कुछ भी बर्दाश्त कर लेना, पर ये नहीं || आचार्य प्रशांत (2023)

आचार्य प्रशांत: जैसे पात गिरे तरुवर से, मिलना बहुत दुहेला। न जाने किधर गिरेगा, लगया पवन का रेला।। ~ कबीर साहब
बहुत क्षणिक अवसर है ये और इस अवसर के अलावा आपके पास कोई सहारा नहीं है। बीता पल लौटकर नहीं आता। और उस बीते पल को आपने मुक्ति की तरफ़ नहीं लगाया तो एक पल और आपने दुख तैयार कर लिया। साधारणतया कोई दुखी आदमी हो तो वो बाक़ी अपनी सब धारणाएँ, कामनाएँ छोड़कर हर पल बस एक ही माँग करेगा — दुख समाप्त हो। उसके भीतर कोई विकल्प नहीं बचेगा। एक ही चीख, एक ही पुकार रहेगी लगातार, क्या? ये मेरी जैसी अभी स्थिति है, ये समाप्त हो। एक-एक बीतता पल उसको भारी पड़ेगा, नहीं पड़ेगा?
सिरदर्द भी ज़ोर का हो जाए तो घड़ी चलना बन्द कर देती है। एक-एक पल भारी पड़ता है। ज़ोर का सिरदर्द हो, आप कोशिश करते हैं कई बार कि नींद आ जाए। और सिरदर्द ही सोने नहीं देता, करवटें बदल रहे हैं। कैसी तड़प की स्थिति हो जाती है! उस समय पर कुछ भी और याद आता है? बस क्या माँगते हैं? अब फट रहा है सिर, कैसे भी दर्द समाप्त हो जाए।
हमारा जीवन उतना ही फटा हुआ है। लेकिन हमने अपने यथार्थ का क्या कर दिया है? दमन। सिरदर्द का दमन आसानी से नहीं हो सकता, हालाँकि अब चिकित्सा-विज्ञान उसका भी दमन कर देता है, ये लो एनेलजेसिक (दर्द निवारक दवा)। पर जीवन का जो दर्द है, उसको तो हम सफलतापूर्वक दबा ही देते हैं। तो पल-पल लगातार एक ही नहीं पुकार रह जाती कि मुक्ति मिले, शान्ति मिले।
जो हम कहते हैं न, 'तथ्य ही सत्य का द्वार है’, उसको ऐसे पढ़िएगा, 'दुख ही सत्य का द्वार है’, क्योंकि जो तथ्य का दर्शन करेगा, वो एक ही तथ्य पाएगा कि दुख है। दमन नहीं कर रहे हो अगर तथ्य का, तो दुख तो है ही। और दुख का दमन करने के तरीक़े हज़ार होते हैं। नयी शर्ट ख़रीद लाओ। नयी आती है तो उसमें एक कवर होगा, एक रैपर









