। कष्ट तब भी रहता है पर बदलता जाता है, वो एक साधारण आदमी का कष्ट नहीं रहता फिर। वो एक ऐसी पीड़ा बनता जाता है जो आपका शोधन कर देती है।

इसी कारण रूमी ने कहा, “द वूंड इज़ द प्लेस व्हेयर द लाइट इंटर्स्स यू” (चोट वह स्थान है जहाँ से आपमें प्रकाश प्रवेश करता है), ये दूसरे तल की बात है। इसी कारण सदा से धर्मों ने ये पाया कि दुख में एक गरिमा है, जो सुख में नहीं है। इसीलिए खासतौर पर ईसाइयत में रिपेंटेंस (पश्चाताप) पर इतना ज़ोर है। कि जो दुख भोग रहे हैं वो कहीं-न-कहीं अपने पाप धो रहे हैं, वो बात वही है कि जिसको वेदना है, उसे वेदना भी है। वेदना यानि जानना मात्र उसके लिए है, जिसे वेदना यानि पीड़ा है। वेदना यानि जानना सिर्फ़ उसके लिए है जिसे वेदना यानि पीड़ा है।

कष्ट में एक ताप होता है। जब आप कष्ट में होते हैं तो भीतर कुछ जल जाता है। कष्ट के ही ताप को फिर तपस्या कहा गया है, कि तप जाना। हमेशा से योगियों ने संतों ने जो अपनेआप को कष्ट दिए, देह को सुखाया, मन की वृत्तियों का निरोध किया, वो यूँही नहीं था। कष्ट शोधन करता है और जितना ज़्यादा आप सुख में होते हैं, मन योग से उतना ज़्यादा दूर होता है। क्योंकि सुख का अर्थ है कि वियोग की अनुभूति नहीं हो रही है।

ईसाइयत ख़ासतौर पर बार-बार कहती है कि जलो पश्चाताप की अग्नि में, पछतावे की पीड़ा में जलो। ये तुम्हारा जलना ही तुम्हें साफ़ करेगा, यही रेचन करेगा तुम्हारा। भारत की भाषा में कहें तो ये होगा कि तुम दुख भुगत कर अपना कर्मफल काट रहे हो। क्योंकि कर्मफल कभी सुख नहीं हो सकता, कर्मफल तो है ही दुख। कर्मफल सुख से कभी नहीं कट सकता, कभी नहीं। सुख का तो अर्थ है कि आपने और कर्मफल पैदा कर लिया है आगे के लिए। यदि कर्म अकर्म से निकला हो तो उसका कोई फल रहेगा ही नहीं। कर्म का फल शेष है, यही दुख है।

तो ये भ्रांति भी अपने मन से निकाल दीजिए कि किसी को सुख इसलिए मिलता है क्योंकि उसने पहले अच्छे कर्म किए थे। पुराने कर्मों से मिलता जरूर है, पर मात्र दुख, सुख नहीं मिल सकता। और यदि पुराने कर्मों से दुख मिल रहा है तो उसे भोग लीजिए, पूरे बोध के साथ। जब बोध के साथ दुख भोगा जाता है, वही आपकी मुक्ति का ज़रिया बन जाता है। भुगतिए। वेदना और वेदना, जानना और भुगतना।

और जो आज उसको नहीं भुगत रहा वो इतना ही कर रहा है कि उसे संग्रहित कर रहा है आगे के लिए। जैसे-जैसे बोध गहराता है वैसे-वैसे कर्मफल कटते हैं। और कर्मफल कैसे कटते हैं, कर्मफल ऐसे ही कटते हैं कि तुम्हारे दुख का सारा भंडार एक त्वरा के साथ, एक जल्दी के साथ तुम्हारे सामने खुलने लगता है।

वो दुख का भंडार हम सबके पास है पर हमने आमतौर पर उसे मन के तहख़ानों में बंद करके रखा हुआ है। और वहाँ वो ज़हर बनता रहता है और जीवन को पूरा दूषित करता रहता है क्योंकि है तो मन में ही न, कहीं और तो नहीं है, मन में ही मौजूद है। संत मन के उस तहख़ाने तक पहुँच जाता है और दुख के उस भंडार को खोल देता है। बोध का अर्थ ही है गहरे जाना। और मन में जब गहरे उतरोगे तो वहाँ दुख-ही-दुख दिखाई देगा और कुछ नहीं है वहाँ पर, हम सब और क्या हैं, दुख का फल हैं और क्या हैं।

