प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक चैप्टर पढ़ा ‘सम्बन्ध’ पुस्तक से, उसमें एक चीज़ थी जो समझ नहीं आई, 'हमारे रिश्ते ख़राब इसलिए होते हैं क्योंकि वो हमारी अपूर्णता से निकलते हैं'। पूरा जीवन जब सम्बन्ध ही है और अकेले हम रह नहीं पाते, अकेलापन महसूस भी होता है। तो फिर यह अपने अकेलेपन के साथ रहने का क्या मतलब है और हम अपने रिश्तों को ठीक कैसे रखें?
आचार्य प्रशांत: तुम्हें अकेलापन लगता है दूसरों के संदर्भ में। तुम्हें अकेलापन लगता है जब तुम्हें भीड़ दिखाई देती है, जब तुम्हें भीड़ दिखाई देती है तब तुम कहते हो कि ‘मैं अकेला हूँ’। दूसरे न हों तो कहोगे कि अकेले हो? सबसे ज़्यादा अकेला तुम अनुभव तब करते हो जब दूसरों का ख़याल आ रहा होता है। दूसरों का ख़याल न हो तो अकेला कहोगे अपनेआप को? जवाब दो। अकेलेपन की भावना और दूसरों का ख़याल, क्या ये साथ-साथ नहीं चलते?
तुम अकेले होते हो दूसरों को दूसरा बना कर। पहले तो तुम दूसरों को दूसरा घोषित करते हो उसके बाद कहते हो ‘अरे! मैं तो अकेला रह गया’। दूसरों को दूर किसने किया? दूसरों को दूर करने का काम भी तो तुम ही कर रहे हो, दूसरों को दूसरा बना भी तो तुम ही रहे हो। कौन सा नियम-क़ायदा है जो तुमसे कह रहा है कि दूसरों को दूसरा होना ही चाहिए, दूसरों से दूरी तुम्हारी होनी ही चाहिए?
प्र: तो वो वॉलन्टीयरीली (स्वेच्छा से) थोड़े ही न होता है, ऐसे ही हो जाता है।
आचार्य: नहीं, मानना पड़ेगा तुम्हें कि तुम्हारे करने से ही हुआ है। झूठ तुम्हारे ऊपर लादे गए हैं लेकिन झूठ स्वाभाव तो है नहीं तुम्हारा, तुमपर लादे गए और अपनेआप तुमने ग्रहण कर लिए है। तुमने सम्मति तो दी ही हैं न, अब अगर अकेलापन अखरता हो, तो उस सम्मति को वापस ले लो।






