जितना अपनों की मृत्यु का दुख होता है, उतना ही अपनी मृत्यु का भय होता है। उनकी मृत्यु हमारी मृत्यु की याद दिलाती है। किसी की भी मृत्यु के दुख के मूल में अज्ञान बैठा है। जब अज्ञान नहीं रहता, तो रिश्ते में बिछुड़ने का डर नहीं रहता। रिश्ते में एक संपूर्णता रहती है। अभी ही पूरा है, तो आगे के लिए कुछ बचा नहीं है। जब रिश्ता ऐसा होता है, तो फिर उसमें विदाई भी सहज रहती है। किसी के साथ कामना का रिश्ता बनाओगे, तो दुख ही पाओगे।
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प्रश्नकर्ता: हम अहंकार के कारण इतना जानते हैं खुद को जितने शरीर है क्योंकि जानने वाला भी शरीर होता है। तो अगर केवल शरीर से जो भी जाना जा रहा है, शरीर के थ्रू, उसकी नेति नेति कर के फिर, मतलब जो मैं शरीर के थ्रू जान रहा हूँ इसलिए मैं खुद को शरीर जान रहा हूँ। जो भी मैं शरीर के थ्रू जानता हूँ, उसपर विश्वास हो जाता है या फिर..
आचार्य प्रशांत: जो आप बोल रहे हो, वो बिल्कुल ठीक है। जो शरीर के लिए है, वो शरीर के लिए तो तथ्य है ही न तो उसको वहीं पर रोक दो, शरीर के लिए तथ्य है, आप क्यों बीच में घुस रहे हो? ठंड शरीर के लिए तथ्य है। आप मत घुसो, विश्वास ठीक है वो, कोई यहाँ पे लाके, गरम चिमटा लगा दे। आप बोलो के विश्वास नहीं करना, क्यों नहीं करना है। शरीर है, उसपे तापमान डालोगे तो वो शरीर के लिए है, शरीर रहे। इससे यह आवश्यक थोड़ी हो जाता है कि वो शरीर के भीतर वो भी रहे।
जो कहता है कि ‘मैं’, उसका होना क्यों ज़रुरी है। कोई लाके यहाँ कुछ गरमा-गरम छुआ देता है, तो ‘मैं’ से पूछ के हाथ हटता है? क्या होता है रिफ्लेक्स ऐक्शन में? ‘मैं’ के लिए समय भी होता है? हम ही है कर्ता, मैं ही हूँ। बस, जहाँ समय नहीं रहता, वहाँ थोड़ी उसकी पोल खुल जाती है। इसी लिए अहम् और समय साथ साथ चलते हैं। इसमें भी अगर धीरे-धीरे यहाँ पर गर्मी लगे, तो अहम् दावा ठोक देगा।