इसीलिए आप पाएँगे कि माया को और संसार को संतों ने ही ठुकराया है, और दुष्ट कहा है, और पाप कहा है। गृहस्थों ने और संसारियों ने नहीं कहा है। इसका कारण है, क्योंकि संसार से दुख अनुभव ही संत करता है, गृहस्थ करता ही नहीं। तुम दुख अनुभव तो तब करोगे न, जब मन में गहरे उतरोगे, जब उस तहखाने में पहुँचोगे। संत ही है जो उतर करके उस तहखाने में पहुँचता है। वही है जिसको दुख उद्घाटित होता है, आम आदमी को तो पता भी नहीं होता कि उसने अपनी वृत्तियों में क्या-क्या संचित कर रखा है। हम कहाँ जानते हैं, संत जानता है।

इसीलिए कबीर बार–बार कहते हैं कि “माया तो ठगनी बड़ी”। आप सड़क पर चलते आम आदमी से पूछिए तो कहेगा, 'माया? माया तो कुछ नहीं।' कबीर बार-बार कहते हैं कि माया बहुत ख़तरनाक है, माया बहुत ख़तरनाक है क्योंकि कबीर ने ही माया के ज़ोर को अनुभव किया है, आम आदमी ने किया ही नहीं। कबीर गए हैं, लड़े हैं। कबीर ही तो अपने सूरमा हैं, वो गए हैं। कहते हैं, 'माया तजि भक्ति करे, सूर कहावे सोये।' कबीर ने कोशिश करी है माया को तजने की और पाया है कि कितना मुश्किल है।

तो इसीलिए कबीर जानते हैं कि “माया पापिनी”। और बार–बार बोलते हैं, 'बड़ी दुष्टा है, बड़ी पिशाचिनी है'। कबीर के अलावा और कोई बोल भी नहीं सकता, संतों के अलावा और कोई बोल भी नहीं सकता क्योंकि हमें पता ही नहीं है कि माया कितनी दुष्ट है। हमें पता ही नहीं है कि माया में कितना ज़ोर है। हमने कभी माया के दर्शन ही कहाँ किए। माया तो बैठती है गहराई से, मन के तहखाने में, हम उस तहखाने तक कभी पहुँचे ही नहीं, हम अपने मन के कभी साक्षी हुए ही नहीं। माया के ज़ोर का, उसके फंदों का और दाँव-पेंचों का हमें पता ही कहाँ है?

तो संत कहेगा कि बाप रे! बड़ी ताकत है माया में। संत कहेगा कि संसार बहुत फँसाता है, बड़ा जाल है इसमें। आम आदमी कहेगा, ‘कहाँ कोई जाल है, हमें तो दिखता नहीं’। और वो झूठ नहीं बोल रहा है, उसे वास्तव में नहीं दिखता। करुणा रखिएगा, वो झूठ नहीं बोल रहा, उसे नहीं दिखता, नहीं दिखता। उसकी आँखें धूल से ढँकी हुई हैं, उसे कुछ नहीं दिखता।

संत को दिखता है। चूँकि उसे दिखता है इसीलिए उसे वेदना है। तो भूलिएगा नहीं जैसे-जैसे वेदना बढ़ेगी, वैसे-वैसे वेदना बढ़ेगी, ये दूसरा तल। इस तल पर दो वेदना हैं और दोनों द्वैत के दो सिरों की तरह अलग-अलग हैं। और आप उलझ जाते हैं, आपको पता भी नहीं चलता कि करें तो करें क्या? हँसे कि रोएँ। हँसने का भी मन करेगा कि इतना मिल गया। और रोने का मन करेगा कि कितना कुछ बाक़ी है मिलने को। कबीर कहते हैं, 'रोता हूँ तो जग छूटता है, और हँसता हूँ तो राम रिसाते हैं'। करें तो करें क्या? और दोनों अनुभूतियाँ हो रही हैं।

