आचार्य प्रशांत: जन्म से पूर्व भी कोई दिखायी नहीं देता, कोई अनुभव नहीं होता उसका। मृत्यु के पश्चात भी कोई दिखायी नहीं देता, कोई अनुभव नहीं होता उसका। ये बीच में अचानक कुछ आ जाता है, जिसको हम जीवन बोलते हैं। तो कृष्ण अर्जुन से कह रहें हैं, ‘अगर कोई मर भी गया तो वो वहीं तो गया, जहाँ वो जन्म से पूर्व था।’
तो तुम यह क्यों कहते हो कि कुछ बदल गया, तुम यह क्यों नहीं कहते कि वो अपनी सहज अवस्था को लौट गया। तुम तुलना करते हो। तुम जीवित और मृत की तुलना करते हो। तो तुम कहते हो कि अब मृत है, दिखायी नहीं देता, थोड़ी देर पहले दिखायी देता था — चलता था, फिरता था, अनुभव करता था। कृष्ण कह रहें हैं, ‘तुलना करनी ही है तो फिर उसी अवस्था से क्यों करते हो जो मृत्यु से ठीक पूर्व थी; तुम उस अवस्था से ही क्यों नहीं तुलना कर लेते जो जन्म से भी पूर्व थी?’ अब मुझे यह बताओ कि मृत्यु के पश्चात की अवस्था और जन्म के पूर्व की अवस्था अलग-अलग हैं क्या?
श्रोता: पता ही नहीं इनके बारे में।
आचार्य: और दोनों में यही साझा है न कि दोनों के बारे में हमें कुछ पता नहीं। तो इतना तो दोनों में साझा है। इतना तो हम कह ही सकते हैं कि दोनों एक हैं कि उन दोनों के बारे में कुछ कह नहीं सकते। दोनों में ही वो सब नहीं है जिसे हम आमतौर पर जीवन कहते हैं।
बात समझ रहे हो?
तो हम क्यों बार-बार यह रोते हैं, क्यों इस बात को लेकर के विलाप करते हैं कि भाई, कुछ अनिष्ट हो गया, कुछ ग़लत हो गया? वो जैसा था, वैसा हो गया। इसमें अनिष्ट क्या हो गया? बात समझ रहे हो?




