जब किसी को खोना पड़े || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते गुरुजी। मेरा नाम चिराग है। मैं इक्कीस साल का हूँ। दिल्ली शहर का निवासी हूँ और बहुत सौभाग्यशाली ख़ुद को महसूस कर रहा हूँ, आपको अपने सामने देखकर और आपकी मेरे जीवन में क्या भूमिका रही है, इसका मेरा यहाँ जीवित खड़ा होना स्वयं प्रमाण है। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ? आप मेरे को तब मिले थे जब मेरा ब्रेकअप हुआ था और उस टाइम पर अपनेआप को बहुत ज़्यादा बिखरा हुआ, संसार का दुखी व्यक्ति महसूस कर रहा था। पर आपकी बातें सुनने के बाद समझ में आया कितनी बेवकूफ़ी कर रहा था और आपका बहुत योगदान था, जिस वजह से अपनेआप को ओवरकम कर पाया उस चीज़ से।
इस चीज़ के सिर्फ़ दो महीने बाद ही मेरा बचपन का दोस्त जिसके साथ मैं खेला हूँ, कूदा हूँ, सबकुछ मौज-मस्ती करी है, उसकी एक कार एक्सीडेंट में आकस्मिक मृत्यु हो गयी। इससे जूझ ही रहा था कि अगले दो महीने बाद मेरी माता जी की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गयी। मेरे पिताजी, जब मैं दस साल का था तब उनकी मृत्यु हो गयी थी और उसके बाद से मेरी माँ ने मुझे पढ़ाया-लिखाया, सबकुछ करा। माँ की मृत्यु के बाद मैं बहुत ज़्यादा बिखर गया था, बहुत ही ज़्यादा। आप थे जिसके सहारे से कहीं-न-कहीं ख़ुद को खड़ा करने में मैं सामर्थ्य हासिल कर पाया। अपनेआप को गिरने नहीं देता।
फिर पिछले महीने जून में मेरा एक और दोस्त जो डिप्रेशन से जूझ रहा था। रात को तीन बजे मेरी उससे फ़ोन पर बात हो रही है और उसकी आवाज़ बहुत नम हो रखी है फ़ोन पर, उसको समझा रहा हूँ कि सब ठीक हो जाएगा, पर सुबह ग्यारह बजे उसने फाँसी लगा ली।
इन बीते सात महीनों में मैंने लगभग अपने जीवन में क़रीबी चार लोगों को खो दिया। मेरा आपसे दो सवाल है। एक जब इस तरीक़े से अकेलापन हमको पकड़ लेता है और अपनों की यादें, क्योंकि उनके जो डेड फेसेस (मृत चेहरे) मैंने देखे हैं, जब मेरे सामने मौज-मस्ती करते थे, हँसते थे, मुस्कुराते थे, वो चेहरे मुझे याद हैं, उनके मृत चेहरे मुझे याद हैं। तो वो जो मंजर मेरी आँखों के सामने आते हैं, तो मैं बहुत बेबस हो जाता हूँ, बहुत ही ज़्यादा।






