प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मैं अभी बहुत दबाव में हूँ। पिता जी को दिल का दौरा पड़ा था, उनको लेकर अस्पताल पहुँचा और आगे का इलाज करवाया। पर अस्पताल पहुँचकर मैं बहुत हिल गया। एक साल से मैं आपको सुन रहा हूँ। हम आपसे सीखते हैं कि हम असंग हैं, सच्चिदानन्द हैं, वो सब भूल जाते हैं। आपने कहा है कि मौत को याद रखिए, मौज को साथ रखिए, तो जब मौत दिखती है तो मौज को साथ में कैसे रखें? जब ऐसी परिस्थिति आती है तो कुछ समझ में नहीं आता।
आचार्य प्रशांत: अभी आपके पिताजी को आपकी ज़रूरत है, है न? और आपके लिए भी आवश्यक है कि आप उनके लिए जो अच्छे-से-अच्छा हो सकता है वो करें। आप उनके लिए अच्छे-से-अच्छा तभी कर पाऍंगे जब भीतर से आप एकदम स्थिर और स्थायी रहेंगे। भीतर अगर दृढ़ता, स्थिरता नहीं है तो जो फिर बाहरी स्थितियॉं होती हैं उनमें व्यक्ति ग़लत निर्णय लेने लगता है। और भीतर की ही स्थिरता को आत्मा कहते हैं।
तो ये तो छोड़िए कि अध्यात्म से आपने जो सीखा वो ऐसी स्थिति में आप भूलने लगते हैं, ऐसी ही स्थिति में अध्यात्म से आपने जो सीखा, उसको पकड़कर रखना और ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि अब जो मुद्दा है, जीवन-मृत्यु का है, संवेदनशील है। है न? कई तरीक़े के आपको निर्णय करने पड़ेंगे। हो सकता है इलाज लम्बा चले, उसमें आपको धैर्य दर्शाना पड़ेगा। और ये सब बातें माॅंगती हैं कि मन आत्मस्थ रहे। नहीं तो टूटने के, बिखरने के, ग़लत फ़ैसले लेने के बहुत मौके रहते हैं, सम्भावना रहती है।
अध्यात्म और किसलिए होता है? इसीलिए तो कि बाहर जब बहुत तरीक़े के तूफ़ान चलें, तो भी आपका केन्द्र डगमग न होने लगे। आत्मा ऐसी होती है जैसे भीतर — बहुत तरीक़े से उसको बोलते हैं पर एक तरीक़ा ये भी है — जैसे भीतर एक खूॅंटा गड़ा हो गहरा और उस खूॅंटे से बॅंधा हुआ है आपका जीवन। अब बाहर हवाएँ चल रही हैं, आँधिया हों, कुछ हों, वो आपको उड़ाकर नहीं ले जा सकतीं, क्योंकि आप उस खूॅंटे से बॅंधे हुए हो। और ऐसे ही समय में तो उस खूॅंटे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है न। नहीं तो ये सब ऑंधियाँ, चक्रवात आपको न जाने कहाँ को उठा ले जाऍंगे, कहाँ को पटक देंगे।







