प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मेरा सवाल डर पर है। असल में पिछले दो-तीन महीनों से मैं शारीरिक रूप से एक परेशानी से जूझ रहा हूँ। अभी इलाज तो नहीं चल रहा है, डायग्नोस (निदान) करने की कोशिश कर रहे हैं डॉक्टर (चिकित्सक), लेकिन हर पड़ाव पर मैं इतना डर जाता हूँ कि अति सोच लेता हूँ, कि अब मैं बचने वाला नहीं हूँ। जाँच जैसे होती है, उसके परिणाम के पहले ही मैं सोचता हूँ कि परिणाम ख़राब होगा।
पहले कुछ जाँच हुई, बायोप्सी वगैरह हुई, बायोप्सी का नाम सुनते ही मैंने समझ लिया कि मुझे कैंसर (कर्क रोग) हो गया। उसकी अंतिम रिपोर्ट अभी नहीं आयी है, कुछ और जाँच होनी है, लेकिन हर पड़ाव पर मैं बहुत ज़्यादा डर जाता हूँ। इसकी वजह से बीच में मैंने काम एकदम छोड़ दिया था, काम हफ़्ते-दस दिन छोड़कर कुछ अवसाद जैसी स्थिति में चला गया था।
इस चीज़ से मैं कैसे बाहर आऊँ?
आचार्य प्रशांत: मैं पूछूँ कि आज से ठीक छः महीने पहले आप क्या कर रहे थे — मैं आपको कोई तारीख़ दे दूँ, कोई भी, मान लीजिए आपसे पूछूँ कि अठारह फरवरी को क्या कर रहे थे, या आप पाँच मार्च को क्या कर रहे थे — आपको याद है?
प्र: नहीं, नहीं याद है।
आचार्य: नहीं याद है। तो कुछ महीने बीतते-बीतते ही, चार-पाँच महीने बीतते-बीतते ही ज़िंदगी काफ़ी आगे निकल जाती है न?