फिर ये दोनों अनुभूतियाँ एकाकार होने लगेंगी, अब आप पहले तल की ओर जा रहे हैं। दोनों रहेंगी पर उनकी जो पृथकता है, वो मिटने लगेगी। दोनों अनुभूतियाँ रहेंगी, उनके बीच की सीमा मिटने लगेगी। सुख दुख में मिलने लगेगा, दुख सुख से एक होने लगेगा। सुख दुख जैसा लगेगा, दुख सुख जैसा लगेगा और दोनों फिर ना-कुछ लगेंगे, ये आनंद है, ये विशुद्ध आनंद है। पूर्ण शून्य हो रहा है, शून्य पूर्ण हो रहा है, रिक्तता में पूर्णता, ना-कुछ में सबकुछ। अब ये प्रश्न ही महत्त्वहीन होने लगेगा कि कैसा लग रहा है क्योंकि जिसको लग रहा था अब वही महत्त्वहीन होने लगा है। इसी स्थिति को फिर ऋभु गीता कहती है कि अविद्या भी झूठी है और विद्या भी झूठी है। कैसा जानना, कैसा आनंद, जिसको हो रहा था, वही मिटता जा रहा है। अब आप एक हैं बिलकुल। योग वियोग से मिल गया है।

अब आप संत से पूछेंगे कि योगी हो कि वियोगी, कुछ न बोल पाएगा। हाँ, ज़ेन की परंपरा का है तो ज़रूर बोल देगा, क्या – मुँह (audio unclear: 00:49:00)। क्या बताएँ तुम्हें कि योगी हैं कि वियोगी! आप जाकर पूछिए बुल्लेशाह से कि पाया है कि नहीं पाया है, तो एक तरफ़ तो कह देंगे कि पाया है और तत्क्षण कह देंगे, ‘न, नहीं मिला है’। कभी-कभी आता है पिया घर और बीच में भी घड़ियाली गड़बड़ कर देता है। आपने कभी सोचा नहीं? बुल्लेशाह एक तरफ़ तो कहते हैं ‘पा लिया’, दूसरी ओर कहते हैं, ‘घड़ियाली भाँजी मारता है’। अरे पा ही लिया तो घड़ियाली कहाँ से आया बीच में? घड़ियाली है, हम सबकी ज़िंदगी में है, बस बुल्लेशाह को प्रतीति है कि वो है। हमें तो पता भी नहीं कि हमारी ज़िंदगी घड़ियालियों और घड़ियालों से ही भरी हुई है। बड़े-बड़े घड़ियाल हैं, हमें पता भी नहीं, उन्हें पता है। जब उन्हें पता है तो कहते हैं कि निकालो इसको।

ये अद्वैत है, सुख-दुख का एक हो जाना। सुख भी है, दुख भी है, उनका विभाजन नहीं है। सुख भी है, दुख भी है। जब सुख है तो दुख की आकांक्षा, दुख का डर नहीं है। जब दुख है तो सुख की आकांक्षा, सुख का लोभ नहीं है। यह एक विभाजन है, ये नहीं है। जो है सो है, सुख में सुख है, दुख में दुख है और इसी स्थिति को आनंद कहते हैं, दोनों एक हो गए।

किसी ज़ेन गुरु से एक बार उसके शिष्य ने पूछा कि गर्मी बहुत लगती है और ठण्ड भी बहुत सताती है, क्या करें। उसने उत्तर दिया, 'जब गर्मी बढ़े तो गर्म हो जाओ और जब सर्दी बढ़े तो सर्द हो जाओ’। यही सूत्र है, पूर्णता का पूरा-पूरा एहसास और रिक्तता के भी भरे-पूरे गीत। रिक्तता के उतने भरे-पूरे गीत निकलेंगे ही पूर्णता से, जैसे मीरा बुलाती है कृष्ण को।

मीरा कृष्ण को इतनी शिद्दत से बुलाती ही इसीलिए है क्योंकि उसके भीतर से कृष्ण ही गा रहे हैं। और कौन पुकारेगा कृष्ण को? कृष्ण को इतनी तीव्रता से कोई मीरा थोड़े ही पुकारेगी, कृष्ण ही चाहिए कृष्ण को आमंत्रित करने के लिए। तो मीरा के हृदय में कृष्ण बैठ गए हैं इसीलिए तो मीरा ऐसे गाती है। अब वो चाहे जो गाये, वो चाहे ये कहे कि कान्हा मिल गया और चाहे वो ये गाये कि कान्हा नहीं मिला, बात एक है, सुख-दुख एक हो चुका है।

