जीवन में कुछ खो जाने का भय हमेशा क्यों रहता है? || आचार्य प्रशांत (2018)

आचार्य प्रशांत: मैं सवाल को थोड़ा सा पलट देता हूँ। किसी चीज़ का अगर पता ही हो कि खो जाएगी और फिर वह खो जाए, तो ज़्यादा बुरा लगता है या किसी चीज़ के बारे में धारणा हो कि नहीं खोएगी, फिर वह खो जाए तो ज़्यादा बुरा लगता है, बताइए?
श्रोता: धारणा।
आचार्य: जहाँ लगता हो कि नहीं खोएगी और फिर खो जाए, तो ज़्यादा झटका लगता है, न? ज़्यादा बुरा लग जाता है। तो चलिए अब आप बताइए ऐसा क्या है जीवन में जो नहीं खोने वाला? क्योंकि असली ख़तरा वहाँ से है जिसको आप माने बैठे हैं कि नहीं खोने वाला। तभी तो आप प्रश्न पूछ रहे हैं कि किस चीज़ के खो जाने का डर लगता है। जैसे कि कोई विशिष्ट चीज़ हो जो खोएगी और बाक़ी सबकुछ खोने नहीं वाला।
मैंने दस चीज़ें पकड़ रखी हों और फिर मैं किसी से सवाल करूँ कि बताओ मुझे किस चीज़ के खो जाने का डर है? तो बात ज़ाहिर है मैं सोच रहा हूँ कि इस दस में से एक या दो ही खोने वाली हैं और बाक़ी खोने नहीं वाली। है न? मेरा ऐसा ही विचार है, न? तो मैं अपनी दृष्टि से बड़ा उपयोगी प्रश्न पूछ रहा हूँ, मैं कह रहा हूँ, ‘मेरे पास दस चीज़ें हैं, बताइए इसमें से मुझे किस के खो जाने का डर लगता रहता है।'
मैं कह रहा हूँ, ‘तुम्हे जिसके भी खो जाने का डर लगता रहता है, वहाँ पर तुम कम ख़तरे में हो। क्योंकि कम-से-कम तुम्हें पता तो है कि वह चीज़ खो जाने वाली है। ज्यादा ख़तरा तुम्हें वहाँ है जहाँ तुम्हें लगता है कि कोई चीज़ नहीं खोने वाली।' तो मैं तुम्हें आमंत्रित कर रहा हूँ, तुम मुझे बताओ क्या है जो नहीं खोने वाला?
श्रोता: चेतना!






