भगवान बुद्ध की शिक्षा || आचार्य प्रशांत, महात्मा बुद्ध पर (2019)

आचार्य प्रशांत: अभी वहाँ से एक पत्ता गिरा नीचे। आम आदमी हरियाली में ही खोया रहता है, अपने पाँव के नीचे जो पत्ते हैं उनको थोड़ा कम ही देखता है। बुद्ध का मन ऐसा कि एक पत्ते को गिरता हुआ देखा और पूछने लगे कि सब पत्ते गिरेंगे क्या। जवाब मिला — हाँ। उन्होंने कहा, 'फिर किसके साथ रिश्ता बनाऊँ? किस पर उम्मीद टिकाऊँ? सब यदि नश्वर ही है, सबकुछ अगर जराजीर्ण ही हो जाना है, तो फिर सुख-चैन कहाँ है?' तमाम जगह उन्होंने सवाल पूछे, खोज करी और पाया यह कि दुख पत्ते के गिरने में नहीं है, दुख है इस कामना में कि पत्ता सतत् शाश्वत रहे।
हम उसमें अमरता चाह रहे होते हैं जो मरणधर्मा है। हम जान-बूझकर अपनेआप को धोखे में रखते हैं। एक पत्ते का गिरना काफ़ी होना चाहिए हमें ये बताने के लिए कि ये सब हरीतिमा नश्वर ही है। पर प्रमाण सामने होता है, हम प्रमाद में खोये रहते हैं। जब सुख मिल रहा होता है तो लगता है कि सुख अनवरत मिलता रहे। कामना बन जाती है कि जो जैसा है सुख के पल में, वो वैसा ही ठहर जाए, वो वैसा ही स्थिर हो जाए और वो वैसा रुकता नहीं, टिकता नहीं।
तो खोज की बुद्ध ने कि आदमी का ये आत्मघाती, आत्मप्रवंचना-युक्त व्यवहार आता कहाँ से है। आदमी जानता है कि उसका दुख उसकी झूठी कामना से उत्पन्न है, फिर भी वो कामना को क्यों पकड़ कर रखता है? क्यों पकड़ कर रखता है? आदमी अपनेआप को क्यों छलता है? आदमी अपनी कामना के समर्थन में क्यों खड़ा हो जाता है? माया है क्या?
बुद्ध ने बड़ी खोज के बाद कहा कि इनका उत्तर देने से कोई लाभ नहीं है। उन्होंने कहा, 'मैं चिकित्सक हूँ, मरीज़ ठीक होना चाहिए, यह प्राथमिक बात है। इस बात का बहुत महत्त्व नहीं है कि उसको सैद्धांतिक रूप से, किताबी तरीक़े से यह समझा दिया जाए कि उसकी बीमारी की उत्पत्ति क्या है।' उन्होंने कहा, 'कोई समझ जाए कि बीमारी का मूल क्या है, बीमारी की प्रक्रिया क्या है, तो अच्छी बात है; नहीं भी समझे तो भी इलाज़ तो ज़रूरी है न।' चिकित्सक ये प्रतीक्षा तो नहीं कर सकता कि रोगी बीमारी को पूरी तरह समझेगा, उसे तो उपचार करना है। तो बुद्ध ने फिर उपचार बताया और बुद्ध का उपचार था 'सम्यकता'।


