'धरनी' पलक परै नहीं, पिय की झलक सुहाय। पुनि-पुनि पीवत परमरस, तबहूँ प्यास न जाय।।
~ संत धरनीदास
आचार्य प्रशांत: “पुनि-पुनि पीवत परमरस, तबहूँ प्यास न जाय” धरनीदास के वचन हैं, सवाल है कि 'प्यास बुझेगी क्यों नहीं, प्यास बुझती क्यों नहीं?' प्रेम अनंत है। अनंत का क्या अर्थ है? अनंत का अर्थ है कि उसकी कोई सीमा कभी आएगी ही नहीं, उसके चरम पर कभी पहुँचोगे नहीं, उसको जितना पाओगे कम पड़ेगा, प्यास बनी ही रहनी है। अनंतता का यही अर्थ है कि जब शिखर पर पहुँचोगे तो नए शिखर खुलेंगे, कि तुम जितना पाते हो तुम्हारी पात्रता उतनी बढ़ती जाती है, कि तुम जितना पाते हो, पा-पाने की क्षमता तुम्हारी उतनी बढ़ती जाती है, यही अनंतता है।
मन में ये छवि बिलकुल मत बनाइएगा कि परम कोई वस्तु है, जिसे पा लिया और बात ख़त्म, कहानी ख़त्म। कहानी कभी ख़त्म नहीं होती। एक बार मैंने आपसे कहा था कि रियलाइजेशन इज नॉट ऐन एंड, इट इज अ कॉन्टिनअस बिगनिंग (समझना अंत नहीं है, एक सतत् शुरुआत है)। कहानी कभी ख़त्म नहीं होती। हाँ, चूँकि हम वस्तुओं को ही देखने के आदी हैं, मन वस्तुलीन रहता है, भाषा वस्तुपरक है तो इसीलिए हम जब सत्य की, प्रेम की, परम की भी चर्चा करते हैं तो वहाँ हम कुछ इस तरीके से बोलते हैं कि प्रेम पा लिया, मोक्ष हो गया, सत्य मिल गया। इस तरह की उक्ति ही नासमझी की है। कभी पाया नहीं जाता, कभी पूरा नहीं पड़ता।
पानी से जो प्यास बुझती है, वो बुझ सकती है क्योंकि गला भी वस्तु है, पानी भी वस्तु है, और ये प्यास पूरी तरह पदार्थनिष्ठ है, ये बुझ सकती है। अनंत की प्यास कभी बुझेगी नहीं। हाँ, वो प्यास और, और, और सूक्ष्म होती जाएगी, उस प्यास के अर्थ बदलते जाएँगे, मायने बदलते जाएँगे। मैंने आपसे कहा कि ये कभी न सोचिएगा कि प्यास बुझ सकती है, कृपा करके दूसरे छोर पर न कूद जाएँ। ये भी मत सोचने लगिए कि आप सदा प्यासे ही रहेंगे। न मैं आपसे ये कह रहा हूँ कि प्यास बुझ सकती है, न मैं ये कह रहा हूँ कि आप सदा प्यासे ही रहेंगे। आप बदलते हैं, आपकी प्यास का स्वरूप बदलता जाता है। आप वही थोड़ी रहते हैं जो प्यासा था। आप जैसे–जैसे पाते हैं, आप बदलते जाते हैं। आप बदलते हैं, आपकी प्यास वही कैसे रह जाएगी।