लेकिन अनुभव दोनों का है, फिर कह रहा हूँ, ये आँख खोलने का फल है, ये कोई नयी चीज़ नहीं है। ये तो तुम्हारे पास इकट्ठा था ही, आँख खुली है तो दिखाई देता है। जैसे कि तुम्हें शरीर सुन्न करने की दवाई दे दी गयी हो, किसी तरीक़े का एनस्थीज़िया। और वो उतरने लगे, तुममें जागृति आने लगे तो तुम्हें क्या अनुभव होगा? गहरी पीड़ा। ये पीड़ा नयी नहीं है, ये तुम्हें थी ही, तुम्हारा नशा उतर रहा है। तुम्हारा नशा उतर रहा है तो अब तुम्हें अनुभव होने लगी है, ये तुम्हें थी, सदा से थी। पर अनुभव अब इसलिए हो रही है क्योंकि नशा उतर रहा है। लोग इसीलिए तो डरते हैं न, नशा छोड़ने से। नशा छोड़ा तो तुरंत क्या अनुभव होगी? पीड़ा। संकेत समझो ! हमने जीवन में जितने नशे पकड़ रखे हैं हम क्यों नहीं छोड़ते? नशा छोड़ा तो अपने जीवन की रिक्तता साफ़-साफ़ दिख जाएगी। दुख का वो पूरा समुद्र है भीतर, वो सामने खड़ा हो जाएगा।

इसीलिए तो हम अकेले रहना बर्दाश्त नहीं करते। हज़ार तरीके के नशे हैं दुनिया में लेकिन सबसे बड़ा जो नशा है, वो नशा है दूसरे, अदर्स (दूसरे लोग)। और उस नशे की जो काट है, वो भी सिर्फ़ एक है, मैं, आत्मा। हम सब यहाँ (शिविर में) जो बैठे हुए हैं, हमें इंसान मत समझ लेना, हम दुख का घनीभूत रूप हैं। जब ये कहा जाता है कि अतृप्त इच्छाएँ ही पैदा होती हैं तो फिर समझ लो न कि हम क्या हैं। हम ऊपर से लेकर नीचे तक नख-शिख दुख हैं हम, दुख-ही-दुख है।

बुद्ध ने इसीलिए जो बातें बोलीं, उनमें पहला आर्य सत्य था, “जीवन दुख है”। “जीवन दुख है” से आशय उनका यही था, ‘हम दुख हैं’। कुछ नहीं है हमारा जो दुख के केंद्र से न निकलता हो। कोई गति, कोई विचार, कोई दिशा नहीं है हमारी जो दुख की न हो। और दुख कायम रहता है दुख के अस्वीकार से।

दुख भुगतने का अर्थ है, मैंने दुख को स्वीकार कर लिया। दुख भुगतने का अर्थ है, मैंने इस तथ्य को जान लिया और चूँकि वो तथ्य है तो उसके सामने सिर झुका दिया कि मैं दुख हूँ। और इसी का नाम समर्पण भी है। चूँकि तुम दुख हो तो तुम समर्पित करोगे भी तो क्या करोगे, अपना दुख ही तो समर्पित करोगे।

तो जब कहा जाता है कि समर्पित हो जाओ तो वो बड़ा फायदे का सौदा होता है। तुमसे यही कहा जाता है, 'अपने सारे दुख ले जा करके विसर्जित कर दो'। समर्पण का अर्थ है, दुखों का विसर्जन। पर हमारी मूर्खता की पराकाष्ठा ये है कि जब कहा जाता है कि समर्पित हो जाओ तो हमें लगता है कि हमारी कोई बहुत कीमती चीज़ कही जा रही है कि इसको समर्पित कर दो। हमें यह समझ में नहीं आता कि चूँकि हम दुख हैं तो इसलिए समर्पण का अर्थ है, दुखों का परित्याग और कुछ नहीं। हम अपनी जेब टटोलना शुरू कर देते हैं। हमें लगता है, कुछ हमारा छीना जा रहा है।

इस बात को समझना तुम — दुख तो दुख है ही, दुख का कोई द्वैत विपरीत नहीं होता, सुख भी दुख है। सुख और दुख दोनों क्या हैं? मानसिक विकार, मानसिक उत्तेजनाएँ।

तो दुख तो दुख है ही, सुख भी दुख है क्योंकि दोनों विकार हैं। कोई ये प्रश्न न उठाए कि क्या सिर्फ़ मन में दुख भरे हुए हैं, सुख नहीं भरे हुए। न; मन में जो कुछ भरा हुआ है, वो सब विकार है। तो दुख तो दुख है, सुख भी दुख है। यही कह रहा हूँ, दुख भी विकार है, और सुख भी विकार है। मन में जो कुछ है, वो विकार-ही-विकार है।

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