आचार्य प्रशांत: शरीर के भीतर उसको तलाशोगे जो शरीर के साथ ख़त्म नहीं होगा तो मिलेगा नहीं। तलाशोगे नहीं तो वो मौजूद है और तुम्हें शांति दे रहा है।
तुम कहोगे कि गये थे; आचार्य जी ने बोला कि कबीर तो मौत पर हँसते हैं; उन्हें कुछ ऐसा मिला हुआ है जो अमर है; तो हम भी तलाशें ज़रा उसे कि क्या अमर है; हमारे भीतर क्या है जो चिता के साथ जलेगा नहीं?
तो तलाशने बैठोगे तो पाओगे नहीं। तुम अपनेआप को जो भी कुछ जानते हो, तुम जो तलाशते हो, तुम जिसकी तलाश करते हो, तुम जिस क्षेत्र में तलाश कर सकते हो, उस क्षेत्र में तो सब कुछ जल ही जाना है चिता पर।
हाँ, तलाशो नहीं तो है। तलाशने वाला ही तो गड़बड़ है; तलाशने वाला ही एक गलत उपकरण है। वो जिस क्षेत्र में तलाशता है, वो क्षेत्र ही अवैध है। तलाशो नहीं तो अमर है। और, और निष्कर्ष निकालने की भूख है तुममें तो निष्कर्ष ही रह जाएँगे, सत्य नहीं मिलेगा।
बड़ी पुरानी आदत है न कि ये सब सुना, उसके बाद कहने लगे कि ठीक है। हम से कहा गया कि मृत्यु पर हँसा जा सकता है मतलब कुछ है हममें जो अमर है। तुममें तो कुछ नहीं है जो अमर है, हाँ फिर भी तुम अमर हो। अमर तुम हो पर तुम्हारी अमरता का कोई मानसिक प्रमाण नहीं हो सकता। इसलिए कहा कि श्रद्धा चाहिए।
कबीर से जाकर कहोगे कि सिद्ध कीजिए कि आप अमर हैं, हँस ही देंगे। बात सिद्ध की जा सकती नहीं, अप्रमेय है। उनके होने में ही बात का प्रमाण है, उनकी मस्ती में ही अमरता का प्रमाण है। कबीर को देखकर के तुम्हें नहीं दिखाई दे रहा कि कुछ है जो मरेगा नहीं तो फिर कोई प्रमाण तुम्हें मनवा नहीं सकता। और अगर तुम तुले हो सिद्ध करने पर कि नहीं सब कुछ मरता है तो तुम जीत जाओगे। तुम प्रमाणित कर ले जाओगे। तुम कहोगे, ‘ये देखो, ये कबीर की आँखें जल गयी। ये कबीर के वचन, मिट गए। ये कबीर के कपड़ें, गल गये। ये कबीर की हड्डियाँ, राख़ हो गयी। क्या बचा?’ तुम सिद्ध कर ले जाओगे कि कबीर यूँ ही झूठ-मूठ कहते थे कि एक कबीरा न मरा — कबीर तो मर गया। तुम कहोगे, "अरे बड़ी गलतफ़हमी थी कबीर को।"







